भैरव

चालीसा · भैरव

भैरव चालीसा

काशी के कोतवाल, शिव के रूप भैरव जी की चालीसा। मूल पाठ, हर चौपाई का अर्थ, भावार्थ और कठिन शब्द।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. चौपाई-वार अर्थ
  4. भावार्थ
  5. कठिन शब्द
  6. फलश्रुति
  7. कब पढ़ें
  8. विधि
  9. महत्व
  10. पाठ-भेद
  11. रचयिता और स्रोत
  12. ये भी पढ़ें
  13. सवाल-जवाब
  14. सुधार सुझाएँ

श्री गणपति गुरु गौरि पद प्रेम सहित धरि माथ।चालीसा वन्दन करौं श्री शिव भैरवनाथ॥

अर्थ: श्री गणपति, गुरु और माँ गौरी के चरणों में प्रेम से सिर रखकर, मैं शिव-स्वरूप श्री भैरवनाथ की वंदना में यह चालीसा कहता हूँ।

श्री भैरव संकट हरण मंगल करण कृपाल।श्याम वरण विकराल वपु लोचन लाल विशाल॥

अर्थ: श्री भैरव संकट हरने वाले, मंगल करने वाले और कृपालु हैं। उनका रंग श्याम है, शरीर विकराल है और आँखें लाल और बड़ी हैं।

जय जय श्री काली के लाला।जयति जयति काशी-कुतवाला ॥१॥

अर्थ: माँ काली के प्यारे पुत्र श्री भैरव की जय हो; काशी के कोतवाल (रक्षक) की जय हो, जय हो।

जयति बटुक-भैरव भय हारी।जयति काल-भैरव बलकारी ॥२॥

अर्थ: भय हरने वाले बटुक भैरव की जय हो; बलवान काल भैरव की जय हो।

जयति नाथ-भैरव विख्याता।जयति सर्व-भैरव सुखदाता ॥३॥

अर्थ: प्रसिद्ध नाथ भैरव की जय हो; सुख देने वाले सर्व भैरव की जय हो।

भैरव रूप कियो शिव धारण।भव के भार उतारण कारण ॥४॥

अर्थ: संसार का भार उतारने के लिए शिव ने भैरव रूप धारण किया।

भैरव रव सुनि ह्वै भय दूरी।सब विधि होय कामना पूरी ॥५॥

अर्थ: भैरव की गर्जना सुनकर भय दूर हो जाता है और हर तरह से कामनाएँ पूरी होती हैं, ऐसा चालीसा कहती है।

शेष महेश आदि गुण गायो।काशी-कोतवाल कहलायो ॥६॥

अर्थ: शेषनाग, महेश आदि ने आपके गुण गाए; आप काशी के कोतवाल कहलाए।

जटा जूट शिर चंद्र विराजत।बाला मुकुट बिजायठ साजत ॥७॥

अर्थ: सिर पर जटाओं का जूड़ा है और उस पर चंद्रमा विराजता है; कानों के गहने, मुकुट और बाजूबंद शोभा देते हैं।

कटि करधनी घूँघरू बाजत।दर्शन करत सकल भय भाजत ॥८॥

अर्थ: कमर में करधनी है और घुँघरू बजते हैं; आपके दर्शन करते ही सब भय भाग जाते हैं।

जीवन दान दास को दीन्ह्यो।कीन्ह्यो कृपा नाथ तब चीन्ह्यो ॥९॥

अर्थ: आपने इस दास को जीवन-दान दिया; हे नाथ, आपने कृपा की और मुझे अपना जाना।

वसि रसना बनि सारद-काली।दीन्ह्यो वर राख्यो मम लाली ॥१०॥

अर्थ: आपने शारदा और काली बनकर मेरी जीभ पर वास किया, यानी वाणी दी; वर दिया और मेरी लाज रखी।

धन्य धन्य भैरव भय भंजन।जय मनरंजन खल दल भंजन ॥११॥

अर्थ: भय का नाश करने वाले भैरव धन्य हैं, धन्य हैं; मन को आनंद देने वाले और दुष्टों के दल का नाश करने वाले की जय हो।

कर त्रिशूल डमरू शुचि कोड़ा।कृपा कटाक्ष सुयश नहिं थोडा ॥१२॥

अर्थ: आपके हाथों में त्रिशूल, डमरू और पवित्र कोड़ा है; आपकी कृपा भरी दृष्टि और सुयश थोड़ा नहीं, अपार है।

जो भैरव निर्भय गुण गावत।अष्टसिद्धि नव निधि फल पावत ॥१३॥

अर्थ: जो निर्भय होकर भैरव के गुण गाता है, वह आठ सिद्धियों और नौ निधियों का फल पाता है, ऐसा चालीसा कहती है।

रूप विशाल कठिन दुख मोचन।क्रोध कराल लाल दुहुँ लोचन ॥१४॥

अर्थ: आपका रूप विशाल है और कठिन दुखों से छुड़ाने वाला है; क्रोध भयंकर है और दोनों आँखें लाल हैं।

अगणित भूत प्रेत संग डोलत।बं बं बं शिव बं बं बोलत ॥१५॥

अर्थ: अनगिनत भूत-प्रेत आपके साथ घूमते हैं और “बं बं बं शिव बं बं” बोलते हैं।

रुद्रकाय काली के लाला।महा कालहू के हो काला ॥१६॥

अर्थ: रुद्र जैसे शरीर वाले, काली के लाल, आप महाकाल के भी काल हैं।

बटुक नाथ हो काल गँभीरा।श्वेत रक्त अरु श्याम शरीरा ॥१७॥

अर्थ: आप बटुकनाथ हैं और गंभीर काल भी; आपके शरीर के श्वेत, रक्त और श्याम, तीन वर्ण हैं।

करत नीनहूँ रूप प्रकाशा।भरत सुभक्तन कहँ शुभ आशा ॥१८॥

अर्थ: आप (इन) तीनों रूपों को प्रकट करते हैं और अच्छे भक्तों के मन में शुभ आशा भरते हैं। (“नीनहूँ” को यहाँ “तीनहूँ”, यानी तीनों, समझा गया है; पाठभेद देखें।)

रत्न जड़ित कंचन सिंहासन।व्याघ्र चर्म शुचि नर्म सुआनन ॥१९॥

अर्थ: आप रत्नों से जड़े सोने के सिंहासन पर, पवित्र और कोमल बाघ की खाल पर विराजते हैं; आपका मुख सुंदर है।

तुमहि जाइ काशिहिं जन ध्यावहिं।विश्वनाथ कहँ दर्शन पावहिं ॥२०॥

अर्थ: लोग काशी जाकर आपका ध्यान करते हैं और (फिर) विश्वनाथ के दर्शन पाते हैं।

जय प्रभु संहारक सुनन्द जय।जय उन्नत हर उमा नन्द जय ॥२१॥

अर्थ: हे प्रभु, संहार करने वाले, सुनंद, उन्नत, हर और उमा को आनंद देने वाले, आपकी जय हो। (यहाँ से चौपाई 28 तक भैरव के अनेक नामों और रूपों की जय-जयकार है; इनमें संहार, भीषण, क्रोध, चंड जैसे नाम भैरव के आठ प्रसिद्ध रूपों से मिलते हैं।)

भीम त्रिलोचन स्वान साथ जय।वैजनाथ श्री जगतनाथ जय ॥२२॥

अर्थ: भीम (भयंकर), तीन नेत्रों वाले, कुत्ते को साथ रखने वाले, वैद्यनाथ और श्री जगन्नाथ, आपकी जय हो।

महा भीम भीषण शरीर जय।रुद्र त्र्यम्बक धीर वीर जय ॥२३॥

अर्थ: महाभीम, भीषण शरीर वाले, रुद्र, त्र्यंबक (तीन नेत्रों वाले), धीर और वीर, आपकी जय हो।

अश्वनाथ जय प्रेतनाथ जय।स्वानारुढ़ सयचंद्र नाथ जय ॥२४॥

अर्थ: अश्वनाथ, प्रेतों के नाथ, कुत्ते पर सवार और चंद्र को धारण करने वाले नाथ, आपकी जय हो। (“सयचंद्र” शब्द पाठ में अस्पष्ट है।)

निमिष दिगंबर चक्रनाथ जय।गहत अनाथन नाथ हाथ जय ॥२५॥

अर्थ: निमिष, दिगंबर, चक्रनाथ, और अनाथों का हाथ थामने वाले नाथ, आपकी जय हो।

त्रेशलेश भूतेश चंद्र जय।क्रोध वत्स अमरेश नन्द जय ॥२६॥

अर्थ: भूतों के स्वामी, चंद्रधारी, क्रोध, वत्स और अमरेश (देवताओं के स्वामी) रूपों वाले, आपकी जय हो। (“त्रेशलेश” शब्द पाठ में अस्पष्ट है।)

श्री वामन नकुलेश चण्ड जय।कृत्याऊ कीरति प्रचण्ड जय ॥२७॥

अर्थ: श्री वामन, नकुलेश, चंड और प्रचंड कीर्ति वाले, आपकी जय हो। (“कृत्याऊ” शब्द पाठ में अस्पष्ट है।)

रुद्र बटुक क्रोधेश कालधर।चक्र तुण्ड दश पाणिव्याल धर ॥२८॥

अर्थ: आप रुद्र, बटुक, क्रोधेश और काल को धारण करने वाले हैं; आप चक्रतुंड, दस हाथों वाले और सर्पों को धारण करने वाले हैं।

करि मद पान शम्भु गुणगावत।चौंसठ योगिन संग नचावत ॥२९॥

अर्थ: आप मद (मदिरा) पीकर शंभु के गुण गाते हैं और चौंसठ योगिनियों को अपने संग नचाते हैं। (यह भैरव के उग्र, तांत्रिक परंपरा वाले रूप का वर्णन है।)

करत कृपा जन पर बहु ढंगा।काशी कोतवाल अड़बंगा ॥३०॥

अर्थ: काशी के अनोखे, मस्तमौला कोतवाल अपने भक्तों पर अनेक प्रकार से कृपा करते हैं।

देयँ काल भैरव जब सोटा।नसै पाप मोटा से मोटा ॥३१॥

अर्थ: जब काल भैरव अपना दंड देते हैं, तो बड़े से बड़ा पाप भी नष्ट हो जाता है, ऐसा चालीसा कहती है।

जनकर निर्मल होय शरीरा।मिटै सकल संकट भव पीरा ॥३२॥

अर्थ: (उससे) भक्त का शरीर निर्मल होता है और संसार के सब संकट और पीड़ाएँ मिटती हैं।

श्री भैरव भूतोंके राजा।बाधा हरत करत शुभ काजा ॥३३॥

अर्थ: श्री भैरव भूतों के राजा हैं; वे बाधाएँ हरते हैं और शुभ काम करते हैं।

ऐलादी के दुःख निवारयो।सदा कृपाकरि काज सम्हारयो ॥३४॥

अर्थ: आपने ऐलादी (एक भक्त) के दुख दूर किए, और सदा कृपा करके उसके काम सँभाले। (ऐलादी कौन थे, यह पाठ से स्पष्ट नहीं।)

सुन्दर दास सहित अनुरागा।श्री दुर्वासा निकट प्रयागा ॥३५॥

अर्थ: प्रयाग के पास दुर्वासा (आश्रम) के निकट रहने वाले सुन्दरदास ने प्रेम के साथ —

श्री भैरव जी की जय लेख्यो।सकल कामना पूरण देख्यो ॥३६॥

अर्थ: — श्री भैरव जी की जय लिखी, और (उनकी कृपा से) अपनी सब कामनाएँ पूरी होती देखीं।

जय जय जय भैरव बटुक स्वामी संकट टार।कृपा दास पर कीजिए शंकर के अवतार॥

अर्थ: हे स्वामी बटुक भैरव, आपकी जय हो, जय हो, जय हो; संकट टालिए। हे शंकर के अवतार, इस दास पर कृपा कीजिए।

हर चौपाई का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।

परिचय

भैरव चालीसा शिव के उग्र रूप भैरव जी की स्तुति है, जो “श्री गणपति गुरु गौरि पद” दोहे से शुरू होती है। इसमें दो आरंभिक दोहे, छत्तीस चौपाइयाँ और अंत में एक दोहा है। चालीसा भैरव को काली का लाल और काशी का कोतवाल कहती है, बटुक भैरव और काल भैरव जैसे उनके रूपों की जय बोलती है, और उनके श्वेत, रक्त और श्याम, तीन वर्णों का वर्णन करती है।

चौपाई 35 में कवि अपना नाम सुन्दरदास और स्थान प्रयाग के पास दुर्वासा आश्रम के निकट बताता है। चौपाई 21 से 28 में भैरव के अनेक नाम एक साथ आते हैं; इनमें से कुछ शब्द सभी उपलब्ध पाठों में अस्पष्ट हैं, इसलिए उन्हें बदला नहीं गया और उनका अर्थ सावधानी से दिया गया है।

चौपाई-वार अर्थ

  1. दोहा श्री गणपति गुरु गौरि पद प्रेम सहित धरि माथ…

    श्री गणपति, गुरु और माँ गौरी के चरणों में प्रेम से सिर रखकर, मैं शिव-स्वरूप श्री भैरवनाथ की वंदना में यह चालीसा कहता हूँ।

  2. दोहा श्री भैरव संकट हरण मंगल करण कृपाल…

    श्री भैरव संकट हरने वाले, मंगल करने वाले और कृपालु हैं। उनका रंग श्याम है, शरीर विकराल है और आँखें लाल और बड़ी हैं।

  3. चौपाई १ जय जय श्री काली के लाला…

    माँ काली के प्यारे पुत्र श्री भैरव की जय हो; काशी के कोतवाल (रक्षक) की जय हो, जय हो।

  4. चौपाई २ जयति बटुक-भैरव भय हारी…

    भय हरने वाले बटुक भैरव की जय हो; बलवान काल भैरव की जय हो।

  5. चौपाई ३ जयति नाथ-भैरव विख्याता…

    प्रसिद्ध नाथ भैरव की जय हो; सुख देने वाले सर्व भैरव की जय हो।

  6. चौपाई ४ भैरव रूप कियो शिव धारण…

    संसार का भार उतारने के लिए शिव ने भैरव रूप धारण किया।

  7. चौपाई ५ भैरव रव सुनि ह्वै भय दूरी…

    भैरव की गर्जना सुनकर भय दूर हो जाता है और हर तरह से कामनाएँ पूरी होती हैं, ऐसा चालीसा कहती है।

  8. चौपाई ६ शेष महेश आदि गुण गायो…

    शेषनाग, महेश आदि ने आपके गुण गाए; आप काशी के कोतवाल कहलाए।

  9. चौपाई ७ जटा जूट शिर चंद्र विराजत…

    सिर पर जटाओं का जूड़ा है और उस पर चंद्रमा विराजता है; कानों के गहने, मुकुट और बाजूबंद शोभा देते हैं।

  10. चौपाई ८ कटि करधनी घूँघरू बाजत…

    कमर में करधनी है और घुँघरू बजते हैं; आपके दर्शन करते ही सब भय भाग जाते हैं।

  11. चौपाई ९ जीवन दान दास को दीन्ह्यो…

    आपने इस दास को जीवन-दान दिया; हे नाथ, आपने कृपा की और मुझे अपना जाना।

  12. चौपाई १० वसि रसना बनि सारद-काली…

    आपने शारदा और काली बनकर मेरी जीभ पर वास किया, यानी वाणी दी; वर दिया और मेरी लाज रखी।

  13. चौपाई ११ धन्य धन्य भैरव भय भंजन…

    भय का नाश करने वाले भैरव धन्य हैं, धन्य हैं; मन को आनंद देने वाले और दुष्टों के दल का नाश करने वाले की जय हो।

  14. चौपाई १२ कर त्रिशूल डमरू शुचि कोड़ा…

    आपके हाथों में त्रिशूल, डमरू और पवित्र कोड़ा है; आपकी कृपा भरी दृष्टि और सुयश थोड़ा नहीं, अपार है।

  15. चौपाई १३ जो भैरव निर्भय गुण गावत…

    जो निर्भय होकर भैरव के गुण गाता है, वह आठ सिद्धियों और नौ निधियों का फल पाता है, ऐसा चालीसा कहती है।

  16. चौपाई १४ रूप विशाल कठिन दुख मोचन…

    आपका रूप विशाल है और कठिन दुखों से छुड़ाने वाला है; क्रोध भयंकर है और दोनों आँखें लाल हैं।

  17. चौपाई १५ अगणित भूत प्रेत संग डोलत…

    अनगिनत भूत-प्रेत आपके साथ घूमते हैं और “बं बं बं शिव बं बं” बोलते हैं।

  18. चौपाई १६ रुद्रकाय काली के लाला…

    रुद्र जैसे शरीर वाले, काली के लाल, आप महाकाल के भी काल हैं।

  19. चौपाई १७ बटुक नाथ हो काल गँभीरा…

    आप बटुकनाथ हैं और गंभीर काल भी; आपके शरीर के श्वेत, रक्त और श्याम, तीन वर्ण हैं।

  20. चौपाई १८ करत नीनहूँ रूप प्रकाशा…

    आप (इन) तीनों रूपों को प्रकट करते हैं और अच्छे भक्तों के मन में शुभ आशा भरते हैं। (“नीनहूँ” को यहाँ “तीनहूँ”, यानी तीनों, समझा गया है; पाठभेद देखें।)

  21. चौपाई १९ रत्न जड़ित कंचन सिंहासन…

    आप रत्नों से जड़े सोने के सिंहासन पर, पवित्र और कोमल बाघ की खाल पर विराजते हैं; आपका मुख सुंदर है।

  22. चौपाई २० तुमहि जाइ काशिहिं जन ध्यावहिं…

    लोग काशी जाकर आपका ध्यान करते हैं और (फिर) विश्वनाथ के दर्शन पाते हैं।

  23. चौपाई २१ जय प्रभु संहारक सुनन्द जय…

    हे प्रभु, संहार करने वाले, सुनंद, उन्नत, हर और उमा को आनंद देने वाले, आपकी जय हो। (यहाँ से चौपाई 28 तक भैरव के अनेक नामों और रूपों की जय-जयकार है; इनमें संहार, भीषण, क्रोध, चंड जैसे नाम भैरव के आठ प्रसिद्ध रूपों से मिलते हैं।)

  24. चौपाई २२ भीम त्रिलोचन स्वान साथ जय…

    भीम (भयंकर), तीन नेत्रों वाले, कुत्ते को साथ रखने वाले, वैद्यनाथ और श्री जगन्नाथ, आपकी जय हो।

  25. चौपाई २३ महा भीम भीषण शरीर जय…

    महाभीम, भीषण शरीर वाले, रुद्र, त्र्यंबक (तीन नेत्रों वाले), धीर और वीर, आपकी जय हो।

  26. चौपाई २४ अश्वनाथ जय प्रेतनाथ जय…

    अश्वनाथ, प्रेतों के नाथ, कुत्ते पर सवार और चंद्र को धारण करने वाले नाथ, आपकी जय हो। (“सयचंद्र” शब्द पाठ में अस्पष्ट है।)

  27. चौपाई २५ निमिष दिगंबर चक्रनाथ जय…

    निमिष, दिगंबर, चक्रनाथ, और अनाथों का हाथ थामने वाले नाथ, आपकी जय हो।

  28. चौपाई २६ त्रेशलेश भूतेश चंद्र जय…

    भूतों के स्वामी, चंद्रधारी, क्रोध, वत्स और अमरेश (देवताओं के स्वामी) रूपों वाले, आपकी जय हो। (“त्रेशलेश” शब्द पाठ में अस्पष्ट है।)

  29. चौपाई २७ श्री वामन नकुलेश चण्ड जय…

    श्री वामन, नकुलेश, चंड और प्रचंड कीर्ति वाले, आपकी जय हो। (“कृत्याऊ” शब्द पाठ में अस्पष्ट है।)

  30. चौपाई २८ रुद्र बटुक क्रोधेश कालधर…

    आप रुद्र, बटुक, क्रोधेश और काल को धारण करने वाले हैं; आप चक्रतुंड, दस हाथों वाले और सर्पों को धारण करने वाले हैं।

  31. चौपाई २९ करि मद पान शम्भु गुणगावत…

    आप मद (मदिरा) पीकर शंभु के गुण गाते हैं और चौंसठ योगिनियों को अपने संग नचाते हैं। (यह भैरव के उग्र, तांत्रिक परंपरा वाले रूप का वर्णन है।)

  32. चौपाई ३० करत कृपा जन पर बहु ढंगा…

    काशी के अनोखे, मस्तमौला कोतवाल अपने भक्तों पर अनेक प्रकार से कृपा करते हैं।

  33. चौपाई ३१ देयँ काल भैरव जब सोटा…

    जब काल भैरव अपना दंड देते हैं, तो बड़े से बड़ा पाप भी नष्ट हो जाता है, ऐसा चालीसा कहती है।

  34. चौपाई ३२ जनकर निर्मल होय शरीरा…

    (उससे) भक्त का शरीर निर्मल होता है और संसार के सब संकट और पीड़ाएँ मिटती हैं।

  35. चौपाई ३३ श्री भैरव भूतोंके राजा…

    श्री भैरव भूतों के राजा हैं; वे बाधाएँ हरते हैं और शुभ काम करते हैं।

  36. चौपाई ३४ ऐलादी के दुःख निवारयो…

    आपने ऐलादी (एक भक्त) के दुख दूर किए, और सदा कृपा करके उसके काम सँभाले। (ऐलादी कौन थे, यह पाठ से स्पष्ट नहीं।)

  37. चौपाई ३५ सुन्दर दास सहित अनुरागा…

    प्रयाग के पास दुर्वासा (आश्रम) के निकट रहने वाले सुन्दरदास ने प्रेम के साथ —

  38. चौपाई ३६ श्री भैरव जी की जय लेख्यो…

    — श्री भैरव जी की जय लिखी, और (उनकी कृपा से) अपनी सब कामनाएँ पूरी होती देखीं।

  39. दोहा जय जय जय भैरव बटुक स्वामी संकट टार…

    हे स्वामी बटुक भैरव, आपकी जय हो, जय हो, जय हो; संकट टालिए। हे शंकर के अवतार, इस दास पर कृपा कीजिए।

विषय और भावार्थ

भैरव चालीसा शिव के उस रूप की स्तुति है जिसे काशी का रक्षक, यानी कोतवाल, माना जाता है। चालीसा कहती है कि शिव ने संसार का भार उतारने के लिए भैरव रूप धारण किया। उनका रूप विकराल है — श्याम वर्ण, लाल आँखें, हाथों में त्रिशूल, डमरू और कोड़ा, साथ में भूत-प्रेत — पर भक्त के लिए वे कृपालु, भय हरने वाले और मंगल करने वाले हैं।

बीच में कवि अपना अनुभव भी कहता है: भैरव ने उसे जीवन-दान दिया, वाणी दी और उसकी लाज रखी। फिर बटुक, काल, नाथ और सर्व भैरव जैसे रूपों और अनेक नामों की जय-जयकार है, और यह बात कि काशी जाकर भैरव का ध्यान करने वाले विश्वनाथ के दर्शन पाते हैं।

अंत में चालीसा कहती है कि भैरव के दंड से बड़े-बड़े पाप नष्ट होते हैं और भक्त निर्मल होता है। अंतिम दोहे में भक्त शंकर के अवतार बटुक भैरव से संकट टालने और कृपा करने की प्रार्थना करता है। उग्र रूप के पीछे इस चालीसा का भाव रक्षा और कृपा का है।

कठिन शब्दों के अर्थ

लाला
प्यारा पुत्र
कुतवाला, कोतवाल
नगर का रक्षक
बटुक
बालक; भैरव का बाल रूप
रव
गर्जना, ध्वनि
बाला
कान का गहना
बिजायठ
बाँह पर पहनने का गहना, बाजूबंद
करधनी
कमर का गहना
रसना
जीभ
सारद
शारदा, सरस्वती
लाली
लाज, प्रतिष्ठा
कोड़ा
चाबुक
कटाक्ष
तिरछी दृष्टि; यहाँ कृपा भरी दृष्टि
अष्टसिद्धि
आठ सिद्धियाँ
नव निधि
नौ निधियाँ, अपार संपदा
कराल
भयानक
रुद्रकाय
रुद्र जैसे शरीर वाले
व्याघ्र चर्म
बाघ की खाल
सुआनन
सुंदर मुख
स्वान
कुत्ता, भैरव का वाहन
त्रिलोचन, त्र्यम्बक
तीन नेत्रों वाले
दिगंबर
दिशाएँ ही जिनका वस्त्र हैं
व्याल
सर्प
मद
मदिरा
अड़बंगा
अनोखे, मस्तमौला
सोटा
डंडा, दंड
लेख्यो
लिखा

फलश्रुति

चौपाई 5, 13, 31 और 32 इस चालीसा की फलश्रुति कहती हैं। चालीसा के अपने वचनों में: भैरव की गर्जना सुनकर भय दूर होता है, निर्भय होकर उनके गुण गाने वाला सिद्धि और निधि का फल पाता है, और उनके दंड से बड़े पाप नष्ट होकर भक्त निर्मल होता है। ये पाठ के वचन हैं; यहाँ इन्हें उसी रूप में दिया गया है।

भैरव रव सुनि ह्वै भय दूरी।
सब विधि होय कामना पूरी॥

भैरव की गर्जना सुनकर भय दूर हो जाता है और हर तरह से कामनाएँ पूरी होती हैं, ऐसा चालीसा कहती है।

जो भैरव निर्भय गुण गावत।
अष्टसिद्धि नव निधि फल पावत॥

जो निर्भय होकर भैरव के गुण गाता है, वह आठ सिद्धियों और नौ निधियों का फल पाता है, ऐसा चालीसा कहती है।

देयँ काल भैरव जब सोटा।
नसै पाप मोटा से मोटा॥

जब काल भैरव अपना दंड देते हैं, तो बड़े से बड़ा पाप भी नष्ट हो जाता है, ऐसा चालीसा कहती है।

जनकर निर्मल होय शरीरा।
मिटै सकल संकट भव पीरा॥

(उससे) भक्त का शरीर निर्मल होता है और संसार के सब संकट और पीड़ाएँ मिटती हैं।

यह चालीसा कब पढ़ी जाता है

  • कालाष्टमी (हर महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमी) पर
  • काल भैरव जयंती पर
  • भैरव जी की साप्ताहिक पूजा में
  • काशी में काल भैरव के दर्शन के समय

पढ़ने की विधि

  • भैरव जी के चित्र या मूर्ति के सामने दीपक जलाकर पढ़ें; परंपरा में सरसों के तेल का दीपक प्रचलित है।
  • पहले गणेश, गुरु और गौरी को प्रणाम करें, जैसा पहला दोहा करता है।
  • चौपाई 21 से 28 के नामों को धीरे-धीरे, जय-जयकार की तरह पढ़ें।
  • भैरव जी का वाहन कुत्ता माना जाता है, इसलिए कई लोग पूजा के बाद कुत्ते को रोटी खिलाते हैं। यह लोक-परंपरा है, पाठ का कोई नियम नहीं।

पारंपरिक महत्व

भैरव शिव का उग्र रूप हैं। परंपरा में काल भैरव को काशी का कोतवाल माना जाता है, और यह चालीसा भी उन्हें बार-बार “काशी-कोतवाल” कहती है। इसलिए काशी के भक्तों में भैरव की उपासना विश्वनाथ की उपासना के साथ जुड़ी है, जैसा चौपाई 20 में है।

चालीसा भैरव के बटुक (बाल) रूप और काल भैरव, दोनों की जय बोलती है और उन्हें शिव का ही रूप मानती है। कालाष्टमी और काल भैरव जयंती पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है।

भैरव का रूप डरावना कहा गया है, पर चालीसा का भाव भक्त के लिए रक्षा और कृपा का है: वे भय हरते हैं, संकट टालते हैं और अनाथों का हाथ पकड़ते हैं।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
चौपाई 18करत तीनहूँ रूप प्रकाशासभी उपलब्ध पाठों (sanskritdocuments.org, भारतडिस्कवरी, भक्ति भारत) में “नीनहूँ” है, इसलिए यहाँ वही रखा गया। पिछली चौपाई के श्वेत, रक्त और श्याम रूपों के संदर्भ में यह “तीनहूँ” (तीनों) की पुरानी छपाई-भूल लगती है; अर्थ उसी के अनुसार दिया गया है।
चौपाई 5भैरव रव सुनि हवै भय दूरीभारतडिस्कवरी और भक्ति भारत में “ह्वै” (हो जाता है) की जगह “हवै”।
चौपाई 15बम बम बम शिव बम बम बोलतभारतडिस्कवरी और भक्ति भारत में “बं” की जगह “बम”; उच्चारण वही है।
चौपाई 21 से 28सयचंद्र, त्रेशलेश, कृत्याऊभैरव के नामों वाली इन चौपाइयों के ये शब्द सभी उपलब्ध पाठों में ऐसे ही हैं और अस्पष्ट हैं; हो सकता है मूल छपाई में भूल रही हो। इन्हें बदला नहीं गया।
दूसरी चालीसाएँजय डमरूधर नयन विशाला …शुभ पंचांग और द्रिक पंचांग जैसे स्रोतों पर भैरव जी की दूसरी चालीसाएँ भी मिलती हैं; वे अलग रचनाएँ हैं।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
सुन्दरदास
भाषा
हिन्दी

नाम चालीसा की अपनी पंक्तियों (चौपाई 35–36) से, जहाँ कवि स्वयं को प्रयाग के पास दुर्वासा आश्रम के निकट का बताता है; sanskritdocuments.org भी रचयिता सुन्दरदास देता है। इसके अलावा कवि के बारे में कुछ ज्ञात नहीं।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): sanskritdocuments.org का पाठ भारतडिस्कवरी और भक्ति भारत के पाठ से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया; तीनों में वही दोहे और छत्तीस चौपाइयाँ एक ही क्रम में हैं, अंतर केवल वर्तनी का है। पाठ sanskritdocuments से (वहाँ यह पाठ जाँचा हुआ नहीं बताया गया); चौपाई 12 का “कटाक्ष” भारतडिस्कवरी से (sanskritdocuments में “कटाक्श”)। चौपाई 18 का “नीनहूँ” और चौपाई 21–28 के कुछ नाम सभी पाठों में अस्पष्ट हैं; उन्हें बदला नहीं गया, अर्थ में यह बताया गया है। sanskritdocuments के पृष्ठ पर चालीसा के बाद की आरती इसका भाग नहीं।

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भैरव जी के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

भैरव चालीसा किसने लिखी?

चौपाई 35 में कवि अपना नाम सुन्दरदास बताता है, जो प्रयाग के पास दुर्वासा आश्रम के निकट रहते थे। इसके अलावा उनके बारे में कुछ ज्ञात नहीं।

भैरव को काशी का कोतवाल क्यों कहते हैं?

परंपरा में काल भैरव काशी के रक्षक माने जाते हैं, जैसे नगर का कोतवाल। चालीसा भी उन्हें बार-बार काशी-कोतवाल कहती है और बताती है कि काशी में उनका ध्यान करने वाले विश्वनाथ के दर्शन पाते हैं।

बटुक भैरव और काल भैरव में क्या अंतर है?

बटुक भैरव भैरव का बाल रूप है और काल भैरव उनका उग्र रूप। यह चालीसा दोनों की जय बोलती है और दोनों को शिव का ही रूप मानती है।

भैरव चालीसा कब पढ़ें?

कालाष्टमी, काल भैरव जयंती और भैरव जी की साप्ताहिक पूजा में इसे पढ़ा जाता है। कोई तय संख्या आवश्यक नहीं; श्रद्धा से पढ़ना पर्याप्त है।

इसमें छत्तीस ही चौपाइयाँ क्यों हैं?

सभी उपलब्ध पाठों में दो आरंभिक दोहे, छत्तीस चौपाइयाँ और अंत में एक दोहा है। “चालीसा” इस शैली का नाम है; हर चालीसा में ठीक चालीस चौपाइयाँ होना आवश्यक नहीं।

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पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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