शिव पूजा विधि
शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

आरती · भैरव
भैरव जी की आरती 'जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा', जिसमें बटुकनाथ रूप का वर्णन है: पूरा पाठ, सरल अर्थ, कठिन शब्द और पाठांतर।
जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा।जय काली और गौरा देवी कृत सेवा॥
अर्थ: हे भैरव देव, हे प्रभु, आपकी जय हो। माँ काली और गौरा (पार्वती) देवी भी जिनकी सेवा करती हैं, ऐसे आपकी जय हो।
तुम्ही पाप उद्धारक दुःख सिन्धु तारक।भक्तों के सुख कारक भीषण वपु धारक॥
॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा ॥
अर्थ: आप ही पापों से उद्धार करने वाले और दुःख के सागर से पार लगाने वाले हैं। आप भक्तों को सुख देने वाले हैं और भयंकर रूप धारण करते हैं।
वाहन श्वान विराजत कर त्रिशूल धारी।महिमा अमित तुम्हारी जय जय भयहारी॥
॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा ॥
अर्थ: श्वान (कुत्ता) आपका वाहन है और आप हाथ में त्रिशूल धारण करते हैं। आपकी महिमा अपार है; हे भय हरने वाले, आपकी जय हो।
तुम बिन देवा सेवा सफल नहीं होवे।चौमुख दीपक दर्शन दुःख खोवे॥
॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा ॥
अर्थ: आरती कहती है कि हे देव, आपके बिना कोई सेवा-पूजा सफल नहीं होती। चार मुख वाले दीपक के साथ आपके दर्शन से दुःख दूर हो जाते हैं।
तेल चटकि दधि मिश्रित भाषावलि तेरी।कृपा कीजिये भैरव, करिए नहीं देरी॥
॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा ॥
अर्थ: पहली पंक्ति तेल में चटकाए और दही मिले भोग की बात करती है; 'भाषावलि' शब्द सभी स्रोतों में इसी रूप में है, पर इसका ठीक अर्थ स्पष्ट नहीं है। हे भैरव, कृपा कीजिए, देर मत कीजिए।
पांव घुंघरु बाजत अरु डमरु डमकावत।बटुकनाथ बन बालक जन मन हरषावत॥
॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा ॥
अर्थ: आपके पाँवों में घुँघरू बजते हैं और आप डमरू बजाते हैं। बटुकनाथ बनकर, बालक रूप में, आप भक्तों का मन प्रसन्न करते हैं।
बटुकनाथ जी की आरती जो कोई नर गावे।कहें धरणीधर नर मनवांछित फल पावे॥
॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा ॥
अर्थ: आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि जो कोई बटुकनाथ जी की यह आरती गाता है, कवि धरणीधर के शब्दों में, वह मनचाहा फल पाता है।
हर अंतरे का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।
'जय भैरव देवा' भगवान भैरव की आरती है, जो भैरव मंदिरों में और घर की भैरव-पूजा के अंत में गाई जाती है। आरती के अंतिम अंतरों में भैरव को 'बटुकनाथ' कहा गया है, यानी यह उनके बटुक (बालक) रूप की आरती है; कई स्रोत इसे काल भैरव की आरती के नाम से भी छापते हैं।
आरती में भैरव को पापों से उद्धार करने वाला, दुःख के सागर से पार लगाने वाला और भय हरने वाला कहा गया है। उनका वाहन श्वान (कुत्ता) है, हाथ में त्रिशूल है, पाँवों में घुँघरू बजते हैं और वे डमरू बजाते हैं।
हे भैरव देव, हे प्रभु, आपकी जय हो। माँ काली और गौरा (पार्वती) देवी भी जिनकी सेवा करती हैं, ऐसे आपकी जय हो।
आप ही पापों से उद्धार करने वाले और दुःख के सागर से पार लगाने वाले हैं। आप भक्तों को सुख देने वाले हैं और भयंकर रूप धारण करते हैं।
श्वान (कुत्ता) आपका वाहन है और आप हाथ में त्रिशूल धारण करते हैं। आपकी महिमा अपार है; हे भय हरने वाले, आपकी जय हो।
आरती कहती है कि हे देव, आपके बिना कोई सेवा-पूजा सफल नहीं होती। चार मुख वाले दीपक के साथ आपके दर्शन से दुःख दूर हो जाते हैं।
पहली पंक्ति तेल में चटकाए और दही मिले भोग की बात करती है; 'भाषावलि' शब्द सभी स्रोतों में इसी रूप में है, पर इसका ठीक अर्थ स्पष्ट नहीं है। हे भैरव, कृपा कीजिए, देर मत कीजिए।
आपके पाँवों में घुँघरू बजते हैं और आप डमरू बजाते हैं। बटुकनाथ बनकर, बालक रूप में, आप भक्तों का मन प्रसन्न करते हैं।
आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि जो कोई बटुकनाथ जी की यह आरती गाता है, कवि धरणीधर के शब्दों में, वह मनचाहा फल पाता है।
भैरव शिव का उग्र रूप माने जाते हैं, पर यह आरती उनके भयंकर रूप को भक्तों के रक्षक के रूप में देखती है: वे पापों से उद्धार करते हैं, दुःख के सागर से पार लगाते हैं और भय हरते हैं। काली और गौरा भी उनकी सेवा करती हैं।
आरती के अंत में भैरव का कोमल रूप सामने आता है: पाँवों में घुँघरू और हाथ में डमरू लिए बटुकनाथ, जो बालक बनकर भक्तों का मन प्रसन्न करते हैं। इस तरह आरती उग्रता और कोमलता, दोनों को एक साथ रखती है।
अंतिम अंतरा कहता है कि बटुकनाथ जी की आरती गाने वाला मनचाहा फल पाता है। ये आरती के अपने शब्द हैं, जिनमें कवि और भक्त का भरोसा बोलता है; इन्हें किसी निश्चित फल का वादा न समझें।
बटुकनाथ जी की आरती जो कोई नर गावे।
कहें धरणीधर नर मनवांछित फल पावे॥आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि जो कोई बटुकनाथ जी की यह आरती गाता है, कवि धरणीधर के शब्दों में, वह मनचाहा फल पाता है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| टेक | जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा, सुर नर मुनि सब करते प्रभु तुम्हरी सेवा | द्रिक पंचांग के पाठ में; भक्ति भारत, भारतकोश और आज तक में 'जय काली और गौरा देवी कृत सेवा' (भक्ति भारत में 'गौर') |
| अंतरा 3 | तुम बिन शिव सेवा सफल नहीं होवे, चतुर्वतिका दीपक दर्शन दुःख खोवे | द्रिक पंचांग में |
| अंतरा 3 | चौमुख दीपक दर्शन दु:ख सगरे खोंवे | भारतकोश और आज तक में |
| अंतरा 6 | बटुकनाथ की आरती जो कोई जन गावे, कहे धरणीधर वह नर मन वांछित फल पावे | द्रिक पंचांग में |
अंतिम पंक्ति 'कहें धरणीधर नर मनवांछित फल पावे' में यह नाम आता है, जो कवि की छाप लगती है। रचयिता के बारे में और कोई जानकारी नहीं मिली।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति चार पाठों से मिलाई गई: भक्ति भारत, भारतकोश (bharatdiscovery.org), आज तक और द्रिक पंचांग। पहले तीन का पाठ एक है (आज तक का पाठ भारतकोश की प्रति लगता है); द्रिक पंचांग टेक, तीसरे अंतरे और अंतिम पंक्ति में अलग है। हर पंक्ति में बहुमत का पाठ लिया गया, और वर्तनी उस स्रोत से जिसमें वह शुद्ध छपी है: 'गौरा', 'भक्तों के सुख कारक', 'पांव घुंघरु बाजत अरु डमरु डमकावत' और 'जन मन हरषावत' (भारतकोश, आज तक), 'भाषावलि' (भारतकोश, आज तक, द्रिक पंचांग), 'कहें धरणीधर' (आज तक); बाकी पंक्तियाँ भक्ति भारत से। भारतकोश और आज तक में छपाई की भूलें हैं ('शवन', 'महीमा', 'भयकारी', 'बथुकनाथ'), और भक्ति भारत में 'दम्कावत', 'जल मन', 'धरनी धर'; हर जगह शुद्ध छपा पाठ लिया गया। 'भाषावलि' का अर्थ स्पष्ट नहीं है; पाठ जैसा मिला वैसा रखा गया और अर्थ में यह बात लिखी गई।
शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
शिव · आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा
भैरव · चालीसा
श्री गणपति गुरु गौरि पद प्रेम सहित धरि माथ
भैरव, शिव · अष्टकम् · संस्कृत
देवराजसेव्यमानपावनाङ्घ्रिपङ्कजं
शिव · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
महाशिवरात्रि पर घर में शिव पूजा: सुबह संकल्प, सेहत के अनुसार व्रत, रात में एक बार या चारों पहर की पूजा, जागरण, निशीथ काल और अगली सुबह पारण।
शिव · चालीसा
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान
आरती के अंतिम अंतरों में 'बटुकनाथ' नाम आता है, इसलिए यह मुख्य रूप से बटुक भैरव (भैरव का बालक रूप) की आरती है। आज तक जैसे कुछ स्रोत इसे काल भैरव की आरती के नाम से भी छापते हैं।
कालाष्टमी (हर महीने की कृष्ण अष्टमी) और काल भैरव जयंती पर विशेष रूप से। भैरव मंदिरों में रोज़ संध्या आरती होती है; घर में अपनी परंपरा के दिन भैरव-पूजा के अंत में इसे गाएँ।
श्वान भैरव का वाहन माना जाता है, इसलिए आरती कहती है कि वे श्वान पर विराजते हैं। इसी कारण कई भक्त कुत्तों को भोजन कराना भी भैरव की सेवा मानते हैं।
चार मुखों (चार बत्तियों) वाला दीपक, जिसकी लौ चारों दिशाओं में होती है। आरती कहती है कि चौमुखे दीपक के साथ भैरव के दर्शन से दुःख दूर होते हैं।
अंतिम पंक्ति में 'कहें धरणीधर' आता है, जो इस आरती के कवि की छाप लगती है। कवि के बारे में और कोई जानकारी नहीं मिली।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।