श्री राम पूजा विधि
राम · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में श्री राम और राम दरबार की सरल पूजा: ध्यान, तुलसी, भोग, राम-नाम जप, रामचरितमानस पाठ, आरती और क्षमा प्रार्थना, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य । बुधकौशिक ऋषिः ।श्रीसीतारामचन्द्रो देवता । अनुष्टुप् छन्दः ।सीता शक्तिः । श्रीमद् हनुमान कीलकम् ।श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः ॥
asya śrīrāmarakṣāstotramantrasya | budhakauśika ṛṣiḥ |
śrīsītārāmacandro devatā | anuṣṭup chandaḥ |
sītā śaktiḥ | śrīmad hanumāna kīlakam |
śrīrāmacandraprītyarthe rāmarakṣāstotrajape viniyogaḥ ||
अर्थ: इस रामरक्षा स्तोत्र-मंत्र के ऋषि बुधकौशिक हैं, देवता श्री सीता-रामचन्द्र हैं, छंद अनुष्टुप् है, शक्ति सीता जी हैं और कीलक श्रीमान हनुमान जी हैं। श्री रामचन्द्र की प्रसन्नता के लिए रामरक्षा स्तोत्र के जप में इसका विनियोग (उपयोग) किया जाता है।
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थंपीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् ।वामाङ्कारूढ सीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभंनानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचन्द्रम् ॥
dhyāyedājānubāhuṃ dhṛtaśaradhanuṣaṃ baddhapadmāsanasthaṃ
pītaṃ vāso vasānaṃ navakamaladalaspardhinetraṃ prasannam |
vāmāṅkārūḍha sītāmukhakamalamilallocanaṃ nīradābhaṃ
nānālaṅkāradīptaṃ dadhatamurujaṭāmaṇḍanaṃ rāmacandram ||
अर्थ: घुटनों तक लंबी भुजाओं वाले, धनुष-बाण धारण किए, पद्मासन में बैठे, पीला वस्त्र पहने, नए कमल-दल से होड़ करती आँखों वाले, प्रसन्न, बाईं गोद में बैठी सीता जी के मुख-कमल से जिनकी आँखें मिली हुई हैं, बादल जैसे श्याम, अनेक आभूषणों से दमकते, बड़ी जटाओं से सजे श्री रामचन्द्र का ध्यान करना चाहिए।
चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम् ।एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥१॥
caritaṃ raghunāthasya śatakoṭi pravistaram |
ekaikamakṣaraṃ puṃsāṃ mahāpātakanāśanam ||
अर्थ: श्री रघुनाथ जी का चरित्र सौ करोड़ (श्लोकों) के विस्तार वाला है, और उसका एक-एक अक्षर मनुष्यों के बड़े-बड़े पापों का नाश करने वाला है।
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥२॥
dhyātvā nīlotpalaśyāmaṃ rāmaṃ rājīvalocanam |
jānakīlakṣmaṇopetaṃ jaṭāmukuṭamaṇḍitam ||
अर्थ: नील कमल जैसे श्याम, कमल-नयन, जानकी और लक्ष्मण के साथ, जटाओं के मुकुट से सुशोभित श्री राम का ध्यान करके (आगे के श्लोकों से वाक्य पूरा होता है)।
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तञ्चरान्तकम् ।स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥३॥
sāsitūṇadhanurbāṇapāṇiṃ naktañcarāntakam |
svalīlayā jagattrātumāvirbhūtamajaṃ vibhum ||
अर्थ: जो हाथों में तलवार, तरकश, धनुष और बाण लिए हैं, राक्षसों का अंत करने वाले हैं, और जगत की रक्षा के लिए अपनी लीला से प्रकट हुए अजन्मा, सर्वव्यापी प्रभु हैं, (उनका ध्यान करके)।
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥४॥
rāmarakṣāṃ paṭhetprājñaḥ pāpaghnīṃ sarvakāmadām |
śiro me rāghavaḥ pātu bhālaṃ daśarathātmajaḥ ||
अर्थ: बुद्धिमान मनुष्य पापों का नाश करने वाली और सब कामनाएँ पूरी करने वाली इस रामरक्षा का पाठ करे। राघव मेरे सिर की रक्षा करें, दशरथ के पुत्र मेरे माथे की।
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती ।घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥५॥
kausalyeyo dṛśau pātu viśvāmitrapriyaḥ śrutī |
ghrāṇaṃ pātu makhatrātā mukhaṃ saumitrivatsalaḥ ||
अर्थ: कौसल्या के पुत्र मेरी आँखों की रक्षा करें, विश्वामित्र के प्रिय मेरे कानों की; यज्ञ के रक्षक मेरी नाक की और सुमित्रा-पुत्र लक्ष्मण पर स्नेह रखने वाले मेरे मुख की रक्षा करें।
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः ।स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥६॥
jihvāṃ vidyānidhiḥ pātu kaṇṭhaṃ bharatavanditaḥ |
skandhau divyāyudhaḥ pātu bhujau bhagneśakārmukaḥ ||
अर्थ: विद्या के भंडार मेरी जीभ की रक्षा करें, भरत से वंदित मेरे कंठ की; दिव्य अस्त्रों वाले मेरे कंधों की और शिव का धनुष तोड़ने वाले मेरी भुजाओं की रक्षा करें।
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित् ।मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥७॥
karau sītāpatiḥ pātu hṛdayaṃ jāmadagnyajit |
madhyaṃ pātu kharadhvaṃsī nābhiṃ jāmbavadāśrayaḥ ||
अर्थ: सीतापति मेरे हाथों की रक्षा करें, परशुराम को जीतने वाले मेरे हृदय की; खर राक्षस का वध करने वाले मेरे शरीर के मध्य भाग की और जाम्बवान के आश्रय मेरी नाभि की रक्षा करें।
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत् ॥८॥
sugrīveśaḥ kaṭī pātu sakthinī hanumatprabhuḥ |
ūrū raghūttamaḥ pātu rakṣaḥkulavināśakṛt ||
अर्थ: सुग्रीव के स्वामी मेरी कमर की रक्षा करें, हनुमान के प्रभु मेरे कूल्हों की; राक्षस-कुल का नाश करने वाले रघुश्रेष्ठ मेरी जाँघों की रक्षा करें।
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः ।पादौ बिभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ॥९॥
jānunī setukṛtpātu jaṅghe daśamukhāntakaḥ |
pādau bibhīṣaṇaśrīdaḥ pātu rāmo’khilaṃ vapuḥ ||
अर्थ: सेतु बनाने वाले मेरे घुटनों की रक्षा करें, दस मुख वाले रावण का अंत करने वाले मेरी पिंडलियों की, विभीषण को राज्य-लक्ष्मी देने वाले मेरे पैरों की, और श्री राम मेरे पूरे शरीर की रक्षा करें।
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥१०॥
etāṃ rāmabalopetāṃ rakṣāṃ yaḥ sukṛtī paṭhet |
sa cirāyuḥ sukhī putrī vijayī vinayī bhavet ||
अर्थ: जो पुण्यात्मा राम के बल से युक्त इस रक्षा का पाठ करता है, वह दीर्घायु, सुखी, संतान वाला, विजयी और विनम्र होता है, ऐसा यह स्तोत्र कहता है।
पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः ।न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥११॥
pātālabhūtalavyomacāriṇaśchadmacāriṇaḥ |
na draṣṭumapi śaktāste rakṣitaṃ rāmanāmabhiḥ ||
अर्थ: पाताल, पृथ्वी और आकाश में घूमने वाले और छिपकर चलने वाले (दुष्ट जीव) राम-नामों से रक्षित व्यक्ति को देख भी नहीं पाते, ऐसा यह स्तोत्र कहता है।
रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन् ।नरो न लिप्यते पापैः भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥
rāmeti rāmabhadreti rāmacandreti vā smaran |
naro na lipyate pāpaiḥ bhuktiṃ muktiṃ ca vindati ||
अर्थ: 'राम', 'रामभद्र' या 'रामचन्द्र' कहकर स्मरण करने वाला मनुष्य पापों से लिप्त नहीं होता और भोग तथा मोक्ष दोनों पाता है, ऐसा यह स्तोत्र कहता है।
जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥१३॥
jagajjaitraikamantreṇa rāmanāmnābhirakṣitam |
yaḥ kaṇṭhe dhārayettasya karasthāḥ sarvasiddhayaḥ ||
अर्थ: जगत को जीतने वाले एकमात्र मंत्र, राम-नाम से रक्षित इस (स्तोत्र) को जो कंठ में धारण करता है (कंठस्थ रखता है), सब सिद्धियाँ उसकी मुट्ठी में होती हैं, ऐसा यह स्तोत्र कहता है।
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत् ।अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम् ॥१४॥
vajrapañjaranāmedaṃ yo rāmakavacaṃ smaret |
avyāhatājñaḥ sarvatra labhate jayamaṅgalam ||
अर्थ: वज्रपंजर नाम के इस राम-कवच का जो स्मरण करता है, उसकी आज्ञा कहीं नहीं टलती और उसे सब जगह विजय और मंगल मिलता है, ऐसा यह स्तोत्र कहता है।
आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः ।तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥१५॥
ādiṣṭavān yathā svapne rāmarakṣāmimāṃ haraḥ |
tathā likhitavān prātaḥ prabuddho budhakauśikaḥ ||
अर्थ: भगवान शिव ने स्वप्न में यह रामरक्षा जैसे बताई, वैसे ही सुबह जागकर बुधकौशिक ऋषि ने इसे लिख लिया।
आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम् ।अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान् स नः प्रभुः ॥१६॥
ārāmaḥ kalpavṛkṣāṇāṃ virāmaḥ sakalāpadām |
abhirāmastrilokānāṃ rāmaḥ śrīmān sa naḥ prabhuḥ ||
अर्थ: जो कल्पवृक्षों के उपवन जैसे हैं (सब इच्छाएँ पूरी करने वाले), सब विपत्तियों का अंत करने वाले हैं, तीनों लोकों में सबसे सुंदर हैं, वे श्रीमान राम हमारे स्वामी हैं।
तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥
taruṇau rūpasampannau sukumārau mahābalau |
puṇḍarīkaviśālākṣau cīrakṛṣṇājināmbarau ||
अर्थ: जो दोनों युवा हैं, रूपवान हैं, सुकुमार हैं, महाबली हैं, कमल जैसी बड़ी आँखों वाले हैं, वल्कल और काले मृगचर्म के वस्त्र पहने हैं (आगे के श्लोकों से वाक्य पूरा होता है)।
फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥
phalamūlāśinau dāntau tāpasau brahmacāriṇau |
putrau daśarathasyaitau bhrātarau rāmalakṣmaṇau ||
अर्थ: जो फल-मूल खाते हैं, संयमी हैं, तपस्वी हैं, ब्रह्मचारी हैं, दशरथ के वे दोनों पुत्र, भाई राम और लक्ष्मण (आगे के श्लोक में प्रार्थना है)।
शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।रक्षः कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥१९॥
śaraṇyau sarvasattvānāṃ śreṣṭhau sarvadhanuṣmatām |
rakṣaḥ kulanihantārau trāyetāṃ no raghūttamau ||
अर्थ: जो सब प्राणियों को शरण देने वाले हैं, सब धनुर्धारियों में श्रेष्ठ हैं और राक्षस-कुल का नाश करने वाले हैं, वे रघुकुल के दोनों श्रेष्ठ वीर हमारी रक्षा करें।
आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषङ्गसङ्गिनौ ।रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम् ॥२०॥
āttasajjadhanuṣāviṣuspṛśāvakṣayāśuganiṣaṅgasaṅginau |
rakṣaṇāya mama rāmalakṣmaṇāvagrataḥ pathi sadaiva gacchatām ||
अर्थ: धनुष चढ़ाए हुए, बाण को छूते हुए, कभी खाली न होने वाले बाणों के तरकश लिए राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा के लिए मार्ग में सदा मेरे आगे-आगे चलें।
सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।गच्छन्मनोरथोऽस्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः ॥२१॥
sannaddhaḥ kavacī khaḍgī cāpabāṇadharo yuvā |
gacchanmanoratho’smākaṃ rāmaḥ pātu salakṣmaṇaḥ ||
अर्थ: तैयार, कवच पहने, तलवार, धनुष और बाण लिए युवा राम, जो हमारे मनोरथ की तरह (हमारे साथ) चलते हैं, लक्ष्मण सहित हमारी रक्षा करें।
रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥२२॥
rāmo dāśarathiḥ śūro lakṣmaṇānucaro balī |
kākutsthaḥ puruṣaḥ pūrṇaḥ kausalyeyo raghūttamaḥ ||
अर्थ: राम, दशरथ-पुत्र, शूर, जिनके पीछे लक्ष्मण चलते हैं, बलवान, ककुत्स्थ-वंशी, पूर्ण पुरुष, कौसल्या-पुत्र, रघुश्रेष्ठ (ये नाम आगे के श्लोक तक चलते हैं)।
वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः ।जानकीवल्लभः श्रीमान् अप्रमेय पराक्रमः ॥२३॥
vedāntavedyo yajñeśaḥ purāṇapuruṣottamaḥ |
jānakīvallabhaḥ śrīmān aprameya parākramaḥ ||
अर्थ: वेदांत से जाने जाने वाले, यज्ञों के स्वामी, पुराण-पुरुष और पुरुषोत्तम, जानकी के प्रिय, श्रीमान और अपार पराक्रम वाले (राम)।
इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ।अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥२४॥
ityetāni japannityaṃ madbhaktaḥ śraddhayānvitaḥ |
aśvamedhādhikaṃ puṇyaṃ samprāpnoti na saṃśayaḥ ||
अर्थ: इन (नामों) का जो मेरा भक्त श्रद्धा के साथ नित्य जप करता है, वह अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक पुण्य पाता है, इसमें संशय नहीं, ऐसा यह स्तोत्र कहता है।
रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम् ।स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैः न ते संसारिणो नराः ॥२५॥
rāmaṃ dūrvādalaśyāmaṃ padmākṣaṃ pītavāsasam |
stuvanti nāmabhirdivyaiḥ na te saṃsāriṇo narāḥ ||
अर्थ: दूर्वा घास जैसे श्याम, कमल-नयन, पीताम्बरधारी राम की जो दिव्य नामों से स्तुति करते हैं, वे मनुष्य फिर संसार के बंधन में नहीं रहते, ऐसा यह स्तोत्र कहता है।
रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरम् ।काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम् ।वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ॥२६॥
rāmaṃ lakṣmaṇapūrvajaṃ raghuvaraṃ sītāpatiṃ sundaram |
kākutsthaṃ karuṇārṇavaṃ guṇanidhiṃ viprapriyaṃ dhārmikam |
rājendraṃ satyasandhaṃ daśarathatanayaṃ śyāmalaṃ śāntamūrtim |
vande lokābhirāmaṃ raghukulatilakaṃ rāghavaṃ rāvaṇārim ||
अर्थ: लक्ष्मण के बड़े भाई, रघुवंश में श्रेष्ठ, सीतापति, सुंदर, ककुत्स्थ-वंशी, करुणा के सागर, गुणों के भंडार, ब्राह्मणों के प्रिय, धर्मात्मा, राजाओं के राजा, सत्य-प्रतिज्ञ, दशरथ-पुत्र, श्याम, शांत मूर्ति, सब लोकों को आनंद देने वाले, रघुकुल-तिलक, रावण के शत्रु राघव राम को मैं प्रणाम करता हूँ।
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे ।रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥२७॥
rāmāya rāmabhadrāya rāmacandrāya vedhase |
raghunāthāya nāthāya sītāyāḥ pataye namaḥ ||
अर्थ: राम को, रामभद्र को, रामचन्द्र को, विधाता को, रघुनाथ को, स्वामी को और सीता के पति को नमस्कार है।
श्रीराम राम रघुनन्दन राम रामश्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।श्रीराम राम रणकर्कश राम रामश्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥
śrīrāma rāma raghunandana rāma rāma
śrīrāma rāma bharatāgraja rāma rāma |
śrīrāma rāma raṇakarkaśa rāma rāma
śrīrāma rāma śaraṇaṃ bhava rāma rāma ||
अर्थ: हे श्रीराम, हे रघुनंदन राम, हे भरत के बड़े भाई राम, हे रण में कठोर राम, हे श्रीराम, मेरे शरणदाता बनिए।
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामिश्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामिश्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥
śrīrāmacandracaraṇau manasā smarāmi
śrīrāmacandracaraṇau vacasā gṛṇāmi |
śrīrāmacandracaraṇau śirasā namāmi
śrīrāmacandracaraṇau śaraṇaṃ prapadye ||
अर्थ: श्री रामचन्द्र के चरणों का मैं मन से स्मरण करता हूँ, वाणी से उनका गुणगान करता हूँ, सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम करता हूँ, और श्री रामचन्द्र के चरणों की शरण लेता हूँ।
माता रामो मत्पिता रामचन्द्रःस्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु-र्नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥
mātā rāmo matpitā rāmacandraḥ
svāmī rāmo matsakhā rāmacandraḥ |
sarvasvaṃ me rāmacandro dayālu-
rnānyaṃ jāne naiva jāne na jāne ||
अर्थ: राम मेरी माता हैं, रामचन्द्र मेरे पिता हैं, राम मेरे स्वामी हैं, रामचन्द्र मेरे सखा हैं; दयालु रामचन्द्र ही मेरा सब कुछ हैं। मैं किसी और को नहीं जानता, बिल्कुल नहीं जानता।
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा ।पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ॥३१॥
dakṣiṇe lakṣmaṇo yasya vāme tu janakātmajā |
purato mārutiryasya taṃ vande raghunandanam ||
अर्थ: जिनके दाहिनी ओर लक्ष्मण हैं, बाईं ओर जनक-नंदिनी सीता हैं और सामने हनुमान हैं, उन रघुनंदन को मैं प्रणाम करता हूँ।
लोकाभिरामं रणरङ्गधीरंराजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् ।कारुण्यरूपं करुणाकरं तंश्रीरामचन्द्रम् शरणं प्रपद्ये ॥३२॥
lokābhirāmaṃ raṇaraṅgadhīraṃ
rājīvanetraṃ raghuvaṃśanātham |
kāruṇyarūpaṃ karuṇākaraṃ taṃ
śrīrāmacandram śaraṇaṃ prapadye ||
अर्थ: सब लोकों को आनंद देने वाले, रणभूमि में धीर, कमल-नयन, रघुवंश के स्वामी, करुणा की मूर्ति और करुणा के भंडार उन श्री रामचन्द्र की मैं शरण लेता हूँ।
मनोजवं मारुततुल्यवेगंजितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।वातात्मजं वानरयूथमुख्यंश्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥
manojavaṃ mārutatulyavegaṃ
jitendriyaṃ buddhimatāṃ variṣṭham |
vātātmajaṃ vānarayūthamukhyaṃ
śrīrāmadūtaṃ śaraṇaṃ prapadye ||
अर्थ: मन जैसी गति और वायु जैसे वेग वाले, जितेन्द्रिय, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, वायुपुत्र, वानर-समूह के प्रमुख, श्री राम के दूत (हनुमान जी) की मैं शरण लेता हूँ।
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् ।आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥३४॥
kūjantaṃ rāmarāmeti madhuraṃ madhurākṣaram |
āruhya kavitāśākhāṃ vande vālmīkikokilam ||
अर्थ: कविता रूपी डाल पर बैठकर 'राम-राम' के मधुर अक्षरों को मधुरता से कूजने वाले वाल्मीकि रूपी कोयल को मैं प्रणाम करता हूँ।
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् ।लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥३५॥
āpadāmapahartāraṃ dātāraṃ sarvasampadām |
lokābhirāmaṃ śrīrāmaṃ bhūyo bhūyo namāmyaham ||
अर्थ: विपत्तियों को हरने वाले, सब संपदाएँ देने वाले, सब लोकों को आनंद देने वाले श्री राम को मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ।
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम् ।तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥३६॥
bharjanaṃ bhavabījānāmarjanaṃ sukhasampadām |
tarjanaṃ yamadūtānāṃ rāmarāmeti garjanam ||
अर्थ: 'राम-राम' की गर्जना संसार (जन्म-मरण) के बीजों को भून देती है, सुख और संपदा को कमाती है, और यमदूतों को डराती है।
रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजेरामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहंरामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥
rāmo rājamaṇiḥ sadā vijayate rāmaṃ rameśaṃ bhaje
rāmeṇābhihatā niśācaracamū rāmāya tasmai namaḥ |
rāmānnāsti parāyaṇaṃ parataraṃ rāmasya dāso’smyahaṃ
rāme cittalayaḥ sadā bhavatu me bho rāma māmuddhara ||
अर्थ: राजाओं के रत्न राम सदा विजयी होते हैं; मैं लक्ष्मीपति राम को भजता हूँ; राम ने राक्षसों की सेना का नाश किया, उन राम को नमस्कार है; राम से बढ़कर कोई आश्रय नहीं; मैं राम का दास हूँ; मेरा मन सदा राम में लीन रहे; हे राम, मेरा उद्धार कीजिए। (इस श्लोक में "राम" शब्द आठों विभक्तियों में आया है।)
श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे ।सहस्रनामतत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥
śrīrāma rāma rāmeti rame rāme manorame |
sahasranāmatattulyaṃ rāmanāma varānane ||
अर्थ: (शिव पार्वती से कहते हैं:) हे सुमुखी, मैं 'राम राम राम' कहते हुए मनोरम राम में ही रमण करता हूँ; राम-नाम (विष्णु के) सहस्र नामों के बराबर है।
इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥॥ श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु ॥
iti śrībudhakauśikaviracitaṃ śrīrāmarakṣāstotraṃ sampūrṇam ||
|| śrīsītārāmacandrārpaṇamastu ||
अर्थ: इस प्रकार श्री बुधकौशिक ऋषि का रचा श्री रामरक्षा स्तोत्र पूरा हुआ। यह (पाठ) श्री सीता-रामचन्द्र को अर्पित हो।
रामरक्षा स्तोत्र श्री राम का कवच-स्तोत्र है। इसके आरम्भ में विनियोग और ध्यान है, फिर श्लोक 4 से 9 तक श्री राम के अलग-अलग नामों से शरीर के हर अंग की रक्षा की प्रार्थना है: राघव सिर की, कौसल्येय आँखों की, सीतापति हाथों की, और अंत में "पातु रामोऽखिलं वपुः", राम पूरे शरीर की रक्षा करें। इसके बाद राम-नाम की महिमा, राम-लक्ष्मण का ध्यान और कई प्रसिद्ध वन्दना-श्लोक हैं, जैसे "रामाय रामभद्राय", "लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं" और "मनोजवं मारुततुल्यवेगं"।
स्तोत्र अपने विनियोग में बुधकौशिक ऋषि को इसका ऋषि बताता है, और श्लोक 15 कहता है कि भगवान शिव ने स्वप्न में जैसे बताया, वैसे ही बुधकौशिक ने सुबह जागकर इसे लिखा। यह स्तोत्र का अपना कथन है। अंतिम श्लोक "श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे" में शिव पार्वती से राम-नाम की महिमा कहते हैं।
रामरक्षा तीन हिस्सों में समझी जा सकती है। पहले विनियोग, ध्यान और श्लोक 1–3: श्री राम के रूप का ध्यान, जिनके एक-एक अक्षर वाले चरित्र को पापों का नाश करने वाला कहा गया है। फिर श्लोक 4–9 का कवच: हर अंग की रक्षा के लिए राम का एक नाम, और हर नाम के पीछे रामायण की एक घटना, जैसे विश्वामित्र का यज्ञ बचाना, शिव का धनुष तोड़ना, परशुराम को जीतना, खर का वध, सेतु बनाना, विभीषण को राज्य देना। इस तरह कवच पढ़ते-पढ़ते पूरी रामकथा याद हो आती है।
श्लोक 10–15 इस कवच की महिमा बताते हैं और श्लोक 15 कहता है कि यह शिव ने स्वप्न में बुधकौशिक को बताया। आगे श्लोक 16–25 में तपस्वी वेश वाले, धनुर्धारी राम-लक्ष्मण का ध्यान है, जो मार्ग में भक्त के आगे-आगे चलकर उसकी रक्षा करें, और राम के नामों की माला।
श्लोक 26–38 वन्दना और शरणागति के श्लोक हैं, जिनमें से कई अलग से भी बहुत गाए जाते हैं: "रामाय रामभद्राय", "माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः", "मनोजवं मारुततुल्यवेगं"। अंतिम श्लोक में शिव कहते हैं कि राम-नाम सहस्र नामों के बराबर है। पूरे स्तोत्र का सार यही है: राम का नाम ही रक्षा है, और उनकी शरण ही सबसे बड़ा कवच।
इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक 10–14 और 24–25) कहती है कि इसका पाठ करने वाला दीर्घायु, सुखी, विजयी और विनम्र होता है, राम-नाम से रक्षित व्यक्ति को कोई दुष्ट जीव देख भी नहीं पाता, नाम-स्मरण करने वाला पापों से लिप्त नहीं होता, और श्रद्धा से नामों का जप अश्वमेध से अधिक पुण्य देता है। ये स्तोत्र के अपने कथन हैं; हम इन्हें किसी फल के वादे के रूप में नहीं देते।
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥जो पुण्यात्मा राम के बल से युक्त इस रक्षा का पाठ करता है, वह दीर्घायु, सुखी, संतान वाला, विजयी और विनम्र होता है, ऐसा यह स्तोत्र कहता है।
पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः ।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥पाताल, पृथ्वी और आकाश में घूमने वाले और छिपकर चलने वाले (दुष्ट जीव) राम-नामों से रक्षित व्यक्ति को देख भी नहीं पाते, ऐसा यह स्तोत्र कहता है।
रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन् ।
नरो न लिप्यते पापैः भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥'राम', 'रामभद्र' या 'रामचन्द्र' कहकर स्मरण करने वाला मनुष्य पापों से लिप्त नहीं होता और भोग तथा मोक्ष दोनों पाता है, ऐसा यह स्तोत्र कहता है।
जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥जगत को जीतने वाले एकमात्र मंत्र, राम-नाम से रक्षित इस (स्तोत्र) को जो कंठ में धारण करता है (कंठस्थ रखता है), सब सिद्धियाँ उसकी मुट्ठी में होती हैं, ऐसा यह स्तोत्र कहता है।
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत् ।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम् ॥वज्रपंजर नाम के इस राम-कवच का जो स्मरण करता है, उसकी आज्ञा कहीं नहीं टलती और उसे सब जगह विजय और मंगल मिलता है, ऐसा यह स्तोत्र कहता है।
इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥इन (नामों) का जो मेरा भक्त श्रद्धा के साथ नित्य जप करता है, वह अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक पुण्य पाता है, इसमें संशय नहीं, ऐसा यह स्तोत्र कहता है।
रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम् ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैः न ते संसारिणो नराः ॥दूर्वा घास जैसे श्याम, कमल-नयन, पीताम्बरधारी राम की जो दिव्य नामों से स्तुति करते हैं, वे मनुष्य फिर संसार के बंधन में नहीं रहते, ऐसा यह स्तोत्र कहता है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| श्लोक 4, दूसरा चरण | शिरो मे राघवः पातु फालं दशरथात्मजः | vignanam.org का पाठ (फाल/भाल, दोनों का अर्थ माथा)। |
| श्लोक 8, पहला चरण | सुग्रीवेशः कटिं पातु | vignanam.org की वर्तनी। |
| श्लोक 20, पहला चरण | आत्तसज्यधनुषाविषुस्पृशा... | vignanam.org में "सज्ज" की जगह "सज्य" (डोरी चढ़ा हुआ) है; अर्थ वही है। |
| श्लोक 21, दूसरा चरण | गच्छन्मनोरथान्नश्च रामः पातु सलक्ष्मणः | vignanam.org का मुख्य पाठ ("हमारे मनोरथों की ओर चलते हुए"); वह "मनोरथोऽस्माकं" को कोष्ठक में देता है। |
| श्लोक 24, पहला चरण | इत्येतानि जपेन्नित्यं | vignanam.org का पाठ ("जप करे")। |
| श्लोक 29, दूसरा चरण | श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृह्णामि | vignanam.org का मुख्य पाठ; वह "गृणामि" कोष्ठक में देता है। |
| श्लोक 31, पहला चरण | वामे च जनकात्मजा | vignanam.org का पाठ। |
| श्लोक 38, पहला चरण | रामरामेति रामेति रमे रामे मनोरमे | sanskritdocuments.org का मुख्य पाठ; वह "श्रीरामरामरामेति" को कोष्ठक में देता है। vignanam.org और stotranidhi.com में "श्रीराम राम रामेति" है, जो यहाँ रखा गया। |
| ध्यान, चौथा चरण | दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम् | vignanam.org का पाठ ("मण्डनं" की जगह "मण्डलं")। |
स्तोत्र का विनियोग, श्लोक 15 और अंत की पंक्ति इसे बुधकौशिक ऋषि का बताते हैं; यह स्तोत्र का अपना कथन है। इसकी कोई अलग ऐतिहासिक जानकारी नहीं मिलती।
इसका एक कुछ अलग रूप आनन्द रामायण के जन्मकाण्ड (सर्ग 5, "रामरक्षाकथनम्") में भी मिलता है, जिसे sanskritdocuments.org अलग से देता है। यहाँ प्रचलित स्वतंत्र पाठ दिया गया है।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): विनियोग, ध्यान, 38 श्लोक और समापन sanskritdocuments.org (rraksha) से लिए गए और vignanam.org व stotranidhi.com के रामरक्षा पाठ से मिलाए गए; तीनों में श्लोक-संख्या और क्रम एक है, अंतर केवल कुछ शब्दों और वर्तनी में है। अर्थ sanskritdocuments.org के सार्थ पृष्ठ (ramarakmean) के शब्दार्थ से मिलाकर लिखे गए। मुख्य पाठ sanskritdocuments.org का है; केवल श्लोक 38 का पहला चरण vignanam.org और stotranidhi.com के "श्रीराम राम रामेति" पाठ से लिया गया (sanskritdocuments.org भी इसे कोष्ठक में देता है), और उसका "रामरामेति रामेति" पाठ-भेद में है। आनन्द रामायण वाली रामरक्षा का क्रम और श्लोक अलग हैं, इसलिए उसे केवल संदर्भ के रूप में जोड़ा।
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स्तोत्र का विनियोग और श्लोक 15 बुधकौशिक ऋषि का नाम देते हैं: शिव ने स्वप्न में इसे बताया और बुधकौशिक ने सुबह इसे लिखा। यह स्तोत्र का अपना कथन है।
विनियोग में स्तोत्र के ऋषि, देवता, छंद, शक्ति और कीलक बताकर पाठ का संकल्प किया जाता है। परंपरा में इसे पहले पढ़ा जाता है; न पढ़ पाएँ तो ध्यान-श्लोक और स्तोत्र श्रद्धा से पढ़ना भी पर्याप्त माना जाता है।
हाँ, प्रचलित रामरक्षा में यह श्लोक 33 है। हनुमान जी की वन्दना के रूप में यह अलग से भी बहुत पढ़ा जाता है।
यह कवच-भाग है, जिसमें श्री राम के अलग-अलग नामों से सिर से पैर तक हर अंग की रक्षा माँगी गई है, और अंत में पूरे शरीर की।
यह अंतिम श्लोक है, जिसमें शिव पार्वती से कहते हैं कि वे राम-नाम में ही रमते हैं और राम-नाम विष्णु के सहस्र नामों के बराबर है। कुछ पुस्तकों में इसका आरम्भ "रामरामेति रामेति" भी छपा है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।