शिव पूजा विधि
शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

नमामीशमीशाननिर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥१॥
namāmīśamīśānanirvāṇarūpaṃ vibhuṃ vyāpakaṃ brahmavedasvarūpam |
nijaṃ nirguṇaṃ nirvikalpaṃ nirīhaṃ cidākāśamākāśavāsaṃ bhaje’ham ||
अर्थ: हे ईशान! मैं आपको नमस्कार करता हूँ, जो मोक्ष-स्वरूप, सर्वसमर्थ, सर्वव्यापक, ब्रह्म और वेद-स्वरूप हैं। अपने आप में स्थित, गुणों से परे, भेद से रहित, इच्छा से रहित, चेतना रूपी आकाश और आकाश को ही वस्त्र मानने वाले आपको मैं भजता हूँ।
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।करालं महाकालकालं कृपालं गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥२॥
nirākāramoṃkāramūlaṃ turīyaṃ girājñānagotītamīśaṃ girīśam |
karālaṃ mahākālakālaṃ kṛpālaṃ guṇāgārasaṃsārapāraṃ nato’ham ||
अर्थ: निराकार, ॐकार के मूल, तुरीय (जागृति, स्वप्न और गहरी नींद से परे), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों की पहुँच से परे, कैलासपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम और संसार से परे परमेश्वर को मैं प्रणाम करता हूँ।
तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं मनोभूतकोटिप्रभाश्रीशरीरम् ।स्फुरन्मौलिकल्लोलिनीचारुगङ्गा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥३॥
tuṣārādrisaṃkāśagauraṃ gabhīraṃ manobhūtakoṭiprabhāśrīśarīram |
sphuranmaulikallolinīcārugaṅgā lasadbhālabālendu kaṇṭhe bhujaṅgā ||
अर्थ: जो हिमालय के समान गौर और गम्भीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों जैसी कान्ति और शोभा है, जिनके सिर पर सुन्दर लहरों वाली गंगा चमकती है, ललाट पर बालचन्द्र और गले में सर्प शोभित हैं।
चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि ॥४॥
calatkuṇḍalaṃ bhrūsunetraṃ viśālaṃ prasannānanaṃ nīlakaṇṭhaṃ dayālam |
mṛgādhīśacarmāmbaraṃ muṇḍamālaṃ priyaṃ śaṅkaraṃ sarvanāthaṃ bhajāmi ||
अर्थ: जिनके कानों में कुण्डल हिलते हैं, सुन्दर भौंहें और बड़े नेत्र हैं, जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं, जो सिंह की खाल पहनते और मुण्डों की माला धारण करते हैं, उन सबके प्रिय, सबके स्वामी शंकर को मैं भजता हूँ।
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशमखण्डमजं भानुकोटिप्रकाशम् ।त्रयःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥५॥
pracaṇḍaṃ prakṛṣṭaṃ pragalbhaṃ pareśamakhaṇḍamajaṃ bhānukoṭiprakāśam |
trayaḥśūlanirmūlanaṃ śūlapāṇiṃ bhaje’haṃ bhavānīpatiṃ bhāvagamyam ||
अर्थ: प्रचण्ड, सबमें श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्यों जैसे प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों (दुःखों) को जड़ से मिटाने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले और भाव (प्रेम) से प्राप्त होने वाले भवानीपति को मैं भजता हूँ।
कलातीतकल्याणकल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।चिदानन्दसन्दोहमोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥६॥
kalātītakalyāṇakalpāntakārī sadā sajjanānandadātā purārī |
cidānandasandohamohāpahārī prasīda prasīda prabho manmathārī ||
अर्थ: कलाओं से परे, कल्याण-स्वरूप, कल्प के अंत में प्रलय करने वाले, सज्जनों को सदा आनंद देने वाले, त्रिपुर के शत्रु, चेतना और आनंद के घन, मोह को हरने वाले, कामदेव के शत्रु प्रभु! प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए।
न यावदुमानाथपादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥७॥
na yāvadumānāthapādāravindaṃ bhajantīha loke pare vā narāṇām |
na tāvatsukhaṃ śānti santāpanāśaṃ prasīda prabho sarvabhūtādhivāsam ||
अर्थ: जब तक मनुष्य उमापति के चरण-कमलों को नहीं भजते, तब तक उन्हें न इस लोक में, न परलोक में सुख और शान्ति मिलती है, और न उनके दुःखों का नाश होता है। हे सब प्राणियों में निवास करने वाले प्रभु! प्रसन्न होइए।
न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम् ।जराजन्मदुःखौघतातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीशशम्भो ॥८॥
na jānāmi yogaṃ japaṃ naiva pūjāṃ nato’haṃ sadā sarvadā śambhu tubhyam |
jarājanmaduḥkhaughatātapyamānaṃ prabho pāhi āpannamāmīśaśambho ||
अर्थ: मैं न योग जानता हूँ, न जप, न पूजा। हे शम्भु! मैं सदा-सर्वदा आपको ही प्रणाम करता हूँ। हे प्रभु! बुढ़ापे और जन्म के दुःखों के समूह से जलते हुए मुझ दुखी की रक्षा कीजिए। हे ईश, हे शम्भु! मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥९॥
rudrāṣṭakamidaṃ proktaṃ vipreṇa haratoṣaye |
ye paṭhanti narā bhaktyā teṣāṃ śambhuḥ prasīdati ||
अर्थ: यह रुद्राष्टक ब्राह्मण ने हर (शिव) को प्रसन्न करने के लिए कहा। यह श्लोक कहता है कि जो मनुष्य इसे भक्ति से पढ़ते हैं, उन पर शम्भु प्रसन्न होते हैं।
॥ इति श्रीरामचरितमानसे उत्तरकाण्डे श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम् ॥
|| iti śrīrāmacaritamānase uttarakāṇḍe śrīgosvāmitulasīdāsakṛtaṃ śrīrudrāṣṭakaṃ sampūrṇam ||
अर्थ: इस प्रकार श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरुद्राष्टक पूरा हुआ।
रुद्राष्टकम् शिव की आठ श्लोकों की स्तुति है, जो गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में आती है। इसकी पहली पंक्ति 'नमामीशमीशान निर्वाणरूपं' से यह घर-घर में पहचानी जाती है।
मानस में यह स्तुति काकभुशुण्डि की कथा का हिस्सा है। अपने पिछले जन्म में उन्होंने शिव-मन्दिर में अपने गुरु का अपमान किया, तब शिव ने उन्हें शाप दिया। उनके दयालु गुरु, एक ब्राह्मण, ने शिष्य की भलाई के लिए हाथ जोड़कर यह स्तुति की, और शिव प्रसन्न हुए। भाषा संस्कृत है, जिसमें तुलसीदास की अवधी का स्वाद भी है।
रुद्राष्टक में शिव के दो रूप एक साथ आते हैं। पहले दो श्लोक उन्हें निर्गुण, निराकार, ॐकार का मूल, तुरीय और वाणी-ज्ञान से परे ब्रह्म के रूप में नमन करते हैं। अगले तीन श्लोक उनका सगुण रूप दिखाते हैं: हिमालय जैसा गौर शरीर, जटा में गंगा, ललाट पर चन्द्रमा, गले में सर्प, नीलकण्ठ, सिंह-चर्म और हाथ में त्रिशूल।
छठे और सातवें श्लोक में भक्त उन्हें कल्याण-स्वरूप, मोह हरने वाले और सबके भीतर बसने वाले मानकर बार-बार 'प्रसीद' कहता है, और यह भी कहता है कि उमापति के चरणों को भजे बिना न यहाँ सुख है, न आगे शान्ति।
आठवाँ श्लोक इस स्तुति का हृदय है: मैं न योग जानता हूँ, न जप, न पूजा; बस आपको प्रणाम करता हूँ, मेरी रक्षा कीजिए। मानस में यह प्रार्थना एक गुरु ने अपने भटके शिष्य के लिए की थी, इसलिए इसमें विनम्रता और करुणा दोनों हैं। नौवाँ श्लोक फलश्रुति है।
इस स्तोत्र की फलश्रुति कहती है कि यह रुद्राष्टक ब्राह्मण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा था, और जो मनुष्य इसे भक्ति से पढ़ते हैं, उन पर शम्भु प्रसन्न होते हैं। मानस में इस स्तुति के बाद शिव ब्राह्मण से वर माँगने को कहते हैं।
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥यह रुद्राष्टक ब्राह्मण ने हर (शिव) को प्रसन्न करने के लिए कहा। यह श्लोक कहता है कि जो मनुष्य इसे भक्ति से पढ़ते हैं, उन पर शम्भु प्रसन्न होते हैं।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| पूरी स्तुति | गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं ... ब्यापकं ... दयालं | रामचरितमानस (sanskritdocuments.org पर उत्तरकाण्ड का पाठ) में कई शब्द अवधी वर्तनी में हैं, जैसे 'ज्ञान' की जगह 'ग्यान'; शब्द और अर्थ वही हैं। |
| श्लोक 2 | कृपालुं | vignanam.org और stotranidhi.com में 'कृपालं' की जगह। |
| श्लोक 3 | मनोभूतकोटिप्रभासी शरीरम् ... कण्ठे भुजङ्गम् | vignanam.org और stotranidhi.com का पाठ; मानस में 'प्रभा श्री शरीरं' और 'भुजंगा' है। |
| श्लोक 4 | चलत्कुण्डलं शुभ्रनेत्रं विशालं ... दयालुम् | vignanam.org और stotranidhi.com का पाठ; मानस में 'भ्रू सुनेत्रं' और 'दयालं' है। |
| श्लोक 5 | अखण्डं भजे भानुकोटिप्रकाशम् । त्रयीशूलनिर्मूलनं | vignanam.org और stotranidhi.com का पाठ; मानस में 'अखंडं अजं' और 'त्रयःशूल' है। |
| श्लोक 8 | नतोऽहं सदा सर्वदा देव तुभ्यम् ... प्रभो पाहि शापान्नमामीश शम्भो | vignanam.org और stotranidhi.com का पाठ; मानस में 'शंभु तुभ्यं' और 'आपन्नमामीश' है। |
| श्लोक 9 | विप्रेण हरतुष्टये | vignanam.org और stotranidhi.com का पाठ; मानस में 'हरतोषये' है। |
यह स्तुति तुलसीदास के रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में है।
मानस में यह काकभुशुण्डि के पिछले जन्म की कथा में आती है: शाप के बाद उनके गुरु (ब्राह्मण) ने शिव को प्रसन्न करने के लिए यह स्तुति की, जिसके बाद दोहा 108 में शिव वर माँगने को कहते हैं।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पाठ sanskritdocuments.org के रुद्राष्टकम् से लिया गया और हर पंक्ति रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड (sanskritdocuments.org) के पाठ से मिलाई गई; vignanam.org और stotranidhi.com के पाठ से भी मिलाया गया। मानस के पाठ से शब्द एक हैं; अंतर केवल वर्तनी और सन्धि का है (जैसे ज्ञान/ग्यान, व्यापकं/ब्यापकं, परेशमखण्डमजं/परेशं अखंडं अजं)। vignanam.org और stotranidhi.com के कुछ अलग शब्द 'पाठ-भेद' में हैं। फलश्रुति की संख्या 9 मानस के अनुसार है।
शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
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शिव · आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा
शिव · चालीसा
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान
शिव · स्तोत्र · संस्कृत
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
शिव · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
महाशिवरात्रि पर घर में शिव पूजा: सुबह संकल्प, सेहत के अनुसार व्रत, रात में एक बार या चारों पहर की पूजा, जागरण, निशीथ काल और अगली सुबह पारण।
शिव · अष्टकम् · संस्कृत
ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं
गोस्वामी तुलसीदास ने। यह उनके रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में दोहा 107 के बाद आता है।
काकभुशुण्डि ने पिछले जन्म में शिव-मन्दिर में अपने गुरु का अपमान किया, तो शिव ने उन्हें शाप दिया। उनके गुरु, एक ब्राह्मण, ने शिष्य पर कृपा के लिए यह स्तुति की।
भाषा संस्कृत है, पर तुलसीदास की कुछ अवधी छाप भी है, जैसे 'शम्भु तुभ्यम्' और 'पुरारी', 'मन्मथारी' जैसे रूप। इसलिए अलग-अलग पुस्तकों में वर्तनी थोड़ी बदली मिलती है।
आठ श्लोक स्तुति के हैं, इसलिए नाम 'अष्टक' है; नौवाँ श्लोक फलश्रुति है।
सोमवार, प्रदोष, सावन और महाशिवरात्रि पर इसका पाठ बहुत होता है, पर इसे किसी भी दिन शिव पूजा के बाद पढ़ा जा सकता है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।