हनुमान पूजा विधि
हनुमान · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
मंगलवार और शनिवार को घर में हनुमान जी की सरल पूजा: राम नाम, दीपक, लाल फूल, सिंदूर का तिलक, गुड़-चने का भोग, हनुमान चालीसा और आरती।

चालीसा · हनुमान
गोस्वामी तुलसीदास की अवधी रचना हनुमान चालीसा का गीता प्रेस वाला पाठ, हर चौपाई का सरल अर्थ, कठिन शब्द, भावार्थ और पाठभेद।
॥ दोहा ॥
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
अर्थ: श्री गुरु के चरण-कमलों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को निर्मल करके, मैं श्री रघुवीर के उस निर्मल यश का वर्णन करता हूँ जो चारों फल (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) देने वाला है।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
अर्थ: हे पवनकुमार! अपने को बुद्धिहीन जानकर मैं आपका स्मरण करता हूँ। मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए और मेरे दुःख और मन के दोष हर लीजिए।
॥ चौपाई ॥
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥१॥
अर्थ: हे हनुमान जी, आपकी जय हो! आप ज्ञान और गुणों के सागर हैं। हे वानरों के स्वामी, आपकी जय हो! आप तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं और उन्हें अपनी कीर्ति से प्रकाशित करते हैं।
राम दूत अतुलित बल धामा।अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा ॥२॥
अर्थ: आप श्री राम के दूत हैं और अतुलनीय बल के धाम हैं। “अंजनी-पुत्र” और “पवनसुत” आपके नाम हैं, क्योंकि आप माता अंजना और पवन देव के पुत्र हैं।
महाबीर बिक्रम बजरंगी।कुमति निवार सुमति के संगी ॥३॥
अर्थ: आप महावीर और पराक्रमी हैं, आपके अंग वज्र जैसे कठोर हैं। आप बुरी बुद्धि को दूर करते हैं और अच्छी बुद्धि वालों के साथी हैं।
कंचन बरन बिराज सुबेसा।कानन कुंडल कुंचित केसा ॥४॥
अर्थ: आपका रंग सोने जैसा है और आप सुंदर वेश में सुशोभित हैं। आपके कानों में कुंडल हैं और बाल घुँघराले हैं।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।काँधे मूँज जनेऊ साजै ॥५॥
अर्थ: आपके हाथ में वज्र और ध्वजा शोभा देते हैं, और कंधे पर मूँज का जनेऊ सजा है।
संकर सुवन केसरीनंदन।तेज प्रताप महा जग बंदन ॥६॥
अर्थ: आप भगवान शंकर के अंश और वानरराज केसरी के पुत्र हैं; परंपरा हनुमान जी को शिव का अवतार मानती है। आपके महान तेज और प्रताप की सारा संसार वंदना करता है।
बिद्यावान गुनी अति चातुर।राम काज करिबे को आतुर ॥७॥
अर्थ: आप विद्वान, गुणी और अत्यंत चतुर हैं, और श्री राम का काम करने के लिए सदा उत्सुक रहते हैं।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।राम लषन सीता मन बसिया ॥८॥
अर्थ: आप प्रभु श्री राम की कथा सुनने के रसिया हैं। श्री राम, लक्ष्मण (लषन) और सीता जी आपके मन में बसते हैं।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥९॥
अर्थ: आपने छोटा रूप धरकर अशोक वाटिका में सीता जी को दर्शन दिए, और विकराल रूप धरकर लंका जलाई।
भीम रूप धरि असुर सँहारे।रामचंद्र के काज सँवारे ॥१०॥
अर्थ: आपने भयंकर रूप धरकर राक्षसों का संहार किया और श्री रामचंद्र जी के काम सँवारे।
लाय सजीवन लखन जियाये।श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥११॥
अर्थ: युद्ध में शक्ति लगने से लक्ष्मण जी मूर्छित हुए, तब आपने संजीवनी बूटी लाकर उन्हें जीवित किया। इससे प्रसन्न होकर श्री रघुवीर ने आपको हृदय से लगा लिया।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥१२॥
अर्थ: श्री रघुनाथ जी ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा: तुम मुझे भरत के समान प्रिय भाई हो।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥१३॥
अर्थ: “हज़ार मुखों वाले शेषनाग भी तुम्हारा यश गाएँ”, ऐसा कहकर लक्ष्मीपति श्री राम ने आपको गले से लगा लिया।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।नारद सारद सहित अहीसा ॥१४॥
अर्थ: सनक आदि ऋषि, ब्रह्मा आदि देवता, बड़े-बड़े मुनि, नारद जी, सरस्वती जी और शेषनाग भी आपका यश गाते हैं।
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥१५॥
अर्थ: यमराज, कुबेर और दिशाओं के रक्षक दिक्पाल भी जिस यश का पूरा वर्णन नहीं कर पाते, उसे कवि और विद्वान कहाँ तक कह सकते हैं?
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥१६॥
अर्थ: आपने सुग्रीव पर उपकार किया: उन्हें श्री राम से मिलाया, और इसी से उन्हें किष्किंधा का राज्य मिला।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥१७॥
अर्थ: विभीषण ने आपकी सलाह मानी (श्री राम की शरण में गए), और वे लंका के राजा बने; यह सारा संसार जानता है।
जुग सहस्र जोजन पर भानू।लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥१८॥
अर्थ: जो सूर्य हज़ारों योजन दूर है, उसे आपने बचपन में मीठा फल समझकर निगल लिया था।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥१९॥
अर्थ: प्रभु श्री राम की दी हुई अँगूठी मुँह में रखकर आपने समुद्र लाँघ लिया; आपके लिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं।
दुर्गम काज जगत के जेते।सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥२०॥
अर्थ: संसार के जितने भी कठिन काम हैं, वे सब आपकी कृपा से सरल हो जाते हैं।
राम दुआरे तुम रखवारे।होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥२१॥
अर्थ: आप श्री राम के द्वार के रखवाले हैं; आपकी आज्ञा के बिना वहाँ कोई प्रवेश नहीं कर पाता। भक्ति-परंपरा इसका भाव यह मानती है कि श्री राम तक पहुँचने का मार्ग हनुमान जी की कृपा से खुलता है।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।तुम रच्छक काहू को डर ना ॥२२॥
अर्थ: जो आपकी शरण में आता है, वह सब सुख पाता है। जब आप रक्षक हैं, तो किसी का डर नहीं रहता।
आपन तेज सम्हारो आपै।तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥२३॥
अर्थ: अपने तेज को आप स्वयं ही सँभाल सकते हैं, कोई और नहीं। आपकी एक हुंकार से तीनों लोक काँप उठते हैं।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।महाबीर जब नाम सुनावै ॥२४॥
अर्थ: चालीसा कहती है कि जब कोई महावीर हनुमान का नाम लेता है, तब भूत-पिशाच पास नहीं आते। भक्त इसे हर तरह के भय से रक्षा के भाव में लेते हैं।
नासै रोग हरै सब पीरा।जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥२५॥
अर्थ: चालीसा कहती है कि वीर हनुमान का निरंतर जप करने से रोग नष्ट होते हैं और सारी पीड़ा दूर होती है।
संकट तें हनुमान छुड़ावै।मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥२६॥
अर्थ: जो मन, कर्म और वचन से हनुमान जी का ध्यान करता है, उसे वे संकटों से छुड़ाते हैं।
सब पर राम तपस्वी राजा।तिन के काज सकल तुम साजा ॥२७॥
अर्थ: तपस्वी राजा श्री राम सबसे श्रेष्ठ हैं, और उनके सब काम आपने ही सँवारे।
और मनोरथ जो कोइ लावै।सोइ अमित जीवन फल पावै ॥२८॥
अर्थ: जो कोई भी आपके पास अपना कोई मनोरथ लेकर आता है, वह जीवन का अपार फल पाता है; चालीसा यही कहती है।
चारों जुग परताप तुम्हारा।है परसिद्ध जगत उजियारा ॥२९॥
अर्थ: चारों युगों में आपका प्रताप है। आपकी कीर्ति सारे जगत में प्रसिद्ध है और उसे उजियारा करती है।
साधु संत के तुम रखवारे।असुर निकंदन राम दुलारे ॥३०॥
अर्थ: आप साधु-संतों के रक्षक हैं, असुरों का नाश करने वाले हैं, और श्री राम के दुलारे हैं।
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।अस बर दीन जानकी माता ॥३१॥
अर्थ: आप आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ देने वाले हैं; यह वरदान आपको माता जानकी (सीता जी) ने दिया है।
राम रसायन तुम्हरे पासा।सदा रहो रघुपति के दासा ॥३२॥
अर्थ: राम-भक्ति रूपी परम औषधि (रसायन) आपके पास है। आप सदा श्री रघुनाथ जी के दास बनकर रहते हैं।
तुम्हरे भजन राम को पावै।जनम जनम के दुख बिसरावै ॥३३॥
अर्थ: आपके भजन से भक्त श्री राम को पाता है, और जन्म-जन्म के दुःख भूल जाता है।
अंत काल रघुबर पुर जाई।जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई ॥३४॥
अर्थ: ऐसा भक्त अंत समय में श्री रघुवीर के धाम जाता है, और जहाँ भी जन्म लेता है, हरि का भक्त कहलाता है।
और देवता चित्त न धरई।हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥३५॥
अर्थ: दूसरे देवताओं को मन में न लाकर भी, केवल हनुमान जी की सेवा से सब सुख मिल जाते हैं। यह हनुमान जी की महिमा का वर्णन है, किसी देवता का निषेध नहीं।
संकट कटै मिटै सब पीरा।जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥३६॥
अर्थ: जो बलवान वीर हनुमान जी का स्मरण करता है, उसके संकट कट जाते हैं और सब पीड़ा मिट जाती है; चालीसा यही कहती है।
जै जै जै हनुमान गोसाईं।कृपा करहु गुरु देव की नाईं ॥३७॥
अर्थ: हे स्वामी हनुमान जी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझ पर गुरुदेव की तरह कृपा कीजिए।
जो सत बार पाठ कर कोई।छूटहि बंदि महा सुख होई ॥३८॥
अर्थ: चालीसा कहती है कि जो कोई इसका सौ बार पाठ करता है, वह बंधन से छूट जाता है और उसे महान सुख मिलता है। यह चालीसा का अपना वचन है, गिनती की होड़ नहीं।
जो यह पढ़ै हनुमान चलीसा।होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥३९॥
अर्थ: जो यह हनुमान चालीसा पढ़ता है, उसे सिद्धि मिलती है; इसके साक्षी स्वयं गौरीपति भगवान शंकर हैं। यह भी चालीसा का अपना वचन है।
तुलसीदास सदा हरि चेरा।कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥४०॥
अर्थ: तुलसीदास सदा श्री हरि का सेवक है। हे नाथ, आप मेरे हृदय में निवास कीजिए।
॥ दोहा ॥
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
अर्थ: हे पवनपुत्र, आप संकट हरने वाले और मंगल की मूर्ति हैं। हे देवताओं में श्रेष्ठ, आप श्री राम, लक्ष्मण और सीता जी सहित मेरे हृदय में बसिए।
हर चौपाई का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।
हनुमान चालीसा हनुमान जी की सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली स्तुति है। इसमें आरंभ के दो दोहे, चालीस चौपाइयाँ और अंत का एक दोहा है; चालीस चौपाइयों के कारण ही इसे चालीसा कहते हैं। भाषा अवधी है, वही भाषा जिसमें रामचरितमानस लिखा गया।
चालीसा में हनुमान जी का रूप, उनका बल और बुद्धि, और रामायण की वे घटनाएँ आती हैं जिनमें उन्होंने श्री राम का काम सँवारा: सीता जी की खोज, लंका-दहन, संजीवनी लाकर लक्ष्मण जी के प्राण बचाना। अंत में भक्त हनुमान जी से गुरु की तरह कृपा करने और श्री राम, लक्ष्मण और सीता जी सहित हृदय में बसने की विनती करता है। यहाँ गीता प्रेस, गोरखपुर का पाठ दिया गया है।
श्री गुरु के चरण-कमलों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को निर्मल करके, मैं श्री रघुवीर के उस निर्मल यश का वर्णन करता हूँ जो चारों फल (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) देने वाला है।
हे पवनकुमार! अपने को बुद्धिहीन जानकर मैं आपका स्मरण करता हूँ। मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए और मेरे दुःख और मन के दोष हर लीजिए।
हे हनुमान जी, आपकी जय हो! आप ज्ञान और गुणों के सागर हैं। हे वानरों के स्वामी, आपकी जय हो! आप तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं और उन्हें अपनी कीर्ति से प्रकाशित करते हैं।
आप श्री राम के दूत हैं और अतुलनीय बल के धाम हैं। “अंजनी-पुत्र” और “पवनसुत” आपके नाम हैं, क्योंकि आप माता अंजना और पवन देव के पुत्र हैं।
आप महावीर और पराक्रमी हैं, आपके अंग वज्र जैसे कठोर हैं। आप बुरी बुद्धि को दूर करते हैं और अच्छी बुद्धि वालों के साथी हैं।
आपका रंग सोने जैसा है और आप सुंदर वेश में सुशोभित हैं। आपके कानों में कुंडल हैं और बाल घुँघराले हैं।
आपके हाथ में वज्र और ध्वजा शोभा देते हैं, और कंधे पर मूँज का जनेऊ सजा है।
आप भगवान शंकर के अंश और वानरराज केसरी के पुत्र हैं; परंपरा हनुमान जी को शिव का अवतार मानती है। आपके महान तेज और प्रताप की सारा संसार वंदना करता है।
आप विद्वान, गुणी और अत्यंत चतुर हैं, और श्री राम का काम करने के लिए सदा उत्सुक रहते हैं।
आप प्रभु श्री राम की कथा सुनने के रसिया हैं। श्री राम, लक्ष्मण (लषन) और सीता जी आपके मन में बसते हैं।
आपने छोटा रूप धरकर अशोक वाटिका में सीता जी को दर्शन दिए, और विकराल रूप धरकर लंका जलाई।
आपने भयंकर रूप धरकर राक्षसों का संहार किया और श्री रामचंद्र जी के काम सँवारे।
युद्ध में शक्ति लगने से लक्ष्मण जी मूर्छित हुए, तब आपने संजीवनी बूटी लाकर उन्हें जीवित किया। इससे प्रसन्न होकर श्री रघुवीर ने आपको हृदय से लगा लिया।
श्री रघुनाथ जी ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा: तुम मुझे भरत के समान प्रिय भाई हो।
“हज़ार मुखों वाले शेषनाग भी तुम्हारा यश गाएँ”, ऐसा कहकर लक्ष्मीपति श्री राम ने आपको गले से लगा लिया।
सनक आदि ऋषि, ब्रह्मा आदि देवता, बड़े-बड़े मुनि, नारद जी, सरस्वती जी और शेषनाग भी आपका यश गाते हैं।
यमराज, कुबेर और दिशाओं के रक्षक दिक्पाल भी जिस यश का पूरा वर्णन नहीं कर पाते, उसे कवि और विद्वान कहाँ तक कह सकते हैं?
आपने सुग्रीव पर उपकार किया: उन्हें श्री राम से मिलाया, और इसी से उन्हें किष्किंधा का राज्य मिला।
विभीषण ने आपकी सलाह मानी (श्री राम की शरण में गए), और वे लंका के राजा बने; यह सारा संसार जानता है।
जो सूर्य हज़ारों योजन दूर है, उसे आपने बचपन में मीठा फल समझकर निगल लिया था।
प्रभु श्री राम की दी हुई अँगूठी मुँह में रखकर आपने समुद्र लाँघ लिया; आपके लिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं।
संसार के जितने भी कठिन काम हैं, वे सब आपकी कृपा से सरल हो जाते हैं।
आप श्री राम के द्वार के रखवाले हैं; आपकी आज्ञा के बिना वहाँ कोई प्रवेश नहीं कर पाता। भक्ति-परंपरा इसका भाव यह मानती है कि श्री राम तक पहुँचने का मार्ग हनुमान जी की कृपा से खुलता है।
जो आपकी शरण में आता है, वह सब सुख पाता है। जब आप रक्षक हैं, तो किसी का डर नहीं रहता।
अपने तेज को आप स्वयं ही सँभाल सकते हैं, कोई और नहीं। आपकी एक हुंकार से तीनों लोक काँप उठते हैं।
चालीसा कहती है कि जब कोई महावीर हनुमान का नाम लेता है, तब भूत-पिशाच पास नहीं आते। भक्त इसे हर तरह के भय से रक्षा के भाव में लेते हैं।
चालीसा कहती है कि वीर हनुमान का निरंतर जप करने से रोग नष्ट होते हैं और सारी पीड़ा दूर होती है।
जो मन, कर्म और वचन से हनुमान जी का ध्यान करता है, उसे वे संकटों से छुड़ाते हैं।
तपस्वी राजा श्री राम सबसे श्रेष्ठ हैं, और उनके सब काम आपने ही सँवारे।
जो कोई भी आपके पास अपना कोई मनोरथ लेकर आता है, वह जीवन का अपार फल पाता है; चालीसा यही कहती है।
चारों युगों में आपका प्रताप है। आपकी कीर्ति सारे जगत में प्रसिद्ध है और उसे उजियारा करती है।
आप साधु-संतों के रक्षक हैं, असुरों का नाश करने वाले हैं, और श्री राम के दुलारे हैं।
आप आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ देने वाले हैं; यह वरदान आपको माता जानकी (सीता जी) ने दिया है।
राम-भक्ति रूपी परम औषधि (रसायन) आपके पास है। आप सदा श्री रघुनाथ जी के दास बनकर रहते हैं।
आपके भजन से भक्त श्री राम को पाता है, और जन्म-जन्म के दुःख भूल जाता है।
ऐसा भक्त अंत समय में श्री रघुवीर के धाम जाता है, और जहाँ भी जन्म लेता है, हरि का भक्त कहलाता है।
दूसरे देवताओं को मन में न लाकर भी, केवल हनुमान जी की सेवा से सब सुख मिल जाते हैं। यह हनुमान जी की महिमा का वर्णन है, किसी देवता का निषेध नहीं।
जो बलवान वीर हनुमान जी का स्मरण करता है, उसके संकट कट जाते हैं और सब पीड़ा मिट जाती है; चालीसा यही कहती है।
हे स्वामी हनुमान जी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझ पर गुरुदेव की तरह कृपा कीजिए।
चालीसा कहती है कि जो कोई इसका सौ बार पाठ करता है, वह बंधन से छूट जाता है और उसे महान सुख मिलता है। यह चालीसा का अपना वचन है, गिनती की होड़ नहीं।
जो यह हनुमान चालीसा पढ़ता है, उसे सिद्धि मिलती है; इसके साक्षी स्वयं गौरीपति भगवान शंकर हैं। यह भी चालीसा का अपना वचन है।
तुलसीदास सदा श्री हरि का सेवक है। हे नाथ, आप मेरे हृदय में निवास कीजिए।
हे पवनपुत्र, आप संकट हरने वाले और मंगल की मूर्ति हैं। हे देवताओं में श्रेष्ठ, आप श्री राम, लक्ष्मण और सीता जी सहित मेरे हृदय में बसिए।
हनुमान चालीसा का भाव विनम्र भक्ति है। आरंभ में भक्त गुरु की कृपा से मन को निर्मल करता है और अपने को बुद्धिहीन मानकर हनुमान जी से बल, बुद्धि और विद्या माँगता है। फिर चालीसा हनुमान जी के रूप, गुण और रामायण के उनके कामों को याद करती है: सीता जी की खोज, लंका-दहन, संजीवनी लाना, सुग्रीव और विभीषण की सहायता। इन सब में एक बात बार-बार आती है: हनुमान जी का बल श्री राम की सेवा के लिए है।
दूसरे भाग में चालीसा बताती है कि हनुमान जी की शरण में भय, रोग और संकट दूर होते हैं, कठिन काम सरल होते हैं, और उनके भजन से श्री राम मिलते हैं। अंत में तुलसीदास अपने को हरि का दास कहकर विनती करते हैं कि हनुमान जी श्री राम, लक्ष्मण और सीता जी सहित हृदय में बसें। इस तरह चालीसा हनुमान जी को भक्त और भगवान के बीच के सबसे प्रिय सेवक के रूप में दिखाती है।
चौपाई 38 और 39 हनुमान चालीसा की फलश्रुति हैं। चालीसा अपने वचनों में कहती है कि जो इसका सौ बार पाठ करे वह बंधन से छूटता है और महान सुख पाता है, और जो इसे पढ़े उसे सिद्धि मिलती है, जिसके साक्षी भगवान शंकर हैं। यहाँ इन्हें चालीसा के अपने वचन के रूप में दिया गया है; इनका सार श्रद्धा और लगन है, गिनती नहीं।
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥चालीसा कहती है कि जो कोई इसका सौ बार पाठ करता है, वह बंधन से छूट जाता है और उसे महान सुख मिलता है। यह चालीसा का अपना वचन है, गिनती की होड़ नहीं।
जो यह पढ़ै हनुमान चलीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥जो यह हनुमान चालीसा पढ़ता है, उसे सिद्धि मिलती है; इसके साक्षी स्वयं गौरीपति भगवान शंकर हैं। यह भी चालीसा का अपना वचन है।
हनुमान चालीसा उत्तर भारत के घरों में सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली स्तुतियों में है। बहुत से लोग इसे बचपन में ही याद कर लेते हैं, और मंगलवार-शनिवार को, हनुमान जयंती पर, या सुंदरकांड और रामायण पाठ के साथ इसका पाठ होता है। मंदिरों में सामूहिक पाठ की भी परंपरा है।
परंपरा में हनुमान जी को बल, बुद्धि और विनम्रता का आदर्श माना जाता है: इतने शक्तिशाली होकर भी वे अपने को श्री राम का दास कहते हैं। चालीसा इसी भाव को सरल अवधी में रखती है, इसलिए इसे पढ़ना भक्ति के साथ-साथ साहस, सेवा और भरोसे का स्मरण भी माना जाता है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| दोहा 2 | बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं | sanskritdocuments.org में “बुधि” की जगह “बुद्धि”। अर्थ वही है। |
| चौपाई 5 | हाथ बज्र और ध्वजा बिराजै | कविता कोश में “और”, भक्ति भारत में “अरु”; गीता प्रेस और sanskritdocuments.org में “औ”। |
| चौपाई 6 | शंकर स्वयं केसरीनंदन | कुछ प्रचलित पुस्तकों में “सुवन” की जगह “स्वयं” भी मिलता है; भक्ति भारत दोनों पाठ देता है। गीता प्रेस और sanskritdocuments.org में “संकर सुवन”। |
| चौपाई 8 | राम लखन सीता मन बसिया | sanskritdocuments.org और अधिकांश पुस्तकों में “लखन”; गीता प्रेस की पुस्तिका में “लषन” छपा है। दोनों का अर्थ लक्ष्मण है। |
| चौपाई 22 | तुम रक्षक काहू को डरना | भक्ति भारत में; गीता प्रेस में “तुम रच्छक काहू को डर ना”। |
| चौपाई 23 | आपन तेज संहारो आपै | sanskritdocuments.org में “सम्हारो” की जगह “संहारो”। गीता प्रेस और भक्ति भारत में “सम्हारो” (सँभालो)। |
| चौपाई 39 | जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा | भक्ति भारत में “चालीसा”; गीता प्रेस और sanskritdocuments.org में “चलीसा” छपा है। |
| अंतिम दोहे के बाद | मंगल मूरति मारुत नंदन… | sanskritdocuments.org चालीसा के बाद एक आरती भी देता है; वह चालीसा का भाग नहीं है, इसलिए यहाँ नहीं दी गई। |
परंपरा और व्यापक मान्यता इसे गोस्वामी तुलसीदास की रचना मानती है, और चालीसवीं चौपाई में “तुलसीदास सदा हरि चेरा” आता है। यह उनके बारह प्रमुख ग्रंथों की सूची में अलग से नहीं गिनी जाती, इसलिए कुछ विद्वान इस पर प्रश्न उठाते हैं।
पाठ गीता प्रेस, गोरखपुर की पुस्तिका “श्रीहनुमानचालीसा” (कोड 695) के अनुसार है। आरंभ का पहला दोहा रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड के आरंभ में भी आता है।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पाठ गीता प्रेस की पुस्तिका 695 के पृष्ठ-चित्रों (archive.org) से पंक्ति-दर-पंक्ति लिया गया। हर पंक्ति sanskritdocuments.org (hanuman40) या गीता प्रेस पुस्तिका के archive.org OCR पाठ में मिलाई गई; कविता कोश और भक्ति भारत के पाठ से पाठभेद देखे गए। गीता प्रेस के पाठ के अनुसार: “बल बुधि बिद्या”, “बिद्यावान”, “राम लषन सीता”, “सम्हारो”, “कोइ”, “सोइ”, “सेइ”, “चलीसा”। चौपाई 18 में गीता प्रेस की पुस्तिका “सहस्त्र” छापती है; यहाँ sanskritdocuments.org का शुद्ध रूप “सहस्र” रखा है, अर्थ वही है। OCR की भूलें (जैसे “बढड़ाई”, “माहां”) पृष्ठ-चित्र से जाँचकर छोड़ी गईं, और ऐसी हर पंक्ति sanskritdocuments.org के पाठ से मिलती है।
हनुमान · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
मंगलवार और शनिवार को घर में हनुमान जी की सरल पूजा: राम नाम, दीपक, लाल फूल, सिंदूर का तिलक, गुड़-चने का भोग, हनुमान चालीसा और आरती।
हनुमान · आरती
आरती कीजै हनुमान लला की
हनुमान · अष्टकम् · ब्रज
बाल समय रबि भक्षि लियो तब तीनहुँ लोक भयो अँधियारो
हनुमान · स्तुति · अवधी
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान
हनुमान · श्लोक · संस्कृत
मनोजवं मारुततुल्यवेगं
राम · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में श्री राम और राम दरबार की सरल पूजा: ध्यान, तुलसी, भोग, राम-नाम जप, रामचरितमानस पाठ, आरती और क्षमा प्रार्थना, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
परंपरा और व्यापक मान्यता इसे गोस्वामी तुलसीदास की रचना मानती है; चालीसवीं चौपाई में “तुलसीदास सदा हरि चेरा” आता है। यह उनके बारह प्रमुख ग्रंथों में अलग से नहीं गिनी जाती।
अवधी में, वही भाषा जिसमें रामचरितमानस लिखा गया है। इसीलिए इसमें बिद्या, जस, कलेस जैसे रूप आते हैं।
आरंभ में दो दोहे और अंत में एक दोहा है। चालीस चौपाइयों के कारण इसका नाम चालीसा है; दोहे उनसे अलग गिने जाते हैं।
शब्दार्थ है “जो कोई सौ बार पाठ करे”। यह चालीसा की अपनी फलश्रुति है; इसे श्रद्धा और लगन से पढ़ने का संकेत माना जाता है, अधिक गिनती से अधिक फल का हिसाब नहीं।
चालीसा में कोई समय या नियम नहीं लिखा है। लोग प्रायः सुबह या शाम, मंगलवार और शनिवार को पढ़ते हैं; शांत मन और श्रद्धा से कभी भी पढ़ सकते हैं।
यहाँ गीता प्रेस, गोरखपुर का पाठ दिया गया है, जिसे सबसे मानक माना जाता है। दूसरी पुस्तकों के पाठभेद नीचे अलग से दिए गए हैं।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।