शिव पूजा विधि
शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

देवराजसेव्यमानपावनाङ्घ्रिपङ्कजंव्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम् ।नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगम्बरंकाशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥१॥
devarājasevyamānapāvanāṅghripaṅkajaṃ
vyālayajñasūtraminduśekharaṃ kṛpākaram |
nāradādiyogivṛndavanditaṃ digambaraṃ
kāśikāpurādhināthakālabhairavaṃ bhaje ||
अर्थ: जिनके पवित्र चरण-कमलों की सेवा देवराज इन्द्र करते हैं, जो सर्प को यज्ञोपवीत की तरह पहनते हैं, सिर पर चन्द्रमा धारण करते हैं, कृपा के भंडार हैं, नारद आदि योगियों के समूह जिनकी वन्दना करते हैं और जो दिगम्बर हैं, काशी नगरी के स्वामी उन काल भैरव को मैं भजता हूँ।
भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परंनीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम् ।कालकालमम्बुजाक्षमक्षशूलमक्षरंकाशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥२॥
bhānukoṭibhāsvaraṃ bhavābdhitārakaṃ paraṃ
nīlakaṇṭhamīpsitārthadāyakaṃ trilocanam |
kālakālamambujākṣamakṣaśūlamakṣaraṃ
kāśikāpurādhināthakālabhairavaṃ bhaje ||
अर्थ: जो करोड़ों सूर्यों के समान चमकते हैं, संसार-सागर से पार उतारने वाले परमेश्वर हैं, जिनका कण्ठ नीला है, जो मनचाहा फल देते हैं और तीन नेत्रों वाले हैं, जो काल के भी काल हैं, कमल जैसे नेत्रों वाले हैं, जिनके हाथ में अक्षमाला और शूल है और जो अविनाशी हैं, काशी के स्वामी उन काल भैरव को मैं भजता हूँ।
शूलटङ्कपाशदण्डपाणिमादिकारणंश्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् ।भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियंकाशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥३॥
śūlaṭaṅkapāśadaṇḍapāṇimādikāraṇaṃ
śyāmakāyamādidevamakṣaraṃ nirāmayam |
bhīmavikramaṃ prabhuṃ vicitratāṇḍavapriyaṃ
kāśikāpurādhināthakālabhairavaṃ bhaje ||
अर्थ: जिनके हाथों में शूल, टंक (फरसा), पाश और दण्ड हैं, जो सबके आदि कारण हैं, जिनका शरीर श्याम वर्ण का है, जो आदिदेव, अविनाशी और हर रोग-दोष से रहित हैं, जिनका पराक्रम भयंकर है, जो प्रभु हैं और जिन्हें अद्भुत ताण्डव प्रिय है, काशी के स्वामी उन काल भैरव को मैं भजता हूँ।
भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहंभक्तवत्सलं स्थिरं समस्तलोकविग्रहम् ।विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिंकाशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥४॥
bhuktimuktidāyakaṃ praśastacāruvigrahaṃ
bhaktavatsalaṃ sthiraṃ samastalokavigraham |
vinikvaṇanmanojñahemakiṅkiṇīlasatkaṭiṃ
kāśikāpurādhināthakālabhairavaṃ bhaje ||
अर्थ: जो भोग और मोक्ष दोनों देते हैं, जिनका रूप सुन्दर और प्रशंसनीय है, जो भक्तों पर स्नेह रखते हैं, स्थिर हैं और समस्त लोक जिनका ही रूप है, जिनकी कमर में सोने की करधनी के घुँघरू मधुर ध्वनि करते हैं, काशी के स्वामी उन काल भैरव को मैं भजता हूँ।
धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशकंकर्मपाशमोचकं सुशर्मदायकं विभुम् ।स्वर्णवर्णकेशपाशशोभिताङ्गमण्डलंकाशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥५॥
dharmasetupālakaṃ tvadharmamārganāśakaṃ
karmapāśamocakaṃ suśarmadāyakaṃ vibhum |
svarṇavarṇakeśapāśaśobhitāṅgamaṇḍalaṃ
kāśikāpurādhināthakālabhairavaṃ bhaje ||
अर्थ: जो धर्म रूपी सेतु की रक्षा करते हैं और अधर्म के मार्ग का नाश करते हैं, जो कर्मों के बंधन से छुड़ाते हैं, सच्चा सुख देते हैं और सर्वव्यापी हैं, जिनका अंग-मंडल सुनहरे केशों से शोभित है, काशी के स्वामी उन काल भैरव को मैं भजता हूँ।
रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकंनित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरञ्जनम् ।मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षदंकाशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥६॥
ratnapādukāprabhābhirāmapādayugmakaṃ
nityamadvitīyamiṣṭadaivataṃ nirañjanam |
mṛtyudarpanāśanaṃ karāladaṃṣṭramokṣadaṃ
kāśikāpurādhināthakālabhairavaṃ bhaje ||
अर्थ: जिनके दोनों चरण रत्नजड़ित पादुकाओं की चमक से सुन्दर लगते हैं, जो नित्य, अद्वितीय, इष्टदेव और निर्मल हैं, जो मृत्यु के अभिमान को तोड़ते हैं, जिनके दाँत विकराल हैं और जो मोक्ष देने वाले हैं, काशी के स्वामी उन काल भैरव को मैं भजता हूँ।
अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसन्ततिंदृष्टिपातनष्टपापजालमुग्रशासनम् ।अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरंकाशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥७॥
aṭṭahāsabhinnapadmajāṇḍakośasantatiṃ
dṛṣṭipātanaṣṭapāpajālamugraśāsanam |
aṣṭasiddhidāyakaṃ kapālamālikādharaṃ
kāśikāpurādhināthakālabhairavaṃ bhaje ||
अर्थ: जिनके अट्टहास से ब्रह्मा के रचे ब्रह्माण्डों की पंक्तियाँ फट जाती हैं, जिनकी एक दृष्टि से पापों का जाल नष्ट हो जाता है, जिनका शासन कठोर है, जो आठों सिद्धियाँ देते हैं और कपालों की माला धारण करते हैं, काशी के स्वामी उन काल भैरव को मैं भजता हूँ।
भूतसङ्घनायकं विशालकीर्तिदायकंकाशिवासिलोकपुण्यपापशोधकं विभुम् ।नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिंकाशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥८॥
bhūtasaṅghanāyakaṃ viśālakīrtidāyakaṃ
kāśivāsilokapuṇyapāpaśodhakaṃ vibhum |
nītimārgakovidaṃ purātanaṃ jagatpatiṃ
kāśikāpurādhināthakālabhairavaṃ bhaje ||
अर्थ: जो भूत-गणों के नायक हैं, बड़ी कीर्ति देने वाले हैं, काशी में रहने वाले लोगों के पुण्य और पाप का शोधन करने वाले सर्वव्यापी प्रभु हैं, जो नीति के मार्ग के ज्ञाता, पुरातन और जगत के स्वामी हैं, काशी के स्वामी उन काल भैरव को मैं भजता हूँ।
कालभैरवाष्टकं पठन्ति ये मनोहरंज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम् ।शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनंप्रयान्ति कालभैरवाङ्घ्रिसन्निधिं नरा ध्रुवम् ॥९॥
kālabhairavāṣṭakaṃ paṭhanti ye manoharaṃ
jñānamuktisādhanaṃ vicitrapuṇyavardhanam |
śokamohadainyalobhakopatāpanāśanaṃ
prayānti kālabhairavāṅghrisannidhiṃ narā dhruvam ||
अर्थ: यह श्लोक कहता है कि जो लोग ज्ञान और मुक्ति के साधन, अनेक प्रकार के पुण्य बढ़ाने वाले, और शोक, मोह, दीनता, लोभ, क्रोध तथा ताप का नाश करने वाले इस मनोहर कालभैरवाष्टक का पाठ करते हैं, वे निश्चय ही काल भैरव के चरणों का सान्निध्य पाते हैं।
इति श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचितं कालभैरवाष्टकं सम्पूर्णम् ।
iti śrīmacchaṅkarācārya viracitaṃ kālabhairavāṣṭakaṃ sampūrṇam |
अर्थ: इस प्रकार श्री शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाने वाला कालभैरवाष्टक पूरा हुआ।
कालभैरवाष्टकम् शिव के उग्र रूप काल भैरव की स्तुति है, जिन्हें काशी नगरी का स्वामी और रक्षक माना जाता है। आठों श्लोक एक ही पंक्ति पर समाप्त होते हैं: काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे, यानी काशी नगरी के स्वामी काल भैरव को मैं भजता हूँ।
स्तोत्र में भैरव का रूप उग्र भी है और करुणामय भी: हाथ में शूल, पाश और दण्ड, कपालों की माला, विकराल दाँत और अट्टहास, पर साथ ही भक्तों पर स्नेह, भोग और मोक्ष देने वाला, और कर्म-बंधन से छुड़ाने वाला। यह पञ्चचामर छन्द में है। परंपरा इसे आदि शंकराचार्य की रचना मानती है।
काल भैरव शिव का वह रूप हैं जो काल (समय और मृत्यु) के भी स्वामी हैं। काशी में मान्यता है कि वे नगरी के रक्षक हैं, इसलिए यह अष्टक हर श्लोक में उन्हें 'काशिकापुराधिनाथ', काशी के स्वामी, कहकर भजता है।
स्तोत्र उनका उग्र रूप छिपाता नहीं: श्याम शरीर, हाथों में शूल, फरसा, पाश और दण्ड, कपालों की माला, विकराल दाँत, और ऐसा अट्टहास जिससे ब्रह्माण्ड फट जाएँ। पर उसी के साथ वे भक्तों पर स्नेह करने वाले, भोग और मोक्ष देने वाले, धर्म की मर्यादा के रक्षक और कर्म-बंधन से छुड़ाने वाले हैं। उनका भय अधर्म, पाप और मृत्यु के अभिमान के लिए है, भक्त के लिए नहीं।
नौवाँ श्लोक फलश्रुति है, जो इस अष्टक को ज्ञान और मुक्ति का साधन और शोक, मोह, लोभ और क्रोध को मिटाने वाला बताता है।
इस स्तोत्र की फलश्रुति कहती है कि यह मनोहर अष्टक ज्ञान और मुक्ति का साधन है, पुण्य बढ़ाता है और शोक, मोह, दीनता, लोभ, क्रोध और ताप को दूर करता है, और इसे पढ़ने वाले काल भैरव के चरणों का सान्निध्य पाते हैं। ये स्तोत्र के अपने शब्द हैं।
कालभैरवाष्टकं पठन्ति ये मनोहरं
ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम् ।
शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनं
प्रयान्ति कालभैरवाङ्घ्रिसन्निधिं नरा ध्रुवम् ॥यह श्लोक कहता है कि जो लोग ज्ञान और मुक्ति के साधन, अनेक प्रकार के पुण्य बढ़ाने वाले, और शोक, मोह, दीनता, लोभ, क्रोध तथा ताप का नाश करने वाले इस मनोहर कालभैरवाष्टक का पाठ करते हैं, वे निश्चय ही काल भैरव के चरणों का सान्निध्य पाते हैं।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| श्लोक 1 | नारदादियोगिबृन्दवन्दितं | stotranidhi.com और vignanam.org में 'वृन्द' की जगह 'बृन्द' लिखा है; अर्थ वही है। |
| श्लोक 4 | भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम् | sanskritdocuments.org का मुख्य पाठ; वहीं 'स्थिरम्' दूसरा पाठ है, और stotranidhi.com और vignanam.org दोनों 'स्थिरं' पढ़ते हैं, इसलिए वही रखा गया। |
| श्लोक 4 | निक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं | stotranidhi.com और vignanam.org का पाठ। यहाँ sanskritdocuments.org का 'विनिक्वणन्' रखा गया, क्योंकि पञ्चचामर छन्द के सोलह अक्षर उसी से पूरे होते हैं। |
| श्लोक 5 | त्वधर्ममार्गनाशनं | sanskritdocuments.org और vignanam.org पर दूसरे पाठ के रूप में। |
| श्लोक 5 | स्वर्णवर्णशेषपाशशोभिताङ्गमण्डलं | sanskritdocuments.org का मुख्य पाठ (सुनहरे सर्प-पाश से शोभित); वहीं 'केशपाश' दूसरा पाठ है, जो stotranidhi.com और vignanam.org में भी है, इसलिए वही रखा गया। |
| श्लोक 5 | स्वर्णवर्णकेशपाशशोभिताङ्गनिर्मलं | stotranidhi.com का पाठ। |
| श्लोक 6 | मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रभूषणं | stotranidhi.com का पाठ; sanskritdocuments.org और vignanam.org पर दूसरे पाठ के रूप में। |
| श्लोक 8 | काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं | sanskritdocuments.org का मुख्य पाठ; वहीं 'काशिवासि' दूसरा पाठ है, जो stotranidhi.com और vignanam.org में भी है, इसलिए वही रखा गया। |
| श्लोक 9 | ते प्रयान्ति कालभैरवाङ्घ्रिसन्निधिं ध्रुवम् | stotranidhi.com और vignanam.org का पाठ; sanskritdocuments.org पर भी दूसरे पाठ के रूप में। यहाँ मुख्य पाठ 'प्रयान्ति ... नरा ध्रुवम्' रखा गया, जो छन्द के अनुसार पूरा बैठता है। |
| श्लोक 9 | ज्ञानमुक्तिसाधकं ... शोकमोहलोभदैन्यकोपतापनाशनं | stotranidhi.com में 'साधकं', और vignanam.org में 'लोभदैन्य' का क्रम मिलता है। |
आदि शंकराचार्य की रचना मानी जाती है; sanskritdocuments.org के अनुसार यह शंकराचार्य की ग्रंथावली के खंड 18 में छपा है। फिर भी इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पाठ sanskritdocuments.org से लिया गया और हर पंक्ति stotranidhi.com और vignanam.org से मिलाई गई। मुख्य पाठ sanskritdocuments.org का है। तीन जगह (श्लोक 4 'स्थिरं', श्लोक 5 'केशपाश', श्लोक 8 'काशिवासि') वह दूसरा पाठ रखा गया जिसे sanskritdocuments.org स्वयं विकल्प के रूप में देता है और जो बाकी दोनों स्रोतों में है। श्लोक 4 'विनिक्वणन्' और श्लोक 9 'प्रयान्ति ... नरा ध्रुवम्' में मुख्य पाठ इसलिए रखा गया कि छन्द उसी से पूरा होता है। समापन वाक्य stotranidhi.com से है, क्योंकि sanskritdocuments.org के समापन में वर्तनी-भूल है।
शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
भैरव · आरती
जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा
भैरव · चालीसा
श्री गणपति गुरु गौरि पद प्रेम सहित धरि माथ
शिव · स्तोत्र · संस्कृत
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
शिव · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
महाशिवरात्रि पर घर में शिव पूजा: सुबह संकल्प, सेहत के अनुसार व्रत, रात में एक बार या चारों पहर की पूजा, जागरण, निशीथ काल और अगली सुबह पारण।
शिव · आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा
काल भैरव शिव का उग्र रूप हैं, जिन्हें काल का भी स्वामी कहा जाता है। काशी में उन्हें नगरी का रक्षक, 'काशी का कोतवाल', माना जाता है।
कालाष्टमी (हर महीने की कृष्ण अष्टमी) और काल भैरव जयंती (मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी) पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है। इसे किसी भी दिन शिव या भैरव की पूजा के साथ पढ़ा जा सकता है।
परंपरा इसे आदि शंकराचार्य की रचना मानती है और यह उनकी ग्रंथावली में छपा है। फिर भी इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
हाँ। यह स्तोत्र स्वयं भैरव को भक्तवत्सल, भोग-मोक्ष देने वाला और कृपा का भंडार कहता है; घर में श्रद्धा से इसका पाठ आम है।
काशिका यानी काशी, पुर यानी नगर और अधिनाथ यानी स्वामी। अर्थ है: काशी नगरी के स्वामी।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।