मधुराष्टकम्
कृष्ण, बाल गोपाल · अष्टकम् · संस्कृत
शृंगार और शयन के समय (चरण 4 और 11)

पूजा विधि · बाल गोपाल · रोज़ की पूजा
घर में लड्डू गोपाल की रोज़ की सेवा, बालक की तरह: जगाना, स्नान, शृंगार, दिन भर के भोग, आरती और शयन, सरल विकल्पों और परंपराओं के अंतर के साथ।
यह घर में लड्डू गोपाल (बालक रूप श्री कृष्ण) की रोज़ की सेवा है: जगाना, स्नान, शृंगार, दिन में कई बार भोग, आरती, दोपहर का विश्राम और रात का शयन। पुष्टिमार्ग की हवेलियों की पूरी अष्टयाम सेवा, किसी संप्रदाय की दीक्षा से जुड़ी सेवा-विधि और मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा यहाँ नहीं हैं; इनके लिए अपनी परंपरा के गुरु, मंदिर या पुरोहित से पूछें। हर संप्रदाय और हर घर की सेवा-रीत अलग है; जो रीत आपके परिवार में चली आ रही है, वही पहले मानें।
लड्डू गोपाल बालक रूप में श्री कृष्ण हैं: घुटनों के बल बैठे, हाथ में लड्डू लिए। उनकी सेवा पूजा से ज़्यादा एक बच्चे की देखभाल जैसी है: सुबह प्यार से जगाना, नहलाना, कपड़े पहनाना, समय पर कुछ खिलाना, दोपहर को आराम कराना और रात को सुलाना। पुष्टिमार्ग की हवेलियों में भी दिन भर की सेवा इसी भाव से चलती है, जैसे माता यशोदा अपने लाला का लाड़ करती हों।
घर-घर की सेवा अलग है: कहीं दिन में दो बार भोग लगता है, कहीं पाँच-छह बार; कहीं रोज़ स्नान होता है, कहीं केवल पोंछकर शृंगार। नीचे एक सरल दिनचर्या दी है, जिसे अपने समय, सेहत और परंपरा के अनुसार छोटा-बड़ा किया जा सकता है। नियमों से ज़्यादा ज़रूरी प्रेम और नियमितता है।
| सामग्री | उपयोग | स्थिति | विकल्प / टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| लड्डू गोपाल की मूर्ति | सेवा के लिए | वैकल्पिक | मूर्ति न हो तो बाल कृष्ण का चित्र रखकर यही सेवा भाव से कर सकते हैं; स्नान की जगह चित्र पर जल के छींटे दें। |
| छोटा सिंहासन या पलंग, बिछौना और झूला | बिठाने, झुलाने और सुलाने के लिए | वैकल्पिक | छोटी टोकरी या डिब्बे में साफ़ मुलायम कपड़ा बिछाकर भी बिछौना बन जाता है। |
| स्नान के लिए छोटी थाली या कटोरा और जल | रोज़ के स्नान के लिए | वैकल्पिक | मौसम देखकर गुनगुना या सामान्य जल; जल में एक तुलसीदल डाल सकते हैं। |
| पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, मिश्री) | विशेष दिनों के स्नान के लिए | वैकल्पिक | रोज़ ज़रूरी नहीं; एकादशी, जन्माष्टमी या किसी विशेष दिन। रोज़ केवल शुद्ध जल से स्नान काफ़ी है। |
| मुलायम सूती कपड़ा (अंगोछा) | स्नान के बाद पोंछने के लिए | वैकल्पिक | कोई भी साफ़ मुलायम कपड़ा। |
| छोटे वस्त्र (पोशाक), मुकुट, मोरपंख, बाँसुरी, माला | शृंगार के लिए | वैकल्पिक | दो-तीन साफ़ पोशाकें बदल-बदलकर काफ़ी हैं; मुकुट-आभूषण न हों तो फूल ही शृंगार है। |
| चंदन या केसर | तिलक के लिए | वैकल्पिक | थोड़ा-सा चंदन या केसर; न हो तो बिना तिलक के भी शृंगार पूरा है। |
| तुलसीदल | हर भोग पर रखने के लिए | आवश्यक | परंपरा में भगवान का भोग तुलसी के साथ ही लगता है (गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश)। तुलसी तोड़ना जिस दिन मना माना जाता है, उस दिन पिछले दिन के रखे या अपने-आप गिरे पत्ते लें; बिल्कुल न मिले तो मन से अर्पित करें। |
| भोग की चीज़ें: माखन-मिश्री, दूध, फल, घर का बना सात्त्विक भोजन | दिन के अलग-अलग भोग के लिए | वैकल्पिक | जो घर में बना हो, उसी में से पहले भोग; कुछ न हो तो मिश्री के दाने और जल। |
| भगवान के अलग बर्तन (कटोरी, गिलास, थाली) | भोग और जल के लिए | परंपरा-विशेष | कई घरों में ठाकुर जी के बर्तन अलग रखे जाते हैं; न हों तो कोई साफ़ बर्तन, जिसमें पहले किसी ने खाया न हो। |
| घी का दीपक और धूप | दर्शन और आरती के लिए | वैकल्पिक | घी न हो तो तिल के तेल का दीपक। |
| छोटा दर्पण | शृंगार के बाद लाला को उनका रूप दिखाने के लिए | परंपरा-विशेष | कई घरों और हवेलियों की रीत है; न हो तो छोड़ दें। |
सेवा की शुरुआत में, या किसी विशेष दिन, मन में यह निश्चय करना कि मैं लाला की सेवा अपने घर के बालक की तरह प्रेम से करूँगा। रोज़ की सेवा में हर दिन संकल्प बोलना ज़रूरी नहीं माना जाता।
हे गोपाल, मैं (अपना नाम) आपकी सेवा अपने घर के लाला की तरह प्रेम से करूँगा/करूँगी। मुझसे जैसी बन पड़े, वैसी सेवा स्वीकार करो, और जहाँ भूल हो, उसे माफ़ कर देना।
पुष्टिमार्ग, गौड़ीय और दूसरी संप्रदाय-परंपराओं में सेवा गुरु से मिली विधि से होती है; उनमें दीक्षा और समर्पण के अपने वाक्य हैं, जो यहाँ नहीं दिए गए।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
अर्थ: हे हरे, हे कृष्ण, हे राम: भगवान को उनके नामों से प्रेम से पुकारना।
अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम्।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥
अर्थ: उनके होंठ मधुर हैं, मुख मधुर है, आँखें मधुर हैं, मुस्कान मधुर है; उनका हृदय मधुर है, चाल मधुर है। मधुरता के स्वामी का सब कुछ मधुर है।
त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।
गृहाण सुमुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर॥
अर्थ: हे गोविंद, यह वस्तु आपकी ही है, आपको ही अर्पित करता हूँ। प्रसन्न मुख से इसे ग्रहण करें; हे परमेश्वर, प्रसन्न हों।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीशालग्राम-पूजन: नैवेद्य
गीतं मधुरं पीतं मधुरं भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम्।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥
अर्थ: उनका गाना मधुर है, पीना मधुर है, खाना मधुर है, सोना मधुर है; उनका रूप मधुर है, तिलक मधुर है। मधुरता के स्वामी का सब कुछ मधुर है।
कृष्ण, बाल गोपाल · अष्टकम् · संस्कृत
शृंगार और शयन के समय (चरण 4 और 11)
कृष्ण, बाल गोपाल · अष्टकम् · संस्कृत
शाम के कीर्तन में, ख़ासकर कार्तिक मास में (चरण 10)
कृष्ण, राधा-कृष्ण · आरती · ब्रज
संध्या आरती (चरण 9)
हर भोग पर तुलसीदल रखें। परंपरा में लड्डू गोपाल का भोग सात्त्विक होता है: प्याज़-लहसुन, मांस, अंडे और नशे की चीज़ों के बिना। बहुत गरम या बहुत तीखा न हो, बच्चे के लिए जैसा रखते हैं वैसा। भोग थोड़ी देर बाद हटाकर प्रसाद की तरह सबमें बाँट दें; उसे फेंका नहीं जाता।
हे लाला, आज की सेवा में जो चूक हो गई हो, उसे माफ़ करना। हमारे घर में ऐसे ही रहना और हमें रोज़ तुम्हारी सेवा का मन देते रहना।
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
अर्थ: हे जनार्दन, मेरी पूजा में मंत्र की, विधि की या भक्ति की जो कमी रही हो, उसके बावजूद मैंने जो पूजा की है, उसे पूरा मान लें। मैं न आपको बुलाना जानता हूँ, न विदा करना, न ठीक से पूजा करना; हे परमेश्वर, मुझे क्षमा करें।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, गृह-मन्दिर में पञ्चदेव-पूजा: क्षमा-याचना
कृष्ण · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
घर में जन्माष्टमी की पूजा: दिन का व्रत, आधी रात को श्री कृष्ण के जन्म पर पंचामृत अभिषेक, पालना, भोग, आरती और पारण, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
कृष्ण · चालीसा
बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम
विष्णु, कृष्ण · अष्टकम् · संस्कृत
अच्युतं केशवं रामनारायणं
समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): नैवेद्य का श्लोक और क्षमा-याचना गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश (archive.org स्कैन का OCR, दो स्कैन से मिलाकर) से; मधुराष्टकम् के दो श्लोक sanskritdocuments से; महामंत्र साइट के मंत्र पन्ने से। आठ दर्शनों की बात Wikipedia के Shrinathji लेख से ली गई। घरों की रीतें (छठी, यात्रा में साथ ले जाना, अलग बर्तन, दर्पण) आम प्रचलित रीतों के रूप में, 'कई घरों में' कहकर लिखी गईं; इनका कोई एक शास्त्रीय नियम नहीं बताया गया।
कई लोग लाला को साथ ले जाते हैं: एक छोटी डिब्बी में बिछौना, पोशाक और भोग के लिए मिश्री रख लेते हैं। साथ न ले जा सकें तो घर के किसी और सदस्य को सेवा सौंपें, या जाने से पहले भोग और जल रखकर, प्यार से बताकर जाएँ और लौटकर सेवा फिर शुरू करें। मजबूरी में छूटी सेवा के लिए डरने की ज़रूरत नहीं; भाव बना रहे, यही काफ़ी है।
इस पर परंपराएँ अलग हैं। गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश कहती है कि घर की मूर्तियों की 'चल प्रतिष्ठा' होती है; कई परिवार किसी पुरोहित से सरल प्रतिष्ठा करवाते हैं, और पुष्टिमार्ग में ठाकुर जी गुरु के माध्यम से सेवा में आते हैं। बहुत-से घरों में लोग प्रेम से सेवा शुरू कर देते हैं। अपनी परंपरा के अनुसार चलें; शंका हो तो पास के मंदिर के पुजारी से पूछ लें।
इस पर घरों में अलग-अलग रीत है। कई परिवारों में उन दिनों सेवा घर का कोई और सदस्य कर लेता है, जबकि कई परिवार ऐसा कोई नियम नहीं मानते। जो भी आपके घर की रीत हो, लाला से बात करना, नाम लेना और मन में उनका ध्यान हर दिन हो सकता है। इसमें अपराध-बोध की कोई बात नहीं है।
परंपरा में लाला का भोग सात्त्विक होता है: प्याज़, लहसुन, मांस, अंडा और नशे की चीज़ें नहीं रखी जातीं। बाज़ार की चीज़ से अच्छा घर का बना है। बहुत गरम चीज़ थोड़ी ठंडी करके रखें, जैसे बच्चे को देते हैं। एकादशी को कई घरों में भोग में भी चावल नहीं रखे जाते।
रंग उतरना या घिसना सामान्य है; बहुत-से घरों में उसी मूर्ति की सेवा चलती रहती है। मूर्ति साफ़ टूट जाए तो परंपरा में आमतौर पर उसे सम्मान से किसी मंदिर को सौंप दिया जाता है या साफ़ मिट्टी में रख दिया जाता है, और नई मूर्ति से सेवा आगे बढ़ती है। इसे अपशकुन मानकर डरने की ज़रूरत नहीं; अपने पुजारी से सलाह ले सकते हैं।
जितनी हो सके उतनी करें, पर रोज़ करें: सुबह जगाकर दीपक और तुलसी, दोपहर या शाम को एक भोग, और रात को सुलाना। पाँच-दस मिनट की प्रेम भरी सेवा भी पूरी सेवा है।
हाँ, और यह बहुत सुंदर है। बच्चे लाला को जगाना, पोशाक पहनाना, भोग रखना और घंटी बजाना ख़ुशी से करते हैं। दीपक और कपूर के समय कोई बड़ा पास रहे।
इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।