शिव पूजा विधि
शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नमः शिवाय ॥१॥
nāgendrahārāya trilocanāya bhasmāṅgarāgāya maheśvarāya |
nityāya śuddhāya digambarāya tasmai nakārāya namaḥ śivāya ||
अर्थ: जिन्होंने नागराज को हार की तरह पहना है, जो तीन नेत्रों वाले हैं, भस्म ही जिनका अंगराग है, जो महेश्वर, नित्य, शुद्ध और दिगम्बर हैं, उन 'न' अक्षर रूप शिव को नमस्कार।
मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय ।मन्दारमुख्यबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै मकाराय नमः शिवाय ॥२॥
mandākinīsalilacandanacarcitāya nandīśvarapramathanāthamaheśvarāya |
mandāramukhyabahupuṣpasupūjitāya tasmai makārāya namaḥ śivāya ||
अर्थ: जिनकी पूजा मन्दाकिनी (गंगा) के जल और चन्दन से होती है, जो नन्दीश्वर और प्रमथगणों के स्वामी महेश्वर हैं, जिनकी पूजा मन्दार आदि अनेक फूलों से होती है, उन 'म' अक्षर रूप शिव को नमस्कार।
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नमः शिवाय ॥३॥
śivāya gaurīvadanābjavṛndasūryāya dakṣādhvaranāśakāya |
śrīnīlakaṇṭhāya vṛṣadhvajāya tasmai śikārāya namaḥ śivāya ||
अर्थ: जो कल्याण-स्वरूप हैं, गौरी के मुख-कमल को खिलाने वाले सूर्य हैं, जिन्होंने दक्ष के यज्ञ का नाश किया, जिनका कण्ठ नीला है और जिनकी ध्वजा पर वृषभ (नन्दी) है, उन 'शि' अक्षर रूप शिव को नमस्कार।
वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्यमुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय ।चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नमः शिवाय ॥४॥
vasiṣṭhakumbhodbhavagautamāryamunīndradevārcitaśekharāya |
candrārkavaiśvānaralocanāya tasmai vakārāya namaḥ śivāya ||
अर्थ: वसिष्ठ, अगस्त्य, गौतम आदि श्रेष्ठ मुनि और देवता जिनके मस्तक की पूजा करते हैं, चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि जिनके तीन नेत्र हैं, उन 'व' अक्षर रूप शिव को नमस्कार।
यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय ।दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नमः शिवाय ॥५॥
yakṣasvarūpāya jaṭādharāya pinākahastāya sanātanāya |
divyāya devāya digambarāya tasmai yakārāya namaḥ śivāya ||
अर्थ: जो यक्ष का रूप धारण करते हैं, जटाधारी हैं, जिनके हाथ में पिनाक धनुष है, जो सनातन, दिव्य, देव और दिगम्बर हैं, उन 'य' अक्षर रूप शिव को नमस्कार।
पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥६॥
pañcākṣaramidaṃ puṇyaṃ yaḥ paṭhecchivasannidhau |
śivalokamavāpnoti śivena saha modate ||
अर्थ: यह श्लोक कहता है कि जो शिव के समीप इस पवित्र पञ्चाक्षर स्तोत्र का पाठ करता है, वह शिवलोक पाता है और शिव के साथ आनंदित होता है।
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं शिवपञ्चाक्षरस्तोत्रं समाप्तम् ॥
|| iti śrīmacchaṅkarācāryaviracitaṃ śivapañcākṣarastotraṃ samāptam ||
अर्थ: इस प्रकार श्री शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाने वाला शिव पञ्चाक्षर स्तोत्र पूरा हुआ।
शिव पञ्चाक्षर स्तोत्र शिव के पञ्चाक्षर मंत्र 'नमः शिवाय' पर रचा गया है। इसके पाँच श्लोक क्रम से न, म, शि, वा और य अक्षर से जुड़े हैं, और हर श्लोक 'तस्मै ... काराय नमः शिवाय' पर समाप्त होता है।
हर श्लोक में शिव का एक चित्र उभरता है: सर्पों का हार, भस्म, गंगाजल और चन्दन से पूजा, गौरी के मुख-कमल के लिए सूर्य, सूर्य-चन्द्र-अग्नि रूपी तीन नेत्र और हाथ में पिनाक। परंपरा इसे आदि शंकराचार्य की रचना मानती है।
यह स्तोत्र शिव के पञ्चाक्षर मंत्र 'नमः शिवाय' की व्याख्या जैसा है। हर अक्षर से एक श्लोक जुड़ा है और उस श्लोक में शिव के ऐसे गुण गिनाए गए हैं जो उस अक्षर की याद दिलाते हैं: न से नागेन्द्रहार, नित्य; म से मन्दाकिनी, मन्दार, महेश्वर; शि से शिव; व से वसिष्ठ, वैश्वानर; य से यक्षस्वरूप।
पाँचों श्लोकों में शिव के दोनों रूप साथ दिखते हैं: एक ओर भस्म, सर्प, जटा और दिगम्बर वेश वाले वैरागी, दूसरी ओर गौरी के प्रिय, देवताओं और मुनियों से पूजित, सूर्य-चन्द्र-अग्नि जैसे नेत्रों वाले जगत के स्वामी। इस तरह पाठ करते हुए मंत्र का हर अक्षर शिव के किसी रूप से भर जाता है।
अंतिम श्लोक फलश्रुति है, जो शिव के समीप इस पञ्चाक्षर के पाठ का फल शिवलोक बताता है।
इस स्तोत्र की फलश्रुति कहती है कि जो शिव के समीप इस पवित्र पञ्चाक्षर का पाठ करता है, वह शिवलोक को प्राप्त करता है और शिव के साथ आनंदित होता है। यह स्तोत्र के अपने शब्द हैं।
पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥यह श्लोक कहता है कि जो शिव के समीप इस पवित्र पञ्चाक्षर स्तोत्र का पाठ करता है, वह शिवलोक पाता है और शिव के साथ आनंदित होता है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| श्लोक 2 | मन्दाकिनि-सलिलचन्दन-चर्चिताय | sanskritdocuments.org का पाठ। stotranidhi.com और vignanam.org में 'मन्दाकिनी' है, जो छन्द के अनुसार भी ठीक बैठता है, इसलिए वही रखा गया। |
| श्लोक 2 | मन्दारपुष्प-बहुपुष्प-सुपूजिताय | sanskritdocuments.org का पाठ; stotranidhi.com और vignanam.org में 'मन्दारमुख्यबहुपुष्पसुपूजिताय' है। |
| श्लोक 2 | तस्मै मकारमहिताय नमः शिवाय | sanskritdocuments.org पर दूसरे पाठ के रूप में दिया गया है। |
| श्लोक 3 | गौरीवदनाब्जबृन्दसूर्याय | stotranidhi.com और vignanam.org में 'वृन्द' की जगह 'बृन्द' लिखा है; अर्थ वही है (समूह)। |
| श्लोक 5 | यज्ञस्वरूपाय जटाधराय | vignanam.org का मुख्य पाठ; वहाँ 'यक्ष' दूसरे पाठ के रूप में दिया है। |
आदि शंकराचार्य की रचना मानी जाती है; संस्करणों के अंत में यही लिखा मिलता है, पर इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पाठ sanskritdocuments.org से लिया गया और हर पंक्ति stotranidhi.com और vignanam.org से मिलाई गई। श्लोक 2 की दोनों पंक्तियाँ stotranidhi.com और vignanam.org के साझा पाठ ('मन्दाकिनी', 'मन्दारमुख्य') के अनुसार हैं; बाकी पाठ sanskritdocuments.org का है। फलश्रुति पर स्रोतों में संख्या नहीं है; यहाँ उसे 6 गिना गया है।
शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
शिव · आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा
शिव · चालीसा
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान
शिव · स्तोत्र · संस्कृत
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
शिव · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
महाशिवरात्रि पर घर में शिव पूजा: सुबह संकल्प, सेहत के अनुसार व्रत, रात में एक बार या चारों पहर की पूजा, जागरण, निशीथ काल और अगली सुबह पारण।
शिव · अष्टकम् · संस्कृत
नमामीशमीशाननिर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्
पञ्चाक्षर यानी पाँच अक्षर: न, मः, शि, वा, य, जो मिलकर 'नमः शिवाय' बनते हैं। यह शिव का प्रसिद्ध मंत्र है, और यह स्तोत्र इसी पर रचा गया है।
परंपरा इसे आदि शंकराचार्य की रचना मानती है और संस्करणों के अंत में यही लिखा मिलता है। इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
केन उपनिषद् की एक कथा में परम तत्त्व देवताओं के सामने यक्ष के रूप में प्रकट होता है। शिव को उसी परम तत्त्व के रूप में देखकर उन्हें यक्षस्वरूप कहा गया है, ऐसी व्याख्या मिलती है।
स्तोत्र कोई संख्या नहीं बताता। एक बार भी भाव और ध्यान से पढ़ना पर्याप्त है; संख्या अपनी सुविधा और परंपरा के अनुसार रखी जा सकती है।
नहीं। sanskritdocuments.org और vignanam.org में यह है, पर stotranidhi.com के संस्करण में केवल पाँच श्लोक हैं।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।