शिव पूजा विधि
शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

आरती · शिव
शिव जी की सबसे प्रसिद्ध आरती, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश को ॐ में एक बताया गया है। पूरा पाठ, हर अंतरे का अर्थ और पाठभेद।
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
अर्थ: हे ओंकार-स्वरूप शिव, हे स्वामी, आपकी जय हो। ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव, जो अपनी अर्धांगिनी को साथ धारण करते हैं, आपके ही रूप हैं।
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥
॥ ॐ जय शिव ओंकारा ॥
अर्थ: आप एक मुख वाले (विष्णु), चार मुख वाले (ब्रह्मा) और पाँच मुख वाले (शिव) रूपों में शोभित हैं। हंस, गरुड़ और बैल, तीनों आपके वाहन बनकर सजते हैं।
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।तीनों रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥
॥ ॐ जय शिव ओंकारा ॥
अर्थ: दो, चार और दस भुजाओं वाले आपके रूप बहुत सुंदर लगते हैं। आपके इन तीनों रूपों को देखकर तीनों लोकों के लोग मोहित हो जाते हैं।
अक्षमाला वनमाला रुण्डमाला धारी।त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥
॥ ॐ जय शिव ओंकारा ॥
अर्थ: आप जप की माला, वन-फूलों की माला और मुंडों की माला धारण करते हैं। आप ही त्रिपुरासुर को मारने वाले शिव, कंस को मारने वाले विष्णु और हाथ में माला लिए ब्रह्मा हैं।
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघाम्बर अंगे।सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥
॥ ॐ जय शिव ओंकारा ॥
अर्थ: आपके अंगों पर सफ़ेद वस्त्र, पीला वस्त्र और बाघ की खाल है। आपके साथ सनक आदि ऋषि, गरुड़ आदि सेवक और भूत-गण रहते हैं।
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूलधारी।सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥
॥ ॐ जय शिव ओंकारा ॥
अर्थ: आपके हाथों में कमंडलु, चक्र और त्रिशूल हैं। आप सुख देने वाले, दुख हरने वाले और जगत का पालन करने वाले हैं।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका॥
॥ ॐ जय शिव ओंकारा ॥
अर्थ: जिनमें विवेक नहीं है, वे ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव को अलग-अलग मानते हैं। पर प्रणव, यानी ॐ के अक्षर में, ये तीनों एक होकर शोभित हैं।
त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे॥
॥ ॐ जय शिव ओंकारा ॥
अर्थ: आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि तीनों गुणों के स्वामी की यह आरती जो कोई गाता है, उसे मनचाहा फल मिलता है। यह बात शिवानंद स्वामी कहते हैं।
हर अंतरे का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।
“ॐ जय शिव ओंकारा” शिव जी की सबसे प्रसिद्ध आरती है, जो सोमवार, प्रदोष, सावन और महाशिवरात्रि की पूजा में घर-घर गाई जाती है। ध्यान से पढ़ें तो यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश, तीनों की एक साथ स्तुति है: अंतरों में तीनों के मुख, वाहन, माला, वस्त्र और हाथ के चिह्न गिनाए गए हैं, और अंत में कहा गया है कि ॐ के अक्षर में ये तीनों एक हैं।
अंतिम अंतरे में “कहत शिवानंद स्वामी” आता है, इसलिए इसे शिवानंद स्वामी की रचना माना जाता है। इसके पाठ में स्रोतों के बीच काफ़ी अंतर है। यहाँ घरों में गाया जाने वाला रूप दिया है; जहाँ स्रोत आपस में अलग थे, वहाँ गीता प्रेस के आरती-संग्रह से मेल खाता शब्द चुना है।
हे ओंकार-स्वरूप शिव, हे स्वामी, आपकी जय हो। ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव, जो अपनी अर्धांगिनी को साथ धारण करते हैं, आपके ही रूप हैं।
आप एक मुख वाले (विष्णु), चार मुख वाले (ब्रह्मा) और पाँच मुख वाले (शिव) रूपों में शोभित हैं। हंस, गरुड़ और बैल, तीनों आपके वाहन बनकर सजते हैं।
दो, चार और दस भुजाओं वाले आपके रूप बहुत सुंदर लगते हैं। आपके इन तीनों रूपों को देखकर तीनों लोकों के लोग मोहित हो जाते हैं।
आप जप की माला, वन-फूलों की माला और मुंडों की माला धारण करते हैं। आप ही त्रिपुरासुर को मारने वाले शिव, कंस को मारने वाले विष्णु और हाथ में माला लिए ब्रह्मा हैं।
आपके अंगों पर सफ़ेद वस्त्र, पीला वस्त्र और बाघ की खाल है। आपके साथ सनक आदि ऋषि, गरुड़ आदि सेवक और भूत-गण रहते हैं।
आपके हाथों में कमंडलु, चक्र और त्रिशूल हैं। आप सुख देने वाले, दुख हरने वाले और जगत का पालन करने वाले हैं।
जिनमें विवेक नहीं है, वे ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव को अलग-अलग मानते हैं। पर प्रणव, यानी ॐ के अक्षर में, ये तीनों एक होकर शोभित हैं।
आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि तीनों गुणों के स्वामी की यह आरती जो कोई गाता है, उसे मनचाहा फल मिलता है। यह बात शिवानंद स्वामी कहते हैं।
यह आरती एक ही परमात्मा को तीन रूपों में देखती है। हर अंतरे में तीन-तीन चीज़ें साथ आती हैं: एक, चार और पाँच मुख; हंस, गरुड़ और बैल; जप-माला, वनमाला और मुंडमाला; सफ़ेद, पीला वस्त्र और बाघ की खाल; कमंडलु, चक्र और त्रिशूल। ये क्रम से ब्रह्मा, विष्णु और शिव के चिह्न हैं, और आरती इन सबको “ओंकारा” शिव के ही रूप मानकर गाती है।
छठे अंतरे में आरती अपना मूल भाव खुद कहती है: जो इन तीनों को अलग-अलग समझते हैं, उनमें विवेक की कमी है; ॐ के एक अक्षर में तीनों एक हैं। इस तरह सृष्टि, पालन और संहार करने वाली शक्ति एक ही है, और उसी की यह आरती है।
अंतरा 7 इस आरती की फलश्रुति है। आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि त्रिगुण के स्वामी की आरती जो गाता है, उसे मनचाहा फल मिलता है; यहाँ यह आरती के अपने वचन के रूप में दिया है।
त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे॥आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि तीनों गुणों के स्वामी की यह आरती जो कोई गाता है, उसे मनचाहा फल मिलता है। यह बात शिवानंद स्वामी कहते हैं।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| मुखड़ा | जय शिव ओंकारा, भज शिव ओंकारा। … ॐ हर हर महादेव॥ | गीता प्रेस के आरती-संग्रह का पाठ; उसमें हर अंतरे के बाद “ॐ हर हर महादेव” आता है। |
| मुखड़ा | ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी हर शिव ओंकारा | sanskritdocuments.org के आरती संग्रह में; वेबदुनिया में “जय शिव ओंकारा ॐ जय शिव ओंकारा”। |
| अंतरा 2 | दो भुज चारु चतुर्भुज दशभुज अति सोहै। तीनों रूप निरखते त्रिभुवन-जन मोहै॥ | गीता प्रेस; “चारु” यानी सुंदर। भक्ति भारत, द्रिक पंचांग और वेबदुनिया में दूसरी पंक्ति “त्रिगुण रूप निरखते” है। |
| अंतरा 3 | अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी। चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी॥ | भक्ति भारत और sanskritdocuments.org का पाठ (वेबदुनिया में “रुण्डमाला” के साथ यही दूसरी पंक्ति)। गीता प्रेस और द्रिक पंचांग में “त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी”। |
| अंतरा 4 | सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे | भक्ति भारत, द्रिक पंचांग और वेबदुनिया; sanskritdocuments.org में “सनकादिक ब्रह्मादिक भूतादिक संगे”। |
| अंतरा 5 | कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता। जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ | वेबदुनिया में; गीता प्रेस में पहली पंक्ति “कर मध्ये सुकमण्डलु चक्र शूलधारी”। |
| अंतरा 7 | त्रिगुणस्वामिकी आरति जो कोइ नर गावै। भनत शिवानन्द स्वामी मनवाञ्छित पावै॥ | गीता प्रेस। भक्ति भारत में अंत “सुख संपति पावे”; sanskritdocuments.org में “निर्गुण शिव की आरती”। |
| अतिरिक्त अंतरा | काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी। नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ | द्रिक पंचांग और भक्ति भारत (वेबदुनिया में थोड़े अंतर से) में; इनके साथ “लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा”, “पर्वत सोहैं पार्वती”, “जटा में गंगा बहत है” वाले अंतरे भी मिलते हैं। ये गीता प्रेस और sanskritdocuments.org में नहीं हैं। |
अंतिम अंतरे की पंक्ति “कहत शिवानंद स्वामी” (गीता प्रेस में “भनत शिवानन्द स्वामी”) ही इसका आधार है। शिवानंद स्वामी कौन थे और कब हुए, इसकी प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती। हिन्दी विकिपीडिया इसे पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी की रचना कहता है, पर वहाँ दिया गया स्रोत “ॐ जय जगदीश हरे” के बारे में है।
गीता प्रेस का पाठ “जय शिव ओंकारा, भज शिव ओंकारा” से शुरू होता है और हर अंतरे के बाद “ॐ हर हर महादेव” कहता है; देखें पाठभेद।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति भक्ति भारत, द्रिक पंचांग, sanskritdocuments.org (आरती संग्रह), वेबदुनिया और गीता प्रेस के आरती-संग्रह (कोड 153 और नया संस्करण, archive.org पर स्कैन से पढ़ा गया पाठ) से मिलाई। हर पंक्ति कम से कम दो स्रोतों में है (वर्तनी के छोटे अंतर छोड़कर)। मुखड़ा प्रचलित रूप में (भक्ति भारत, द्रिक पंचांग)। जहाँ स्रोत अलग थे, वहाँ गीता प्रेस से मेल खाता पाठ चुना: “तीनों रूप निरखते” (गीता प्रेस, sanskritdocuments), “रुण्डमाला … त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी” (गीता प्रेस, द्रिक पंचांग; वेबदुनिया में भी “रुण्डमाला”), “बाघाम्बर”, “सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी”, “प्रणवाक्षर में शोभित”, “मनवांछित फल पावे”। “गरुड़ादिक” गीता प्रेस की वर्तनी है; बाक़ी स्रोत “गरुणादिक” लिखते हैं। अतिरिक्त अंतरे (काशी में विश्वनाथ आदि) गीता प्रेस और sanskritdocuments में न होने से मुख्य पाठ में नहीं लिए। sanskritdocuments “ओंकारा” को “ॐकारा” लिखता है।
शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
भैरव · आरती
जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा
शिव · चालीसा
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान
शिव · स्तोत्र · संस्कृत
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
शिव · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
महाशिवरात्रि पर घर में शिव पूजा: सुबह संकल्प, सेहत के अनुसार व्रत, रात में एक बार या चारों पहर की पूजा, जागरण, निशीथ काल और अगली सुबह पारण।
शिव · अष्टकम् · संस्कृत
नमामीशमीशाननिर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्
इसे शिव जी की आरती कहा जाता है, पर इसके अंतरे ब्रह्मा, विष्णु और शिव, तीनों के चिह्न गिनाते हैं और अंत में कहते हैं कि ॐ में तीनों एक हैं। गीता प्रेस इसे “भगवान् ब्रह्मा, विष्णु, महेश” की आरती के नाम से छापता है।
अंतिम अंतरे में “कहत शिवानंद स्वामी” आता है, इसी से इसे शिवानंद स्वामी की रचना माना जाता है। उनके जीवन के बारे में प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।
प्रणव यानी ॐ। परंपरा ॐ के तीन अंश अ, उ और म को ब्रह्मा, विष्णु और महेश से जोड़ती है। पंक्ति कहती है कि तीनों को अलग मानना अविवेक है; ॐ में वे एक हैं।
रोज़ की शिव पूजा के अंत में कर सकते हैं। सोमवार, प्रदोष, सावन और महाशिवरात्रि पर यह विशेष रूप से गाई जाती है।
यह आरती लंबे समय से मौखिक परंपरा में गाई जा रही है, इसलिए इसके कई रूप बन गए। मुख्य अंतर ऊपर पाठभेद में दिए हैं।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।