जन्माष्टमी पूजा विधि
कृष्ण · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
घर में जन्माष्टमी की पूजा: दिन का व्रत, आधी रात को श्री कृष्ण के जन्म पर पंचामृत अभिषेक, पालना, भोग, आरती और पारण, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

आरती · कृष्ण, राधा-कृष्ण
श्रीकृष्ण की सबसे प्रसिद्ध आरती, जिसमें वृंदावन वाले श्याम का रूप है। जन्माष्टमी और रोज़ की पूजा के लिए पूरा पाठ, अर्थ और पाठभेद।
आरती कुंजबिहारी की,श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
अर्थ: आइए, कुंजों में विहार करने वाले, गोवर्धन पर्वत उठाने वाले मुरारी श्रीकृष्ण की आरती करें।
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।
॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
अर्थ: उनके गले में वैजयंती माला है और वे मधुर स्वर में मुरली बजाते हैं। कानों में कुंडल झिलमिलाते हैं; वे नंद बाबा के आनंद, नंद के लाल हैं।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।लतन में ठाढ़े बनमाली,भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक,ललित छवि श्यामा प्यारी की।
॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
अर्थ: उनके अंगों की कांति आकाश जैसी साँवली है, और हे सखी, साथ में राधिका जी चमक रही हैं। वनमाला पहने श्याम लताओं के बीच खड़े हैं: भौंरों जैसी काली लटें, माथे पर कस्तूरी का तिलक और चंद्रमा जैसी आभा। यह श्यामा जी के प्यारे की सुंदर छवि है।
कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।गगन सों सुमन रासि बरसै,बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग,अतुल रति गोप कुमारी की।
॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
अर्थ: उनका सोने का मोर-मुकुट शोभा पा रहा है, और देवता उनके दर्शन को तरसते हैं। आकाश से फूलों की वर्षा हो रही है; मुरचंग और मधुर मृदंग बज रहे हैं, साथ में ग्वालिनें हैं। ये वही हैं जिनसे गोपकुमारियों का अतुलनीय प्रेम है।
जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्री गंगा।स्मरन ते होत मोह भंगा,बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच,चरन छवि श्री बनवारी की।
॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
अर्थ: जिन चरणों से कलियुग का मैल हरने वाली श्री गंगा प्रकट हुईं, जिनके स्मरण से मोह टूट जाता है, और जो गंगा शिव जी के सिर पर जटाओं के बीच बसकर पाप का कीचड़ धोती हैं, यह श्री बनवारी के उन्हीं चरणों की छवि है।
चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू।चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू,हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद,टेर सुन दीन दुखारी की।
॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
अर्थ: (यमुना के) तट की उजली रेत चमक रही है और वृंदावन में बाँसुरी बज रही है। चारों ओर गोपियाँ, ग्वाल और गायें हैं। चाँदनी में श्याम धीमे-धीमे मुस्कुरा रहे हैं, जिससे संसार के बंधन कट जाते हैं। हे प्रभु, इस दीन-दुखी की पुकार सुनो।
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“आरती कुंजबिहारी की” श्रीकृष्ण की सबसे प्रसिद्ध आरती है, जो जन्माष्टमी पर, लड्डू गोपाल की सेवा में और रोज़ की पूजा में गाई जाती है। ब्रजभाषा की इस आरती में श्रीकृष्ण का वृंदावन वाला रूप है: गले में वैजयंती माला, होंठों पर मुरली, सिर पर मोर-मुकुट, साथ में राधिका जी, और चारों ओर गोपियाँ, ग्वाल और गायें।
इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है। गीता प्रेस के आरती-संग्रह में यह “भगवान् कुंजबिहारी” शीर्षक से है, और उसमें पहली दो पंक्तियाँ अपना अलग अंतरा हैं; यहाँ वही बँटवारा रखा है। पाठ घरों में गाया जाने वाला है; जहाँ स्रोत अलग थे, वहाँ गीता प्रेस से मेल खाता शब्द चुना है।
आइए, कुंजों में विहार करने वाले, गोवर्धन पर्वत उठाने वाले मुरारी श्रीकृष्ण की आरती करें।
उनके गले में वैजयंती माला है और वे मधुर स्वर में मुरली बजाते हैं। कानों में कुंडल झिलमिलाते हैं; वे नंद बाबा के आनंद, नंद के लाल हैं।
उनके अंगों की कांति आकाश जैसी साँवली है, और हे सखी, साथ में राधिका जी चमक रही हैं। वनमाला पहने श्याम लताओं के बीच खड़े हैं: भौंरों जैसी काली लटें, माथे पर कस्तूरी का तिलक और चंद्रमा जैसी आभा। यह श्यामा जी के प्यारे की सुंदर छवि है।
उनका सोने का मोर-मुकुट शोभा पा रहा है, और देवता उनके दर्शन को तरसते हैं। आकाश से फूलों की वर्षा हो रही है; मुरचंग और मधुर मृदंग बज रहे हैं, साथ में ग्वालिनें हैं। ये वही हैं जिनसे गोपकुमारियों का अतुलनीय प्रेम है।
जिन चरणों से कलियुग का मैल हरने वाली श्री गंगा प्रकट हुईं, जिनके स्मरण से मोह टूट जाता है, और जो गंगा शिव जी के सिर पर जटाओं के बीच बसकर पाप का कीचड़ धोती हैं, यह श्री बनवारी के उन्हीं चरणों की छवि है।
(यमुना के) तट की उजली रेत चमक रही है और वृंदावन में बाँसुरी बज रही है। चारों ओर गोपियाँ, ग्वाल और गायें हैं। चाँदनी में श्याम धीमे-धीमे मुस्कुरा रहे हैं, जिससे संसार के बंधन कट जाते हैं। हे प्रभु, इस दीन-दुखी की पुकार सुनो।
यह आरती श्रीकृष्ण को किसी मंदिर के गर्भगृह में नहीं, वृंदावन के कुंजों में दिखाती है। पहले उनका रूप आता है: वैजयंती माला, मुरली, कुंडल, आकाश जैसा साँवला रंग, भौंरों जैसी लटें, कस्तूरी का तिलक, सोने का मोर-मुकुट। साथ में राधिका जी हैं, चारों ओर ग्वालिनें, आकाश से फूल बरस रहे हैं और देवता भी उनके दर्शन को तरस रहे हैं।
चौथे अंतरे में आरती उनके चरणों की महिमा कहती है: उन्हीं चरणों से गंगा निकलीं, जो शिव जी की जटाओं में बसकर संसार के पाप धोती हैं। अंतिम अंतरा फिर वृंदावन की चाँदनी रात में लौटता है, जहाँ श्याम की मंद मुस्कान ही संसार के बंधन काट देती है। अंत में भक्त अपने लिए बस इतना कहता है: इस दीन-दुखी की पुकार सुन लो।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| अंतरा 1 और 2 | (एक ही अंतरा) | भक्ति भारत और द्रिक पंचांग “गले में बैजंती माला” से “ललित छवि श्यामा प्यारी की” तक को एक अंतरा मानते हैं; गीता प्रेस पहली दो पंक्तियों के बाद “श्रीगिरधर०” देकर उन्हें अलग अंतरा बनाता है। |
| अंतरा 4 | जहाँ ते प्रगट भई गंगा, सकल-मल-हारिणि श्रीगंगा | गीता प्रेस; भक्ति भारत में “सकल मन हारिणि”। द्रिक पंचांग, sanskritdocuments.org और वेबदुनिया में “कलुष कलि हारिणि”। |
| अंतरा 5 | टेर सुन दीन भिखारी की | द्रिक पंचांग, sanskritdocuments.org और वेबदुनिया; गीता प्रेस और भक्ति भारत में “दीन दुखारी”। |
| अंतरा 3 | गगन से सुमन राशि बरसैं, बजै मुरचंग मधुर मृदंग | वेबदुनिया की वर्तनी। |
गीता प्रेस के पाठ में ब्रज वर्तनी है, जैसे “कृष्नमुरारी”, “छबि”, “स्यामा”।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति भक्ति भारत, द्रिक पंचांग, गीता प्रेस के आरती-संग्रह (कोड 153, archive.org पर स्कैन से पढ़ा गया पाठ) और वेबदुनिया से मिलाई; sanskritdocuments.org के आरती संग्रह से भी तुलना की। हर पंक्ति कम से कम दो स्रोतों में है (वर्तनी के छोटे अंतर छोड़कर)। पाठ भक्ति भारत और द्रिक पंचांग का प्रचलित रूप है; अंतरों का बँटवारा गीता प्रेस जैसा (पहली दो पंक्तियाँ अलग अंतरा)। जहाँ वेब स्रोत अलग थे, वहाँ गीता प्रेस से मेल खाता शब्द चुना: “टेर सुन दीन दुखारी की” (गीता प्रेस, भक्ति भारत)। अंतरा 4 में गीता प्रेस का “सकल-मल-हारिणि” किसी दूसरे स्रोत में ठीक नहीं मिला (भक्ति भारत में “सकल मन हारिणि”), इसलिए बहुमत का “कलुष कलि हारिणि” रखा। sanskritdocuments.org के इस आरती के पाठ में कई शब्द बिगड़े हैं (“अजेमुरचन”, “खटक भव भन्ज”), इसलिए उसे संदर्भ-फ़ाइल नहीं बनाया।
कृष्ण · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
घर में जन्माष्टमी की पूजा: दिन का व्रत, आधी रात को श्री कृष्ण के जन्म पर पंचामृत अभिषेक, पालना, भोग, आरती और पारण, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
कृष्ण · चालीसा
बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम
कृष्ण, बाल गोपाल · अष्टकम् · संस्कृत
अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम्
कृष्ण · अष्टकम् · संस्कृत
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्
कृष्ण, बाल गोपाल · अष्टकम् · संस्कृत
नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं
विष्णु, कृष्ण · अष्टकम् · संस्कृत
अच्युतं केशवं रामनारायणं
कुंज यानी लताओं और पेड़ों का झुरमुट, और बिहारी यानी विहार करने वाले। वृंदावन के कुंजों में लीला करने वाले श्रीकृष्ण को कुंजबिहारी कहते हैं।
गिरिधर: जिन्होंने गोवर्धन पर्वत उठाया। मुरारी: मुर नाम के असुर के शत्रु। ये तीनों श्रीकृष्ण के ही नाम हैं।
पुराणों की कथा है कि गंगा भगवान विष्णु के चरणों से निकलीं और फिर शिव जी की जटाओं में उतरीं। आरती श्रीकृष्ण को वही भगवान मानकर उनके चरणों की महिमा गाती है।
इसके रचयिता का नाम आरती में नहीं आता और किसी विश्वसनीय स्रोत में भी नहीं मिलता।
आधी रात को श्रीकृष्ण-जन्म की पूजा और अभिषेक के बाद यह आरती गाई जाती है। लड्डू गोपाल की रोज़ की सेवा में भी इसे सुबह और शाम गा सकते हैं।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।