कृष्णाष्टकम् (वसुदेवसुतं देवं)
कृष्ण · अष्टकम् · संस्कृत
रात की पूजा में ध्यान के समय (चरण 4)

पूजा विधि · कृष्ण · त्योहार की पूजा
घर में जन्माष्टमी की पूजा: दिन का व्रत, आधी रात को श्री कृष्ण के जन्म पर पंचामृत अभिषेक, पालना, भोग, आरती और पारण, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
यह घर में जन्माष्टमी की पूजा है: दिन का व्रत (अपनी क्षमता के अनुसार), आधी रात को श्री कृष्ण के जन्म के समय पंचामृत अभिषेक, शृंगार, पालना, भोग, आरती और फिर पारण। मंदिरों का विशाल अभिषेक, पुरुषसूक्त जैसे वैदिक मंत्रों से षोडशोपचार और दही-हांडी जैसे सामुदायिक उत्सव यहाँ नहीं हैं। रोज़ की सेवा के लिए लड्डू गोपाल की सेवा विधि देखें।
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की आधी रात को मथुरा के कारागार में देवकी और वसुदेव के घर श्री कृष्ण का जन्म हुआ, और उसी रात वसुदेव उन्हें यमुना पार गोकुल में यशोदा और नंद के घर छोड़ आए। जन्माष्टमी इसी जन्म का उत्सव है। इसलिए इसकी मुख्य पूजा आधी रात को होती है: दिन भर व्रत और कीर्तन, और रात को जन्म के क्षण पर शंख-घंटी, अभिषेक, नए वस्त्र, पालना और भोग।
इस पूजा का भाव घर में बच्चे के जन्म की ख़ुशी जैसा है। बड़ी झाँकी, छप्पन भोग या चाँदी का पालना ज़रूरी नहीं; एक छोटी मूर्ति या चित्र, थोड़ा दूध-जल, एक तुलसीदल और प्रेम से गाया एक भजन भी उतना ही सच्चा उत्सव है। नीचे हर चरण के साथ उसका सरल विकल्प दिया है।
| सामग्री | उपयोग | स्थिति | विकल्प / टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| बाल कृष्ण या लड्डू गोपाल की मूर्ति | अभिषेक, शृंगार और पालने के लिए | वैकल्पिक | मूर्ति न हो तो बाल कृष्ण का चित्र; अभिषेक की जगह फूल से जल-दूध के छींटे दें। |
| पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, मिश्री) | जन्म के बाद अभिषेक के लिए | वैकल्पिक | पाँचों चीज़ें न हों तो केवल दूध और फिर जल से स्नान; यह भी न हो तो शुद्ध जल ही। |
| शंख | जन्म के क्षण बजाने और अभिषेक के लिए | परंपरा-विशेष | न हो तो घंटी बजाएँ और लोटे से अभिषेक करें। |
| अभिषेक के लिए बड़ी थाली या परात | मूर्ति को बिठाकर स्नान कराने के लिए | वैकल्पिक | कोई भी साफ़ बड़ा बर्तन। |
| नई पोशाक, मुकुट, मोरपंख, बाँसुरी, माला | जन्म के बाद शृंगार के लिए | वैकल्पिक | नई पोशाक न हो तो साफ़ धुली पोशाक; मोरपंख और फूल ही सुंदर शृंगार हैं। |
| पालना या झूला | जन्म के बाद लाला को झुलाने के लिए | परंपरा-विशेष | पालना न हो तो छोटी टोकरी में मुलायम कपड़ा बिछाकर फूलों से सजा दें। |
| तुलसीदल | पूजा और हर भोग के लिए | आवश्यक | परंपरा में भगवान का भोग तुलसी के साथ ही लगता है (गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश)। एक दिन पहले तोड़कर रख लें; न मिले तो मन से अर्पित करें। |
| भोग: माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी, पंचामृत, फल, मेवे | जन्म के बाद भोग के लिए | वैकल्पिक | जो बन सके; माखन-मिश्री या केवल मिश्री और तुलसी भी पूरा भोग है। |
| फूल, फूलमाला और सजावट | पूजा-स्थान, झाँकी और पालना सजाने के लिए | वैकल्पिक | घर में जो फूल-पत्तियाँ हों, उन्हीं से सजाएँ। |
| घी का दीपक, धूप और कपूर | पूजा और आरती के लिए | वैकल्पिक | घी न हो तो तिल के तेल का दीपक। |
| चंदन या केसर | तिलक के लिए | वैकल्पिक | न हो तो छोड़ दें। |
जन्माष्टमी के दिन सुबह स्नान के बाद व्रत और रात की पूजा का संकल्प लिया जाता है। हाथ में जल, फूल और तुलसीदल लेकर संकल्प बोलें और जल थाली में छोड़ दें।
हे श्री कृष्ण, आज जन्माष्टमी के दिन मैं (अपना नाम) अपनी शक्ति के अनुसार व्रत रखकर रात को आपके जन्म का उत्सव मनाऊँगा/मनाऊँगी। मेरी यह छोटी-सी सेवा स्वीकार करें।
व्रत कैसा हो, निर्जल, फलाहार या एक समय भोजन, यह संकल्प में अपनी सेहत देखकर तय करें। बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती स्त्रियाँ, दवा लेने वाले और बच्चे व्रत न रखें या केवल हल्का फलाहार रखें; उनका पूजा में शामिल होना ही काफ़ी है।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
अर्थ: हे हरे, हे कृष्ण, हे राम: भगवान को उनके नामों से प्रेम से पुकारना।
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥
अर्थ: वसुदेव के पुत्र, कंस और चाणूर का अंत करने वाले, देवकी को परम आनंद देने वाले, जगत के गुरु श्री कृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।
पयो दधि घृतं चैव मधु च शर्करान्वितम्।
पञ्चामृतं मयाऽऽनीतं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्॥
अर्थ: दूध, दही, घी, शहद और शक्कर मिलाकर यह पंचामृत मैं लाया हूँ; स्नान के लिए इसे स्वीकार करें।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: पंचामृत-स्नान का श्लोक (देवपूजा का सामान्य विधान)
त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।
गृहाण सुमुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर॥
अर्थ: हे गोविंद, यह वस्तु आपकी ही है, आपको ही अर्पित करता हूँ। प्रसन्न मुख से इसे ग्रहण करें; हे परमेश्वर, प्रसन्न हों।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीशालग्राम-पूजन: नैवेद्य
कृष्ण · अष्टकम् · संस्कृत
रात की पूजा में ध्यान के समय (चरण 4)
कृष्ण, बाल गोपाल · अष्टकम् · संस्कृत
पालना झुलाते समय या कीर्तन में (चरण 3 और 9)
कृष्ण, राधा-कृष्ण · आरती · ब्रज
जन्म के बाद की आरती (चरण 11)
हर भोग पर तुलसीदल रखें। भोग सात्त्विक हो: प्याज़-लहसुन के बिना। व्रत रखने वाले पारण में यही प्रसाद लेते हैं, इसलिए फलाहार के अनुकूल चीज़ें अच्छी रहती हैं। कई मंदिरों और घरों में छप्पन भोग लगता है, पर एक-दो चीज़ों का प्रेम से बना भोग भी उतना ही पूरा है।
हे नंदलाल, आज आप हमारे घर आए। इस पूजा में जो भूल हुई हो, उसे क्षमा करें; हमारे घर में ऐसे ही बसे रहें और हमें हर दिन आपकी याद दिलाते रहें।
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
अर्थ: हे जनार्दन, मेरी पूजा में मंत्र की, विधि की या भक्ति की जो कमी रही हो, उसके बावजूद मैंने जो पूजा की है, उसे पूरा मान लें। मैं न आपको बुलाना जानता हूँ, न विदा करना, न ठीक से पूजा करना; हे परमेश्वर, मुझे क्षमा करें।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, गृह-मन्दिर में पञ्चदेव-पूजा: क्षमा-याचना
बाल गोपाल · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में लड्डू गोपाल की रोज़ की सेवा, बालक की तरह: जगाना, स्नान, शृंगार, दिन भर के भोग, आरती और शयन, सरल विकल्पों और परंपराओं के अंतर के साथ।
कृष्ण · चालीसा
बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम
कृष्ण, बाल गोपाल · अष्टकम् · संस्कृत
नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं
समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): पंचामृत-स्नान और नैवेद्य के श्लोक तथा क्षमा-याचना गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश (archive.org स्कैन का OCR, दो स्कैन से मिलाकर) से; वसुदेवसुतं श्लोक sanskritdocuments के श्लोकसङ्ग्रह 1 से (कृष्णाष्टकम् का पहला श्लोक); महामंत्र और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' साइट के मंत्र पन्नों से। तिथि, दो दिन और पारण की बातें साइट के जन्माष्टमी पन्ने के अनुरूप रखी गईं। खीरा काटना, छठी और चंद्र-अर्घ्य को 'कई घरों में' / 'कुछ परंपराओं में' कहकर लिखा गया है; ये लोक-रीतें हैं, इनका कोई एक शास्त्रीय स्रोत नहीं दिया गया।
नहीं। व्रत कितना कड़ा हो, यह हर व्यक्ति अपनी सेहत, उम्र और काम देखकर तय करता है: कोई निर्जल रहता है, कोई फलाहार करता है, कोई एक समय भोजन। बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती स्त्रियाँ, दवा लेने वाले और बच्चे कड़ा व्रत न रखें। उत्सव का असली भाव रात की पूजा और भगवान का स्मरण है।
बुज़ुर्ग और बच्चे पहले सो सकते हैं; घर का कोई एक सदस्य निशीथ काल की पूजा कर ले। अगर कोई भी देर तक न जाग सके, तो रात को जितनी देर संभव हो उतनी देर पूजा कर लें और मन में भगवान के जन्म का स्मरण करें। भाव से की गई पूजा स्वीकार होती है।
इसमें परंपराएँ अलग हैं। कई घरों में आधी रात की पूजा के बाद चरणामृत और प्रसाद से व्रत खोल लेते हैं; कई अगली सुबह सूर्योदय के बाद पूजा करके पारण करते हैं, और कुछ परंपराएँ अष्टमी तिथि या रोहिणी नक्षत्र के बीतने का भी ध्यान रखती हैं। अपने परिवार की रीत मानें; समय के लिए साइट का जन्माष्टमी पन्ना देखें।
तारीख़ तय करने में आधी रात को अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र, दोनों देखे जाते हैं। गृहस्थ (स्मार्त) परंपरा और वैष्णव परंपरा के नियमों में थोड़ा अंतर है, इसलिए कई साल दोनों के दिन अलग पड़ते हैं। अपने परिवार या मंदिर की परंपरा वाला दिन चुनें।
बाल कृष्ण का चित्र रखकर पूरी पूजा की जा सकती है: अभिषेक की जगह फूल से जल-दूध के छींटे दें, और पालने में चित्र या फूलों का छोटा गुच्छा रखकर झुलाएँ। पास के मंदिर में आधी रात के दर्शन भी किए जा सकते हैं।
इस पर परिवारों में अलग-अलग रीत है। कई घरों में उन दिनों मूर्ति छूना और अभिषेक घर का कोई और सदस्य करता है, जबकि बहुत-से परिवार ऐसा नियम नहीं मानते। जो भी रीत हो, आप कीर्तन, भजन, नाम-जप और मन से पूजा में पूरी तरह शामिल हो सकती हैं।
छोटे बच्चों के लिए व्रत ज़रूरी नहीं है; वे समय पर खाना खाएँ। उन्हें झाँकी सजाने, पालना झुलाने, घंटी बजाने और भजन गाने में शामिल करें; यही उनकी सबसे सुंदर पूजा है।
इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।