राम

चालीसा · राम

राम चालीसा

“श्री रघुबीर भक्त हितकारी” वाली राम चालीसा का मूल पाठ, हर चौपाई का सरल अर्थ, कठिन शब्द, भावार्थ और छपी पुस्तक से पाठभेद।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. चौपाई-वार अर्थ
  4. भावार्थ
  5. कठिन शब्द
  6. फलश्रुति
  7. कब पढ़ें
  8. विधि
  9. महत्व
  10. पाठ-भेद
  11. रचयिता और स्रोत
  12. ये भी पढ़ें
  13. सवाल-जवाब
  14. सुधार सुझाएँ

श्री रघुबीर भक्त हितकारी।सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी ॥१॥

अर्थ: हे श्री रघुवीर, भक्तों का हित करने वाले प्रभु, मेरी विनती सुन लीजिए।

निशि दिन ध्यान धरै जो कोई।ता सम भक्त और नहिं होई ॥२॥

अर्थ: जो दिन-रात आपका ध्यान करता है, उसके समान कोई दूसरा भक्त नहीं।

ध्यान धरे शिवजी मन माहीं।ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं ॥३॥

अर्थ: शिव जी भी मन में आपका ध्यान करते हैं; ब्रह्मा और इंद्र भी आपका पार नहीं पाते।

जय जय जय रघुनाथ कृपाला।सदा करो सन्तन प्रतिपाला ॥४॥

अर्थ: हे कृपालु रघुनाथ, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप सदा संतों का पालन कीजिए।

दूत तुम्हार वीर हनुमाना।जासु प्रभाव तिहूँ पुर जाना ॥५॥

अर्थ: वीर हनुमान आपके दूत हैं, जिनका प्रभाव तीनों लोक जानते हैं।

तुव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला।रावण मारि सुरन प्रतिपाला ॥६॥

अर्थ: हे कृपालु, आपकी भुजाएँ प्रचंड बलशाली हैं; आपने रावण को मारकर देवताओं की रक्षा की।

तुम अनाथ के नाथ गोसाईं।दीनन के हो सदा सहाई ॥७॥

अर्थ: हे स्वामी, आप अनाथों के नाथ हैं और सदा दीनों के सहायक हैं।

ब्रह्मादिक तव पार न पावैं।सदा ईश तुम्हरो यश गावैं ॥८॥

अर्थ: ब्रह्मा आदि देवता भी आपका पार नहीं पाते; हे ईश्वर, वे सदा आपका यश गाते हैं।

चारिउ वेद भरत हैं साखी।तुम भक्तन की लज्जा राखी ॥९॥

अर्थ: चारों वेद इसकी गवाही देते हैं कि आपने सदा भक्तों की लाज रखी है।

गुण गावत शारद मन माहीं।सुरपति ताको पार न पाहीं ॥१०॥

अर्थ: सरस्वती जी मन में आपके गुण गाती हैं, और देवराज इंद्र भी उनका पार नहीं पाते।

नाम तुम्हार लेत जो कोई।ता सम धन्य और नहिं होई ॥११॥

अर्थ: जो कोई आपका नाम लेता है, उसके समान धन्य कोई दूसरा नहीं।

राम नाम है अपरम्पारा।चारिहु वेदन जाहि पुकारा ॥१२॥

अर्थ: राम नाम की महिमा अपरंपार है; चारों वेद उसी नाम को पुकारते हैं।

गणपति नाम तुम्हारो लीन्हों।तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हों ॥१३॥

अर्थ: गणपति ने आपका नाम लिया, तो आपने उन्हें सबसे पहले पूजे जाने वाला बना दिया।

शेष रटत नित नाम तुम्हारा।महि को भार शीश पर धारा ॥१४॥

अर्थ: शेषनाग नित आपका नाम रटते हैं, और पृथ्वी का भार अपने सिर पर धारण करते हैं।

फूल समान रहत सो भारा।पावत कोउ न तुम्हरो पारा ॥१५॥

अर्थ: आपके नाम के बल से वह भार उन्हें फूल जैसा हल्का लगता है। फिर भी आपका पार कोई नहीं पाता।

भरत नाम तुम्हरो उर धारो।तासों कबहुँ न रण में हारो ॥१६॥

अर्थ: भरत जी ने आपका नाम हृदय में धारण किया, इसलिए वे कभी युद्ध में नहीं हारे।

नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा।सुमिरत होत शत्रु कर नाशा ॥१७॥

अर्थ: शत्रुघ्न जी के हृदय में आपका नाम प्रकाशित है; उसके स्मरण से शत्रुओं का नाश होता है।

लषन तुम्हारे आज्ञाकारी।सदा करत सन्तन रखवारी ॥१८॥

अर्थ: लक्ष्मण जी आपके आज्ञाकारी हैं, और सदा संतों की रखवाली करते हैं।

ताते रण जीते नहिं कोई।युद्ध जुरे यमहूँ किन होई ॥१९॥

अर्थ: इसलिए युद्ध में उन्हें कोई नहीं जीत सकता, चाहे सामने यमराज ही क्यों न हों।

महालक्ष्मी धर अवतारा।सब विधि करत पाप को छारा ॥२०॥

अर्थ: महालक्ष्मी ने सीता जी के रूप में अवतार लिया, जो हर प्रकार से पापों को नष्ट करती हैं।

सीता राम पुनीता गायो।भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो ॥२१॥

अर्थ: सीता-राम का पवित्र यश गाया जाता है; सीता जी ने जगत की स्वामिनी भुवनेश्वरी का प्रभाव दिखाया।

घट सों प्रकट भई सो आई।जाको देखत चन्द्र लजाई ॥२२॥

अर्थ: वे घड़े से प्रकट होकर आईं, और उनकी सुंदरता देखकर चंद्रमा भी लजा जाता है। एक परंपरा के अनुसार राजा जनक को हल चलाते समय धरती में मिले घड़े से सीता जी प्रकट हुई थीं।

सो तुमरे नित पांव पलोटत।नवो निद्धि चरणन में लोटत ॥२३॥

अर्थ: वही सीता जी नित आपके चरणों की सेवा करती हैं, और नौ निधियाँ आपके चरणों में लोटती हैं।

सिद्धि अठारह मंगल कारी।सो तुम पर जावै बलिहारी ॥२४॥

अर्थ: मंगल करने वाली अठारह सिद्धियाँ भी आप पर न्योछावर होती हैं।

औरहु जो अनेक प्रभुताई।सो सीतापति तुमहिं बनाई ॥२५॥

अर्थ: और भी जितनी प्रभुताएँ और महिमाएँ हैं, हे सीतापति, वे सब आपने ही रची हैं।

इच्छा ते कोटिन संसारा।रचत न लागत पल की बारा ॥२६॥

अर्थ: आपकी इच्छा से करोड़ों संसार बनते हैं, और उन्हें रचने में पल भर की भी देर नहीं लगती।

जो तुम्हरे चरनन चित लावै।ताको मुक्ति अवसि हो जावै ॥२७॥

अर्थ: जो आपके चरणों में मन लगाता है, उसकी मुक्ति अवश्य होती है।

सुनहु राम तुम तात हमारे।तुमहिं भरत कुल-पूज्य प्रचारे ॥२८॥

अर्थ: हे राम, सुनिए, आप हमारे पिता हैं; आपको ही कुल का पूज्य कहा गया है।

तुमहिं देव कुल देव हमारे।तुम गुरु देव प्राण के प्यारे ॥२९॥

अर्थ: आप ही हमारे देव और कुलदेव हैं; आप ही गुरुदेव हैं और प्राणों से प्यारे हैं।

जो कुछ हो सो तुमहीं राजा।जय जय जय प्रभु राखो लाजा ॥३०॥

अर्थ: हे राजा राम, जो कुछ है, सब आप ही हैं। हे प्रभु, आपकी जय हो; मेरी लाज रखिए।

रामा आत्मा पोषण हारे।जय जय जय दशरथ के प्यारे ॥३१॥

अर्थ: हे राम, आप आत्मा का पोषण करने वाले हैं। हे दशरथ के प्यारे, आपकी जय हो, जय हो, जय हो!

जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा।निर्गुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा ॥३२॥

अर्थ: हे ज्योति-स्वरूप प्रभु, आपकी जय हो! आप निर्गुण ब्रह्म हैं, अखंड और अनुपम हैं।

सत्य सत्य जय सत्य-ब्रत स्वामी।सत्य सनातन अन्तर्यामी ॥३३॥

अर्थ: हे सत्य का व्रत निभाने वाले स्वामी, आप सत्य हैं, आपकी जय हो। आप सत्य, सनातन और सबके मन की जानने वाले हैं।

सत्य भजन तुम्हरो जो गावै।सो निश्चय चारों फल पावै ॥३४॥

अर्थ: चालीसा कहती है कि जो सच्चे मन से आपका भजन गाता है, वह चारों फल (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) पाता है।

सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं।तुमने भक्तहिं सब सिद्धि दीन्हीं ॥३५॥

अर्थ: गौरीपति शिव ने सच्ची शपथ लेकर कहा है कि आपने भक्तों को सब सिद्धियाँ दी हैं।

ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा।नमो नमो जय जगपति भूपा ॥३६॥

अर्थ: हे ज्ञान-स्वरूप, मेरे हृदय को ज्ञान दीजिए। हे जगत के स्वामी राजा राम, आपको नमस्कार है, आपकी जय हो।

धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा।नाम तुम्हार हरत संतापा ॥३७॥

अर्थ: आप धन्य हैं, आपका प्रताप धन्य है; आपका नाम सब संताप हर लेता है।

सत्य शुद्ध देवन मुख गाया।बजी दुन्दुभी शंख बजाया ॥३८॥

अर्थ: देवताओं ने अपने मुख से आपका सच्चा और शुद्ध यश गाया, और दुंदुभी और शंख बजाए।

सत्य सत्य तुम सत्य सनातन।तुमहीं हो हमरे तन मन धन ॥३९॥

अर्थ: आप सत्य हैं, सनातन हैं; आप ही हमारे तन, मन और धन हैं।

याको पाठ करे जो कोई।ज्ञान प्रकट ताके उर होई ॥४०॥

अर्थ: चालीसा कहती है कि जो कोई इसका पाठ करता है, उसके हृदय में ज्ञान प्रकट होता है।

आवागमन मिटै तिहि केरा।सत्य वचन माने शिव मेरा ॥४१॥

अर्थ: उसका जन्म-मरण का आना-जाना मिट जाता है। कवि कहता है: मेरा यह वचन सत्य है, शिव भी इसे मानते हैं।

और आस मन में जो ल्यावै।तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै ॥४२॥

अर्थ: और जो मन में कोई कामना लेकर तुलसी-दल और फूल चढ़ाता है,

साग पत्र सो भोग लगावै।सो नर सकल सिद्धता पावै ॥४३॥

अर्थ: और साग-पत्ते का सादा भोग लगाता है, वह मनुष्य सब सिद्धियाँ पाता है; ऐसा चालीसा कहती है।

अन्त समय रघुबर पुर जाई।जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ॥४४॥

अर्थ: वह अंत समय में श्री रघुवीर के धाम जाता है, और जहाँ भी जन्म लेता है, हरि का भक्त कहलाता है।

श्री हरि दास कहै अरु गावै।सो वैकुण्ठ धाम को पावै ॥४५॥

अर्थ: हरिदास कहते हैं: जो इसे कहता और गाता है, वह वैकुंठ धाम पाता है।

॥ दोहा ॥

सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय।हरिदास हरिकृपा से, अवसि भक्ति को पाय॥

अर्थ: जो सात दिन नियम से, मन लगाकर इसका पाठ करता है, हरिदास कहते हैं कि वह हरि की कृपा से अवश्य भक्ति पाता है।

राम चालीसा जो पढ़े, रामचरण चित लाय।जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्ध हो जाय॥

अर्थ: चालीसा का अंतिम दोहा कहता है कि जो श्री राम के चरणों में मन लगाकर राम चालीसा पढ़ता है, उसकी मन की इच्छा पूरी होती है।

हर चौपाई का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।

परिचय

राम चालीसा श्री राम की प्रचलित हिन्दी स्तुति है। यह सीधे चौपाइयों से शुरू होती है, “श्री रघुबीर भक्त हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी॥”, और अंत में दो दोहे हैं। इस पाठ में पैंतालीस चौपाइयाँ हैं; चालीसा नाम ऐसी स्तुतियों का प्रचलित नाम है।

चालीसा राम नाम की महिमा पर टिकी है: शिव, ब्रह्मा, शेषनाग और गणपति भी उसी नाम का स्मरण करते हैं, और भरत, शत्रुघ्न और लक्ष्मण का बल भी उसी से है। फिर सीता जी को महालक्ष्मी का अवतार कहकर उनकी महिमा आती है, और श्री राम को निर्गुण ब्रह्म, सत्य-स्वरूप और कुलदेव कहकर वंदना होती है। अंत की चौपाइयाँ और दोहे पाठ का फल बताते हैं।

चौपाई-वार अर्थ

  1. चौपाई १ श्री रघुबीर भक्त हितकारी…

    हे श्री रघुवीर, भक्तों का हित करने वाले प्रभु, मेरी विनती सुन लीजिए।

  2. चौपाई २ निशि दिन ध्यान धरै जो कोई…

    जो दिन-रात आपका ध्यान करता है, उसके समान कोई दूसरा भक्त नहीं।

  3. चौपाई ३ ध्यान धरे शिवजी मन माहीं…

    शिव जी भी मन में आपका ध्यान करते हैं; ब्रह्मा और इंद्र भी आपका पार नहीं पाते।

  4. चौपाई ४ जय जय जय रघुनाथ कृपाला…

    हे कृपालु रघुनाथ, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप सदा संतों का पालन कीजिए।

  5. चौपाई ५ दूत तुम्हार वीर हनुमाना…

    वीर हनुमान आपके दूत हैं, जिनका प्रभाव तीनों लोक जानते हैं।

  6. चौपाई ६ तुव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला…

    हे कृपालु, आपकी भुजाएँ प्रचंड बलशाली हैं; आपने रावण को मारकर देवताओं की रक्षा की।

  7. चौपाई ७ तुम अनाथ के नाथ गोसाईं…

    हे स्वामी, आप अनाथों के नाथ हैं और सदा दीनों के सहायक हैं।

  8. चौपाई ८ ब्रह्मादिक तव पार न पावैं…

    ब्रह्मा आदि देवता भी आपका पार नहीं पाते; हे ईश्वर, वे सदा आपका यश गाते हैं।

  9. चौपाई ९ चारिउ वेद भरत हैं साखी…

    चारों वेद इसकी गवाही देते हैं कि आपने सदा भक्तों की लाज रखी है।

  10. चौपाई १० गुण गावत शारद मन माहीं…

    सरस्वती जी मन में आपके गुण गाती हैं, और देवराज इंद्र भी उनका पार नहीं पाते।

  11. चौपाई ११ नाम तुम्हार लेत जो कोई…

    जो कोई आपका नाम लेता है, उसके समान धन्य कोई दूसरा नहीं।

  12. चौपाई १२ राम नाम है अपरम्पारा…

    राम नाम की महिमा अपरंपार है; चारों वेद उसी नाम को पुकारते हैं।

  13. चौपाई १३ गणपति नाम तुम्हारो लीन्हों…

    गणपति ने आपका नाम लिया, तो आपने उन्हें सबसे पहले पूजे जाने वाला बना दिया।

  14. चौपाई १४ शेष रटत नित नाम तुम्हारा…

    शेषनाग नित आपका नाम रटते हैं, और पृथ्वी का भार अपने सिर पर धारण करते हैं।

  15. चौपाई १५ फूल समान रहत सो भारा…

    आपके नाम के बल से वह भार उन्हें फूल जैसा हल्का लगता है। फिर भी आपका पार कोई नहीं पाता।

  16. चौपाई १६ भरत नाम तुम्हरो उर धारो…

    भरत जी ने आपका नाम हृदय में धारण किया, इसलिए वे कभी युद्ध में नहीं हारे।

  17. चौपाई १७ नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा…

    शत्रुघ्न जी के हृदय में आपका नाम प्रकाशित है; उसके स्मरण से शत्रुओं का नाश होता है।

  18. चौपाई १८ लषन तुम्हारे आज्ञाकारी…

    लक्ष्मण जी आपके आज्ञाकारी हैं, और सदा संतों की रखवाली करते हैं।

  19. चौपाई १९ ताते रण जीते नहिं कोई…

    इसलिए युद्ध में उन्हें कोई नहीं जीत सकता, चाहे सामने यमराज ही क्यों न हों।

  20. चौपाई २० महालक्ष्मी धर अवतारा…

    महालक्ष्मी ने सीता जी के रूप में अवतार लिया, जो हर प्रकार से पापों को नष्ट करती हैं।

  21. चौपाई २१ सीता राम पुनीता गायो…

    सीता-राम का पवित्र यश गाया जाता है; सीता जी ने जगत की स्वामिनी भुवनेश्वरी का प्रभाव दिखाया।

  22. चौपाई २२ घट सों प्रकट भई सो आई…

    वे घड़े से प्रकट होकर आईं, और उनकी सुंदरता देखकर चंद्रमा भी लजा जाता है। एक परंपरा के अनुसार राजा जनक को हल चलाते समय धरती में मिले घड़े से सीता जी प्रकट हुई थीं।

  23. चौपाई २३ सो तुमरे नित पांव पलोटत…

    वही सीता जी नित आपके चरणों की सेवा करती हैं, और नौ निधियाँ आपके चरणों में लोटती हैं।

  24. चौपाई २४ सिद्धि अठारह मंगल कारी…

    मंगल करने वाली अठारह सिद्धियाँ भी आप पर न्योछावर होती हैं।

  25. चौपाई २५ औरहु जो अनेक प्रभुताई…

    और भी जितनी प्रभुताएँ और महिमाएँ हैं, हे सीतापति, वे सब आपने ही रची हैं।

  26. चौपाई २६ इच्छा ते कोटिन संसारा…

    आपकी इच्छा से करोड़ों संसार बनते हैं, और उन्हें रचने में पल भर की भी देर नहीं लगती।

  27. चौपाई २७ जो तुम्हरे चरनन चित लावै…

    जो आपके चरणों में मन लगाता है, उसकी मुक्ति अवश्य होती है।

  28. चौपाई २८ सुनहु राम तुम तात हमारे…

    हे राम, सुनिए, आप हमारे पिता हैं; आपको ही कुल का पूज्य कहा गया है।

  29. चौपाई २९ तुमहिं देव कुल देव हमारे…

    आप ही हमारे देव और कुलदेव हैं; आप ही गुरुदेव हैं और प्राणों से प्यारे हैं।

  30. चौपाई ३० जो कुछ हो सो तुमहीं राजा…

    हे राजा राम, जो कुछ है, सब आप ही हैं। हे प्रभु, आपकी जय हो; मेरी लाज रखिए।

  31. चौपाई ३१ रामा आत्मा पोषण हारे…

    हे राम, आप आत्मा का पोषण करने वाले हैं। हे दशरथ के प्यारे, आपकी जय हो, जय हो, जय हो!

  32. चौपाई ३२ जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा…

    हे ज्योति-स्वरूप प्रभु, आपकी जय हो! आप निर्गुण ब्रह्म हैं, अखंड और अनुपम हैं।

  33. चौपाई ३३ सत्य सत्य जय सत्य-ब्रत स्वामी…

    हे सत्य का व्रत निभाने वाले स्वामी, आप सत्य हैं, आपकी जय हो। आप सत्य, सनातन और सबके मन की जानने वाले हैं।

  34. चौपाई ३४ सत्य भजन तुम्हरो जो गावै…

    चालीसा कहती है कि जो सच्चे मन से आपका भजन गाता है, वह चारों फल (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) पाता है।

  35. चौपाई ३५ सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं…

    गौरीपति शिव ने सच्ची शपथ लेकर कहा है कि आपने भक्तों को सब सिद्धियाँ दी हैं।

  36. चौपाई ३६ ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा…

    हे ज्ञान-स्वरूप, मेरे हृदय को ज्ञान दीजिए। हे जगत के स्वामी राजा राम, आपको नमस्कार है, आपकी जय हो।

  37. चौपाई ३७ धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा…

    आप धन्य हैं, आपका प्रताप धन्य है; आपका नाम सब संताप हर लेता है।

  38. चौपाई ३८ सत्य शुद्ध देवन मुख गाया…

    देवताओं ने अपने मुख से आपका सच्चा और शुद्ध यश गाया, और दुंदुभी और शंख बजाए।

  39. चौपाई ३९ सत्य सत्य तुम सत्य सनातन…

    आप सत्य हैं, सनातन हैं; आप ही हमारे तन, मन और धन हैं।

  40. चौपाई ४० याको पाठ करे जो कोई…

    चालीसा कहती है कि जो कोई इसका पाठ करता है, उसके हृदय में ज्ञान प्रकट होता है।

  41. चौपाई ४१ आवागमन मिटै तिहि केरा…

    उसका जन्म-मरण का आना-जाना मिट जाता है। कवि कहता है: मेरा यह वचन सत्य है, शिव भी इसे मानते हैं।

  42. चौपाई ४२ और आस मन में जो ल्यावै…

    और जो मन में कोई कामना लेकर तुलसी-दल और फूल चढ़ाता है,

  43. चौपाई ४३ साग पत्र सो भोग लगावै…

    और साग-पत्ते का सादा भोग लगाता है, वह मनुष्य सब सिद्धियाँ पाता है; ऐसा चालीसा कहती है।

  44. चौपाई ४४ अन्त समय रघुबर पुर जाई…

    वह अंत समय में श्री रघुवीर के धाम जाता है, और जहाँ भी जन्म लेता है, हरि का भक्त कहलाता है।

  45. चौपाई ४५ श्री हरि दास कहै अरु गावै…

    हरिदास कहते हैं: जो इसे कहता और गाता है, वह वैकुंठ धाम पाता है।

  46. दोहा सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय…

    जो सात दिन नियम से, मन लगाकर इसका पाठ करता है, हरिदास कहते हैं कि वह हरि की कृपा से अवश्य भक्ति पाता है।

  47. दोहा राम चालीसा जो पढ़े, रामचरण चित लाय…

    चालीसा का अंतिम दोहा कहता है कि जो श्री राम के चरणों में मन लगाकर राम चालीसा पढ़ता है, उसकी मन की इच्छा पूरी होती है।

विषय और भावार्थ

राम चालीसा का केंद्र राम नाम है। चालीसा बताती है कि शिव, ब्रह्मा, सरस्वती, शेषनाग और गणपति, सब इसी नाम का स्मरण करते हैं: गणपति इसी से प्रथम पूज्य बने और शेषनाग को धरती का भार इसी से फूल जैसा हल्का लगता है। श्री राम के भाई भी इसी नाम के बल से अजेय हैं, और सीता जी, जो महालक्ष्मी का अवतार हैं, नित प्रभु की सेवा करती हैं।

दूसरे भाग में भक्त श्री राम को अपना पिता, कुलदेव, गुरु और प्राणों से प्यारा कहता है, और उन्हें निर्गुण ब्रह्म, ज्योति-स्वरूप और सत्य-सनातन मानकर वंदना करता है। अंत में चालीसा पाठ का फल बताती है: हृदय में ज्ञान, जन्म-मरण से छुटकारा और हरि की भक्ति। सादा भोग, तुलसी-दल और फूल की बात यह दिखाती है कि इस भक्ति में बड़ी सामग्री नहीं, सच्चा मन मुख्य है।

कठिन शब्दों के अर्थ

हितकारी
भला करने वाले
अरज
विनती
निशि दिन
रात-दिन
तिहूँ पुर
तीनों लोक
भुजदण्ड
बलशाली भुजाएँ
सुरन
देवताओं
गोसाईं
स्वामी
साखी
साक्षी, गवाह
शारद
सरस्वती
सुरपति
देवताओं के राजा, इंद्र
अपरम्पारा
जिसका कोई अंत न हो
महि
पृथ्वी
शत्रुहन
शत्रुघ्न
लषन
लक्ष्मण
छारा
राख, नष्ट करना
घट
घड़ा
पलोटत
चरण दबाते हुए, सेवा करते हुए
निद्धि
निधि, खज़ाना
बलिहारी
न्योछावर
कोटिन
करोड़ों
अवसि
अवश्य
तात
पिता
निर्गुण
गुणों से परे
सत्य-ब्रत
सत्य का व्रत निभाने वाले
दुन्दुभी
नगाड़ा
आवागमन
जन्म और मृत्यु का आना-जाना
साग पत्र
साग और पत्ते, सादा भोजन
नेम
नियम

फलश्रुति

चौपाई 34, चौपाई 40 से 45 और अंत के दोनों दोहे राम चालीसा की फलश्रुति हैं। चालीसा अपने वचनों में कहती है कि सच्चे मन से भजन गाने और पाठ करने वाले के हृदय में ज्ञान प्रकट होता है, जन्म-मरण का बंधन मिटता है, और सात दिन नियम से पाठ करने वाला हरि की कृपा से भक्ति पाता है। यहाँ ये चालीसा के अपने वचन के रूप में दिए गए हैं, किसी परिणाम के वादे के रूप में नहीं।

सत्य भजन तुम्हरो जो गावै।
सो निश्चय चारों फल पावै॥

चालीसा कहती है कि जो सच्चे मन से आपका भजन गाता है, वह चारों फल (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) पाता है।

याको पाठ करे जो कोई।
ज्ञान प्रकट ताके उर होई॥

चालीसा कहती है कि जो कोई इसका पाठ करता है, उसके हृदय में ज्ञान प्रकट होता है।

आवागमन मिटै तिहि केरा।
सत्य वचन माने शिव मेरा॥

उसका जन्म-मरण का आना-जाना मिट जाता है। कवि कहता है: मेरा यह वचन सत्य है, शिव भी इसे मानते हैं।

और आस मन में जो ल्यावै।
तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै॥

और जो मन में कोई कामना लेकर तुलसी-दल और फूल चढ़ाता है,

साग पत्र सो भोग लगावै।
सो नर सकल सिद्धता पावै॥

और साग-पत्ते का सादा भोग लगाता है, वह मनुष्य सब सिद्धियाँ पाता है; ऐसा चालीसा कहती है।

अन्त समय रघुबर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥

वह अंत समय में श्री रघुवीर के धाम जाता है, और जहाँ भी जन्म लेता है, हरि का भक्त कहलाता है।

श्री हरि दास कहै अरु गावै।
सो वैकुण्ठ धाम को पावै॥

हरिदास कहते हैं: जो इसे कहता और गाता है, वह वैकुंठ धाम पाता है।

सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय।
हरिदास हरिकृपा से, अवसि भक्ति को पाय॥

जो सात दिन नियम से, मन लगाकर इसका पाठ करता है, हरिदास कहते हैं कि वह हरि की कृपा से अवश्य भक्ति पाता है।

राम चालीसा जो पढ़े, रामचरण चित लाय।
जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्ध हो जाय॥

चालीसा का अंतिम दोहा कहता है कि जो श्री राम के चरणों में मन लगाकर राम चालीसा पढ़ता है, उसकी मन की इच्छा पूरी होती है।

यह चालीसा कब पढ़ी जाता है

  • राम नवमी पर
  • रोज़ सुबह या शाम की पूजा में
  • रामायण, सुंदरकांड या राम कथा के साथ
  • चालीसा के अंतिम दोहे के अनुसार, कुछ लोग इसे सात दिन नियम से पढ़ते हैं

पढ़ने की विधि

  • शांत होकर बैठें। चाहें तो श्री राम दरबार के चित्र के सामने दीपक जलाकर पाठ करें।
  • चौपाइयाँ और अंत के दोनों दोहे एक जैसी, आराम की गति से पढ़ें; राम नाम पर मन टिकाए रखें।
  • चालीसा तुलसी-दल, फूल और साग-पत्र के सादे भोग की बात करती है; जो सहज हो वही अर्पित करें।
पूरी विधिश्री राम पूजा विधिघर में श्री राम और राम दरबार की सरल पूजा: ध्यान, तुलसी, भोग, राम-नाम जप, रामचरितमानस पाठ, आरती और क्षमा प्रार्थना, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

पारंपरिक महत्व

राम चालीसा राम नवमी पर और रोज़ की पूजा में पढ़ी जाती है, और बहुत से लोग इसे रामायण या सुंदरकांड पाठ के साथ भी पढ़ते हैं। इसकी भाषा सरल है, इसलिए जो रामचरितमानस का लंबा पाठ नहीं कर पाते, उनके लिए यह श्री राम के स्मरण का छोटा और सहज माध्यम है।

परंपरा में राम नाम को सबसे सरल साधना माना जाता है, और यह चालीसा उसी विश्वास को कथा के उदाहरणों से कहती है। चौपाई 44 हनुमान चालीसा की एक चौपाई से लगभग ज्यों की त्यों मिलती है, जो दिखाता है कि यह रचना उसी राम-भक्ति परंपरा में बनी है।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
चौपाई 3 और 4(ये दोनों चौपाइयाँ नहीं)रणधीर प्रकाशन की पुस्तक “51 चालीसा संग्रह” में “ध्यान धरे शिवजी मन माहीं…” और “जय जय जय रघुनाथ कृपाला…” नहीं हैं; sanskritdocuments.org और भक्ति भारत में हैं।
चौपाई 6तव भुज दण्ड प्रचण्ड कृपालारणधीर प्रकाशन की पुस्तक में “तुव” की जगह “तव”; अर्थ वही है।
चौपाई 21सीता नाम पुनीता गायोरणधीर प्रकाशन की पुस्तक में: सीता जी का पवित्र नाम गाया गया।
चौपाई 28 से 35(क्रम अलग)रणधीर प्रकाशन की पुस्तक में चौपाई 32 से 35 पहले आती हैं और 28 से 31 बाद में।
चौपाई 31राम आत्मा पोषण हारे। जय जय जय दशरथ दुलारे॥रणधीर प्रकाशन की पुस्तक में।
चौपाई 42और आस मन में जो होई। मनवांछित फल पावे सोई॥ तीनहूं काल ध्यान जो ल्यावैं। तुलसी दल अरु फूल चढ़ावैं॥रणधीर प्रकाशन की पुस्तक में यहाँ एक की जगह दो चौपाइयाँ हैं। sanskritdocuments.org और भक्ति भारत में एक ही चौपाई है, जो यहाँ दी गई है।
चौपाई 45सो बैकुण्ठ धाम को जावैरणधीर प्रकाशन की पुस्तक में “पावै” की जगह “जावै”।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
हरिदास (परंपरा के अनुसार)
भाषा
हिन्दी

अंतिम चौपाई (“श्री हरि दास कहै अरु गावै”) और पहले अंतिम दोहे (“हरिदास हरिकृपा से”) में यह नाम आता है, इसलिए इन्हें रचयिता माना जाता है। इनके बारे में और प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): sanskritdocuments.org (rama40) को रणधीर प्रकाशन की छपी पुस्तक “51 चालीसा संग्रह” (archive.org के पृष्ठ-चित्र और OCR) और भक्ति भारत के पाठ से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया। हर पंक्ति इन दो संदर्भ फ़ाइलों में से किसी एक में ज्यों की त्यों मिलती है। आधार sanskritdocuments.org का पाठ है (भक्ति भारत का पाठ उसी से मेल खाता है)। उसकी तीन छपाई की भूलें छपी पुस्तक के पाठ से ठीक कीं, जिसे पृष्ठ-चित्र से जाँचा: “महा लक्श्मी” → “महालक्ष्मी”, “निगुण” → “निर्गुण”, “जापति” → “जगपति”। sanskritdocuments.org पर चालीसा के बाद दी गई राम स्तुति, रामाष्टक और आरती अलग रचनाएँ हैं, यहाँ नहीं लीं। चौपाइयों के क्रमांक 1 से 45 क्रम से दिए हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

राम चालीसा किसने लिखी?

अंतिम चौपाई और पहले अंतिम दोहे में “हरिदास” नाम आता है, इसलिए उन्हें रचयिता माना जाता है। उनके बारे में और प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।

नाम चालीसा है, तो चौपाइयाँ पैंतालीस क्यों हैं?

इस प्रचलित पाठ में पैंतालीस चौपाइयाँ हैं। चालीसा नाम ऐसी स्तुतियों का सामान्य नाम बन गया है; कुछ पुस्तकों में चौपाइयों की गिनती थोड़ी अलग है।

राम चालीसा कब पढ़ी जाती है?

राम नवमी पर, रोज़ की पूजा में, और रामायण या सुंदरकांड पाठ के साथ। अंतिम दोहा सात दिन नियम से पाठ की बात करता है, पर कोई दिन अनिवार्य नहीं बताता।

राम चालीसा और हनुमान चालीसा एक ही हैं क्या?

नहीं। हनुमान चालीसा हनुमान जी की स्तुति है और गोस्वामी तुलसीदास के नाम से प्रसिद्ध है; राम चालीसा श्री राम की स्तुति है और इसमें हरिदास का नाम आता है। दोनों में एक चौपाई लगभग समान है।

चालीसा में सीता जी को महालक्ष्मी क्यों कहा गया है?

परंपरा मानती है कि विष्णु जी के राम अवतार में लक्ष्मी जी सीता जी के रूप में प्रकट हुईं। चौपाई 20 से 23 यही कहती हैं।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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