शिव पूजा विधि
शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

चालीसा · भैरव
काशी के कोतवाल, शिव के रूप भैरव जी की चालीसा। मूल पाठ, हर चौपाई का अर्थ, भावार्थ और कठिन शब्द।
श्री गणपति गुरु गौरि पद प्रेम सहित धरि माथ।चालीसा वन्दन करौं श्री शिव भैरवनाथ॥
अर्थ: श्री गणपति, गुरु और माँ गौरी के चरणों में प्रेम से सिर रखकर, मैं शिव-स्वरूप श्री भैरवनाथ की वंदना में यह चालीसा कहता हूँ।
श्री भैरव संकट हरण मंगल करण कृपाल।श्याम वरण विकराल वपु लोचन लाल विशाल॥
अर्थ: श्री भैरव संकट हरने वाले, मंगल करने वाले और कृपालु हैं। उनका रंग श्याम है, शरीर विकराल है और आँखें लाल और बड़ी हैं।
जय जय श्री काली के लाला।जयति जयति काशी-कुतवाला ॥१॥
अर्थ: माँ काली के प्यारे पुत्र श्री भैरव की जय हो; काशी के कोतवाल (रक्षक) की जय हो, जय हो।
जयति बटुक-भैरव भय हारी।जयति काल-भैरव बलकारी ॥२॥
अर्थ: भय हरने वाले बटुक भैरव की जय हो; बलवान काल भैरव की जय हो।
जयति नाथ-भैरव विख्याता।जयति सर्व-भैरव सुखदाता ॥३॥
अर्थ: प्रसिद्ध नाथ भैरव की जय हो; सुख देने वाले सर्व भैरव की जय हो।
भैरव रूप कियो शिव धारण।भव के भार उतारण कारण ॥४॥
अर्थ: संसार का भार उतारने के लिए शिव ने भैरव रूप धारण किया।
भैरव रव सुनि ह्वै भय दूरी।सब विधि होय कामना पूरी ॥५॥
अर्थ: भैरव की गर्जना सुनकर भय दूर हो जाता है और हर तरह से कामनाएँ पूरी होती हैं, ऐसा चालीसा कहती है।
शेष महेश आदि गुण गायो।काशी-कोतवाल कहलायो ॥६॥
अर्थ: शेषनाग, महेश आदि ने आपके गुण गाए; आप काशी के कोतवाल कहलाए।
जटा जूट शिर चंद्र विराजत।बाला मुकुट बिजायठ साजत ॥७॥
अर्थ: सिर पर जटाओं का जूड़ा है और उस पर चंद्रमा विराजता है; कानों के गहने, मुकुट और बाजूबंद शोभा देते हैं।
कटि करधनी घूँघरू बाजत।दर्शन करत सकल भय भाजत ॥८॥
अर्थ: कमर में करधनी है और घुँघरू बजते हैं; आपके दर्शन करते ही सब भय भाग जाते हैं।
जीवन दान दास को दीन्ह्यो।कीन्ह्यो कृपा नाथ तब चीन्ह्यो ॥९॥
अर्थ: आपने इस दास को जीवन-दान दिया; हे नाथ, आपने कृपा की और मुझे अपना जाना।
वसि रसना बनि सारद-काली।दीन्ह्यो वर राख्यो मम लाली ॥१०॥
अर्थ: आपने शारदा और काली बनकर मेरी जीभ पर वास किया, यानी वाणी दी; वर दिया और मेरी लाज रखी।
धन्य धन्य भैरव भय भंजन।जय मनरंजन खल दल भंजन ॥११॥
अर्थ: भय का नाश करने वाले भैरव धन्य हैं, धन्य हैं; मन को आनंद देने वाले और दुष्टों के दल का नाश करने वाले की जय हो।
कर त्रिशूल डमरू शुचि कोड़ा।कृपा कटाक्ष सुयश नहिं थोडा ॥१२॥
अर्थ: आपके हाथों में त्रिशूल, डमरू और पवित्र कोड़ा है; आपकी कृपा भरी दृष्टि और सुयश थोड़ा नहीं, अपार है।
जो भैरव निर्भय गुण गावत।अष्टसिद्धि नव निधि फल पावत ॥१३॥
अर्थ: जो निर्भय होकर भैरव के गुण गाता है, वह आठ सिद्धियों और नौ निधियों का फल पाता है, ऐसा चालीसा कहती है।
रूप विशाल कठिन दुख मोचन।क्रोध कराल लाल दुहुँ लोचन ॥१४॥
अर्थ: आपका रूप विशाल है और कठिन दुखों से छुड़ाने वाला है; क्रोध भयंकर है और दोनों आँखें लाल हैं।
अगणित भूत प्रेत संग डोलत।बं बं बं शिव बं बं बोलत ॥१५॥
अर्थ: अनगिनत भूत-प्रेत आपके साथ घूमते हैं और “बं बं बं शिव बं बं” बोलते हैं।
रुद्रकाय काली के लाला।महा कालहू के हो काला ॥१६॥
अर्थ: रुद्र जैसे शरीर वाले, काली के लाल, आप महाकाल के भी काल हैं।
बटुक नाथ हो काल गँभीरा।श्वेत रक्त अरु श्याम शरीरा ॥१७॥
अर्थ: आप बटुकनाथ हैं और गंभीर काल भी; आपके शरीर के श्वेत, रक्त और श्याम, तीन वर्ण हैं।
करत नीनहूँ रूप प्रकाशा।भरत सुभक्तन कहँ शुभ आशा ॥१८॥
अर्थ: आप (इन) तीनों रूपों को प्रकट करते हैं और अच्छे भक्तों के मन में शुभ आशा भरते हैं। (“नीनहूँ” को यहाँ “तीनहूँ”, यानी तीनों, समझा गया है; पाठभेद देखें।)
रत्न जड़ित कंचन सिंहासन।व्याघ्र चर्म शुचि नर्म सुआनन ॥१९॥
अर्थ: आप रत्नों से जड़े सोने के सिंहासन पर, पवित्र और कोमल बाघ की खाल पर विराजते हैं; आपका मुख सुंदर है।
तुमहि जाइ काशिहिं जन ध्यावहिं।विश्वनाथ कहँ दर्शन पावहिं ॥२०॥
अर्थ: लोग काशी जाकर आपका ध्यान करते हैं और (फिर) विश्वनाथ के दर्शन पाते हैं।
जय प्रभु संहारक सुनन्द जय।जय उन्नत हर उमा नन्द जय ॥२१॥
अर्थ: हे प्रभु, संहार करने वाले, सुनंद, उन्नत, हर और उमा को आनंद देने वाले, आपकी जय हो। (यहाँ से चौपाई 28 तक भैरव के अनेक नामों और रूपों की जय-जयकार है; इनमें संहार, भीषण, क्रोध, चंड जैसे नाम भैरव के आठ प्रसिद्ध रूपों से मिलते हैं।)
भीम त्रिलोचन स्वान साथ जय।वैजनाथ श्री जगतनाथ जय ॥२२॥
अर्थ: भीम (भयंकर), तीन नेत्रों वाले, कुत्ते को साथ रखने वाले, वैद्यनाथ और श्री जगन्नाथ, आपकी जय हो।
महा भीम भीषण शरीर जय।रुद्र त्र्यम्बक धीर वीर जय ॥२३॥
अर्थ: महाभीम, भीषण शरीर वाले, रुद्र, त्र्यंबक (तीन नेत्रों वाले), धीर और वीर, आपकी जय हो।
अश्वनाथ जय प्रेतनाथ जय।स्वानारुढ़ सयचंद्र नाथ जय ॥२४॥
अर्थ: अश्वनाथ, प्रेतों के नाथ, कुत्ते पर सवार और चंद्र को धारण करने वाले नाथ, आपकी जय हो। (“सयचंद्र” शब्द पाठ में अस्पष्ट है।)
निमिष दिगंबर चक्रनाथ जय।गहत अनाथन नाथ हाथ जय ॥२५॥
अर्थ: निमिष, दिगंबर, चक्रनाथ, और अनाथों का हाथ थामने वाले नाथ, आपकी जय हो।
त्रेशलेश भूतेश चंद्र जय।क्रोध वत्स अमरेश नन्द जय ॥२६॥
अर्थ: भूतों के स्वामी, चंद्रधारी, क्रोध, वत्स और अमरेश (देवताओं के स्वामी) रूपों वाले, आपकी जय हो। (“त्रेशलेश” शब्द पाठ में अस्पष्ट है।)
श्री वामन नकुलेश चण्ड जय।कृत्याऊ कीरति प्रचण्ड जय ॥२७॥
अर्थ: श्री वामन, नकुलेश, चंड और प्रचंड कीर्ति वाले, आपकी जय हो। (“कृत्याऊ” शब्द पाठ में अस्पष्ट है।)
रुद्र बटुक क्रोधेश कालधर।चक्र तुण्ड दश पाणिव्याल धर ॥२८॥
अर्थ: आप रुद्र, बटुक, क्रोधेश और काल को धारण करने वाले हैं; आप चक्रतुंड, दस हाथों वाले और सर्पों को धारण करने वाले हैं।
करि मद पान शम्भु गुणगावत।चौंसठ योगिन संग नचावत ॥२९॥
अर्थ: आप मद (मदिरा) पीकर शंभु के गुण गाते हैं और चौंसठ योगिनियों को अपने संग नचाते हैं। (यह भैरव के उग्र, तांत्रिक परंपरा वाले रूप का वर्णन है।)
करत कृपा जन पर बहु ढंगा।काशी कोतवाल अड़बंगा ॥३०॥
अर्थ: काशी के अनोखे, मस्तमौला कोतवाल अपने भक्तों पर अनेक प्रकार से कृपा करते हैं।
देयँ काल भैरव जब सोटा।नसै पाप मोटा से मोटा ॥३१॥
अर्थ: जब काल भैरव अपना दंड देते हैं, तो बड़े से बड़ा पाप भी नष्ट हो जाता है, ऐसा चालीसा कहती है।
जनकर निर्मल होय शरीरा।मिटै सकल संकट भव पीरा ॥३२॥
अर्थ: (उससे) भक्त का शरीर निर्मल होता है और संसार के सब संकट और पीड़ाएँ मिटती हैं।
श्री भैरव भूतोंके राजा।बाधा हरत करत शुभ काजा ॥३३॥
अर्थ: श्री भैरव भूतों के राजा हैं; वे बाधाएँ हरते हैं और शुभ काम करते हैं।
ऐलादी के दुःख निवारयो।सदा कृपाकरि काज सम्हारयो ॥३४॥
अर्थ: आपने ऐलादी (एक भक्त) के दुख दूर किए, और सदा कृपा करके उसके काम सँभाले। (ऐलादी कौन थे, यह पाठ से स्पष्ट नहीं।)
सुन्दर दास सहित अनुरागा।श्री दुर्वासा निकट प्रयागा ॥३५॥
अर्थ: प्रयाग के पास दुर्वासा (आश्रम) के निकट रहने वाले सुन्दरदास ने प्रेम के साथ —
श्री भैरव जी की जय लेख्यो।सकल कामना पूरण देख्यो ॥३६॥
अर्थ: — श्री भैरव जी की जय लिखी, और (उनकी कृपा से) अपनी सब कामनाएँ पूरी होती देखीं।
जय जय जय भैरव बटुक स्वामी संकट टार।कृपा दास पर कीजिए शंकर के अवतार॥
अर्थ: हे स्वामी बटुक भैरव, आपकी जय हो, जय हो, जय हो; संकट टालिए। हे शंकर के अवतार, इस दास पर कृपा कीजिए।
हर चौपाई का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।
भैरव चालीसा शिव के उग्र रूप भैरव जी की स्तुति है, जो “श्री गणपति गुरु गौरि पद” दोहे से शुरू होती है। इसमें दो आरंभिक दोहे, छत्तीस चौपाइयाँ और अंत में एक दोहा है। चालीसा भैरव को काली का लाल और काशी का कोतवाल कहती है, बटुक भैरव और काल भैरव जैसे उनके रूपों की जय बोलती है, और उनके श्वेत, रक्त और श्याम, तीन वर्णों का वर्णन करती है।
चौपाई 35 में कवि अपना नाम सुन्दरदास और स्थान प्रयाग के पास दुर्वासा आश्रम के निकट बताता है। चौपाई 21 से 28 में भैरव के अनेक नाम एक साथ आते हैं; इनमें से कुछ शब्द सभी उपलब्ध पाठों में अस्पष्ट हैं, इसलिए उन्हें बदला नहीं गया और उनका अर्थ सावधानी से दिया गया है।
श्री गणपति, गुरु और माँ गौरी के चरणों में प्रेम से सिर रखकर, मैं शिव-स्वरूप श्री भैरवनाथ की वंदना में यह चालीसा कहता हूँ।
श्री भैरव संकट हरने वाले, मंगल करने वाले और कृपालु हैं। उनका रंग श्याम है, शरीर विकराल है और आँखें लाल और बड़ी हैं।
माँ काली के प्यारे पुत्र श्री भैरव की जय हो; काशी के कोतवाल (रक्षक) की जय हो, जय हो।
भय हरने वाले बटुक भैरव की जय हो; बलवान काल भैरव की जय हो।
प्रसिद्ध नाथ भैरव की जय हो; सुख देने वाले सर्व भैरव की जय हो।
संसार का भार उतारने के लिए शिव ने भैरव रूप धारण किया।
भैरव की गर्जना सुनकर भय दूर हो जाता है और हर तरह से कामनाएँ पूरी होती हैं, ऐसा चालीसा कहती है।
शेषनाग, महेश आदि ने आपके गुण गाए; आप काशी के कोतवाल कहलाए।
सिर पर जटाओं का जूड़ा है और उस पर चंद्रमा विराजता है; कानों के गहने, मुकुट और बाजूबंद शोभा देते हैं।
कमर में करधनी है और घुँघरू बजते हैं; आपके दर्शन करते ही सब भय भाग जाते हैं।
आपने इस दास को जीवन-दान दिया; हे नाथ, आपने कृपा की और मुझे अपना जाना।
आपने शारदा और काली बनकर मेरी जीभ पर वास किया, यानी वाणी दी; वर दिया और मेरी लाज रखी।
भय का नाश करने वाले भैरव धन्य हैं, धन्य हैं; मन को आनंद देने वाले और दुष्टों के दल का नाश करने वाले की जय हो।
आपके हाथों में त्रिशूल, डमरू और पवित्र कोड़ा है; आपकी कृपा भरी दृष्टि और सुयश थोड़ा नहीं, अपार है।
जो निर्भय होकर भैरव के गुण गाता है, वह आठ सिद्धियों और नौ निधियों का फल पाता है, ऐसा चालीसा कहती है।
आपका रूप विशाल है और कठिन दुखों से छुड़ाने वाला है; क्रोध भयंकर है और दोनों आँखें लाल हैं।
अनगिनत भूत-प्रेत आपके साथ घूमते हैं और “बं बं बं शिव बं बं” बोलते हैं।
रुद्र जैसे शरीर वाले, काली के लाल, आप महाकाल के भी काल हैं।
आप बटुकनाथ हैं और गंभीर काल भी; आपके शरीर के श्वेत, रक्त और श्याम, तीन वर्ण हैं।
आप (इन) तीनों रूपों को प्रकट करते हैं और अच्छे भक्तों के मन में शुभ आशा भरते हैं। (“नीनहूँ” को यहाँ “तीनहूँ”, यानी तीनों, समझा गया है; पाठभेद देखें।)
आप रत्नों से जड़े सोने के सिंहासन पर, पवित्र और कोमल बाघ की खाल पर विराजते हैं; आपका मुख सुंदर है।
लोग काशी जाकर आपका ध्यान करते हैं और (फिर) विश्वनाथ के दर्शन पाते हैं।
हे प्रभु, संहार करने वाले, सुनंद, उन्नत, हर और उमा को आनंद देने वाले, आपकी जय हो। (यहाँ से चौपाई 28 तक भैरव के अनेक नामों और रूपों की जय-जयकार है; इनमें संहार, भीषण, क्रोध, चंड जैसे नाम भैरव के आठ प्रसिद्ध रूपों से मिलते हैं।)
भीम (भयंकर), तीन नेत्रों वाले, कुत्ते को साथ रखने वाले, वैद्यनाथ और श्री जगन्नाथ, आपकी जय हो।
महाभीम, भीषण शरीर वाले, रुद्र, त्र्यंबक (तीन नेत्रों वाले), धीर और वीर, आपकी जय हो।
अश्वनाथ, प्रेतों के नाथ, कुत्ते पर सवार और चंद्र को धारण करने वाले नाथ, आपकी जय हो। (“सयचंद्र” शब्द पाठ में अस्पष्ट है।)
निमिष, दिगंबर, चक्रनाथ, और अनाथों का हाथ थामने वाले नाथ, आपकी जय हो।
भूतों के स्वामी, चंद्रधारी, क्रोध, वत्स और अमरेश (देवताओं के स्वामी) रूपों वाले, आपकी जय हो। (“त्रेशलेश” शब्द पाठ में अस्पष्ट है।)
श्री वामन, नकुलेश, चंड और प्रचंड कीर्ति वाले, आपकी जय हो। (“कृत्याऊ” शब्द पाठ में अस्पष्ट है।)
आप रुद्र, बटुक, क्रोधेश और काल को धारण करने वाले हैं; आप चक्रतुंड, दस हाथों वाले और सर्पों को धारण करने वाले हैं।
आप मद (मदिरा) पीकर शंभु के गुण गाते हैं और चौंसठ योगिनियों को अपने संग नचाते हैं। (यह भैरव के उग्र, तांत्रिक परंपरा वाले रूप का वर्णन है।)
काशी के अनोखे, मस्तमौला कोतवाल अपने भक्तों पर अनेक प्रकार से कृपा करते हैं।
जब काल भैरव अपना दंड देते हैं, तो बड़े से बड़ा पाप भी नष्ट हो जाता है, ऐसा चालीसा कहती है।
(उससे) भक्त का शरीर निर्मल होता है और संसार के सब संकट और पीड़ाएँ मिटती हैं।
श्री भैरव भूतों के राजा हैं; वे बाधाएँ हरते हैं और शुभ काम करते हैं।
आपने ऐलादी (एक भक्त) के दुख दूर किए, और सदा कृपा करके उसके काम सँभाले। (ऐलादी कौन थे, यह पाठ से स्पष्ट नहीं।)
प्रयाग के पास दुर्वासा (आश्रम) के निकट रहने वाले सुन्दरदास ने प्रेम के साथ —
— श्री भैरव जी की जय लिखी, और (उनकी कृपा से) अपनी सब कामनाएँ पूरी होती देखीं।
हे स्वामी बटुक भैरव, आपकी जय हो, जय हो, जय हो; संकट टालिए। हे शंकर के अवतार, इस दास पर कृपा कीजिए।
भैरव चालीसा शिव के उस रूप की स्तुति है जिसे काशी का रक्षक, यानी कोतवाल, माना जाता है। चालीसा कहती है कि शिव ने संसार का भार उतारने के लिए भैरव रूप धारण किया। उनका रूप विकराल है — श्याम वर्ण, लाल आँखें, हाथों में त्रिशूल, डमरू और कोड़ा, साथ में भूत-प्रेत — पर भक्त के लिए वे कृपालु, भय हरने वाले और मंगल करने वाले हैं।
बीच में कवि अपना अनुभव भी कहता है: भैरव ने उसे जीवन-दान दिया, वाणी दी और उसकी लाज रखी। फिर बटुक, काल, नाथ और सर्व भैरव जैसे रूपों और अनेक नामों की जय-जयकार है, और यह बात कि काशी जाकर भैरव का ध्यान करने वाले विश्वनाथ के दर्शन पाते हैं।
अंत में चालीसा कहती है कि भैरव के दंड से बड़े-बड़े पाप नष्ट होते हैं और भक्त निर्मल होता है। अंतिम दोहे में भक्त शंकर के अवतार बटुक भैरव से संकट टालने और कृपा करने की प्रार्थना करता है। उग्र रूप के पीछे इस चालीसा का भाव रक्षा और कृपा का है।
चौपाई 5, 13, 31 और 32 इस चालीसा की फलश्रुति कहती हैं। चालीसा के अपने वचनों में: भैरव की गर्जना सुनकर भय दूर होता है, निर्भय होकर उनके गुण गाने वाला सिद्धि और निधि का फल पाता है, और उनके दंड से बड़े पाप नष्ट होकर भक्त निर्मल होता है। ये पाठ के वचन हैं; यहाँ इन्हें उसी रूप में दिया गया है।
भैरव रव सुनि ह्वै भय दूरी।
सब विधि होय कामना पूरी॥भैरव की गर्जना सुनकर भय दूर हो जाता है और हर तरह से कामनाएँ पूरी होती हैं, ऐसा चालीसा कहती है।
जो भैरव निर्भय गुण गावत।
अष्टसिद्धि नव निधि फल पावत॥जो निर्भय होकर भैरव के गुण गाता है, वह आठ सिद्धियों और नौ निधियों का फल पाता है, ऐसा चालीसा कहती है।
देयँ काल भैरव जब सोटा।
नसै पाप मोटा से मोटा॥जब काल भैरव अपना दंड देते हैं, तो बड़े से बड़ा पाप भी नष्ट हो जाता है, ऐसा चालीसा कहती है।
जनकर निर्मल होय शरीरा।
मिटै सकल संकट भव पीरा॥(उससे) भक्त का शरीर निर्मल होता है और संसार के सब संकट और पीड़ाएँ मिटती हैं।
भैरव शिव का उग्र रूप हैं। परंपरा में काल भैरव को काशी का कोतवाल माना जाता है, और यह चालीसा भी उन्हें बार-बार “काशी-कोतवाल” कहती है। इसलिए काशी के भक्तों में भैरव की उपासना विश्वनाथ की उपासना के साथ जुड़ी है, जैसा चौपाई 20 में है।
चालीसा भैरव के बटुक (बाल) रूप और काल भैरव, दोनों की जय बोलती है और उन्हें शिव का ही रूप मानती है। कालाष्टमी और काल भैरव जयंती पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है।
भैरव का रूप डरावना कहा गया है, पर चालीसा का भाव भक्त के लिए रक्षा और कृपा का है: वे भय हरते हैं, संकट टालते हैं और अनाथों का हाथ पकड़ते हैं।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| चौपाई 18 | करत तीनहूँ रूप प्रकाशा | सभी उपलब्ध पाठों (sanskritdocuments.org, भारतडिस्कवरी, भक्ति भारत) में “नीनहूँ” है, इसलिए यहाँ वही रखा गया। पिछली चौपाई के श्वेत, रक्त और श्याम रूपों के संदर्भ में यह “तीनहूँ” (तीनों) की पुरानी छपाई-भूल लगती है; अर्थ उसी के अनुसार दिया गया है। |
| चौपाई 5 | भैरव रव सुनि हवै भय दूरी | भारतडिस्कवरी और भक्ति भारत में “ह्वै” (हो जाता है) की जगह “हवै”। |
| चौपाई 15 | बम बम बम शिव बम बम बोलत | भारतडिस्कवरी और भक्ति भारत में “बं” की जगह “बम”; उच्चारण वही है। |
| चौपाई 21 से 28 | सयचंद्र, त्रेशलेश, कृत्याऊ | भैरव के नामों वाली इन चौपाइयों के ये शब्द सभी उपलब्ध पाठों में ऐसे ही हैं और अस्पष्ट हैं; हो सकता है मूल छपाई में भूल रही हो। इन्हें बदला नहीं गया। |
| दूसरी चालीसाएँ | जय डमरूधर नयन विशाला … | शुभ पंचांग और द्रिक पंचांग जैसे स्रोतों पर भैरव जी की दूसरी चालीसाएँ भी मिलती हैं; वे अलग रचनाएँ हैं। |
नाम चालीसा की अपनी पंक्तियों (चौपाई 35–36) से, जहाँ कवि स्वयं को प्रयाग के पास दुर्वासा आश्रम के निकट का बताता है; sanskritdocuments.org भी रचयिता सुन्दरदास देता है। इसके अलावा कवि के बारे में कुछ ज्ञात नहीं।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): sanskritdocuments.org का पाठ भारतडिस्कवरी और भक्ति भारत के पाठ से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया; तीनों में वही दोहे और छत्तीस चौपाइयाँ एक ही क्रम में हैं, अंतर केवल वर्तनी का है। पाठ sanskritdocuments से (वहाँ यह पाठ जाँचा हुआ नहीं बताया गया); चौपाई 12 का “कटाक्ष” भारतडिस्कवरी से (sanskritdocuments में “कटाक्श”)। चौपाई 18 का “नीनहूँ” और चौपाई 21–28 के कुछ नाम सभी पाठों में अस्पष्ट हैं; उन्हें बदला नहीं गया, अर्थ में यह बताया गया है। sanskritdocuments के पृष्ठ पर चालीसा के बाद की आरती इसका भाग नहीं।
शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
भैरव · आरती
जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा
शिव · चालीसा
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान
भैरव, शिव · अष्टकम् · संस्कृत
देवराजसेव्यमानपावनाङ्घ्रिपङ्कजं
शिव · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
महाशिवरात्रि पर घर में शिव पूजा: सुबह संकल्प, सेहत के अनुसार व्रत, रात में एक बार या चारों पहर की पूजा, जागरण, निशीथ काल और अगली सुबह पारण।
शिव · आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा
चौपाई 35 में कवि अपना नाम सुन्दरदास बताता है, जो प्रयाग के पास दुर्वासा आश्रम के निकट रहते थे। इसके अलावा उनके बारे में कुछ ज्ञात नहीं।
परंपरा में काल भैरव काशी के रक्षक माने जाते हैं, जैसे नगर का कोतवाल। चालीसा भी उन्हें बार-बार काशी-कोतवाल कहती है और बताती है कि काशी में उनका ध्यान करने वाले विश्वनाथ के दर्शन पाते हैं।
बटुक भैरव भैरव का बाल रूप है और काल भैरव उनका उग्र रूप। यह चालीसा दोनों की जय बोलती है और दोनों को शिव का ही रूप मानती है।
कालाष्टमी, काल भैरव जयंती और भैरव जी की साप्ताहिक पूजा में इसे पढ़ा जाता है। कोई तय संख्या आवश्यक नहीं; श्रद्धा से पढ़ना पर्याप्त है।
सभी उपलब्ध पाठों में दो आरंभिक दोहे, छत्तीस चौपाइयाँ और अंत में एक दोहा है। “चालीसा” इस शैली का नाम है; हर चालीसा में ठीक चालीस चौपाइयाँ होना आवश्यक नहीं।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।