शिव पूजा विधि
शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

चालीसा · शिव
“जय गिरिजापति दीनदयाला” वाली शिव चालीसा का मूल पाठ, हर चौपाई का सरल अर्थ, कठिन शब्द, भावार्थ और अलग-अलग पुस्तकों के पाठभेद।
॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
अर्थ: हे गिरिजा (पार्वती) के पुत्र गणेश जी, आप मंगल के मूल और परम ज्ञानी हैं, आपकी जय हो। अयोध्यादास कहते हैं: आप मुझे अभय का वरदान दीजिए।
॥ चौपाई ॥
जय गिरिजापति दीनदयाला।सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥१॥
अर्थ: हे गिरिजापति, दीनों पर दया करने वाले शिव जी, आपकी जय हो। आप सदा संतों की रक्षा और पालन करते हैं।
भाल चन्द्रमा सोहत नीके।कानन कुण्डल नागफनी के ॥२॥
अर्थ: आपके माथे पर चंद्रमा सुंदर शोभा देता है, और कानों में नाग के फन के कुंडल हैं।
अंग गौर शिर गंग बहाये।मुण्डमाल तन क्षार लगाये ॥३॥
अर्थ: आपका शरीर गौर (उजला) है, सिर की जटाओं से गंगा बहती है, गले में मुंडों की माला है और शरीर पर भस्म लगी है।
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।छवि को देखि नाग मन मोहे ॥४॥
अर्थ: आप बाघ की खाल का वस्त्र पहने सुशोभित हैं; आपकी छवि देखकर नाग भी मोहित हो जाते हैं।
मैना मातु की हवे दुलारी।वाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥५॥
अर्थ: माता मैना (मेना) की दुलारी पुत्री पार्वती जी आपके बाएँ अंग में विराजती हैं; उनकी छवि निराली है।
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥६॥
अर्थ: आपके हाथ में त्रिशूल बहुत सुंदर लगता है, जो सदा शत्रुओं का नाश करता है।
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे।सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥७॥
अर्थ: आपके पास नंदी और गणेश जी ऐसे शोभा देते हैं, जैसे सागर के बीच कमल खिले हों।
कार्तिक श्याम और गणराऊ।या छवि को कहि जात न काऊ ॥८॥
अर्थ: कार्तिकेय, श्यामा (पार्वती जी) और गणों के राजा गणेश जी के साथ आपकी इस छवि का वर्णन कोई नहीं कर सकता।
देवन जबहीं जाय पुकारा।तबहिं दुख प्रभु आप निवारा ॥९॥
अर्थ: जब भी देवताओं ने जाकर आपको पुकारा, हे प्रभु, आपने तुरंत उनका दुःख दूर किया।
किया उपद्रव तारक भारी।देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥१०॥
अर्थ: जब तारकासुर ने भारी उपद्रव मचाया, तब सब देवताओं ने मिलकर आपसे विनती की।
तुरत षडानन आप पठायउ।लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥११॥
अर्थ: आपने तुरंत छह मुखों वाले कार्तिकेय (षडानन) को भेजा, जिन्होंने पल भर में तारकासुर को मार गिराया।
आप जलंधर असुर संहारा।सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥१२॥
अर्थ: आपने जलंधर असुर का संहार किया; आपका सुयश सारे संसार में प्रसिद्ध है।
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई।सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥१३॥
अर्थ: त्रिपुरासुर से युद्ध करके आपने कृपा कर सबको बचा लिया।
किया तपहिं भागीरथ भारी।पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥१४॥
अर्थ: जब भगीरथ ने गंगा को धरती पर लाने के लिए भारी तप किया, तब हे पुरारि, आपने गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर उनकी प्रतिज्ञा पूरी की।
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं।सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥१५॥
अर्थ: दान देने वालों में आपके समान कोई नहीं है; आपके सेवक सदा आपकी स्तुति करते हैं।
वेद नाम महिमा तव गाई।अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥१६॥
अर्थ: वेदों ने आपके नाम की महिमा गाई है, फिर भी आप अकथनीय और अनादि हैं; आपका रहस्य कोई नहीं जान पाया।
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला।जरत सुरासुर भए विहाला ॥१७॥
अर्थ: समुद्र-मंथन में जब विष की ज्वाला निकली, तब देवता और असुर उससे जलकर व्याकुल हो गए।
कीन्ही दया तहं करी सहाई।नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥१८॥
अर्थ: तब आपने दया करके सहायता की और वह विष अपने कंठ में धारण कर लिया; तभी से आपका नाम नीलकंठ पड़ा।
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा।जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥१९॥
अर्थ: जब श्री रामचंद्र जी ने आपका पूजन किया, तब आपकी कृपा से उन्होंने लंका जीतकर विभीषण को दे दी।
सहस कमल में हो रहे धारी।कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥२०॥
अर्थ: जब प्रभु हज़ार कमलों से आपकी पूजा कर रहे थे, तब हे पुरारि, आपने उनकी परीक्षा ली। पुराणों में यह कथा भगवान विष्णु की पूजा के रूप में आती है।
एक कमल प्रभु राखेउ जोई।कमल नयन पूजन चहं सोई ॥२१॥
अर्थ: आपने उन कमलों में से एक कमल छिपा लिया। तब कमल-नयन प्रभु ने कमल की जगह अपना नेत्र ही अर्पित करना चाहा।
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥२२॥
अर्थ: प्रभु शंकर ने यह कठिन भक्ति देखी तो प्रसन्न होकर मनचाहा वरदान दिया।
जय जय जय अनन्त अविनाशी।करत कृपा सब के घटवासी ॥२३॥
अर्थ: हे अनंत और अविनाशी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप सबके हृदय में बसते हैं और सब पर कृपा करते हैं।
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै।भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥२४॥
अर्थ: सब दुष्ट मुझे रोज़ सताते हैं; मैं भटकता रहता हूँ और मुझे चैन नहीं मिलता।
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो।येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥२५॥
अर्थ: हे नाथ, मैं “बचाइए, बचाइए” पुकार रहा हूँ; इसी समय आकर मेरा उद्धार कीजिए।
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो।संकट से मोहि आन उबारो ॥२६॥
अर्थ: त्रिशूल लेकर शत्रुओं का नाश कीजिए और मुझे संकट से उबार लीजिए। भक्ति में इन शत्रुओं को मन के काम, क्रोध जैसे दोष भी समझा जाता है।
मात पिता भ्राता सब कोई।संकट में पूछत नहिं कोई ॥२७॥
अर्थ: माता, पिता, भाई, सब होते हैं, पर संकट के समय कोई नहीं पूछता।
स्वामी एक है आस तुम्हारी।आय हरहु मम संकट भारी ॥२८॥
अर्थ: हे स्वामी, मुझे बस आपकी ही आस है; आकर मेरा भारी संकट हर लीजिए।
धन निर्धन को देत सदा हीं।जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥२९॥
अर्थ: आप निर्धन को सदा धन देते हैं; जो कोई आपसे माँगता है, वह फल पाता है।
अस्तुति केहि विधि करों तुम्हारी।क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥३०॥
अर्थ: मैं किस विधि से आपकी स्तुति करूँ? हे नाथ, मेरी भूलों को क्षमा कीजिए।
शंकर हो संकट के नाशन।मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥३१॥
अर्थ: हे शंकर, आप संकटों का नाश करने वाले, मंगल करने वाले और विघ्नों को मिटाने वाले हैं।
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं।शारद नारद शीश नवावैं ॥३२॥
अर्थ: योगी, यति और मुनि आपका ध्यान करते हैं; सरस्वती जी और नारद जी आपको शीश नवाते हैं।
नमो नमो जय नमः शिवाय।सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥३३॥
अर्थ: आपको नमस्कार है, नमस्कार है; “नमः शिवाय”, आपकी जय हो। ब्रह्मा आदि देवता भी आपका पार नहीं पाते।
जो यह पाठ करे मन लाई।ता पर होत है शम्भु सहाई ॥३४॥
अर्थ: चालीसा कहती है कि जो इसका पाठ मन लगाकर करता है, भगवान शंभु उसकी सहायता करते हैं।
ऋनिया जो कोई हो अधिकारी।पाठ करे सो पावन हारी ॥३५॥
अर्थ: चालीसा के अनुसार कर्ज़ में दबा व्यक्ति भी यदि इसका पाठ करे तो वह पावन होता है, उसका भार उतरता है।
पुत्र हीन कर इच्छा जोई।निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥३६॥
अर्थ: चालीसा कहती है कि जो संतान की इच्छा रखता है, उस पर शिव की कृपा होती है।
पण्डित त्रयोदशी को लावे।ध्यान पूर्वक होम करावे ॥३७॥
अर्थ: त्रयोदशी के दिन पंडित को बुलाकर ध्यान से होम (हवन) करवाए; यह चालीसा की बताई हुई विधि है।
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा।तन नहिं ताके रहै कलेशा ॥३८॥
अर्थ: चालीसा कहती है कि जो त्रयोदशी का व्रत नियम से करता है, उसके शरीर में क्लेश नहीं रहता।
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥३९॥
अर्थ: धूप, दीप और नैवेद्य चढ़ाकर भगवान शंकर के सामने यह पाठ सुनाए।
जन्म जन्म के पाप नसावे।अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥४०॥
अर्थ: चालीसा के अनुसार ऐसा करने वाले के जन्म-जन्म के पाप नष्ट होते हैं, और अंत में वह शिवधाम पाता है।
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी।जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥
अर्थ: अयोध्यादास कहते हैं: हे प्रभु, मुझे आपकी ही आस है; आप सब जानते हैं, मेरे सारे दुःख हर लीजिए।
॥ दोहा ॥
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीस।तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
अर्थ: मैं नियम से हर सुबह यह चालीसा पढ़ूँ। हे जगदीश, आप मेरी मनोकामना पूरी कीजिए।
मगसर छठि हेमन्त ऋतु, संवत् चौसठ जान।अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥
अर्थ: मार्गशीर्ष (अगहन) मास की षष्ठी को, हेमंत ऋतु में, संवत् चौंसठ में शिव जी की यह स्तुति रूपी चालीसा कल्याण के लिए पूरी हुई। यह दोहा रचना का समय बताता है।
हर चौपाई का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।
शिव चालीसा भगवान शिव की सबसे प्रचलित हिन्दी स्तुतियों में से है। आरंभ में गणेश जी की वंदना का एक दोहा है, फिर चालीस चौपाइयाँ, अयोध्यादास की विनती वाली एक चौपाई और अंत में दो दोहे।
चौपाइयों में शिव का रूप आता है, फिर उनकी कथाएँ: तारकासुर, जलंधर और त्रिपुरासुर का अंत, भगीरथ के लिए गंगा को धारण करना, समुद्र-मंथन का विष पीकर नीलकंठ कहलाना। इसके बाद भक्त अपने संकट कहकर शरण माँगता है, और अंत में चालीसा अपने पाठ का फल बताती है।
हे गिरिजा (पार्वती) के पुत्र गणेश जी, आप मंगल के मूल और परम ज्ञानी हैं, आपकी जय हो। अयोध्यादास कहते हैं: आप मुझे अभय का वरदान दीजिए।
हे गिरिजापति, दीनों पर दया करने वाले शिव जी, आपकी जय हो। आप सदा संतों की रक्षा और पालन करते हैं।
आपके माथे पर चंद्रमा सुंदर शोभा देता है, और कानों में नाग के फन के कुंडल हैं।
आपका शरीर गौर (उजला) है, सिर की जटाओं से गंगा बहती है, गले में मुंडों की माला है और शरीर पर भस्म लगी है।
आप बाघ की खाल का वस्त्र पहने सुशोभित हैं; आपकी छवि देखकर नाग भी मोहित हो जाते हैं।
माता मैना (मेना) की दुलारी पुत्री पार्वती जी आपके बाएँ अंग में विराजती हैं; उनकी छवि निराली है।
आपके हाथ में त्रिशूल बहुत सुंदर लगता है, जो सदा शत्रुओं का नाश करता है।
आपके पास नंदी और गणेश जी ऐसे शोभा देते हैं, जैसे सागर के बीच कमल खिले हों।
कार्तिकेय, श्यामा (पार्वती जी) और गणों के राजा गणेश जी के साथ आपकी इस छवि का वर्णन कोई नहीं कर सकता।
जब भी देवताओं ने जाकर आपको पुकारा, हे प्रभु, आपने तुरंत उनका दुःख दूर किया।
जब तारकासुर ने भारी उपद्रव मचाया, तब सब देवताओं ने मिलकर आपसे विनती की।
आपने तुरंत छह मुखों वाले कार्तिकेय (षडानन) को भेजा, जिन्होंने पल भर में तारकासुर को मार गिराया।
आपने जलंधर असुर का संहार किया; आपका सुयश सारे संसार में प्रसिद्ध है।
त्रिपुरासुर से युद्ध करके आपने कृपा कर सबको बचा लिया।
जब भगीरथ ने गंगा को धरती पर लाने के लिए भारी तप किया, तब हे पुरारि, आपने गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर उनकी प्रतिज्ञा पूरी की।
दान देने वालों में आपके समान कोई नहीं है; आपके सेवक सदा आपकी स्तुति करते हैं।
वेदों ने आपके नाम की महिमा गाई है, फिर भी आप अकथनीय और अनादि हैं; आपका रहस्य कोई नहीं जान पाया।
समुद्र-मंथन में जब विष की ज्वाला निकली, तब देवता और असुर उससे जलकर व्याकुल हो गए।
तब आपने दया करके सहायता की और वह विष अपने कंठ में धारण कर लिया; तभी से आपका नाम नीलकंठ पड़ा।
जब श्री रामचंद्र जी ने आपका पूजन किया, तब आपकी कृपा से उन्होंने लंका जीतकर विभीषण को दे दी।
जब प्रभु हज़ार कमलों से आपकी पूजा कर रहे थे, तब हे पुरारि, आपने उनकी परीक्षा ली। पुराणों में यह कथा भगवान विष्णु की पूजा के रूप में आती है।
आपने उन कमलों में से एक कमल छिपा लिया। तब कमल-नयन प्रभु ने कमल की जगह अपना नेत्र ही अर्पित करना चाहा।
प्रभु शंकर ने यह कठिन भक्ति देखी तो प्रसन्न होकर मनचाहा वरदान दिया।
हे अनंत और अविनाशी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप सबके हृदय में बसते हैं और सब पर कृपा करते हैं।
सब दुष्ट मुझे रोज़ सताते हैं; मैं भटकता रहता हूँ और मुझे चैन नहीं मिलता।
हे नाथ, मैं “बचाइए, बचाइए” पुकार रहा हूँ; इसी समय आकर मेरा उद्धार कीजिए।
त्रिशूल लेकर शत्रुओं का नाश कीजिए और मुझे संकट से उबार लीजिए। भक्ति में इन शत्रुओं को मन के काम, क्रोध जैसे दोष भी समझा जाता है।
माता, पिता, भाई, सब होते हैं, पर संकट के समय कोई नहीं पूछता।
हे स्वामी, मुझे बस आपकी ही आस है; आकर मेरा भारी संकट हर लीजिए।
आप निर्धन को सदा धन देते हैं; जो कोई आपसे माँगता है, वह फल पाता है।
मैं किस विधि से आपकी स्तुति करूँ? हे नाथ, मेरी भूलों को क्षमा कीजिए।
हे शंकर, आप संकटों का नाश करने वाले, मंगल करने वाले और विघ्नों को मिटाने वाले हैं।
योगी, यति और मुनि आपका ध्यान करते हैं; सरस्वती जी और नारद जी आपको शीश नवाते हैं।
आपको नमस्कार है, नमस्कार है; “नमः शिवाय”, आपकी जय हो। ब्रह्मा आदि देवता भी आपका पार नहीं पाते।
चालीसा कहती है कि जो इसका पाठ मन लगाकर करता है, भगवान शंभु उसकी सहायता करते हैं।
चालीसा के अनुसार कर्ज़ में दबा व्यक्ति भी यदि इसका पाठ करे तो वह पावन होता है, उसका भार उतरता है।
चालीसा कहती है कि जो संतान की इच्छा रखता है, उस पर शिव की कृपा होती है।
त्रयोदशी के दिन पंडित को बुलाकर ध्यान से होम (हवन) करवाए; यह चालीसा की बताई हुई विधि है।
चालीसा कहती है कि जो त्रयोदशी का व्रत नियम से करता है, उसके शरीर में क्लेश नहीं रहता।
धूप, दीप और नैवेद्य चढ़ाकर भगवान शंकर के सामने यह पाठ सुनाए।
चालीसा के अनुसार ऐसा करने वाले के जन्म-जन्म के पाप नष्ट होते हैं, और अंत में वह शिवधाम पाता है।
अयोध्यादास कहते हैं: हे प्रभु, मुझे आपकी ही आस है; आप सब जानते हैं, मेरे सारे दुःख हर लीजिए।
मैं नियम से हर सुबह यह चालीसा पढ़ूँ। हे जगदीश, आप मेरी मनोकामना पूरी कीजिए।
मार्गशीर्ष (अगहन) मास की षष्ठी को, हेमंत ऋतु में, संवत् चौंसठ में शिव जी की यह स्तुति रूपी चालीसा कल्याण के लिए पूरी हुई। यह दोहा रचना का समय बताता है।
शिव चालीसा का भाव शरणागति है। पहले भक्त शिव के रूप का ध्यान करता है: माथे पर चंद्रमा, जटाओं में गंगा, गले में मुंडमाला, शरीर पर भस्म, साथ में पार्वती, गणेश, कार्तिकेय और नंदी। फिर वह उन कथाओं को याद करता है जिनमें शिव ने बिना देर किए दूसरों का संकट दूर किया: देवताओं की रक्षा, भगीरथ की तपस्या का फल, और समुद्र-मंथन का विष पीकर संसार को बचाना।
इन कथाओं के बाद भक्त अपनी बात कहता है: दुष्ट सताते हैं, अपने साथ नहीं देते, अब बस शिव की आस है। वह अपनी भूलों की क्षमा माँगता है और मानता है कि ब्रह्मा भी शिव का पार नहीं पाते। अंत में चालीसा अपने पाठ, त्रयोदशी व्रत और शिव-पूजन का फल बताती है। पूरी रचना का सार यह है कि शिव “दीनदयाल” हैं, जो पुकारने पर अपने जन को अपनाते हैं।
चौपाई 34 से 40 और पहला अंतिम दोहा शिव चालीसा की फलश्रुति हैं। चालीसा अपने वचनों में कहती है कि मन लगाकर पाठ करने वाले की शंभु सहायता करते हैं, ऋणी पावन होता है, संतान चाहने वाले पर शिव की कृपा होती है, त्रयोदशी व्रत करने वाले के क्लेश दूर रहते हैं और अंत में शिवधाम मिलता है। यहाँ ये चालीसा के अपने वचन के रूप में दिए गए हैं, किसी परिणाम के वादे के रूप में नहीं।
जो यह पाठ करे मन लाई।
ता पर होत है शम्भु सहाई॥चालीसा कहती है कि जो इसका पाठ मन लगाकर करता है, भगवान शंभु उसकी सहायता करते हैं।
ऋनिया जो कोई हो अधिकारी।
पाठ करे सो पावन हारी॥चालीसा के अनुसार कर्ज़ में दबा व्यक्ति भी यदि इसका पाठ करे तो वह पावन होता है, उसका भार उतरता है।
पुत्र हीन कर इच्छा जोई।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥चालीसा कहती है कि जो संतान की इच्छा रखता है, उस पर शिव की कृपा होती है।
पण्डित त्रयोदशी को लावे।
ध्यान पूर्वक होम करावे॥त्रयोदशी के दिन पंडित को बुलाकर ध्यान से होम (हवन) करवाए; यह चालीसा की बताई हुई विधि है।
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा।
तन नहिं ताके रहै कलेशा॥चालीसा कहती है कि जो त्रयोदशी का व्रत नियम से करता है, उसके शरीर में क्लेश नहीं रहता।
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥धूप, दीप और नैवेद्य चढ़ाकर भगवान शंकर के सामने यह पाठ सुनाए।
जन्म जन्म के पाप नसावे।
अन्त धाम शिवपुर में पावे॥चालीसा के अनुसार ऐसा करने वाले के जन्म-जन्म के पाप नष्ट होते हैं, और अंत में वह शिवधाम पाता है।
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीस।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥मैं नियम से हर सुबह यह चालीसा पढ़ूँ। हे जगदीश, आप मेरी मनोकामना पूरी कीजिए।
शिव चालीसा उत्तर भारत के घरों और शिव मंदिरों में बहुत पढ़ी जाती है, विशेषकर सोमवार को, प्रदोष के दिन, सावन के महीने में और महाशिवरात्रि पर। इसकी भाषा सरल है और लय में गाई जा सकती है, इसलिए परिवार मिलकर भी इसका पाठ करते हैं।
चालीसा स्वयं त्रयोदशी व्रत और शिव के सामने धूप-दीप के साथ पाठ की बात करती है, इसलिए परंपरा में प्रदोष के दिन इसका विशेष स्थान है। भक्त इसे शिव के “भोले” और “दीनदयाल” स्वभाव की याद के रूप में पढ़ते हैं: वे जल्दी प्रसन्न होते हैं और शरण में आए को अपनाते हैं।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| दोहा 1 | कहत अयोध्यादास तुम देउ अभय वरदान | sanskritdocuments.org में “देहु” की जगह “देउ”; भक्ति भारत और रणधीर प्रकाशन की पुस्तक में “देहु”। |
| चौपाई 4 | छवि को देख नाग मुनि मोहे | रणधीर प्रकाशन की पुस्तक में “मन” की जगह “मुनि”: छवि देखकर नाग और मुनि मोहित होते हैं। |
| चौपाई 13 | तबहिं कृपा कर लीन बचाई | sanskritdocuments.org में “सबहिं” की जगह “तबहिं”। |
| चौपाई 16 | वेद माहि महिमा तुम गाई | sanskritdocuments.org में; भक्ति भारत और रणधीर प्रकाशन में “वेद नाम महिमा तव गाई”। |
| चौपाई 17 | प्रगटी उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥ | रणधीर प्रकाशन की पुस्तक में; sanskritdocuments.org में “प्रकटे”। |
| चौपाई 20 | कीन्ह परीक्षा तबहिं त्रिपुरारी | sanskritdocuments.org में “पुरारी” की जगह “त्रिपुरारी”; दोनों शिव के नाम हैं। |
| चौपाई 27 | मात-पिता भ्राता सब होई | भक्ति भारत में; sanskritdocuments.org और रणधीर प्रकाशन में “सब कोई”। |
| चौपाई 36 | पुत्र होन की इच्छा जोई | sanskritdocuments.org में; रणधीर प्रकाशन में “पुत्रहीन इच्छा कर कोई”। अर्थ एक ही है: संतान की इच्छा। |
| चौपाई 40 | अन्त वास शिवपुर में पावे | रणधीर प्रकाशन की पुस्तक में “धाम” की जगह “वास”। |
| अंतिम दोहे | नित नेम उठि प्रातःही पाठ करो चालीस | sanskritdocuments.org का पाठ; वहाँ “मगसर छठि हेमन्त ऋतु…” वाला दूसरा दोहा नहीं है। भक्ति भारत और रणधीर प्रकाशन में दोनों दोहे हैं। |
आरंभ के दोहे (“कहत अयोध्यादास”) और अंतिम चौपाई (“कहैं अयोध्यादास”) में यह नाम आता है, इसलिए इन्हें रचयिता माना जाता है। इनके जीवन के बारे में प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): sanskritdocuments.org (siva40), भक्ति भारत और रणधीर प्रकाशन की छपी पुस्तक “51 चालीसा संग्रह” (archive.org के पृष्ठ-चित्र और OCR) को पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया। हर पंक्ति इनमें से किसी एक स्रोत में ज्यों की त्यों मिलती है; जहाँ स्रोत अलग थे, वहाँ प्रायः दो स्रोतों में मिलने वाला पाठ रखा। भक्ति भारत की क्रम-संख्या के अनुसार चौपाइयाँ 1 से 40 गिनी गई हैं; “कहैं अयोध्यादास…” वाली विनती बिना संख्या के है, जैसा वहाँ है। “ऋनिया” रणधीर प्रकाशन से (sanskritdocuments.org में “रनियां”); दूसरा अंतिम दोहा भक्ति भारत और रणधीर प्रकाशन में है, sanskritdocuments.org में नहीं। sanskritdocuments.org चालीसा के बाद त्रिगुण आरती भी देता है, जो यहाँ नहीं ली गई।
शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
शिव · आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा
भैरव · चालीसा
श्री गणपति गुरु गौरि पद प्रेम सहित धरि माथ
शिव · स्तोत्र · संस्कृत
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
शिव · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
महाशिवरात्रि पर घर में शिव पूजा: सुबह संकल्प, सेहत के अनुसार व्रत, रात में एक बार या चारों पहर की पूजा, जागरण, निशीथ काल और अगली सुबह पारण।
शिव · अष्टकम् · संस्कृत
नमामीशमीशाननिर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्
आरंभ के दोहे और अंतिम चौपाई में “अयोध्यादास” नाम आता है, इसलिए उन्हें रचयिता माना जाता है। उनके बारे में और प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।
प्रायः सोमवार को, प्रदोष (त्रयोदशी) के दिन, सावन में और महाशिवरात्रि पर। रोज़ की पूजा में भी इसे पढ़ा जाता है।
चालीसा की फलश्रुति में त्रयोदशी पर होम और व्रत की बात आती है। घर पर साधारण पाठ के लिए दीपक-धूप के साथ श्रद्धा से पढ़ना ही प्रचलित है।
जो संतान की इच्छा रखता है, उस पर शिव की कृपा होती है। यह चालीसा की अपनी फलश्रुति का वचन है।
यह रचना का समय बताता है: मार्गशीर्ष मास की षष्ठी, हेमंत ऋतु, संवत् चौंसठ। संवत् का पूरा वर्ष दोहे में नहीं दिया है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।