कृष्ण

पूजा विधि · कृष्ण · त्योहार की पूजा

जन्माष्टमी पूजा विधि

घर में जन्माष्टमी की पूजा: दिन का व्रत, आधी रात को श्री कृष्ण के जन्म पर पंचामृत अभिषेक, पालना, भोग, आरती और पारण, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

इस पेज पर
  1. परिचय
  2. एक नज़र में
  3. कब करें
  4. सामग्री
  5. तैयारी
  6. चित्र या मूर्ति
  7. संकल्प
  8. चरण-दर-चरण विधि
  9. पाठ
  10. भोग
  11. समापन
  12. छोटी विधि
  13. परंपराओं में अंतर
  14. ये भी पढ़ें
  15. स्रोत
  16. सवाल-जवाब
  17. सुधार सुझाएँ
त्योहार की पूजा

यह घर में जन्माष्टमी की पूजा है: दिन का व्रत (अपनी क्षमता के अनुसार), आधी रात को श्री कृष्ण के जन्म के समय पंचामृत अभिषेक, शृंगार, पालना, भोग, आरती और फिर पारण। मंदिरों का विशाल अभिषेक, पुरुषसूक्त जैसे वैदिक मंत्रों से षोडशोपचार और दही-हांडी जैसे सामुदायिक उत्सव यहाँ नहीं हैं। रोज़ की सेवा के लिए लड्डू गोपाल की सेवा विधि देखें।

परिचय

भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की आधी रात को मथुरा के कारागार में देवकी और वसुदेव के घर श्री कृष्ण का जन्म हुआ, और उसी रात वसुदेव उन्हें यमुना पार गोकुल में यशोदा और नंद के घर छोड़ आए। जन्माष्टमी इसी जन्म का उत्सव है। इसलिए इसकी मुख्य पूजा आधी रात को होती है: दिन भर व्रत और कीर्तन, और रात को जन्म के क्षण पर शंख-घंटी, अभिषेक, नए वस्त्र, पालना और भोग।

इस पूजा का भाव घर में बच्चे के जन्म की ख़ुशी जैसा है। बड़ी झाँकी, छप्पन भोग या चाँदी का पालना ज़रूरी नहीं; एक छोटी मूर्ति या चित्र, थोड़ा दूध-जल, एक तुलसीदल और प्रेम से गाया एक भजन भी उतना ही सच्चा उत्सव है। नीचे हर चरण के साथ उसका सरल विकल्प दिया है।

एक नज़र में

समय
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी; मुख्य पूजा आधी रात (निशीथ काल) में
अवधि
रात की पूजा लगभग 45–60 मिनट; दिन में कीर्तन अपनी इच्छा से
कौन कर सकता है
पूरा परिवार; व्रत हर कोई अपनी सेहत के अनुसार
मुख्य सामग्री
पंचामृत, नई पोशाक, पालना, तुलसीदल, माखन-मिश्री, पंजीरी, दीपक
आरती
आरती कुंजबिहारी की

पूजा कब करें

  • जन्माष्टमी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है; अमांत पंचांग में यही तिथि श्रावण कृष्ण अष्टमी कहलाती है। श्री कृष्ण का जन्म आधी रात को माना जाता है, इसलिए मुख्य पूजा आधी रात के निशीथ काल में होती है।
  • जन्माष्टमी अक्सर दो दिन पड़ती है: गृहस्थ (स्मार्त) पहले दिन और वैष्णव परंपरा कई बार अगले दिन मनाती है; तारीख़ तय करने में अष्टमी तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र भी देखा जाता है। इस साल की तारीख़, तिथि का समय और निशीथ काल साइट के जन्माष्टमी पन्ने पर है; अपने मंदिर या स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।
  • व्रत सुबह से रखा जाता है। पारण, यानी व्रत खोलना, परंपरा के अनुसार आधी रात की पूजा के बाद प्रसाद से, या अगली सुबह किया जाता है।

पूजा सामग्री

  • आवश्यक इसके बिना यह विधि नहीं होती
  • वैकल्पिक हो तो अच्छा; न हो तो विकल्प दिया है
  • परंपरा-विशेष कुछ परंपराओं में ही
सामग्रीउपयोगस्थितिविकल्प / टिप्पणी
बाल कृष्ण या लड्डू गोपाल की मूर्तिअभिषेक, शृंगार और पालने के लिएवैकल्पिकमूर्ति न हो तो बाल कृष्ण का चित्र; अभिषेक की जगह फूल से जल-दूध के छींटे दें।
पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, मिश्री)जन्म के बाद अभिषेक के लिएवैकल्पिकपाँचों चीज़ें न हों तो केवल दूध और फिर जल से स्नान; यह भी न हो तो शुद्ध जल ही।
शंखजन्म के क्षण बजाने और अभिषेक के लिएपरंपरा-विशेषन हो तो घंटी बजाएँ और लोटे से अभिषेक करें।
अभिषेक के लिए बड़ी थाली या परातमूर्ति को बिठाकर स्नान कराने के लिएवैकल्पिककोई भी साफ़ बड़ा बर्तन।
नई पोशाक, मुकुट, मोरपंख, बाँसुरी, मालाजन्म के बाद शृंगार के लिएवैकल्पिकनई पोशाक न हो तो साफ़ धुली पोशाक; मोरपंख और फूल ही सुंदर शृंगार हैं।
पालना या झूलाजन्म के बाद लाला को झुलाने के लिएपरंपरा-विशेषपालना न हो तो छोटी टोकरी में मुलायम कपड़ा बिछाकर फूलों से सजा दें।
तुलसीदलपूजा और हर भोग के लिएआवश्यकपरंपरा में भगवान का भोग तुलसी के साथ ही लगता है (गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश)। एक दिन पहले तोड़कर रख लें; न मिले तो मन से अर्पित करें।
भोग: माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी, पंचामृत, फल, मेवेजन्म के बाद भोग के लिएवैकल्पिकजो बन सके; माखन-मिश्री या केवल मिश्री और तुलसी भी पूरा भोग है।
फूल, फूलमाला और सजावटपूजा-स्थान, झाँकी और पालना सजाने के लिएवैकल्पिकघर में जो फूल-पत्तियाँ हों, उन्हीं से सजाएँ।
घी का दीपक, धूप और कपूरपूजा और आरती के लिएवैकल्पिकघी न हो तो तिल के तेल का दीपक।
चंदन या केसरतिलक के लिएवैकल्पिकन हो तो छोड़ दें।

स्थान और अपनी तैयारी

  • दिन में घर और पूजा-स्थान की सफ़ाई करें और फूल, पत्तियों और रंगोली से सजाएँ। कई घरों में दरवाज़े से पूजा-घर तक छोटे-छोटे पैरों के निशान बनाए जाते हैं, मानो बाल कृष्ण घर में आ रहे हों।
  • रात की पूजा से पहले स्नान करें या कम से कम हाथ-मुँह धोकर साफ़ कपड़े पहनें।
  • पूजा के समय परिवार साथ बैठे; बच्चों को घंटी, शंख और पालना झुलाने का काम दें।

चित्र या मूर्ति कैसे रखें

  • चौकी पर साफ़ कपड़ा बिछाकर बाल कृष्ण की मूर्ति या चित्र रखें; पास में सजा हुआ पालना। चाहें तो पीछे गोकुल या मथुरा की छोटी झाँकी बनाएँ।
  • अभिषेक के लिए परात, पंचामृत की अलग-अलग कटोरियाँ, शुद्ध जल का लोटा और शंख पहले से तैयार रखें। नई पोशाक और शृंगार का सामान पास में रहे।
  • पूजा करने वाले की दाहिनी ओर घी का दीपक, बाईं ओर जल का कलश और धूप रहे; भोग भगवान के सामने। मुख आमतौर पर पूर्व या उत्तर की ओर रखा जाता है; परंपराओं में इसमें अंतर है।

संकल्प

जन्माष्टमी के दिन सुबह स्नान के बाद व्रत और रात की पूजा का संकल्प लिया जाता है। हाथ में जल, फूल और तुलसीदल लेकर संकल्प बोलें और जल थाली में छोड़ दें।

हे श्री कृष्ण, आज जन्माष्टमी के दिन मैं (अपना नाम) अपनी शक्ति के अनुसार व्रत रखकर रात को आपके जन्म का उत्सव मनाऊँगा/मनाऊँगी। मेरी यह छोटी-सी सेवा स्वीकार करें।

व्रत कैसा हो, निर्जल, फलाहार या एक समय भोजन, यह संकल्प में अपनी सेहत देखकर तय करें। बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती स्त्रियाँ, दवा लेने वाले और बच्चे व्रत न रखें या केवल हल्का फलाहार रखें; उनका पूजा में शामिल होना ही काफ़ी है।

पूजा की विधि, चरण-दर-चरण

  1. १सुबह संकल्प और व्रत

    क्या करें
    सुबह स्नान के बाद व्रत और रात की पूजा का संकल्प लें।
    कैसे करें
    दीपक जलाकर ऊपर दिया संकल्प बोलें। दिन में अपनी क्षमता के अनुसार निर्जल, फलाहार या एक समय का व्रत रखें।
    भाव
    आज का दिन लाला के आने की प्रतीक्षा का दिन है।
    विकल्प
    व्रत न रख सकें तो सात्त्विक भोजन करें और रात की पूजा में मन से शामिल हों।
  2. २घर और झाँकी सजाना

    क्या करें
    पूजा-स्थान, पालना और घर सजाएँ।
    कैसे करें
    फूलों, पत्तियों, रंगोली और दीयों से सजाएँ। पालने में मुलायम बिछौना लगाएँ। दरवाज़े से पूजा-घर तक छोटे पैरों के निशान बना सकते हैं।
    भाव
    जैसे घर में नए मेहमान के आने की तैयारी होती है।
    विकल्प
    सजावट थोड़ी हो तो भी चलेगा; साफ़-सुथरा स्थान ही सबसे सुंदर सजावट है।
  3. ३दिन में नाम-कीर्तन

    क्या करें
    दिन में और शाम को नाम-कीर्तन, भजन या कृष्ण-कथा करें।
    कैसे करें
    परिवार के साथ महामंत्र या भजन गाएँ; समय हो तो श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध से जन्म-कथा पढ़ें या सुनें।
    भाव
    प्रतीक्षा का समय भगवान के नाम में बीते।
    पाठ

    हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
    हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥

    अर्थ: हे हरे, हे कृष्ण, हे राम: भगवान को उनके नामों से प्रेम से पुकारना।

    मंत्र का अर्थ और उच्चारण

    विकल्प
    जो भजन या नाम आपको अच्छा लगे, वही गाएँ।
  4. ४रात की तैयारी और ध्यान

    क्या करें
    निशीथ काल से कुछ पहले परिवार के साथ बैठें, दीपक जलाएँ और भगवान का ध्यान करें।
    कैसे करें
    अभिषेक, शृंगार और भोग का सामान पास रख लें। दीपक जलाकर हाथ में फूल लें, नीचे का श्लोक पढ़ें और फूल चरणों में रख दें।
    भाव
    कारागार की अँधेरी रात में प्रकट होने वाले भगवान का स्मरण।
    पाठ

    वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
    देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

    अर्थ: वसुदेव के पुत्र, कंस और चाणूर का अंत करने वाले, देवकी को परम आनंद देने वाले, जगत के गुरु श्री कृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।

    कृष्णाष्टकम् (वसुदेवसुतं देवं): पूरा पाठ और अर्थ

    विकल्प
    श्लोक न पढ़ सकें तो 'जय श्री कृष्ण' कहकर फूल चढ़ाएँ।
  5. ५जन्म का क्षण

    क्या करें
    निशीथ काल में, आधी रात को, शंख और घंटी बजाकर श्री कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाएँ।
    कैसे करें
    जिन घरों में मूर्ति को कपड़े से ढककर रखा जाता है, वहाँ इस समय कपड़ा हटाया जाता है। शंख बजाएँ, घंटियाँ बजाएँ, 'नंदलाल की जय' या 'जय कन्हैया लाल की' बोलें।
    भाव
    घर में बच्चे के जन्म जैसी ख़ुशी: लाला आ गए।
    विकल्प
    शंख न हो तो घंटी, थाली या ताली से ही आनंद मनाएँ।
  6. ६पंचामृत अभिषेक

    क्या करें
    मूर्ति को परात में बिठाकर पंचामृत से अभिषेक करें।
    कैसे करें
    पहले शुद्ध जल, फिर क्रम से दूध, दही, घी, शहद और मिश्री (या पहले से मिलाया पंचामृत) धीरे-धीरे चढ़ाएँ; शंख हो तो उसी से। अभिषेक का पंचामृत एक बर्तन में इकट्ठा करें; यही चरणामृत प्रसाद बनेगा।
    भाव
    नवजात लाला का पहला स्नान, बहुत कोमलता से।
    पाठ

    पयो दधि घृतं चैव मधु च शर्करान्वितम्।
    पञ्चामृतं मयाऽऽनीतं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्॥

    अर्थ: दूध, दही, घी, शहद और शक्कर मिलाकर यह पंचामृत मैं लाया हूँ; स्नान के लिए इसे स्वीकार करें।

    स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: पंचामृत-स्नान का श्लोक (देवपूजा का सामान्य विधान)

    विकल्प
    चित्र हो तो फूल से पंचामृत या दूध के कुछ छींटे दें।
  7. ७शुद्ध जल से स्नान और शृंगार

    क्या करें
    पंचामृत के बाद शुद्ध जल से नहलाकर पोंछें और नई पोशाक पहनाएँ।
    कैसे करें
    गुनगुने या सामान्य जल से धोकर मुलायम कपड़े से पोंछें। नई पोशाक, मुकुट, मोरपंख, बाँसुरी और माला से सजाएँ, चंदन या केसर का तिलक लगाएँ।
    भाव
    पहली बार सजे लाला को निहारना।
    पाठ

    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

    अर्थ: भगवान वासुदेव को नमस्कार।

    मंत्र का अर्थ और उच्चारण

    विकल्प
    नई पोशाक न हो तो धुली पोशाक और एक फूल।
  8. ८तुलसी, फूल, धूप और दीप

    क्या करें
    चरणों में तुलसीदल और फूल रखें, धूप-दीप दिखाएँ।
    कैसे करें
    तुलसीदल और फूलमाला अर्पित करें। धूप हल्की रखें। दीपक दिखाकर हाथ जोड़ें।
    भाव
    नवजात भगवान का पहला शृंगार-दर्शन।
    विकल्प
    धूप न हो तो केवल दीपक।
  9. ९पालना झुलाना

    क्या करें
    लाला को पालने में बिठाकर धीरे-धीरे झुलाएँ।
    कैसे करें
    परिवार के सब लोग बारी-बारी से पालने की डोरी खींचें और भजन या लोरी गाएँ।
    भाव
    यशोदा मैया की तरह लाला को झुलाने का सुख।
    विकल्प
    पालना न हो तो सजी टोकरी को हल्के से हिलाएँ, या मूर्ति को गोद में लेकर झुलाएँ।
  10. १०भोग

    क्या करें
    जन्म का भोग लगाएँ: माखन-मिश्री, पंजीरी, पंचामृत, फल और मेवे, हर चीज़ पर तुलसीदल।
    कैसे करें
    भोग सामने रखकर श्लोक पढ़ें, कुछ पल आँखें बंद रखें, फिर पीने का जल दें।
    भाव
    माखन के प्रेमी लाला को उनकी प्रिय चीज़ें।
    पाठ

    त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।
    गृहाण सुमुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर॥

    अर्थ: हे गोविंद, यह वस्तु आपकी ही है, आपको ही अर्पित करता हूँ। प्रसन्न मुख से इसे ग्रहण करें; हे परमेश्वर, प्रसन्न हों।

    स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीशालग्राम-पूजन: नैवेद्य

    विकल्प
    माखन-मिश्री न हो तो मिश्री और तुलसीदल।
  11. ११आरती

    क्या करें
    'आरती कुंजबिहारी की' गाते हुए आरती करें।
    कैसे करें
    घी का दीपक या कपूर लेकर दीपक को चरणों के सामने चार बार, नाभि के सामने दो बार, मुख के सामने एक बार और फिर पूरे रूप के सामने सात बार घुमाएँ। आरती के बाद थोड़ा जल गिराएँ और सब लोग दोनों हथेलियों से आरती लें।
    भाव
    जन्म की ख़ुशी में पूरे परिवार का गुणगान।
    विकल्प
    बोल याद न हों तो 'जय श्री कृष्ण' कहते हुए दीपक घुमाएँ।
    आरतीआरती कुंजबिहारी की,पूरी श्री कृष्ण की आरती पढ़ें
  12. १२क्षमा प्रार्थना और प्रसाद

    क्या करें
    क्षमा प्रार्थना करके चरणामृत और प्रसाद बाँटें।
    कैसे करें
    नीचे दी गई क्षमा प्रार्थना करें। अभिषेक का पंचामृत चरणामृत के रूप में सबको थोड़ा-थोड़ा दें, फिर भोग का प्रसाद बाँटें।
    भाव
    जो कमी रह गई, उसे भगवान पर छोड़कर ख़ुशी बाँटना।
    विकल्प
    बहुत देर हो गई हो तो प्रसाद अगली सुबह भी बाँट सकते हैं।
  13. १३पारण

    क्या करें
    अपनी परंपरा के अनुसार व्रत खोलें।
    कैसे करें
    कई घरों में आधी रात की पूजा के बाद चरणामृत और प्रसाद से व्रत खोला जाता है; कई घरों में अगली सुबह सूर्योदय के बाद पूजा करके। पहले थोड़ा प्रसाद लें, फिर हल्का भोजन।
    भाव
    भगवान का प्रसाद पाकर दिन भर की प्रतीक्षा पूरी होना।
    विकल्प
    दवा लेनी हो या तबीयत ठीक न हो तो पूजा के बाद ही प्रसाद लेकर भोजन कर लें।

पूजा में पढ़े जाने वाले पाठ

कृष्ण

मधुराष्टकम्

कृष्ण, बाल गोपाल · अष्टकम् · संस्कृत

पालना झुलाते समय या कीर्तन में (चरण 3 और 9)

भोग

  • माखन-मिश्री
  • धनिया पंजीरी (उत्तर भारत में जन्माष्टमी का ख़ास प्रसाद)
  • पंचामृत
  • मखाने या साबूदाने की खीर
  • फल और सूखे मेवे
  • पेड़ा या लड्डू

हर भोग पर तुलसीदल रखें। भोग सात्त्विक हो: प्याज़-लहसुन के बिना। व्रत रखने वाले पारण में यही प्रसाद लेते हैं, इसलिए फलाहार के अनुकूल चीज़ें अच्छी रहती हैं। कई मंदिरों और घरों में छप्पन भोग लगता है, पर एक-दो चीज़ों का प्रेम से बना भोग भी उतना ही पूरा है।

प्रार्थना और समापन

हे नंदलाल, आज आप हमारे घर आए। इस पूजा में जो भूल हुई हो, उसे क्षमा करें; हमारे घर में ऐसे ही बसे रहें और हमें हर दिन आपकी याद दिलाते रहें।

क्षमा प्रार्थना

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥

अर्थ: हे जनार्दन, मेरी पूजा में मंत्र की, विधि की या भक्ति की जो कमी रही हो, उसके बावजूद मैंने जो पूजा की है, उसे पूरा मान लें। मैं न आपको बुलाना जानता हूँ, न विदा करना, न ठीक से पूजा करना; हे परमेश्वर, मुझे क्षमा करें।

स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, गृह-मन्दिर में पञ्चदेव-पूजा: क्षमा-याचना

पूजा के बाद

  • चरणामृत और प्रसाद परिवार, पड़ोसियों और मिलने वालों में बाँटें।
  • लाला को पालने में या उनके बिछौने पर सुला दें; अगले दिन से उनकी रोज़ की सेवा चलती रहे।
  • सजावट के फूल और पत्तियाँ एक-दो दिन बाद हटाकर गमलों या बगीचे की मिट्टी में डाल दें। अगले दिन कई जगह नंद उत्सव और दही-हांडी मनाए जाते हैं।

समय कम हो तो: छोटी विधि

  1. सुबह व्रत का संकल्प लें; व्रत अपनी सेहत के अनुसार रखें।
  2. घर और पालना सजाएँ, दिन में नाम-कीर्तन करें।
  3. आधी रात से पहले परिवार के साथ बैठकर ध्यान करें।
  4. जन्म के क्षण शंख-घंटी बजाकर पंचामृत से अभिषेक करें।
  5. शुद्ध जल से नहलाकर नई पोशाक पहनाएँ और पालने में झुलाएँ।
  6. तुलसीदल के साथ माखन-मिश्री और पंजीरी का भोग लगाएँ।
  7. 'आरती कुंजबिहारी की' से आरती करें, चरणामृत और प्रसाद बाँटें।
  8. अपनी परंपरा के अनुसार रात को या अगली सुबह पारण करें।

परंपराओं में अंतर

  • स्मार्त और वैष्णव: गृहस्थ (स्मार्त) परंपरा अक्सर पहले दिन जन्माष्टमी मनाती है और वैष्णव परंपरा कई बार अगले दिन, जब अष्टमी के साथ रोहिणी नक्षत्र का मेल देखा जाता है। इसलिए एक ही शहर में दो दिन उत्सव हो सकता है।
  • उत्तर भारत में आधी रात को अभिषेक, पालना और धनिया पंजीरी का प्रसाद प्रचलित है; कई घरों में आधी रात को डंठल वाला खीरा काटकर जन्म का प्रतीक मनाया जाता है, और जन्म के छह दिन बाद छठी भी मनती है।
  • महाराष्ट्र में अगले दिन गोपालकाला और दही-हांडी, गुजरात के द्वारका में माखन-हांडी, और ओडिशा व बंगाल में अगले दिन नंद उत्सव मनाया जाता है; वहाँ भागवत के दशम स्कंध का पाठ भी होता है।
  • दक्षिण भारत में इसे गोकुलाष्टमी या श्री जयंती कहते हैं; दरवाज़े से पूजा-घर तक चावल के आटे से छोटे पैरों के निशान बनाए जाते हैं और घर के बने पकवान भोग में चढ़ते हैं। कई जगह पूजा शाम को ही हो जाती है।
  • कुछ परंपराओं में आधी रात को चंद्रमा को भी अर्घ्य दिया जाता है, क्योंकि श्री कृष्ण चंद्रवंश में जन्मे माने जाते हैं।

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कृष्ण

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कृष्ण, बाल गोपाल · अष्टकम् · संस्कृत

नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं

श्री कृष्ण के लिए और

स्रोत और समीक्षा

समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): पंचामृत-स्नान और नैवेद्य के श्लोक तथा क्षमा-याचना गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश (archive.org स्कैन का OCR, दो स्कैन से मिलाकर) से; वसुदेवसुतं श्लोक sanskritdocuments के श्लोकसङ्ग्रह 1 से (कृष्णाष्टकम् का पहला श्लोक); महामंत्र और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' साइट के मंत्र पन्नों से। तिथि, दो दिन और पारण की बातें साइट के जन्माष्टमी पन्ने के अनुरूप रखी गईं। खीरा काटना, छठी और चंद्र-अर्घ्य को 'कई घरों में' / 'कुछ परंपराओं में' कहकर लिखा गया है; ये लोक-रीतें हैं, इनका कोई एक शास्त्रीय स्रोत नहीं दिया गया।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या निर्जल व्रत रखना ज़रूरी है?

नहीं। व्रत कितना कड़ा हो, यह हर व्यक्ति अपनी सेहत, उम्र और काम देखकर तय करता है: कोई निर्जल रहता है, कोई फलाहार करता है, कोई एक समय भोजन। बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती स्त्रियाँ, दवा लेने वाले और बच्चे कड़ा व्रत न रखें। उत्सव का असली भाव रात की पूजा और भगवान का स्मरण है।

आधी रात तक जागना संभव न हो तो?

बुज़ुर्ग और बच्चे पहले सो सकते हैं; घर का कोई एक सदस्य निशीथ काल की पूजा कर ले। अगर कोई भी देर तक न जाग सके, तो रात को जितनी देर संभव हो उतनी देर पूजा कर लें और मन में भगवान के जन्म का स्मरण करें। भाव से की गई पूजा स्वीकार होती है।

व्रत कब खोलें?

इसमें परंपराएँ अलग हैं। कई घरों में आधी रात की पूजा के बाद चरणामृत और प्रसाद से व्रत खोल लेते हैं; कई अगली सुबह सूर्योदय के बाद पूजा करके पारण करते हैं, और कुछ परंपराएँ अष्टमी तिथि या रोहिणी नक्षत्र के बीतने का भी ध्यान रखती हैं। अपने परिवार की रीत मानें; समय के लिए साइट का जन्माष्टमी पन्ना देखें।

जन्माष्टमी दो दिन क्यों दिखती है?

तारीख़ तय करने में आधी रात को अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र, दोनों देखे जाते हैं। गृहस्थ (स्मार्त) परंपरा और वैष्णव परंपरा के नियमों में थोड़ा अंतर है, इसलिए कई साल दोनों के दिन अलग पड़ते हैं। अपने परिवार या मंदिर की परंपरा वाला दिन चुनें।

घर में लड्डू गोपाल की मूर्ति नहीं है, तो पूजा कैसे करें?

बाल कृष्ण का चित्र रखकर पूरी पूजा की जा सकती है: अभिषेक की जगह फूल से जल-दूध के छींटे दें, और पालने में चित्र या फूलों का छोटा गुच्छा रखकर झुलाएँ। पास के मंदिर में आधी रात के दर्शन भी किए जा सकते हैं।

क्या मासिक धर्म के दिनों में जन्माष्टमी की पूजा कर सकते हैं?

इस पर परिवारों में अलग-अलग रीत है। कई घरों में उन दिनों मूर्ति छूना और अभिषेक घर का कोई और सदस्य करता है, जबकि बहुत-से परिवार ऐसा नियम नहीं मानते। जो भी रीत हो, आप कीर्तन, भजन, नाम-जप और मन से पूजा में पूरी तरह शामिल हो सकती हैं।

क्या बच्चे व्रत रखें?

छोटे बच्चों के लिए व्रत ज़रूरी नहीं है; वे समय पर खाना खाएँ। उन्हें झाँकी सजाने, पालना झुलाने, घंटी बजाने और भजन गाने में शामिल करें; यही उनकी सबसे सुंदर पूजा है।

सुधार सुझाएँ

इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।

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