शिव चालीसा
शिव · चालीसा
मंत्र जाप के बाद, ख़ासकर सोमवार को

यह पन्ना घर में रोज़ या सोमवार को की जाने वाली शिव जी की सरल पूजा बताता है: शिवलिंग या तस्वीर के सामने जल, बेलपत्र, दीपक और "ॐ नमः शिवाय" के साथ। रुद्राष्टाध्यायी के वैदिक मंत्रों से होने वाला रुद्राभिषेक, पार्थिव शिवलिंग का विधिवत पूजन, मंदिर की प्रतिष्ठित मूर्ति की सेवा और दीक्षा से जुड़ी शैव साधनाएँ अलग विधियाँ हैं; इन्हें किसी जानकार आचार्य से सीखकर या उनके साथ करें। महाशिवरात्रि की रात की पूजा के लिए अलग पन्ना है।
शिव जी की पूजा सबसे सरल पूजाओं में गिनी जाती है। उन्हें भोलेनाथ इसीलिए कहा जाता है कि वे थोड़े में प्रसन्न माने जाते हैं: एक लोटा जल, एक बेलपत्र और सच्चे मन से लिया गया नाम। शिवलिंग पर धीरे-धीरे जल चढ़ाना, यानी अभिषेक, इस पूजा का केंद्र है।
यहाँ घर की रोज़ की पूजा का क्रम है, जिसे सोमवार, प्रदोष या सावन में थोड़ा विस्तार से किया जा सकता है। हर सामग्री के साथ उसका विकल्प भी लिखा है। जो चीज़ न हो, उसे मन से अर्पित करना भी पूजा का ही अंग माना गया है; जल, दीपक और नाम के साथ की गई छोटी-सी पूजा भी पूरी पूजा है।
| सामग्री | उपयोग | स्थिति | विकल्प / टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| जल | शिवलिंग पर अभिषेक के लिए; यही इस पूजा का केंद्र है | आवश्यक | साफ़ पानी का एक लोटा काफ़ी है; गंगाजल हो तो कुछ बूँदें मिला लें। शिवलिंग न हो तो तस्वीर के सामने एक कटोरी में जल अर्पित करें। |
| बेलपत्र (बिल्वपत्र) | शिव जी को सबसे प्रिय पत्ता; तीन पत्तियों वाला, बिना कटा-फटा | वैकल्पिक | रोज़ न मिले तो पहले चढ़ाया हुआ बेलपत्र धोकर फिर से चढ़ाया जा सकता है; गीता प्रेस यह बात स्कंद पुराण के हवाले से लिखती है। वह भी न हो तो मन से अर्पित करें। |
| दूध | जल के साथ अभिषेक | वैकल्पिक | थोड़ा-सा दूध जल में मिलाकर चढ़ाना काफ़ी है; न हो तो केवल जल। बहुत-से परिवार दूध की बर्बादी से बचने के लिए थोड़ी मात्रा ही लेते हैं। |
| पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) | सोमवार या विशेष दिन का स्नान | वैकल्पिक | रोज़ की पूजा में ज़रूरी नहीं। चढ़ाने के बाद शुद्ध जल से शिवलिंग धो दें; अलग पात्र में बचा पंचामृत प्रसाद है। |
| चंदन या भस्म | शिवलिंग पर तिलक या त्रिपुंड | वैकल्पिक | सफ़ेद चंदन घिसकर; न हो तो यह उपचार छोड़ दें। |
| अक्षत | बिना टूटे चावल, अर्पण के लिए | वैकल्पिक | थोड़े-से साबुत चावल; न हों तो छोड़ दें। |
| फूल | सफ़ेद और सुगंधित फूल, कनेर या आक | वैकल्पिक | जो भी ताज़ा फूल मिले। केतकी (केवड़ा) शिव पूजा में नहीं चढ़ाई जाती। |
| धतूरा और आक के फूल | शिव जी को प्रिय माने जाते हैं | परंपरा-विशेष | ज़रूरी नहीं। धतूरा ज़हरीला होता है: बच्चों की पहुँच से दूर रखें और छूने के बाद हाथ धो लें। |
| दीपक | घी या तेल का दीपक | वैकल्पिक | घी का दीपक दाईं ओर और तेल का बाईं ओर रखने की परंपरा है (गीता प्रेस)। दीपक न हो तो एक अगरबत्ती से भी पूजा हो जाती है। |
| धूप या अगरबत्ती | सुगंध अर्पण | वैकल्पिक | न हो तो छोड़ दें। |
| नैवेद्य | भोग: मिश्री, फल, मेवा या घर की बनी शुद्ध मिठाई | वैकल्पिक | थोड़ी मिश्री या एक फल भी काफ़ी है। |
| कपूर | आरती के लिए | वैकल्पिक | न हो तो घी के दीपक से आरती करें। |
| रुद्राक्ष की माला | मंत्र जाप की गिनती | वैकल्पिक | उंगलियों पर गिनकर या बिना गिने भी जाप हो सकता है। |
संकल्प का अर्थ है पूजा शुरू करने से पहले मन में साफ़ निश्चय करना: मैं कौन हूँ, किसकी पूजा कर रहा हूँ और किस भाव से। दाहिने हाथ में थोड़ा जल, अक्षत और एक फूल लेकर संकल्प बोला जाता है, फिर जल नीचे छोड़ दिया जाता है।
हे महादेव, आज [दिन] को मैं [अपना नाम] अपने परिवार के साथ आपकी पूजा अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार कर रहा/रही हूँ। जो सामग्री है उसे स्वीकार करें, और जो नहीं है उसे मेरे भाव से पूरा मानें।
विस्तृत पूजा में पुरोहित संस्कृत संकल्प में संवत, महीना, तिथि, स्थान और गोत्र भी बोलते हैं। घर की रोज़ की पूजा में अपनी भाषा में किया गया यह सरल संकल्प काफ़ी है।
ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं
रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं
विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥
अर्थ: मैं महेश्वर का नित्य ध्यान करूँ: जो चाँदी के पर्वत जैसे उजले हैं, सुंदर चंद्रमा जिनका आभूषण है, रत्नों के आभूषणों से जिनका शरीर दमकता है, जिनके हाथों में परशु, मृग, वर और अभय की मुद्रा है, जो प्रसन्न हैं, कमल पर बैठे हैं, देवगण चारों ओर से जिनकी स्तुति करते हैं, जो बाघ की खाल पहने हैं, जो विश्व के आदि और विश्व के बीज हैं, सब भय हरने वाले हैं, और जिनके पाँच मुख और तीन नेत्र हैं।
स्रोत: शिव जी का प्रचलित ध्यान-श्लोक; द्रिक पंचांग की शिव पूजा विधि (ध्यानम्) के पाठ से मिलाया गया। गीता प्रेस की पञ्चदेव-पूजा में भी शिव जी का यही ध्यान है।
ॐ नमः शिवाय
अर्थ: मैं मंगलमय शिव को नमन करता/करती हूँ और स्वयं को उन्हें समर्पित करता/करती हूँ।
ॐ नमः शिवाय। पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि॥
ॐ नमः शिवाय। शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि॥
अर्थ: हे शिव, आपको नमन; मैं पंचामृत से स्नान अर्पित करता/करती हूँ। हे शिव, आपको नमन; मैं शुद्ध जल से स्नान अर्पित करता/करती हूँ।
स्रोत: हर उपचार को देवता के नाम-मंत्र के साथ "समर्पयामि" कहकर अर्पित करने का प्रचलित ढंग। गीता प्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश कहती है कि जो श्लोक न पढ़ सकें वे नाम-मंत्र से पूजा करें, और उसके पार्थिव-पूजन में हर उपचार "ॐ नमः शिवाय" के साथ इन्हीं शब्दों से अर्पित होता है।
ॐ नमः शिवाय। गन्धं समर्पयामि॥
ॐ नमः शिवाय। अक्षतान् समर्पयामि॥
अर्थ: हे शिव, आपको नमन; मैं चंदन (गंध) अर्पित करता/करती हूँ। हे शिव, आपको नमन; मैं अक्षत अर्पित करता/करती हूँ।
स्रोत: नाम-मंत्र के साथ उपचार अर्पित करने का प्रचलित ढंग; गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश (शिव-पूजा और पार्थिव-पूजन) के उपचार-वाक्यों के अनुसार।
ॐ नमः शिवाय। बिल्वपत्रं समर्पयामि॥
ॐ नमः शिवाय। पुष्पाणि समर्पयामि॥
अर्थ: हे शिव, आपको नमन; मैं बेलपत्र अर्पित करता/करती हूँ। हे शिव, आपको नमन; मैं फूल अर्पित करता/करती हूँ।
स्रोत: नाम-मंत्र के साथ उपचार अर्पित करने का प्रचलित ढंग; गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश के अनुसार।
ॐ नमः शिवाय। धूपमाघ्रापयामि॥
ॐ नमः शिवाय। दीपं दर्शयामि॥
अर्थ: हे शिव, आपको नमन; मैं धूप की सुगंध अर्पित करता/करती हूँ। हे शिव, आपको नमन; मैं दीपक की ज्योति दिखाता/दिखाती हूँ।
स्रोत: नाम-मंत्र के साथ उपचार अर्पित करने का प्रचलित ढंग; गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश के उपचार-वाक्य "धूपमाघ्रापयामि" और "दीपं दर्शयामि"।
ॐ नमः शिवाय। नैवेद्यं निवेदयामि॥
अर्थ: हे शिव, आपको नमन; मैं यह भोग निवेदन करता/करती हूँ।
स्रोत: नाम-मंत्र के साथ उपचार अर्पित करने का प्रचलित ढंग; गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश के अनुसार।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
अर्थ: हम तीन नेत्रों वाले शिव की पूजा करते हैं, जो सुगंधित हैं और सबका पोषण बढ़ाते हैं। जैसे पका हुआ फल अपने डंठल से सहज ही छूट जाता है, वैसे ही वे हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें, अमृत से नहीं।
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥
अर्थ: जो कपूर जैसे उजले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं, सर्पराज को हार की तरह पहनते हैं और सदा भक्तों के हृदय-कमल में बसते हैं, उन भव (शिव) को माँ भवानी के साथ मैं नमन करता/करती हूँ।
शिव · चालीसा
मंत्र जाप के बाद, ख़ासकर सोमवार को
शिव · स्तोत्र · संस्कृत
"ॐ नमः शिवाय" के पाँच अक्षरों की स्तुति; जाप के साथ पढ़ें
शिव · अष्टकम् · संस्कृत
बेलपत्र चढ़ाते समय
शिव · अष्टकम् · संस्कृत
अभिषेक के बाद या आरती से पहले
शिव · अष्टकम् · संस्कृत
सोमवार और प्रदोष की शाम की पूजा में
शिव · स्तोत्र · संस्कृत
जिस दिन सामग्री न हो: इसमें पूरी पूजा मन से अर्पित की जाती है
शिव · श्लोक · संस्कृत
आरती के अंत में
भोग शिवलिंग के ऊपर न रखकर सामने थाली में रखें; वही प्रसाद के रूप में बाँटें। शिवलिंग पर चढ़ा जल, दूध और फूल प्रसाद में नहीं लिए जाते; उन्हें पौधों और मिट्टी में दे दें।
हे भोलेनाथ, आज आपने अपनी पूजा का अवसर दिया, इसके लिए आभार। मेरे घर में शांति रहे, मन में धैर्य रहे, और मैं किसी का बुरा न सोचूँ। पूजा में जो कमी रह गई हो, उसे क्षमा करें।
आवाहनं न जानामि न जानामि तवार्चनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व मां महेश्वर॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
अर्थ: हे महेश्वर, न मैं आपको बुलाना जानता हूँ, न आपकी अर्चना करना, न पूजा की विधि जानता हूँ; मुझे क्षमा करें। हे देवों के ईश्वर, मेरी पूजा मंत्र, विधि और भक्ति, तीनों में अधूरी है; फिर भी मैंने जो पूजा की है, वह आपकी कृपा से पूरी हो।
स्रोत: पूजा के अंत की प्रचलित शिव क्षमा-प्रार्थना के दो श्लोक, द्रिक पंचांग की शिव पूजा विधि (क्षमा-प्रार्थना) के पाठ के अनुसार। "मन्त्रहीनं क्रियाहीनं" वाला श्लोक गीता प्रेस की शिव-पूजा की क्षमा-याचना में भी है।
शिव · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
महाशिवरात्रि पर घर में शिव पूजा: सुबह संकल्प, सेहत के अनुसार व्रत, रात में एक बार या चारों पहर की पूजा, जागरण, निशीथ काल और अगली सुबह पारण।
शिव · आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा
शिव · स्तोत्र · संस्कृत
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): Order of worship follows the panchopachara/shodashopachara of Gita Press Nityakarma-Pujaprakash (upachara list p.122-123, name-mantra rule, arrangement, Shiva-puja and Parthiv-pujan upachara sentences with "ॐ नमः शिवाय"), checked against two archive.org OCR copies. Bilva rules (plucking days, re-offering washed leaves, face-down), half pradakshina to the somasutra and Shiva's prohibited flowers (ketaki) from the same book. Dhyana shloka and kshama-prarthana text from Drik Panchang's Shiva puja vidhi. Ketaki story and naivedya rule checked in Shiva Purana Vidyeshvara Samhita ch. 8 and 22; women/children line in Koti Rudra Samhita 38.22 (sanskritdocuments.org). Mantra lines copied from the site's own mantra pages. Karpur Gauram from shlokam.org. Tulsi not offered to Shiva is given only as a widespread custom, without a scriptural claim.
हाँ, बहुत-से घरों में छोटा शिवलिंग रखकर रोज़ पूजा होती है। गीता प्रेस बताती है कि शिवलिंग में सभी देवताओं की पूजा आवाहन-विसर्जन के बिना भी की जा सकती है। ध्यान इतना रखें कि जलाधारी से जल निकलने की जगह हो और शिवलिंग साफ़ रहे। कुछ दिन पूजा न हो पाए तो डरने की बात नहीं; लौटकर फिर से शुरू करें।
शिव जी या शिव परिवार की तस्वीर के सामने यही क्रम रखें। जल एक कटोरी में अर्पित करें, बेलपत्र और फूल तस्वीर के सामने रखें। शिव मानस पूजा का पाठ भी कर सकते हैं, जिसमें पूरी पूजा मन से की जाती है। मंदिर जाकर शिवलिंग पर जल चढ़ाना भी इसी पूजा का रूप है।
हाँ। घरों और मंदिरों में स्त्रियाँ सदा से शिव जी को जल चढ़ाती आई हैं, और शिव पुराण शिवरात्रि व्रत को स्त्रियों और बच्चों समेत सबके लिए हितकारी बताता है। कुछ परिवारों में अविवाहित लड़कियों के शिवलिंग छूने को लेकर अलग मान्यताएँ हैं; ये परिवार की अपनी रीतियाँ हैं, इन्हें अपनी श्रद्धा और घर की परंपरा के अनुसार मानें।
इस पर परिवारों की रीतियाँ अलग हैं। कई घरों में इन दिनों मूर्ति या शिवलिंग छूने और विधिवत पूजा से विराम लिया जाता है और पूजा कोई और सदस्य कर लेता है; कई घर ऐसा नहीं मानते। मन में "ॐ नमः शिवाय" का स्मरण और प्रार्थना आम तौर पर हर स्थिति में की जाती है। अपने घर की रीति और अपनी सुविधा के अनुसार चलें; इसमें अपराध-बोध की कोई बात नहीं।
गीता प्रेस स्कंद पुराण के हवाले से लिखती है कि नया बेलपत्र न मिले तो चढ़ाया हुआ बेलपत्र धोकर बार-बार चढ़ाया जा सकता है। कुछ बेलपत्र साफ़ कपड़े में लपेटकर रख लें। वह भी न हो तो फूल चढ़ाएँ, या मन से बेलपत्र अर्पित करें।
तुलसी को परंपरा में भगवान विष्णु से जोड़ा जाता है, और शिव पूजा में वही स्थान बेलपत्र का है; इसलिए बहुत-से घरों में शिवलिंग पर तुलसी नहीं चढ़ाई जाती। केतकी के निषेध की कथा शिव पुराण में है। अनजाने में कुछ चढ़ गया हो तो चिंता न करें; पूजा में भाव सबसे बड़ा है।
नहीं, पूजा व्रत के बिना भी पूरी है। व्रत रखना चाहें तो अपनी सेहत के अनुसार रखें: फलाहार, एक समय भोजन, या पूजा होने तक कुछ न खाना। गर्भावस्था, बीमारी, नियमित दवा या बुढ़ापे में कठोर व्रत न रखें; पूजा और नाम-जाप काफ़ी है। यहीं के सोमवार व्रत वाले पन्ने पर इसकी परंपराएँ दी गई हैं।
इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।