शिव चालीसा
शिव · चालीसा
पहरों के बीच जागरण में

यह पन्ना महाशिवरात्रि पर घर में किए जाने वाले संकल्प, व्रत, रात की पूजा और जागरण की सरल विधि बताता है: एक बार की पूजा भी, और चाहें तो रात के चारों पहर की पूजा भी। मंदिरों में होने वाला रुद्राभिषेक (रुद्राष्टाध्यायी के वैदिक मंत्रों से), पार्थिव शिवलिंग की विधिवत प्रतिष्ठा-पूजा, शिवरात्रि व्रत का उद्यापन, हवन और दीक्षा से जुड़ी साधनाएँ अलग विधियाँ हैं; इन्हें किसी जानकार आचार्य के साथ करें। रोज़ की शिव पूजा के लिए "शिव पूजा विधि" वाला पन्ना देखें।
महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात है (अमांत पंचांग में यही माघ कृष्ण चतुर्दशी कहलाती है), और शिव आराधना की साल की सबसे बड़ी रात मानी जाती है। इस पर्व का केंद्र है जागरण: दिन में संकल्प और व्रत, रात भर पूजा, जाप, कथा और भजन, और अगली सुबह फिर पूजा करके व्रत खोलना।
शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता (अध्याय 38) रात के चारों पहरों की अलग-अलग पूजा का वर्णन करती है, और यह पन्ना उसी क्रम पर चलता है। पर घर में यह पूरा क्रम निभाना ज़रूरी नहीं: आधी रात के निशीथ काल में एक बार की पूजा भी पूरी पूजा है। व्रत भी उतना ही रखें जितना शरीर अनुमति दे; शिव पुराण स्वयं इस व्रत को "यथाशक्ति" करने की बात कहता है।
| सामग्री | उपयोग | स्थिति | विकल्प / टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| जल | हर पहर में अभिषेक और जलधारा | आवश्यक | साफ़ पानी काफ़ी है; गंगाजल हो तो कुछ बूँदें मिला लें। शिवलिंग न हो तो तस्वीर के सामने पात्र में जल अर्पित करें। |
| दूध | अभिषेक | वैकल्पिक | थोड़ी मात्रा जल में मिलाकर; न हो तो केवल जल। |
| पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) | शिव पुराण पहले पहर में "पाँच द्रव्यों" से पूजा की बात करता है; बहुत-से परिवार इसे पंचामृत मानते हैं | वैकल्पिक | पाँचों न हों तो जो हों वही; बाद में शुद्ध जल से स्नान कराएँ। |
| बेलपत्र | शिव पुराण दूसरे और चौथे पहर में बेलपत्र से विशेष पूजा बताता है | वैकल्पिक | महाशिवरात्रि चतुर्दशी है, और गीता प्रेस के अनुसार चतुर्दशी को बेलपत्र नहीं तोड़े जाते; एक दिन पहले तोड़ लें। कम हों तो चढ़ाए बेलपत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं। |
| काले तिल, जौ, गेहूँ और साबुत दालें (उड़द, मूँग) | शिव पुराण अलग-अलग पहर में तिल-जौ, गेहूँ और उड़द-मूँग जैसे अन्न से पूजा बताता है | परंपरा-विशेष | जो घर में हो, थोड़ा-थोड़ा; न हो तो अक्षत। |
| फूल: कमल, कनेर, आक, शंखपुष्पी | शिव पुराण पहले पहर में कमल और कनेर, तीसरे में आक और चौथे में शंखपुष्पी के फूल बताता है | परंपरा-विशेष | जो ताज़े फूल मिलें, वही चढ़ाएँ। केतकी (केवड़ा) न चढ़ाएँ। |
| धतूरा | शिव जी को प्रिय माना जाता है | परंपरा-विशेष | ज़रूरी नहीं। धतूरा ज़हरीला होता है; बच्चों से दूर रखें और छूने के बाद हाथ धोएँ। |
| चंदन या भस्म, अक्षत | तिलक और अर्पण | वैकल्पिक | न हों तो छोड़ दें। |
| अर्घ्य के फल: श्रीफल, बिजौरा नींबू, अनार, केला | शिव पुराण हर पहर के अर्घ्य में अलग फल बताता है (श्रीफल को परंपरा में नारियल या बेल का फल माना जाता है) | परंपरा-विशेष | जो भी मौसमी फल हो, वही चढ़ाएँ। |
| दीपक और धूप | हर पहर की पूजा; एक दीपक रात भर | वैकल्पिक | रात भर जलने वाले दीपक में पर्याप्त घी या तेल रखें, और उसे परदों और कपड़ों से दूर रखें। |
| नैवेद्य | शिव पुराण पहले पहर में पकवान, दूसरे में खीर, तीसरे में पुए और चौथे में मीठे पकवान बताता है | वैकल्पिक | व्रत वाले घर फलाहारी भोग रखते हैं; एक ही भोग चारों पहर रखा जा सकता है। |
| कपूर | आरती; शिव पुराण तीसरे पहर में कपूर से आरती का उल्लेख करता है | वैकल्पिक | घी के दीपक से भी आरती होती है। |
| रुद्राक्ष की माला | जाप | वैकल्पिक | उंगलियों पर या बिना गिने भी जाप हो सकता है। |
महाशिवरात्रि का संकल्प सुबह स्नान और पूजा के बाद लिया जाता है: आज दिन भर का व्रत और रात भर की पूजा शिव जी को समर्पित है। शिव पुराण में यही क्रम है: सुबह नित्य-कर्म, शिव जी की पूजा और प्रणाम, फिर संकल्प।
हे महादेव, आज महाशिवरात्रि पर मैं [अपना नाम] अपनी सेहत और सामर्थ्य के अनुसार व्रत रखकर रात में आपकी पूजा और जागरण करना चाहता/चाहती हूँ। आपकी कृपा से यह बिना विघ्न पूरा हो, और काम-क्रोध जैसे भीतर के शत्रु मुझे परेशान न करें।
देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोऽस्तु ते।
कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव॥
तव प्रभावाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति।
कामाद्याः शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि॥
अर्थ: हे देवों के देव महादेव, हे नीलकंठ, आपको नमस्कार। हे देव, मैं आपका शिवरात्रि व्रत करना चाहता हूँ। हे देवेश, आपके प्रभाव से यह बिना विघ्न पूरा हो, और काम आदि शत्रु मुझे पीड़ा न दें।
स्रोत: शिव पुराण, कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 38, श्लोक 28-29
ऊपर का हिंदी संकल्प इन्हीं श्लोकों का भाव है। जो संस्कृत न पढ़ सकें, वे केवल हिंदी संकल्प बोलें; दोनों का अर्थ एक है।
भवः शर्वस्तथा रुद्रः पुनः पशुपतिस्तथा।
उग्रो महांस्तथा भीम ईशान इति तानि वै॥
अर्थ: भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान, भीम और ईशान: ये शिव के आठ नाम हैं।
स्रोत: शिव पुराण, कोटिरुद्र संहिता 38.54; यहाँ पहले पहर में इन्हीं आठ नामों से शिव जी को फूल चढ़ाने का निर्देश है।
ॐ नमः शिवाय। बिल्वपत्रं समर्पयामि॥
अर्थ: हे शिव, आपको नमन; मैं बेलपत्र अर्पित करता/करती हूँ।
स्रोत: हर उपचार को देवता के नाम-मंत्र के साथ "समर्पयामि" कहकर अर्पित करने का प्रचलित ढंग; गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश (पार्थिव-पूजन) के उपचार-वाक्य के अनुसार।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
अर्थ: हम तीन नेत्रों वाले शिव की पूजा करते हैं, जो सुगंधित हैं और सबका पोषण बढ़ाते हैं। जैसे पका हुआ फल अपने डंठल से सहज ही छूट जाता है, वैसे ही वे हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें, अमृत से नहीं।
ॐ नमः शिवाय
अर्थ: मैं मंगलमय शिव को नमन करता/करती हूँ और स्वयं को उन्हें समर्पित करता/करती हूँ।
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥
अर्थ: जो कपूर जैसे उजले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं, सर्पराज को हार की तरह पहनते हैं और सदा भक्तों के हृदय-कमल में बसते हैं, उन भव (शिव) को माँ भवानी के साथ मैं नमन करता/करती हूँ।
अनेनैवोपवासेन यज्जातं फलमेव च।
तेनैव प्रीयतां देवः शङ्करः सुखदायकः॥
अर्थ: इस उपवास से जो भी फल बना हो, उसी से सुख देने वाले देव शंकर प्रसन्न हों।
स्रोत: शिव पुराण, कोटिरुद्र संहिता 38.80; शिवरात्रि व्रत के अंत की प्रार्थना।
शिव · चालीसा
पहरों के बीच जागरण में
शिव · अष्टकम् · संस्कृत
निशीथ काल की पूजा में, अभिषेक के बाद
शिव · अष्टकम् · संस्कृत
दूसरे पहर में बेलपत्र चढ़ाते समय
शिव · स्तोत्र · संस्कृत
जाप के साथ
शिव · अष्टकम् · संस्कृत
किसी भी पहर की आरती से पहले
शिव · स्तोत्र · संस्कृत
जागरण में पाठ या गायन
शिव · स्तोत्र · संस्कृत
भोर की प्रार्थना से पहले बारह ज्योतिर्लिंगों का स्मरण
शिव · स्तोत्र · संस्कृत
जो सामग्री न जुटा सकें, वे इससे मन से पूरी पूजा करें
यह क्रम शिव पुराण के वर्णन से है; हर पहर अलग भोग बनाना ज़रूरी नहीं, एक ही भोग चारों पहर रखा जा सकता है। व्रत रखने वाले परिवार अनाज की जगह फलाहार का भोग रखते हैं। भोग शिवलिंग के ऊपर नहीं, सामने थाली में रखें; वही सुबह प्रसाद के रूप में बँटता है।
हे महादेव, इस रात आपने मुझे जागने, आपका नाम लेने और आपकी पूजा करने का अवसर दिया। जो कुछ बन पड़ा, वह आपको अर्पित है। मेरे मन से भय और आलस दूर करें, मेरे घर में सदा आपका भजन होता रहे, और परिवार में शांति बनी रहे।
तावकस्त्वद्गतप्राणस्त्वच्चित्तोऽहं सदा मृड।
कृपानिधे इति ज्ञात्वा यथायोग्यं तथा कुरु॥
अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाज्जपपूजादिकं मया।
कृपानिधित्वाज्ज्ञात्वैव भूतनाथ प्रसीद मे॥
अर्थ: हे मृड (सुख देने वाले शिव), मैं आपका हूँ; मेरे प्राण और मेरा मन सदा आप में है। हे कृपा के सागर, यह जानकर जो उचित हो वही करें। हे भूतनाथ, मैंने अनजाने में या जानते हुए जो भी जप-पूजा की है, आप कृपा के सागर हैं, यही जानकर मुझ पर प्रसन्न हों।
स्रोत: शिव पुराण, कोटिरुद्र संहिता 38.78-79; शिवरात्रि व्रत पूरा होने पर की जाने वाली प्रार्थना।
शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
शिव · आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा
समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): Structure follows Shiva Purana, Koti Rudra Samhita ch. 38 (sanskritdocuments.org text): nishitha-vyapini chaturdashi (24), morning routine and sankalp verses 28-29 (quoted verbatim), second bath (32-33), the four prahar worship with their dravyas, flowers, arghya fruits and naivedya (47-74), the eight names (54, quoted), name-mantra when no guru mantra (51), dawn worship (75-77) and prayers 78-80 (quoted verbatim), yathashakti (43), women and children (22). The common milk/curd/ghee/honey-per-prahar list is mentioned only as a household custom, not attributed to the Purana. Once-or-four-times, nishita and the two parana views from Drik Panchang. Bilva plucking rule from Gita Press. Mantra lines from the site's mantra pages; Karpur Gauram from shlokam.org.
नहीं। रात में एक बार की पूजा भी पूरी पूजा है; एक बार करें तो आधी रात का निशीथ काल सबसे उत्तम माना जाता है। चारों पहर की पूजा उन लोगों के लिए है जो रात भर जागकर साधना करना चाहते हैं। परिवार में पहर बाँट लेना भी अच्छा तरीका है।
जागरण इस पर्व का केंद्र है, पर इसे ज़बरदस्ती न बनाएँ। जितना जाग सकें, उतना समय नाम-स्मरण, कथा और भजन में बिताएँ। बच्चों, बुज़ुर्गों, बीमार लोगों और जिन्हें सुबह काम पर जाना हो, उनके लिए कुछ घंटे का जागरण भी पूरा है।
निर्जल व्रत एक परंपरा है, नियम नहीं। फल, दूध और पानी लेकर भी व्रत रखा जाता है। नियमित दवा कभी न छोड़ें। गर्भावस्था, मधुमेह, रक्तचाप या किसी बीमारी में व्रत रखने से पहले अपने चिकित्सक से पूछ लें। व्रत न रख सकें तो भी पूजा और जागरण पूरे हैं; शिव पुराण भी व्रत को अपनी शक्ति के अनुसार करने की बात कहता है।
आधी रात के आसपास का लगभग पौन घंटे का समय निशीथ काल कहलाता है। शिवरात्रि की पूजा के लिए इसे सबसे मुख्य समय माना जाता है। यह हर शहर में थोड़ा अलग होता है; यहीं के महाशिवरात्रि वाले पन्ने पर हर साल का निशीथ काल दिया गया है।
हर महीने की कृष्ण चतुर्दशी मासिक शिवरात्रि है। फाल्गुन महीने की कृष्ण चतुर्दशी (अमांत में माघ) महाशिवरात्रि कहलाती है और साल की सबसे बड़ी शिवरात्रि मानी जाती है। मासिक शिवरात्रि पर भी यही पूजा छोटे रूप में की जा सकती है।
शिव जी की तस्वीर के सामने यही क्रम रखें और जल एक पात्र में अर्पित करें। दिन में मंदिर जाकर शिवलिंग पर जल चढ़ा सकते हैं और रात का जागरण घर में। शिव मानस पूजा का पाठ भी कर सकते हैं, जिसमें पूरी पूजा मन से होती है।
इस पर परिवारों की रीतियाँ अलग हैं। कई घरों में इन दिनों शिवलिंग छूने और विधिवत पूजा से विराम लिया जाता है और पूजा कोई और सदस्य करता है; कई घर ऐसा नहीं मानते। व्रत, जागरण, मन में "ॐ नमः शिवाय" का जाप और कथा सुनना आम तौर पर हर स्थिति में किया जाता है। अपने घर की रीति और अपनी सेहत के अनुसार चलें; इसमें अपराध-बोध की कोई बात नहीं।
इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।