श्री रामरक्षा स्तोत्रम्
राम · स्तोत्र · संस्कृत
ध्यान और पुष्प अर्पण के श्लोक इसी से हैं (चरण 3 और 6); समय हो तो पूरा पाठ

पूजा विधि · राम · रोज़ की पूजा
घर में श्री राम और राम दरबार की सरल पूजा: ध्यान, तुलसी, भोग, राम-नाम जप, रामचरितमानस पाठ, आरती और क्षमा प्रार्थना, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
यह घर में श्री राम (राम दरबार) की रोज़ की सरल पूजा है: ध्यान, जल, चंदन, फूल, तुलसी, धूप-दीप, भोग, राम-नाम का जप, रामचरितमानस का पाठ और आरती। राम नवमी पर यही पूजा दोपहर में जन्म-उत्सव के साथ की जाती है। अखंड रामायण का विधिवत अनुष्ठान, यज्ञ-हवन और किसी संप्रदाय की दीक्षा से मिले राम-मंत्र की साधना यहाँ नहीं हैं; उनके लिए किसी जानकार या पुरोहित से मार्गदर्शन लें।
घरों में श्री राम की पूजा प्रायः राम दरबार के रूप में होती है: बीच में श्री राम, उनकी बाईं ओर माता सीता, दाहिनी ओर लक्ष्मण जी और चरणों में हनुमान जी। इसलिए राम जी की पूजा में सीता जी, लक्ष्मण जी और हनुमान जी का भी स्मरण होता है। राम भगवान विष्णु के अवतार हैं, इसलिए वैष्णव रीत में उनके भोग में भी तुलसीदल रखा जाता है।
राम जी की उपासना की सबसे सरल और सबसे प्रचलित राह राम-नाम है, और घर-घर में इसका साथी है गोस्वामी तुलसीदास का रामचरितमानस। रोज़ की पूजा में कुछ चौपाइयाँ पढ़ लेना, या केवल 'श्री राम जय राम जय जय राम' का जप करना भी पूरी श्रद्धा की पूजा है। नीचे हर चरण के साथ उसका छोटा रूप भी दिया है।
| सामग्री | उपयोग | स्थिति | विकल्प / टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| राम दरबार या श्री राम का चित्र या मूर्ति | पूजा का केंद्र | वैकल्पिक | चित्र न हो तो दीपक जलाकर उसके सामने बैठें और मन में राम दरबार का ध्यान करें। |
| तुलसीदल | फूलों के साथ चढ़ाने और भोग पर रखने के लिए | परंपरा-विशेष | वैष्णव रीत में राम जी के भोग में तुलसी रखी जाती है। न मिले तो मन से अर्पित करें; पूजा पूरी है। |
| शुद्ध जल का लोटा | आचमन, स्नान और अर्घ्य के लिए | वैकल्पिक | गंगाजल हो तो कुछ बूँदें मिला लें; न हो तो साफ़ जल। |
| फूल और फूलमाला | पुष्प अर्पण | वैकल्पिक | जो भी ताज़ा फूल मिले; कमल मिले तो बहुत सुंदर, पर ज़रूरी नहीं। |
| चंदन, रोली और अक्षत | तिलक और अर्पण के लिए | वैकल्पिक | जो एक-दो चीज़ें हों, वही। |
| घी का दीपक और धूप | दीप-धूप और आरती के लिए | वैकल्पिक | घी न हो तो तिल के तेल का दीपक। |
| भोग: फल, मिठाई, खीर, पंचामृत | नैवेद्य के लिए | वैकल्पिक | कुछ न हो तो गुड़ या मिश्री और जल। |
| रामचरितमानस की पोथी या गुटका | पाठ के लिए | वैकल्पिक | पोथी न हो तो जो चौपाई या दोहा याद हो, वही; या केवल राम-नाम। |
| छोटा पीला वस्त्र या मौली | वस्त्र अर्पण के लिए | वैकल्पिक | न हो तो मन से अर्पित करें। |
| घंटी और शंख | पूजा के आरंभ और आरती में | वैकल्पिक | न हों तो कोई बात नहीं। |
पूजा से पहले मन में निश्चय करना कि किसकी, किस भाव से पूजा कर रहे हैं। दाहिने हाथ में थोड़ा जल, फूल और अक्षत लेकर संकल्प बोलें और जल थाली में छोड़ दें।
हे श्री राम, आज (दिन का नाम) को मैं (अपना नाम) अपने परिवार के साथ आपकी, माता सीता, लक्ष्मण जी और हनुमान जी की प्रसन्नता के लिए यह पूजा कर रहा/रही हूँ। मेरी इस सेवा को स्वीकार करें।
विस्तृत संस्कृत संकल्प में संवत्, मास, तिथि, स्थान और गोत्र बोले जाते हैं; किसी अनुष्ठान में यह पुरोहित करवाते हैं। रोज़ की पूजा में अपनी भाषा का यह संकल्प काफ़ी है।
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम्॥
अर्थ: जिनकी दाहिनी ओर लक्ष्मण हैं, बाईं ओर जनक की पुत्री सीता हैं और सामने पवनपुत्र हनुमान हैं, उन रघुनंदन श्री राम की मैं वंदना करता हूँ।
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्॥
अर्थ: जो विपत्तियों को दूर करते हैं और सब संपदाएँ देते हैं, सारे जगत को आनंद देने वाले उन श्री राम को मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ।
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्॥
अर्थ: जो संसार की उत्पत्ति, पालन और संहार करने वाली हैं, क्लेश हरने वाली हैं और सबका कल्याण करने वाली हैं, श्री राम की प्रिय उन सीता जी को मैं प्रणाम करता हूँ।
आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं काञ्चनम्
वैदेहीहरणं जटायुमरणम् सुग्रीवसम्भाषणम्॥
वालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लङ्कापुरीदाहनम्
पश्चाद्रावणकुम्भकर्णहननं एतद्धिरामायणम्॥
अर्थ: पहले श्री राम का वन जाना, सोने के हिरण को मारना, सीता जी का हरण, जटायु की मृत्यु और सुग्रीव से मित्रता; फिर बाली का अंत, समुद्र पार करना और लंका का जलना; अंत में रावण और कुंभकर्ण का वध: यही रामायण है।
स्रोत: sanskritdocuments.org, श्लोक संग्रह 2: श्रीरामायणसूत्र (एकश्लोकी रामायण)
राम · स्तोत्र · संस्कृत
ध्यान और पुष्प अर्पण के श्लोक इसी से हैं (चरण 3 और 6); समय हो तो पूरा पाठ
सीता · श्लोक · संस्कृत
सीता जी को नमन के समय (चरण 7)
हनुमान · श्लोक · संस्कृत
हनुमान जी को नमन के समय (चरण 7)
राम · स्तुति · ब्रज
आरती के समय या पाठ के बाद गाने के लिए (चरण 11 और 12)
राम · चालीसा
पाठ के समय (चरण 11)
भोग पर तुलसीदल रखने की वैष्णव रीत है। भोग सात्त्विक हो: प्याज़-लहसुन के बिना। भोग थोड़ी देर बाद हटाकर प्रसाद के रूप में बाँट दें।
हे सियाराम, इस पूजा में जो कमी रह गई हो, उसे क्षमा करें। हमें आपकी तरह मर्यादा में रहने, सच बोलने और सबका भला सोचने की शक्ति दें, और हनुमान जी की तरह आपके चरणों में मन लगा रहे।
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
अर्थ: हे जनार्दन, मेरी पूजा में मंत्र की, विधि की या भक्ति की जो कमी रही हो, उसके बावजूद मैंने जो पूजा की है, उसे पूरा मान लें। मैं न आपको बुलाना जानता हूँ, न विदा करना, न ठीक से पूजा करना; हे परमेश्वर, मुझे क्षमा करें।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, गृह-मन्दिर में पञ्चदेव-पूजा: क्षमा-याचना
राम · आरती · ब्रज
ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन
हनुमान · आरती
आरती कीजै हनुमान लला की
समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): ध्यान और पुष्प के श्लोक sanskritdocuments के रामरक्षास्तोत्र (श्लोक 31, 35) से; सीता-वंदना रामचरितमानस बालकाण्ड के मंगलाचरण (श्लोक 5) से; एकश्लोकी रामायण श्लोक संग्रह 2 से; क्षमा-याचना और आरती की रीत गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश से। श्री राम की आरती का पन्ना लिखते समय तैयार नहीं था (texts/ref में विनय पत्रिका की 'ऐसी आरती राम रघुबीर की' का स्रोत आ चुका था, पर work फ़ाइल नहीं), इसलिए aarti को null रखा गया और आरती के चरण में उसका और 'श्री रामचन्द्र कृपालु' का केवल नाम लिया गया; राम-आरती का पन्ना पास हो जाए तो उसे चरण 12 और aarti में जोड़ दें।
अलग-अलग क्षेत्रों में श्री राम की अलग आरतियाँ प्रचलित हैं। गोस्वामी तुलसीदास की विनय पत्रिका में 'ऐसी आरती राम रघुबीर की' पद है, और उत्तर भारत के बहुत-से घरों में आरती के समय उन्हीं की स्तुति 'श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन' गाई जाती है। जो आरती आपके घर में गाई जाती रही है, वही गाएँ; बोल याद न हों तो दीपक घुमाते हुए राम-नाम लेना भी आरती है।
हाँ, वैष्णव रीत में राम जी के भोग और पूजा में तुलसीदल रखा जाता है, क्योंकि वे भगवान विष्णु के अवतार हैं। तुलसी न हो तो भी पूजा पूरी है; मन से अर्पित कर दें।
किसी शुभ दिन, जैसे राम नवमी, विवाह पंचमी या किसी भी मंगलवार से, बालकांड के आरंभ से रोज़ कुछ दोहे-चौपाई पढ़ना शुरू करें। पढ़ने से पहले राम दरबार को प्रणाम करें और पढ़कर फिर प्रणाम करें। रोज़ थोड़ा पढ़ना, कभी-कभार ज़्यादा पढ़ने से अच्छा है।
श्री राम का जन्म दोपहर में माना जाता है, इसलिए राम नवमी की मुख्य पूजा मध्याह्न में होती है। उस दिन की सही तारीख़ साइट के राम नवमी पन्ने पर है। सुबह स्नान करके संकल्प लें और दोपहर को यही पूजा जन्म-उत्सव के साथ करें।
इस पर परिवारों में अलग-अलग रीत है। कई घरों में उन दिनों मूर्ति और पोथी छूने से बचा जाता है, जबकि बहुत-से परिवार ऐसा कोई नियम नहीं मानते। जो भी रीत हो, राम-नाम का जप और मन से प्रार्थना हर दिन की जा सकती है; इसमें अपराध-बोध की कोई बात नहीं है।
श्री राम का कोई भी चित्र, या केवल 'राम' लिखा एक साफ़ काग़ज़ रखकर भी पूजा की जा सकती है। चित्र बिल्कुल न हो तो दीपक जलाकर मन में राम दरबार का ध्यान करें।
छोटा रूप करें: दीपक जलाएँ, फूल या तुलसी चढ़ाएँ, 11 बार 'श्री राम जय राम जय जय राम' कहें और प्रणाम करें। चलते-फिरते भी राम-नाम लिया जा सकता है।
इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।