भैरव

आरती · भैरव

जय भैरव देवा

भैरव जी की आरती 'जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा', जिसमें बटुकनाथ रूप का वर्णन है: पूरा पाठ, सरल अर्थ, कठिन शब्द और पाठांतर।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. अंतरा-वार अर्थ
  4. भावार्थ
  5. कठिन शब्द
  6. फलश्रुति
  7. कब पढ़ें
  8. विधि
  9. पाठ-भेद
  10. रचयिता और स्रोत
  11. ये भी पढ़ें
  12. सवाल-जवाब
  13. सुधार सुझाएँ

जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा।जय काली और गौरा देवी कृत सेवा॥

अर्थ: हे भैरव देव, हे प्रभु, आपकी जय हो। माँ काली और गौरा (पार्वती) देवी भी जिनकी सेवा करती हैं, ऐसे आपकी जय हो।

तुम्ही पाप उद्धारक दुःख सिन्धु तारक।भक्तों के सुख कारक भीषण वपु धारक॥

॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा ॥

अर्थ: आप ही पापों से उद्धार करने वाले और दुःख के सागर से पार लगाने वाले हैं। आप भक्तों को सुख देने वाले हैं और भयंकर रूप धारण करते हैं।

वाहन श्वान विराजत कर त्रिशूल धारी।महिमा अमित तुम्हारी जय जय भयहारी॥

॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा ॥

अर्थ: श्वान (कुत्ता) आपका वाहन है और आप हाथ में त्रिशूल धारण करते हैं। आपकी महिमा अपार है; हे भय हरने वाले, आपकी जय हो।

तुम बिन देवा सेवा सफल नहीं होवे।चौमुख दीपक दर्शन दुःख खोवे॥

॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा ॥

अर्थ: आरती कहती है कि हे देव, आपके बिना कोई सेवा-पूजा सफल नहीं होती। चार मुख वाले दीपक के साथ आपके दर्शन से दुःख दूर हो जाते हैं।

तेल चटकि दधि मिश्रित भाषावलि तेरी।कृपा कीजिये भैरव, करिए नहीं देरी॥

॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा ॥

अर्थ: पहली पंक्ति तेल में चटकाए और दही मिले भोग की बात करती है; 'भाषावलि' शब्द सभी स्रोतों में इसी रूप में है, पर इसका ठीक अर्थ स्पष्ट नहीं है। हे भैरव, कृपा कीजिए, देर मत कीजिए।

पांव घुंघरु बाजत अरु डमरु डमकावत।बटुकनाथ बन बालक जन मन हरषावत॥

॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा ॥

अर्थ: आपके पाँवों में घुँघरू बजते हैं और आप डमरू बजाते हैं। बटुकनाथ बनकर, बालक रूप में, आप भक्तों का मन प्रसन्न करते हैं।

बटुकनाथ जी की आरती जो कोई नर गावे।कहें धरणीधर नर मनवांछित फल पावे॥

॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा ॥

अर्थ: आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि जो कोई बटुकनाथ जी की यह आरती गाता है, कवि धरणीधर के शब्दों में, वह मनचाहा फल पाता है।

हर अंतरे का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।

परिचय

'जय भैरव देवा' भगवान भैरव की आरती है, जो भैरव मंदिरों में और घर की भैरव-पूजा के अंत में गाई जाती है। आरती के अंतिम अंतरों में भैरव को 'बटुकनाथ' कहा गया है, यानी यह उनके बटुक (बालक) रूप की आरती है; कई स्रोत इसे काल भैरव की आरती के नाम से भी छापते हैं।

आरती में भैरव को पापों से उद्धार करने वाला, दुःख के सागर से पार लगाने वाला और भय हरने वाला कहा गया है। उनका वाहन श्वान (कुत्ता) है, हाथ में त्रिशूल है, पाँवों में घुँघरू बजते हैं और वे डमरू बजाते हैं।

अंतरा-वार अर्थ

  1. मुखड़ा जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा…

    हे भैरव देव, हे प्रभु, आपकी जय हो। माँ काली और गौरा (पार्वती) देवी भी जिनकी सेवा करती हैं, ऐसे आपकी जय हो।

  2. अंतरा १ तुम्ही पाप उद्धारक दुःख सिन्धु तारक…

    आप ही पापों से उद्धार करने वाले और दुःख के सागर से पार लगाने वाले हैं। आप भक्तों को सुख देने वाले हैं और भयंकर रूप धारण करते हैं।

  3. अंतरा २ वाहन श्वान विराजत कर त्रिशूल धारी…

    श्वान (कुत्ता) आपका वाहन है और आप हाथ में त्रिशूल धारण करते हैं। आपकी महिमा अपार है; हे भय हरने वाले, आपकी जय हो।

  4. अंतरा ३ तुम बिन देवा सेवा सफल नहीं होवे…

    आरती कहती है कि हे देव, आपके बिना कोई सेवा-पूजा सफल नहीं होती। चार मुख वाले दीपक के साथ आपके दर्शन से दुःख दूर हो जाते हैं।

  5. अंतरा ४ तेल चटकि दधि मिश्रित भाषावलि तेरी…

    पहली पंक्ति तेल में चटकाए और दही मिले भोग की बात करती है; 'भाषावलि' शब्द सभी स्रोतों में इसी रूप में है, पर इसका ठीक अर्थ स्पष्ट नहीं है। हे भैरव, कृपा कीजिए, देर मत कीजिए।

  6. अंतरा ५ पांव घुंघरु बाजत अरु डमरु डमकावत…

    आपके पाँवों में घुँघरू बजते हैं और आप डमरू बजाते हैं। बटुकनाथ बनकर, बालक रूप में, आप भक्तों का मन प्रसन्न करते हैं।

  7. अंतरा ६ बटुकनाथ जी की आरती जो कोई नर गावे…

    आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि जो कोई बटुकनाथ जी की यह आरती गाता है, कवि धरणीधर के शब्दों में, वह मनचाहा फल पाता है।

भावार्थ

भैरव शिव का उग्र रूप माने जाते हैं, पर यह आरती उनके भयंकर रूप को भक्तों के रक्षक के रूप में देखती है: वे पापों से उद्धार करते हैं, दुःख के सागर से पार लगाते हैं और भय हरते हैं। काली और गौरा भी उनकी सेवा करती हैं।

आरती के अंत में भैरव का कोमल रूप सामने आता है: पाँवों में घुँघरू और हाथ में डमरू लिए बटुकनाथ, जो बालक बनकर भक्तों का मन प्रसन्न करते हैं। इस तरह आरती उग्रता और कोमलता, दोनों को एक साथ रखती है।

कठिन शब्दों के अर्थ

कृत सेवा
जिनकी सेवा की जाती है
उद्धारक
उद्धार करने वाले
सिन्धु
सागर
तारक
पार लगाने वाले
कारक
करने वाले
भीषण
भयंकर
वपु
शरीर, रूप
श्वान
कुत्ता
अमित
अपार
भयहारी
भय हरने वाले
चौमुख दीपक
चार बत्तियों वाला दीपक
खोवे
मिटा देता है
दधि
दही
मिश्रित
मिला हुआ
डमरु
शिव और भैरव का छोटा बाजा
डमकावत
बजाते हैं
बटुकनाथ
भैरव का बालक रूप
हरषावत
प्रसन्न करते हैं
मनवांछित
मन में चाहा हुआ

फलश्रुति

अंतिम अंतरा कहता है कि बटुकनाथ जी की आरती गाने वाला मनचाहा फल पाता है। ये आरती के अपने शब्द हैं, जिनमें कवि और भक्त का भरोसा बोलता है; इन्हें किसी निश्चित फल का वादा न समझें।

बटुकनाथ जी की आरती जो कोई नर गावे।
कहें धरणीधर नर मनवांछित फल पावे॥

आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि जो कोई बटुकनाथ जी की यह आरती गाता है, कवि धरणीधर के शब्दों में, वह मनचाहा फल पाता है।

यह आरती कब गाई जाती है

  • कालाष्टमी (हर महीने की कृष्ण अष्टमी) पर
  • काल भैरव जयंती (मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी) पर
  • भैरव मंदिर में संध्या आरती के समय
  • घर या कुल की परंपरा के अनुसार भैरव-पूजा के दिन

आरती कैसे करें

  • भैरव जी के चित्र के सामने सरसों के तेल या घी का दीपक जलाएँ; आरती में चौमुखे दीपक का उल्लेख है, हो सके तो चार बत्तियों वाला दीपक लें।
  • टेक 'जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा' से आरती शुरू करें और हर अंतरे के बाद इसे दोहराएँ।
  • भोग में जो घर की परंपरा हो, वह श्रद्धा से चढ़ाएँ और आरती के बाद प्रसाद बाँटें।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
टेकजय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा, सुर नर मुनि सब करते प्रभु तुम्हरी सेवाद्रिक पंचांग के पाठ में; भक्ति भारत, भारतकोश और आज तक में 'जय काली और गौरा देवी कृत सेवा' (भक्ति भारत में 'गौर')
अंतरा 3तुम बिन शिव सेवा सफल नहीं होवे, चतुर्वतिका दीपक दर्शन दुःख खोवेद्रिक पंचांग में
अंतरा 3चौमुख दीपक दर्शन दु:ख सगरे खोंवेभारतकोश और आज तक में
अंतरा 6बटुकनाथ की आरती जो कोई जन गावे, कहे धरणीधर वह नर मन वांछित फल पावेद्रिक पंचांग में

रचयिता और स्रोत

रचयिता
धरणीधर (परंपरा के अनुसार)
भाषा
हिन्दी

अंतिम पंक्ति 'कहें धरणीधर नर मनवांछित फल पावे' में यह नाम आता है, जो कवि की छाप लगती है। रचयिता के बारे में और कोई जानकारी नहीं मिली।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति चार पाठों से मिलाई गई: भक्ति भारत, भारतकोश (bharatdiscovery.org), आज तक और द्रिक पंचांग। पहले तीन का पाठ एक है (आज तक का पाठ भारतकोश की प्रति लगता है); द्रिक पंचांग टेक, तीसरे अंतरे और अंतिम पंक्ति में अलग है। हर पंक्ति में बहुमत का पाठ लिया गया, और वर्तनी उस स्रोत से जिसमें वह शुद्ध छपी है: 'गौरा', 'भक्तों के सुख कारक', 'पांव घुंघरु बाजत अरु डमरु डमकावत' और 'जन मन हरषावत' (भारतकोश, आज तक), 'भाषावलि' (भारतकोश, आज तक, द्रिक पंचांग), 'कहें धरणीधर' (आज तक); बाकी पंक्तियाँ भक्ति भारत से। भारतकोश और आज तक में छपाई की भूलें हैं ('शवन', 'महीमा', 'भयकारी', 'बथुकनाथ'), और भक्ति भारत में 'दम्कावत', 'जल मन', 'धरनी धर'; हर जगह शुद्ध छपा पाठ लिया गया। 'भाषावलि' का अर्थ स्पष्ट नहीं है; पाठ जैसा मिला वैसा रखा गया और अर्थ में यह बात लिखी गई।

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भैरव जी के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

यह आरती भैरव के किस रूप की है?

आरती के अंतिम अंतरों में 'बटुकनाथ' नाम आता है, इसलिए यह मुख्य रूप से बटुक भैरव (भैरव का बालक रूप) की आरती है। आज तक जैसे कुछ स्रोत इसे काल भैरव की आरती के नाम से भी छापते हैं।

भैरव जी की आरती कब करें?

कालाष्टमी (हर महीने की कृष्ण अष्टमी) और काल भैरव जयंती पर विशेष रूप से। भैरव मंदिरों में रोज़ संध्या आरती होती है; घर में अपनी परंपरा के दिन भैरव-पूजा के अंत में इसे गाएँ।

आरती में श्वान (कुत्ते) का उल्लेख क्यों है?

श्वान भैरव का वाहन माना जाता है, इसलिए आरती कहती है कि वे श्वान पर विराजते हैं। इसी कारण कई भक्त कुत्तों को भोजन कराना भी भैरव की सेवा मानते हैं।

'चौमुख दीपक' क्या है?

चार मुखों (चार बत्तियों) वाला दीपक, जिसकी लौ चारों दिशाओं में होती है। आरती कहती है कि चौमुखे दीपक के साथ भैरव के दर्शन से दुःख दूर होते हैं।

धरणीधर कौन हैं?

अंतिम पंक्ति में 'कहें धरणीधर' आता है, जो इस आरती के कवि की छाप लगती है। कवि के बारे में और कोई जानकारी नहीं मिली।

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