शिव

स्तोत्र · शिव · स्तोत्र

शिव ताण्डव स्तोत्रम्

रावण का रचा माना जाने वाला शिव ताण्डव स्तोत्र: शिव के ताण्डव, जटा में बहती गंगा और ललाट की अग्नि का वर्णन। पूरा पाठ, हर श्लोक का सरल अर्थ।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. भावार्थ
  4. फलश्रुति
  5. कब पढ़ें
  6. विधि
  7. पाठ-भेद
  8. रचयिता और स्रोत
  9. ये भी पढ़ें
  10. सवाल-जवाब
  11. सुधार सुझाएँ

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थलेगलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयंचकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥

jaṭāṭavīgalajjalapravāhapāvitasthale
gale’valambya lambitāṃ bhujaṅgatuṅgamālikām |
ḍamaḍḍamaḍḍamaḍḍamanninādavaḍḍamarvayaṃ
cakāra caṇḍatāṇḍavaṃ tanotu naḥ śivaḥ śivam ||

अर्थ: जटाओं के वन से बहती गंगा की धारा से पवित्र हुए स्थान पर, गले में सर्पों की लंबी माला डाले, डमरू की डम-डम ध्वनि के साथ जिन्होंने प्रचण्ड ताण्डव किया, वे शिव हमारा कल्याण करें।

जटाटवी
जटाओं का वन
गलत्
बहता हुआ
पावित
पवित्र किया हुआ
भुजङ्गतुङ्गमालिका
सर्पों की बड़ी माला
डमरु
शिव का छोटा ढोल
चण्डताण्डव
प्रचण्ड नृत्य
तनोतु
बढ़ाएँ, प्रदान करें
शिवम्
कल्याण

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि ।धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावकेकिशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥

jaṭākaṭāhasambhramabhramannilimpanirjharī-
vilolavīcivallarīvirājamānamūrddhani |
dhagaddhagaddhagajjvalallalāṭapaṭṭapāvake
kiśoracandraśekhare ratiḥ pratikṣaṇaṃ mama ||

अर्थ: जिनकी जटा रूपी कड़ाह में देवनदी गंगा वेग से घूम रही है और जिसकी चंचल लहरें बेलों की तरह सिर पर शोभा पा रही हैं, जिनके ललाट पर धक्-धक् करती अग्नि जल रही है, उन बालचन्द्र को सिर पर धारण करने वाले शिव में मेरा प्रेम हर क्षण बना रहे।

कटाह
कड़ाह
निलिम्पनिर्झरी
देवताओं की नदी, गंगा
वीचि
लहर
वल्लरी
बेल
मूर्द्धा
सिर
ललाटपट्टपावक
ललाट की अग्नि
किशोरचन्द्र
बालचन्द्र
रति
प्रेम, अनुराग

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदिक्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

dharādharendranandinīvilāsabandhubandhura-
sphuraddigantasantatipramodamānamānase |
kṛpākaṭākṣadhoraṇīniruddhadurdharāpadi
kvaciddigambare mano vinodametu vastuni ||

अर्थ: जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती के विलास के सुन्दर साथी हैं, जिनका मन दिशाओं तक फैली सृष्टि को देखकर आनंदित होता है, जिनकी कृपा-दृष्टि की धारा कठिन से कठिन विपत्ति को रोक देती है, उन दिगम्बर परम तत्त्व में मेरा मन कभी तो आनंद पाए।

धराधरेन्द्रनन्दिनी
पर्वतराज की पुत्री, पार्वती
बन्धुर
सुन्दर
दिगन्त
दिशाओं का छोर
कृपाकटाक्ष
कृपा भरी दृष्टि
धोरणी
धारा, लगातार प्रवाह
दुर्धरापद्
कठिन विपत्ति
दिगम्बर
दिशाएँ ही जिनका वस्त्र हैं
विनोद
आनंद

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा-कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरेमनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥

jaṭābhujaṅgapiṅgalasphuratphaṇāmaṇiprabhā-
kadambakuṅkumadravapraliptadigvadhūmukhe |
madāndhasindhurasphurattvaguttarīyamedure
mano vinodamadbhutaṃ bibhartu bhūtabhartari ||

अर्थ: जटाओं में लिपटे सर्पों के फनों की मणियों की पीली चमक से दिशा रूपी वधुओं के मुख मानो केसर के लेप से रंग गए हैं; जो मदमस्त हाथी की चमकती खाल ओढ़े हुए हैं, उन सब प्राणियों के पालक शिव में मेरा मन अद्भुत आनंद पाए।

पिङ्गल
पीला-भूरा
फणामणि
सर्प के फन की मणि
कदम्ब
समूह
कुङ्कुमद्रव
केसर का घोल
दिग्वधू
दिशाएँ रूपी वधुएँ
सिन्धुर
हाथी
उत्तरीय
ओढ़ने का वस्त्र
भूतभर्ता
सब प्राणियों के पालक

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकःश्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५॥

sahasralocanaprabhṛtyaśeṣalekhaśekhara-
prasūnadhūlidhoraṇīvidhūsarāṅghripīṭhabhūḥ |
bhujaṅgarājamālayā nibaddhajāṭajūṭakaḥ
śriyai cirāya jāyatāṃ cakorabandhuśekharaḥ ||

अर्थ: इन्द्र आदि सभी देवताओं के झुके हुए मस्तकों के फूलों की पराग से जिनके चरणों की चौकी धूसर हो गई है, जिनकी जटाएँ सर्पराज की माला से बँधी हैं, वे चन्द्रमा को सिर पर धारण करने वाले शिव हमें चिरकाल तक श्री (समृद्धि) देने वाले हों।

सहस्रलोचन
हज़ार नेत्रों वाले, इन्द्र
लेख
देवता
शेखर
सिर, मुकुट
प्रसूनधूलि
फूलों की पराग
अङ्घ्रिपीठ
चरण रखने की चौकी
जटाजूट
जटाओं का जूड़ा
चकोरबन्धु
चकोर का मित्र, चन्द्रमा
श्री
समृद्धि, शोभा

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरंमहाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः ॥६॥

lalāṭacatvarajvaladdhanañjayasphuliṅgabhā-
nipītapañcasāyakaṃ namannilimpanāyakam |
sudhāmayūkhalekhayā virājamānaśekharaṃ
mahākapāli sampade śiro jaṭālamastu naḥ ||

अर्थ: जिनके ललाट रूपी आँगन में जलती अग्नि की चिनगारियों के तेज ने कामदेव को भस्म कर दिया, जिन्हें देवताओं के स्वामी प्रणाम करते हैं, जिनका मस्तक चन्द्रमा की कला से शोभित है, उन महाकपाली शिव का जटाओं वाला सिर हमारे लिए सम्पदा का कारण हो।

चत्वर
आँगन, चौक
धनञ्जय
अग्नि
स्फुलिङ्ग
चिनगारी
निपीत
पी लिया, भस्म कर दिया
पञ्चसायक
पाँच बाणों वाला, कामदेव
निलिम्पनायक
देवताओं के स्वामी
सुधामयूख
अमृत-किरणों वाला, चन्द्रमा
जटाल
जटाओं वाला

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥७॥

karālabhālapaṭṭikādhagaddhagaddhagajjvala-
ddhanañjayāhutīkṛtapracaṇḍapañcasāyake |
dharādharendranandinīkucāgracitrapatraka-
prakalpanaikaśilpini trilocane ratirmama ||

अर्थ: जिन्होंने अपने विकराल ललाट पर धक्-धक् जलती अग्नि में प्रचण्ड कामदेव की आहुति दे दी, और जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती के श्रृंगार में (वक्ष पर) चित्र-पत्र रचने वाले अनोखे कलाकार हैं, उन तीन नेत्रों वाले शिव में मेरा प्रेम बना रहे।

कराल
विकराल
भालपट्टिका
ललाट
आहुतीकृत
आहुति बना दिया
पञ्चसायक
कामदेव
चित्रपत्रक
श्रृंगार के लिए बनाई पत्र-आकृतियाँ
शिल्पी
कलाकार
त्रिलोचन
तीन नेत्रों वाले

नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्-कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः ।निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरःकलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥८॥

navīnameghamaṇḍalīniruddhadurdharasphurat-
kuhūniśīthinītamaḥprabandhabaddhakandharaḥ |
nilimpanirjharīdharastanotu kṛttisindhuraḥ
kalānidhānabandhuraḥ śriyaṃ jagaddhurandharaḥ ||

अर्थ: नए बादलों के घेरे से ढकी अमावस की आधी रात के घने अँधेरे जैसा जिनका कण्ठ है, जो गंगा को धारण करते हैं, हाथी की खाल ओढ़ते हैं, चन्द्रमा से सुन्दर लगते हैं और जगत का भार उठाते हैं, वे शिव हमें श्री (समृद्धि) प्रदान करें।

मेघमण्डली
बादलों का घेरा
कुहू
अमावस्या
निशीथिनी
रात
कन्धर
गर्दन, कण्ठ
कृत्ति
खाल
सिन्धुर
हाथी
कलानिधान
कलाओं का भंडार, चन्द्रमा
जगद्धुरन्धर
जगत का भार उठाने वाले

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-ऽवलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदंगजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥९॥

praphullanīlapaṅkajaprapañcakālimaprabhā-
’valambikaṇṭhakandalīruciprabaddhakandharam |
smaracchidaṃ puracchidaṃ bhavacchidaṃ makhacchidaṃ
gajacchidāndhakacchidaṃ tamantakacchidaṃ bhaje ||

अर्थ: खिले हुए नीले कमलों की श्यामल आभा जैसे कण्ठ से जिनकी गर्दन शोभित है, जिन्होंने कामदेव, त्रिपुर, संसार-बंधन, दक्ष के यज्ञ, गजासुर, अन्धकासुर और यमराज का भी अंत किया, उन शिव को मैं भजता हूँ।

प्रफुल्ल
खिला हुआ
पङ्कज
कमल
कालिमा
श्यामलता
स्मर
कामदेव
पुर
त्रिपुर, असुरों के तीन नगर
भव
संसार का बंधन
मख
यज्ञ (दक्ष का)
अन्तक
यमराज

अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी-रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम् ।स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकंगजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥

akharvasarvamaṅgalākalākadambamañjarī-
rasapravāhamādhurīvijṛmbhaṇāmadhuvratam |
smarāntakaṃ purāntakaṃ bhavāntakaṃ makhāntakaṃ
gajāntakāndhakāntakaṃ tamantakāntakaṃ bhaje ||

अर्थ: जो सर्वमंगला पार्वती की पूर्ण कलाओं रूपी कदम्ब-मंजरी के रस की मधुरता में रमने वाले भौंरे के समान हैं, और जो काम, त्रिपुर, संसार, दक्ष-यज्ञ, गजासुर, अन्धकासुर और यम का भी अंत करने वाले हैं, उन शिव को मैं भजता हूँ।

अखर्व
पूर्ण, बड़ा
सर्वमङ्गला
पार्वती
कदम्बमञ्जरी
कदम्ब के फूलों का गुच्छा
माधुरी
मधुरता
विजृम्भण
फैलाव, आनंद
मधुव्रत
भौंरा
अन्तक
अंत करने वाला; यम

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल-ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥

jayatvadabhravibhramabhramadbhujaṅgamaśvasa-
dvinirgamatkramasphuratkarālabhālahavyavāṭ |
dhimiddhimiddhimiddhvananmṛdaṅgatuṅgamaṅgala-
dhvanikramapravartitapracaṇḍatāṇḍavaḥ śivaḥ ||

अर्थ: तेज़ी से घूमते सर्पों की फुफकार से जिनके विकराल ललाट की अग्नि क्रम से और भड़क उठती है, और धिमि-धिमि बजते मृदंग की ऊँची मंगल ध्वनि की लय पर जिन्होंने प्रचण्ड ताण्डव आरम्भ किया है, उन शिव की जय हो।

जयतु
जय हो
अदभ्र
बहुत, तीव्र
विभ्रम
घूमना
श्वसत्
फुफकारता हुआ
हव्यवाट्
अग्नि
मृदङ्ग
ढोल जैसा वाद्य
तुङ्ग
ऊँचा
प्रवर्तित
आरम्भ किया हुआ

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्-गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोःसमप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥१२॥

dṛṣadvicitratalpayorbhujaṅgamauktikasrajor-
gariṣṭharatnaloṣṭhayoḥ suhṛdvipakṣapakṣayoḥ |
tṛṇāravindacakṣuṣoḥ prajāmahīmahendrayoḥ
samapravṛttikaḥ kadā sadāśivaṃ bhajāmyaham ||

अर्थ: पत्थर और सुन्दर बिछौने में, सर्प और मोतियों की माला में, बहुमूल्य रत्न और मिट्टी के ढेले में, मित्र और शत्रु में, तिनके और कमल-नयनी सुन्दरी में, प्रजा और पृथ्वी के राजा में, सबमें एक-सा भाव रखते हुए मैं कब सदाशिव को भजूँगा?

दृषद्
पत्थर
तल्प
शय्या, बिछौना
मौक्तिकस्रज्
मोतियों की माला
लोष्ठ
मिट्टी का ढेला
सुहृद्
मित्र
विपक्ष
शत्रु
तृण
तिनका
समप्रवृत्तिक
सबके प्रति समान भाव वाला

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् ।विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकःशिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥

kadā nilimpanirjharīnikuñjakoṭare vasan
vimuktadurmatiḥ sadā śiraḥsthamañjaliṃ vahan |
vilolalolalocano lalāmabhālalagnakaḥ
śiveti mantramuccaran kadā sukhī bhavāmyaham ||

अर्थ: कब मैं गंगा के तट के कुंजों की किसी खोह में रहते हुए, बुरे विचारों से मुक्त होकर, सदा सिर पर हाथ जोड़े, चंचल नेत्रों से शिव के सुन्दर ललाट में मन लगाए, 'शिव' मंत्र का उच्चारण करते हुए सुखी होऊँगा?

निलिम्पनिर्झरी
गंगा
निकुञ्ज
लताओं से घिरा स्थान
कोटर
खोह
दुर्मति
बुरी बुद्धि
अञ्जलि
जुड़े हुए हाथ
लोल
चंचल
ललाम
सुन्दर
भाल
ललाट

निलिम्पनाथनागरीकदम्बमौलमल्लिका-निगुम्फनिर्भरक्षरन्मधूष्णिकामनोहरः ।तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनीमहर्निशंपरश्रियः परं पदं तदङ्गजत्विषां चयः ॥१४॥

nilimpanāthanāgarīkadambamaulamallikā-
nigumphanirbharakṣaranmadhūṣṇikāmanoharaḥ |
tanotu no manomudaṃ vinodinīmaharniśaṃ
paraśriyaḥ paraṃ padaṃ tadaṅgajatviṣāṃ cayaḥ ||

अर्थ: देवलोक की स्त्रियों के सिरों पर गुँथी मल्लिका की मालाओं से झरते पराग जैसी मनोहर, परम शोभा का धाम, शिव के अंगों की वह कान्ति हमारे मन को दिन-रात आनंद देती रहे।

निलिम्पनाथनागरी
देवराज की नगरी की स्त्रियाँ
मौल
सिर का
मल्लिका
मोगरा, बेला
निगुम्फ
गुँथी हुई माला
मधूष्णिका
पराग, मकरन्द
अहर्निशम्
दिन-रात
त्विषा
कान्ति
चय
समूह

प्रचण्डवाडवानलप्रभाशुभप्रचारणीमहाष्टसिद्धिकामिनीजनाऽवहूतजल्पना ।विमुक्तवामलोचनाविवाहकालिकध्वनिःशिवेति मन्त्रभूषणा जगज्जयाय जायताम् ॥१५॥

pracaṇḍavāḍavānalaprabhāśubhapracāraṇī
mahāṣṭasiddhikāminījanā’vahūtajalpanā |
vimuktavāmalocanāvivāhakālikadhvaniḥ
śiveti mantrabhūṣaṇā jagajjayāya jāyatām ||

अर्थ: जो वडवानल (समुद्र की अग्नि) की प्रचण्ड प्रभा की तरह शुभ फैलाती है, जिसे आठों महासिद्धियाँ रूपी स्त्रियाँ पुकारती हैं, और जो सुन्दर नेत्रों वाली पार्वती के विवाह के समय की मंगल-ध्वनि है, वह 'शिव' मंत्र से सजी वाणी संसार की विजय और कल्याण के लिए हो।

वाडवानल
समुद्र के भीतर की अग्नि
प्रचारणी
फैलाने वाली
अष्टसिद्धि
अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ
अवहूत
पुकारा हुआ
वामलोचना
सुन्दर नेत्रों वाली, पार्वती
विवाहकालिक
विवाह के समय की
जगज्जय
जगत की विजय

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवंपठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसन्ततम् ।हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नाऽन्यथा गतिंविमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥१६॥

imaṃ hi nityamevamuktamuttamottamaṃ stavaṃ
paṭhansmaranbruvannaro viśuddhimetisantatam |
hare gurau subhaktimāśu yāti nā’nyathā gatiṃ
vimohanaṃ hi dehināṃ suśaṅkarasya cintanam ||

अर्थ: यह श्लोक कहता है कि इस उत्तम से उत्तम स्तुति को जो मनुष्य नित्य पढ़ता, याद करता और बोलता है, वह सदा शुद्ध होता जाता है और गुरु रूप हर (शिव) में उसकी भक्ति शीघ्र दृढ़ होती है; वह किसी और राह नहीं भटकता। शंकर का चिन्तन ही देहधारियों का मोह दूर करता है।

स्तव
स्तुति
उत्तमोत्तम
श्रेष्ठ में श्रेष्ठ
विशुद्धि
पवित्रता
सन्ततम्
लगातार
हर
शिव
आशु
शीघ्र
विमोहन
मोह दूर करने वाला
देही
देहधारी

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतंयः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तांलक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥

pūjāvasānasamaye daśavaktragītaṃ
yaḥ śambhupūjanaparaṃ paṭhati pradoṣe |
tasya sthirāṃ rathagajendraturaṅgayuktāṃ
lakṣmīṃ sadaiva sumukhīṃ pradadāti śambhuḥ ||

अर्थ: यह श्लोक कहता है कि जो प्रदोष के समय शिव-पूजा के अंत में दशमुख (रावण) के गाए इस शिव-पूजन वाले स्तोत्र को पढ़ता है, शम्भु उसे रथ, हाथी और घोड़ों से युक्त, स्थिर और प्रसन्नमुखी लक्ष्मी सदा देते हैं।

पूजावसान
पूजा का अंत
दशवक्त्र
दस मुख वाला, रावण
प्रदोष
संध्या का समय, प्रदोष काल
स्थिर
टिकने वाली
गजेन्द्र
श्रेष्ठ हाथी
तुरङ्ग
घोड़ा
सुमुखी
प्रसन्नमुखी

॥ इति श्रीरावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

|| iti śrīrāvaṇakṛtaṃ śivatāṇḍavastotraṃ sampūrṇam ||

अर्थ: इस प्रकार रावण द्वारा रचित माना जाने वाला शिव ताण्डव स्तोत्र पूरा हुआ।

परिचय

शिव ताण्डव स्तोत्र महादेव के प्रचण्ड नृत्य, ताण्डव, का वर्णन करने वाला संस्कृत स्तोत्र है। इसकी पंक्तियाँ डमरू की थाप जैसी तेज़ लय में चलती हैं: जटाओं से बहती गंगा, गले में लिपटे सर्प, ललाट पर धधकती अग्नि, सिर पर बालचन्द्र और मृदंग की धिमि-धिमि।

परंपरा इसे लंकापति रावण की रचना मानती है, और स्तोत्र का अंतिम श्लोक भी इसे 'दशवक्त्र' (दस मुख वाले) का गाया हुआ कहता है। यह पञ्चचामर छन्द में है, जिसकी हर पंक्ति में लघु और गुरु अक्षर बारी-बारी से आते हैं; इसी से इसका पाठ नृत्य की ताल जैसा लगता है।

भावार्थ

शिव ताण्डव स्तोत्र शिव के उस रूप की स्तुति है जो नृत्य में लीन है। पहले ही श्लोक में दृश्य बनता है: जटाओं से बहती गंगा, गले में सर्पों की माला, डमरू की डम-डम और प्रचण्ड ताण्डव। आगे के श्लोकों में यही चित्र भरता जाता है: सिर पर बालचन्द्र, ललाट की अग्नि जिसने कामदेव को भस्म किया, हाथी की खाल का उत्तरीय, अमावस की रात जैसा नीला कण्ठ, और मृदंग की धिमि-धिमि पर उठता नृत्य।

भय और सौंदर्य, संहार और करुणा यहाँ साथ-साथ हैं। जो शिव त्रिपुर, गजासुर, अन्धक और यम का भी अंत करते हैं, वही पार्वती के साथी हैं और उनकी कृपा-दृष्टि विपत्ति को रोक देती है। बारहवें और तेरहवें श्लोक में भक्त अपनी इच्छा कहता है: मैं कब पत्थर और फूलों की सेज में, मित्र और शत्रु में एक-सा भाव रखकर, गंगा-तट पर 'शिव' मंत्र जपते हुए सुखी होऊँगा।

अंतिम दो श्लोक फलश्रुति हैं, जो नित्य पाठ से शुद्धि और भक्ति, और प्रदोष में पूजा के अंत में पाठ करने पर स्थिर लक्ष्मी की बात करते हैं।

फलश्रुति

इस स्तोत्र की फलश्रुति कहती है कि इसे नित्य पढ़ने, याद करने और बोलने वाला शुद्ध होता है और शिव में उसकी भक्ति दृढ़ होती है, और जो प्रदोष में शिव-पूजा के अंत में इसे पढ़ता है, उसे शम्भु स्थिर लक्ष्मी देते हैं। ये स्तोत्र के अपने शब्द हैं।

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसन्ततम् ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नाऽन्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥

यह श्लोक कहता है कि इस उत्तम से उत्तम स्तुति को जो मनुष्य नित्य पढ़ता, याद करता और बोलता है, वह सदा शुद्ध होता जाता है और गुरु रूप हर (शिव) में उसकी भक्ति शीघ्र दृढ़ होती है; वह किसी और राह नहीं भटकता। शंकर का चिन्तन ही देहधारियों का मोह दूर करता है।

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥

यह श्लोक कहता है कि जो प्रदोष के समय शिव-पूजा के अंत में दशमुख (रावण) के गाए इस शिव-पूजन वाले स्तोत्र को पढ़ता है, शम्भु उसे रथ, हाथी और घोड़ों से युक्त, स्थिर और प्रसन्नमुखी लक्ष्मी सदा देते हैं।

यह स्तोत्र कब पढ़ा जाता है

  • प्रदोष के दिन शाम की शिव पूजा के अंत में; स्तोत्र का अंतिम श्लोक स्वयं इसी समय की बात करता है
  • सोमवार, सावन मास और महाशिवरात्रि पर
  • रोज़ की शिव पूजा या अभिषेक के बाद

पढ़ने की विधि

  • पहली बार पढ़ रहे हों तो पहले हर श्लोक का अर्थ पढ़ लें, फिर धीरे-धीरे पाठ करें; लय अपने आप बनने लगती है।
  • लंबे समासों को, जैसे 'जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले', छोटे टुकड़ों में तोड़कर पढ़ें (जटा-अटवी-गलत्-जल-प्रवाह...)। गति से अधिक ज़रूरी शुद्ध उच्चारण है।
  • शिवलिंग या शिव के चित्र के सामने दीप जलाकर, शांत मन से पढ़ सकते हैं। पूरा पाठ न हो सके तो कुछ श्लोक भी भाव से पढ़ें।
पूरी विधिमहाशिवरात्रि पूजा विधिमहाशिवरात्रि पर घर में शिव पूजा: सुबह संकल्प, सेहत के अनुसार व्रत, रात में एक बार या चारों पहर की पूजा, जागरण, निशीथ काल और अगली सुबह पारण।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
श्लोक-संख्या15 श्लोकvignanam.org और stotranidhi.com के संस्करणों में यहाँ के श्लोक 14 और 15 नहीं हैं, इसलिए वहाँ कुल 15 श्लोक हैं (13 स्तुति + 2 फलश्रुति)। sanskritdocuments.org और sa.wikisource.org में 17 हैं।
श्लोक 3क्वचिच्चिदम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनिsanskritdocuments.org पर दूसरे पाठ के रूप में दिया गया है।
श्लोक 4मदान्धसिन्धुरासुरत्वगुत्तरीयमेदुरेsa.wikisource.org का पाठ: मदमस्त हाथी-रूपी असुर की खाल।
श्लोक 6महः कपालि सम्पदे सरिज्जटालमस्तु नःsa.wikisource.org का पाठ; sanskritdocuments.org पर भी दूसरे पाठ के रूप में।
श्लोक 7, 11करालफाल...vignanam.org और stotranidhi.com में 'भाल' की जगह 'फाल' है; दोनों का अर्थ ललाट है।
श्लोक 10अगर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरीvignanam.org का पाठ।
श्लोक 12समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजेvignanam.org का पाठ; sanskritdocuments.org पर भी दूसरे पाठ के रूप में।
श्लोक 13विमुक्तलोललोचनाललामभाललग्नकंsa.wikisource.org का पाठ; vignanam.org में 'विमुक्तलोललोचनो ललाटफाललग्नकः' और अंत में 'सदा सुखी भवाम्यहम्' है।
श्लोक 17लक्ष्मीं प्रसादसमये प्रददाति शम्भुःsa.wikisource.org का पाठ; sanskritdocuments.org पर भी दूसरे पाठ के रूप में।
अतिरिक्त श्लोकनमामि पार्वतीपतिं नमामि जाह्नवीपतिं ... तदीयपादपङ्कजं स्मराम्यहं नटेश्वरम्sanskritdocuments.org के अनुसार कुछ संस्करणों में यह और 'रावणेन कृतं स्तोत्रं यः पठेच्छिवसन्निधौ' वाला श्लोक भी मिलता है; ये यहाँ के पाठ में नहीं गिने गए।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
रावण (परंपरा के अनुसार)
भाषा
संस्कृत

परंपरा इसे रावण की रचना मानती है और अंतिम श्लोक इसे 'दशवक्त्रगीतं' (दशमुख का गाया) कहता है; इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पाठ sanskritdocuments.org से लिया गया और हर पंक्ति sa.wikisource.org और vignanam.org के पाठ से मिलाई गई; stotranidhi.com का पाठ भी देखा गया। श्लोक-संख्या मुख्य स्रोत के अनुसार 17 है। जहाँ स्रोतों में शब्द अलग मिले, वहाँ sanskritdocuments.org का मुख्य पाठ रखा गया और दूसरे पाठ 'पाठ-भेद' में दिए गए। यह मुख्य पाठ हर पंक्ति में कम से कम एक और स्रोत से मेल खाता है; केवल श्लोक 13 की तीसरी पंक्ति में stotranidhi.com 'भाल' की जगह 'फाल' पढ़ता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

शिव ताण्डव स्तोत्र किसने लिखा?

परंपरा इसे रावण की रचना मानती है, और अंतिम श्लोक भी इसे 'दशवक्त्रगीतं' (दस मुख वाले का गाया) कहता है। इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

इसमें कितने श्लोक हैं?

संस्करणों में संख्या अलग है। यहाँ sanskritdocuments.org के अनुसार 17 श्लोक हैं: 15 स्तुति के और 2 फलश्रुति के। कई पुस्तकों में 15 श्लोक मिलते हैं, क्योंकि उनमें यहाँ के श्लोक 14 और 15 नहीं हैं।

'ताण्डव' का क्या अर्थ है?

ताण्डव शिव का प्रचण्ड, ऊर्जा भरा नृत्य है। यह स्तोत्र उसी नृत्य का वर्णन करता है, और इसकी लय भी नृत्य की ताल जैसी है।

इसे कब पढ़ना अच्छा माना जाता है?

स्तोत्र का अंतिम श्लोक प्रदोष के समय शिव-पूजा के अंत में पाठ की बात करता है। इसके अलावा सोमवार, सावन और महाशिवरात्रि पर इसका पाठ बहुत होता है; रोज़ भी पढ़ सकते हैं।

उच्चारण कठिन लगे तो क्या करें?

पहले अर्थ पढ़ें, फिर लंबे शब्दों को छोटे टुकड़ों में बाँटकर धीरे-धीरे पढ़ें। कुछ दिनों के अभ्यास से लय और उच्चारण दोनों सहज हो जाते हैं।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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