शिव

पूजा विधि · शिव · त्योहार की पूजा

महाशिवरात्रि पूजा विधि

महाशिवरात्रि पर घर में शिव पूजा: सुबह संकल्प, सेहत के अनुसार व्रत, रात में एक बार या चारों पहर की पूजा, जागरण, निशीथ काल और अगली सुबह पारण।

इस पेज पर
  1. परिचय
  2. एक नज़र में
  3. कब करें
  4. सामग्री
  5. तैयारी
  6. चित्र या मूर्ति
  7. संकल्प
  8. चरण-दर-चरण विधि
  9. पाठ
  10. भोग
  11. समापन
  12. छोटी विधि
  13. परंपराओं में अंतर
  14. ये भी पढ़ें
  15. स्रोत
  16. सवाल-जवाब
  17. सुधार सुझाएँ
त्योहार की पूजा

यह पन्ना महाशिवरात्रि पर घर में किए जाने वाले संकल्प, व्रत, रात की पूजा और जागरण की सरल विधि बताता है: एक बार की पूजा भी, और चाहें तो रात के चारों पहर की पूजा भी। मंदिरों में होने वाला रुद्राभिषेक (रुद्राष्टाध्यायी के वैदिक मंत्रों से), पार्थिव शिवलिंग की विधिवत प्रतिष्ठा-पूजा, शिवरात्रि व्रत का उद्यापन, हवन और दीक्षा से जुड़ी साधनाएँ अलग विधियाँ हैं; इन्हें किसी जानकार आचार्य के साथ करें। रोज़ की शिव पूजा के लिए "शिव पूजा विधि" वाला पन्ना देखें।

परिचय

महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात है (अमांत पंचांग में यही माघ कृष्ण चतुर्दशी कहलाती है), और शिव आराधना की साल की सबसे बड़ी रात मानी जाती है। इस पर्व का केंद्र है जागरण: दिन में संकल्प और व्रत, रात भर पूजा, जाप, कथा और भजन, और अगली सुबह फिर पूजा करके व्रत खोलना।

शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता (अध्याय 38) रात के चारों पहरों की अलग-अलग पूजा का वर्णन करती है, और यह पन्ना उसी क्रम पर चलता है। पर घर में यह पूरा क्रम निभाना ज़रूरी नहीं: आधी रात के निशीथ काल में एक बार की पूजा भी पूरी पूजा है। व्रत भी उतना ही रखें जितना शरीर अनुमति दे; शिव पुराण स्वयं इस व्रत को "यथाशक्ति" करने की बात कहता है।

एक नज़र में

समय
सुबह संकल्प; रात के चार पहर में पूजा, सबसे मुख्य आधी रात का निशीथ काल; अगली सुबह पारण
अवधि
एक बार की पूजा लगभग 30 से 45 मिनट; चारों पहर की पूजा रात भर
कौन कर सकता है
कोई भी: स्त्री, पुरुष, बच्चे और बुज़ुर्ग; व्रत अपनी सेहत के अनुसार
मुख्य सामग्री
जल, दूध, पंचामृत, बेलपत्र, काले तिल, आक या कनेर के फूल, फल, दीपक
आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, हर पहर की पूजा के अंत में

पूजा कब करें

  • महाशिवरात्रि हर साल फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को आती है। उत्तर भारत के पूर्णिमांत और दक्षिण-पश्चिम भारत के अमांत पंचांग में महीने का नाम अलग बोला जाता है, पर दिन एक ही होता है।
  • व्रत उस दिन रखा जाता है जिसकी रात में आधी रात के समय (निशीथ काल में) चतुर्दशी तिथि हो; शिव पुराण भी "निशीथव्यापिनी" चतुर्दशी को ग्रहण करने को कहता है। यहीं के महाशिवरात्रि वाले पन्ने पर हर साल की तारीख़ और निशीथ काल का समय दिया गया है।
  • सूर्यास्त से सूर्योदय तक की रात के चार बराबर हिस्से चार पहर हैं। हर पहर लगभग तीन घंटे का होता है, जो मौसम और शहर के हिसाब से थोड़ा बदलता है। अपने शहर का सूर्यास्त और अगले दिन का सूर्योदय देखकर पहर निकाले जा सकते हैं।
  • व्रत अगली सुबह स्नान, पूजा और दान के बाद खोला जाता है। पारण के सही समय पर पंचांगों में दो मत हैं: कुछ चतुर्दशी समाप्त होने से पहले पारण बताते हैं और कुछ उसके बाद। अपने परिवार और स्थानीय पंचांग की रीति मानें।

पूजा सामग्री

  • आवश्यक इसके बिना यह विधि नहीं होती
  • वैकल्पिक हो तो अच्छा; न हो तो विकल्प दिया है
  • परंपरा-विशेष कुछ परंपराओं में ही
सामग्रीउपयोगस्थितिविकल्प / टिप्पणी
जलहर पहर में अभिषेक और जलधाराआवश्यकसाफ़ पानी काफ़ी है; गंगाजल हो तो कुछ बूँदें मिला लें। शिवलिंग न हो तो तस्वीर के सामने पात्र में जल अर्पित करें।
दूधअभिषेकवैकल्पिकथोड़ी मात्रा जल में मिलाकर; न हो तो केवल जल।
पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)शिव पुराण पहले पहर में "पाँच द्रव्यों" से पूजा की बात करता है; बहुत-से परिवार इसे पंचामृत मानते हैंवैकल्पिकपाँचों न हों तो जो हों वही; बाद में शुद्ध जल से स्नान कराएँ।
बेलपत्रशिव पुराण दूसरे और चौथे पहर में बेलपत्र से विशेष पूजा बताता हैवैकल्पिकमहाशिवरात्रि चतुर्दशी है, और गीता प्रेस के अनुसार चतुर्दशी को बेलपत्र नहीं तोड़े जाते; एक दिन पहले तोड़ लें। कम हों तो चढ़ाए बेलपत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं।
काले तिल, जौ, गेहूँ और साबुत दालें (उड़द, मूँग)शिव पुराण अलग-अलग पहर में तिल-जौ, गेहूँ और उड़द-मूँग जैसे अन्न से पूजा बताता हैपरंपरा-विशेषजो घर में हो, थोड़ा-थोड़ा; न हो तो अक्षत।
फूल: कमल, कनेर, आक, शंखपुष्पीशिव पुराण पहले पहर में कमल और कनेर, तीसरे में आक और चौथे में शंखपुष्पी के फूल बताता हैपरंपरा-विशेषजो ताज़े फूल मिलें, वही चढ़ाएँ। केतकी (केवड़ा) न चढ़ाएँ।
धतूराशिव जी को प्रिय माना जाता हैपरंपरा-विशेषज़रूरी नहीं। धतूरा ज़हरीला होता है; बच्चों से दूर रखें और छूने के बाद हाथ धोएँ।
चंदन या भस्म, अक्षततिलक और अर्पणवैकल्पिकन हों तो छोड़ दें।
अर्घ्य के फल: श्रीफल, बिजौरा नींबू, अनार, केलाशिव पुराण हर पहर के अर्घ्य में अलग फल बताता है (श्रीफल को परंपरा में नारियल या बेल का फल माना जाता है)परंपरा-विशेषजो भी मौसमी फल हो, वही चढ़ाएँ।
दीपक और धूपहर पहर की पूजा; एक दीपक रात भरवैकल्पिकरात भर जलने वाले दीपक में पर्याप्त घी या तेल रखें, और उसे परदों और कपड़ों से दूर रखें।
नैवेद्यशिव पुराण पहले पहर में पकवान, दूसरे में खीर, तीसरे में पुए और चौथे में मीठे पकवान बताता हैवैकल्पिकव्रत वाले घर फलाहारी भोग रखते हैं; एक ही भोग चारों पहर रखा जा सकता है।
कपूरआरती; शिव पुराण तीसरे पहर में कपूर से आरती का उल्लेख करता हैवैकल्पिकघी के दीपक से भी आरती होती है।
रुद्राक्ष की मालाजापवैकल्पिकउंगलियों पर या बिना गिने भी जाप हो सकता है।

स्थान और अपनी तैयारी

  • दिन में घर और पूजा का स्थान साफ़ कर लें। शाम को सूर्यास्त के आसपास फिर स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें; शिव पुराण भी रात की पूजा से पहले दोबारा स्नान और तीन बार आचमन की बात करता है।
  • रात भर बैठना हो तो आरामदायक आसन, ओढ़ने के लिए शॉल (फाल्गुन की रात ठंडी हो सकती है) और पीने का पानी पास रखें।
  • पूजा की सामग्री पहले ही हर पहर के हिसाब से छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट लें, ताकि रात में ढूँढनी न पड़े।
  • परिवार के साथ जागरण करना हो तो पहले तय कर लें कि कौन किस पहर में पूजा करेगा और कौन आराम करेगा। बच्चों और बुज़ुर्गों पर पूरी रात जागने का दबाव न डालें।

चित्र या मूर्ति कैसे रखें

  • शिवलिंग को जलाधारी सहित एक चौकी या बड़ी थाली में रखें और जलाधारी की नली के नीचे बड़ा पात्र रखें, क्योंकि रात भर कई बार अभिषेक होगा।
  • शिव पुराण पूजा की सामग्री शिवलिंग की दक्षिण या पश्चिम ओर रखने की बात कहता है। घर में जहाँ सुविधा हो, सामग्री एक ओर पहरों के क्रम में व्यवस्थित रखें।
  • पार्थिव (मिट्टी का) शिवलिंग बनाकर पूजने की परंपरा भी शिव पुराण में आती है; यह एक अलग, विस्तृत विधि है। घर के शिवलिंग या शिव जी की तस्वीर के सामने की गई पूजा पूरी तरह मान्य है।
  • पूजा करने वाला पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बैठे, यह प्रचलित है; परंपराएँ अलग हैं, घर की जगह के अनुसार बैठें।
  • रात भर जलने वाला दीपक ऐसी जगह रखें जहाँ हवा न लगे, परदे और कपड़े दूर हों और बच्चों का हाथ न पहुँचे।

संकल्प

महाशिवरात्रि का संकल्प सुबह स्नान और पूजा के बाद लिया जाता है: आज दिन भर का व्रत और रात भर की पूजा शिव जी को समर्पित है। शिव पुराण में यही क्रम है: सुबह नित्य-कर्म, शिव जी की पूजा और प्रणाम, फिर संकल्प।

हे महादेव, आज महाशिवरात्रि पर मैं [अपना नाम] अपनी सेहत और सामर्थ्य के अनुसार व्रत रखकर रात में आपकी पूजा और जागरण करना चाहता/चाहती हूँ। आपकी कृपा से यह बिना विघ्न पूरा हो, और काम-क्रोध जैसे भीतर के शत्रु मुझे परेशान न करें।

देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोऽस्तु ते।
कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव॥
तव प्रभावाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति।
कामाद्याः शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि॥

अर्थ: हे देवों के देव महादेव, हे नीलकंठ, आपको नमस्कार। हे देव, मैं आपका शिवरात्रि व्रत करना चाहता हूँ। हे देवेश, आपके प्रभाव से यह बिना विघ्न पूरा हो, और काम आदि शत्रु मुझे पीड़ा न दें।

स्रोत: शिव पुराण, कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 38, श्लोक 28-29

ऊपर का हिंदी संकल्प इन्हीं श्लोकों का भाव है। जो संस्कृत न पढ़ सकें, वे केवल हिंदी संकल्प बोलें; दोनों का अर्थ एक है।

पूजा की विधि, चरण-दर-चरण

  1. १सुबह: स्नान, पूजा और संकल्प

    क्या करें
    सुबह स्नान करके शिव जी की सामान्य पूजा करें और दिन भर के व्रत और रात की पूजा का संकल्प लें।
    कैसे करें
    रोज़ की तरह जल, बेलपत्र, फूल और दीपक से छोटी पूजा करें, या पास के मंदिर में शिवलिंग पर जल चढ़ाएँ। फिर हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर ऊपर दिया संकल्प बोलें।
    भाव
    आज का दिन और आज की रात शिव जी के नाम।
    विकल्प
    सुबह समय न हो तो संकल्प शाम की पूजा से पहले भी लिया जा सकता है।
  2. २दिन का व्रत

    क्या करें
    दिन भर व्रत रखें, जितना शरीर अनुमति दे।
    कैसे करें
    कुछ लोग निर्जल रहते हैं, कुछ फल और दूध लेते हैं, कुछ एक समय सात्विक फलाहार करते हैं। जो रोज़ दवा लेते हैं, वे दवा न छोड़ें। शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता 38.43) व्रत को "यथाशक्ति", यानी अपनी शक्ति के अनुसार करने की बात कहता है।
    भाव
    व्रत शरीर को सताना नहीं, मन को दिन भर भगवान के पास रखना है।
    विकल्प
    व्रत न रख सकें तो भी पूजा और जागरण पूरे माने जाते हैं।
  3. ३शाम: स्नान और तैयारी

    क्या करें
    सूर्यास्त के आसपास फिर स्नान करें, दीपक जलाएँ और गणेश जी को प्रणाम करें।
    कैसे करें
    पूजा-स्थान पर सामग्री पहरों के क्रम में रख लें, रात भर जलने वाला दीपक जलाएँ, और हाथ जोड़कर "श्री गणेशाय नमः" कहें।
    भाव
    अब रात की साधना शुरू होती है।
    विकल्प
    थके हों तो स्नान की जगह हाथ-पैर-मुँह धोकर भी पूजा में बैठ सकते हैं।
  4. ४रात की पूजा का तरीका चुनें

    क्या करें
    तय करें कि पूजा रात में एक बार करनी है या चारों पहर।
    कैसे करें
    शिवरात्रि की पूजा रात में एक बार या चार बार की जा सकती है। एक बार करें तो आधी रात का निशीथ काल चुनें, जो लगभग पौन घंटे का होता है; उसमें नीचे दिए पहले पहर का क्रम करें। चार बार करें तो हर पहर में अगला चरण करें। हर पूजा का ढाँचा एक ही है: जल-अभिषेक, चंदन-अक्षत, फूल-बेलपत्र, धूप-दीप, भोग, जाप और आरती।
    भाव
    जितनी शक्ति है, उतनी पूरी श्रद्धा से।
    विकल्प
    परिवार में पहर बाँट लें: हर सदस्य एक पहर की पूजा करे।
  5. ५पहला पहर: पाँच द्रव्य और जलधारा

    क्या करें
    पंचामृत के पाँचों द्रव्य एक-एक करके चढ़ाएँ, फिर जल की धार से शिवलिंग धो दें; चंदन, अक्षत, काले तिल और फूल अर्पित करें।
    कैसे करें
    शिव पुराण कहता है कि हर द्रव्य अलग-अलग मंत्र से चढ़ाकर फिर जलधारा दें, और जिसे गुरु से मंत्र न मिला हो वह नाम-मंत्र से पूजा करे; इसलिए हर द्रव्य के साथ "ॐ नमः शिवाय" बोलें। फिर शिव के आठ नाम लेकर एक-एक फूल चढ़ाएँ। धूप, दीप और पकवान का भोग लगाएँ, श्रीफल से अर्घ्य दें, और कुछ देर जाप करें।
    भाव
    पहले पहर में मन को धीरे-धीरे पूजा में उतारना।
    पाठ

    भवः शर्वस्तथा रुद्रः पुनः पशुपतिस्तथा।
    उग्रो महांस्तथा भीम ईशान इति तानि वै॥

    अर्थ: भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान, भीम और ईशान: ये शिव के आठ नाम हैं।

    स्रोत: शिव पुराण, कोटिरुद्र संहिता 38.54; यहाँ पहले पहर में इन्हीं आठ नामों से शिव जी को फूल चढ़ाने का निर्देश है।

    विकल्प
    पंचामृत न हो तो केवल जल और दूध; आठ नाम कठिन लगें तो हर फूल के साथ "ॐ नमः शिवाय"।
  6. ६दूसरा पहर: बेलपत्र और खीर

    क्या करें
    पहले की तरह अभिषेक करें, फिर ख़ास तौर पर बेलपत्र चढ़ाएँ और खीर का भोग लगाएँ।
    कैसे करें
    शिव पुराण दूसरे पहर में तिल, जौ और कमल के साथ विशेष रूप से बेलपत्र से पूजा, बिजौरा नींबू से अर्घ्य और खीर का भोग बताता है, और जाप पहले पहर से दोगुना। बेलपत्र का चिकना हिस्सा शिवलिंग की ओर रखकर चढ़ाएँ।
    भाव
    बेलपत्र की तीन पत्तियों के साथ मन, वाणी और कर्म अर्पित।
    पाठ

    ॐ नमः शिवाय। बिल्वपत्रं समर्पयामि॥

    अर्थ: हे शिव, आपको नमन; मैं बेलपत्र अर्पित करता/करती हूँ।

    स्रोत: हर उपचार को देवता के नाम-मंत्र के साथ "समर्पयामि" कहकर अर्पित करने का प्रचलित ढंग; गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश (पार्थिव-पूजन) के उपचार-वाक्य के अनुसार।

    विकल्प
    बेलपत्र कम हों तो एक ही बेलपत्र धोकर हर पहर में चढ़ाया जा सकता है।
  7. ७तीसरा पहर: आक के फूल और कपूर आरती

    क्या करें
    अभिषेक के बाद आक के फूल चढ़ाएँ, पुए का भोग लगाएँ और कपूर से आरती करें।
    कैसे करें
    शिव पुराण तीसरे पहर में जौ की जगह गेहूँ, आक के फूल, तरह-तरह के धूप-दीप, पुए और सब्ज़ियों का भोग, कपूर की आरती और अनार से अर्घ्य बताता है। यह पहर अक्सर आधी रात के बाद पड़ता है, जब नींद सबसे भारी होती है; इसलिए जाप खड़े होकर या धीमे स्वर में बोलकर करें।
    भाव
    थकान के बीच भी नाम न छूटे।
    पाठ

    ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
    उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥

    अर्थ: हम तीन नेत्रों वाले शिव की पूजा करते हैं, जो सुगंधित हैं और सबका पोषण बढ़ाते हैं। जैसे पका हुआ फल अपने डंठल से सहज ही छूट जाता है, वैसे ही वे हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें, अमृत से नहीं।

    मंत्र का अर्थ और उच्चारण

    विकल्प
    आक के फूल न मिलें तो कोई भी ताज़ा फूल; पुए की जगह कोई भी भोग।
  8. ८चौथा पहर: अन्न, शंखपुष्पी और भोर तक कीर्तन

    क्या करें
    अभिषेक के बाद उड़द, मूँग या सात तरह के अनाज, शंखपुष्पी के फूल और बेलपत्र चढ़ाएँ; केले या दूसरे फलों से अर्घ्य दें।
    कैसे करें
    शिव पुराण चौथे पहर में उड़द, कँगनी और मूँग या सप्तधान्य, शंखपुष्पी और बेलपत्र से पूजा, मीठे पकवानों का भोग और केले या तरह-तरह के फलों से अर्घ्य बताता है। इसके बाद अरुणोदय, यानी भोर की लाली तक, गीत, भजन और कीर्तन में समय बिताएँ।
    भाव
    रात का अंतिम पहर, भोर की प्रतीक्षा।
    विकल्प
    अनाज न हों तो अक्षत; शंखपुष्पी न हो तो कोई भी फूल।
  9. ९पहरों के बीच: जाप, कथा और भजन

    क्या करें
    पूजा के बीच के समय में "ॐ नमः शिवाय" का जाप, शिव चालीसा, शिवरात्रि की कथा और भजन-कीर्तन करें।
    कैसे करें
    शिव पुराण गीत, वाद्य और नृत्य के साथ भक्ति-भाव से जागरण की बात कहता है, और व्रत का माहात्म्य पढ़ने-सुनने की भी। शिवरात्रि की प्रसिद्ध कथा में एक शिकारी अनजाने में रात भर बेलपत्र गिराकर चारों पहर की पूजा कर देता है; यह कथा परिवार के साथ पढ़ी जा सकती है।
    भाव
    जागना केवल आँखों का नहीं, मन का भी।
    पाठ

    ॐ नमः शिवाय

    अर्थ: मैं मंगलमय शिव को नमन करता/करती हूँ और स्वयं को उन्हें समर्पित करता/करती हूँ।

    मंत्र का अर्थ और उच्चारण

    विकल्प
    पूरी रात न जाग सकें तो कुछ घंटे जागकर नाम-स्मरण करें और फिर आराम करें।
  10. १०आरती

    क्या करें
    हर पहर की पूजा के अंत में "ॐ जय शिव ओंकारा" से आरती करें और कर्पूरगौरं श्लोक पढ़ें।
    कैसे करें
    आरती की थाली शिवलिंग के सामने घड़ी की सुई की दिशा में घुमाएँ, घंटी बजाएँ, परिवार साथ गाए। आरती के बाद थाली के चारों ओर थोड़ा जल घुमा दें।
    भाव
    हर पहर का अंत शिव की जय से।
    पाठ

    कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
    सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥

    अर्थ: जो कपूर जैसे उजले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं, सर्पराज को हार की तरह पहनते हैं और सदा भक्तों के हृदय-कमल में बसते हैं, उन भव (शिव) को माँ भवानी के साथ मैं नमन करता/करती हूँ।

    कर्पूरगौरं करुणावतारं: पूरा पाठ और अर्थ

    विकल्प
    आरती न आती हो तो दीपक घुमाते हुए "ॐ नमः शिवाय" बोलें।
    आरतीॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारापूरी शिव जी की आरती पढ़ें
  11. ११भोर: स्नान, पूजा और प्रार्थना

    क्या करें
    सूर्योदय होने पर फिर स्नान करके शिव जी की पूजा करें, पुष्पांजलि दें और व्रत उन्हें अर्पित करें।
    कैसे करें
    शिव पुराण कहता है कि सुबह फिर स्नान करके पूजा और अभिषेक करें, हाथ जोड़कर प्रार्थना करें और फूलों की अंजलि चढ़ाएँ। दोनों हाथों में फूल लेकर नीचे दिया श्लोक पढ़ें और फूल शिवलिंग पर चढ़ा दें।
    भाव
    व्रत का जो भी फल हो, वह मेरा नहीं, शिव का।
    पाठ

    अनेनैवोपवासेन यज्जातं फलमेव च।
    तेनैव प्रीयतां देवः शङ्करः सुखदायकः॥

    अर्थ: इस उपवास से जो भी फल बना हो, उसी से सुख देने वाले देव शंकर प्रसन्न हों।

    स्रोत: शिव पुराण, कोटिरुद्र संहिता 38.80; शिवरात्रि व्रत के अंत की प्रार्थना।

    विकल्प
    श्लोक न पढ़ सकें तो हिंदी में कहें: "हे शंकर, इस व्रत का जो भी फल हो, वह आपको अर्पित है।"
  12. १२दान और पारण

    क्या करें
    अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करें, फिर व्रत खोलें।
    कैसे करें
    शिव पुराण यथाशक्ति दान और ब्राह्मणों व संन्यासियों को भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करने की बात कहता है। आज के घरों में किसी ज़रूरतमंद को भोजन, फल या कपड़े देना इसी भाव का रूप है। पारण हल्के, सात्विक भोजन से करें; भारी तला हुआ खाना धीरे-धीरे।
    भाव
    जो मिला, उसमें से बाँटकर फिर ग्रहण करना।
    विकल्प
    दान के लिए कुछ न हो तो किसी की सेवा या मदद का संकल्प भी दान है।

पूजा में पढ़े जाने वाले पाठ

शिव

लिङ्गाष्टकम्

शिव · अष्टकम् · संस्कृत

निशीथ काल की पूजा में, अभिषेक के बाद

शिव

बिल्वाष्टकम्

शिव · अष्टकम् · संस्कृत

दूसरे पहर में बेलपत्र चढ़ाते समय

शिव

शिव मानस पूजा

शिव · स्तोत्र · संस्कृत

जो सामग्री न जुटा सकें, वे इससे मन से पूरी पूजा करें

भोग

  • पहले पहर: घर का बना पकवान (व्रत वाले घरों में फलाहारी)
  • दूसरे पहर: खीर
  • तीसरे पहर: पुए
  • चौथे पहर: कोई मीठा पकवान
  • मौसमी फल: बेर, केला, अनार, बेल

यह क्रम शिव पुराण के वर्णन से है; हर पहर अलग भोग बनाना ज़रूरी नहीं, एक ही भोग चारों पहर रखा जा सकता है। व्रत रखने वाले परिवार अनाज की जगह फलाहार का भोग रखते हैं। भोग शिवलिंग के ऊपर नहीं, सामने थाली में रखें; वही सुबह प्रसाद के रूप में बँटता है।

प्रार्थना और समापन

हे महादेव, इस रात आपने मुझे जागने, आपका नाम लेने और आपकी पूजा करने का अवसर दिया। जो कुछ बन पड़ा, वह आपको अर्पित है। मेरे मन से भय और आलस दूर करें, मेरे घर में सदा आपका भजन होता रहे, और परिवार में शांति बनी रहे।

क्षमा प्रार्थना

तावकस्त्वद्गतप्राणस्त्वच्चित्तोऽहं सदा मृड।
कृपानिधे इति ज्ञात्वा यथायोग्यं तथा कुरु॥
अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाज्जपपूजादिकं मया।
कृपानिधित्वाज्ज्ञात्वैव भूतनाथ प्रसीद मे॥

अर्थ: हे मृड (सुख देने वाले शिव), मैं आपका हूँ; मेरे प्राण और मेरा मन सदा आप में है। हे कृपा के सागर, यह जानकर जो उचित हो वही करें। हे भूतनाथ, मैंने अनजाने में या जानते हुए जो भी जप-पूजा की है, आप कृपा के सागर हैं, यही जानकर मुझ पर प्रसन्न हों।

स्रोत: शिव पुराण, कोटिरुद्र संहिता 38.78-79; शिवरात्रि व्रत पूरा होने पर की जाने वाली प्रार्थना।

पूजा के बाद

  • सुबह की पूजा के बाद प्रसाद बाँटें और फिर पारण करें।
  • रात भर चढ़ा जल और दूध गमलों या पेड़ों की जड़ में डाल दें; फूल, बेलपत्र और अनाज मिट्टी में दबा दें या पक्षियों के लिए रख दें।
  • शिवलिंग को साफ़ जल से धोकर पोंछ दें, ताकि दूध और शहद की चिकनाई न रहे।
  • अगले दिन थकान हो तो आराम करें। जागरण भाव का है, शरीर पर ज़बरदस्ती का नहीं।

समय कम हो तो: छोटी विधि

  1. सुबह स्नान, शिव पूजा और व्रत का संकल्प।
  2. दिन में व्रत, अपनी सेहत के अनुसार।
  3. शाम को फिर स्नान, दीपक जलाकर गणेश जी को प्रणाम।
  4. रात में एक बार (निशीथ काल में) या चारों पहर: जल-अभिषेक, बेलपत्र, फूल, धूप-दीप और भोग।
  5. पहरों के बीच "ॐ नमः शिवाय" का जाप, शिव चालीसा, कथा और भजन।
  6. हर पूजा के अंत में "ॐ जय शिव ओंकारा" से आरती।
  7. भोर में स्नान, पूजा, प्रार्थना और दान के बाद पारण।

परंपराओं में अंतर

  • किस पहर में क्या चढ़े, इसकी कई प्रचलित सूचियाँ हैं; कई घरों में हर पहर में अलग द्रव्य, जैसे दूध, दही, घी और शहद, से अभिषेक की रीति है। शिव पुराण का वर्णन इससे अलग है: वहाँ पहले पहर में पाँच द्रव्य और जलधारा, और बाद के पहरों में अलग अन्न, फूल, अर्घ्य और भोग बताए गए हैं। दोनों रीतियाँ घरों में चलती हैं।
  • बहुत-से परिवार दिन में या रात में मंदिर जाकर शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं और घर में केवल जागरण करते हैं; कई घरों में पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा होती है।
  • कई जगह इस रात को शिव-पार्वती विवाह से भी जोड़ा जाता है, और शिव बारात या विवाह-कथा का आयोजन होता है। कश्मीरी पंडित परिवारों में यह पर्व "हेरथ" कहलाता है और उसकी अपनी अलग पूजा-परंपरा है।
  • व्रत के भोजन में घरों की रीतियाँ अलग हैं: कोई निर्जल रहता है, कोई फल-दूध लेता है, कोई एक समय सेंधा नमक वाला फलाहार करता है।
  • पारण के समय पर दो मत हैं: चतुर्दशी समाप्त होने से पहले, या उसके बाद। अपने परिवार और स्थानीय पंचांग की रीति मानें।

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घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

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स्रोत और समीक्षा

समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): Structure follows Shiva Purana, Koti Rudra Samhita ch. 38 (sanskritdocuments.org text): nishitha-vyapini chaturdashi (24), morning routine and sankalp verses 28-29 (quoted verbatim), second bath (32-33), the four prahar worship with their dravyas, flowers, arghya fruits and naivedya (47-74), the eight names (54, quoted), name-mantra when no guru mantra (51), dawn worship (75-77) and prayers 78-80 (quoted verbatim), yathashakti (43), women and children (22). The common milk/curd/ghee/honey-per-prahar list is mentioned only as a household custom, not attributed to the Purana. Once-or-four-times, nishita and the two parana views from Drik Panchang. Bilva plucking rule from Gita Press. Mantra lines from the site's mantra pages; Karpur Gauram from shlokam.org.

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या चारों पहर की पूजा करना ज़रूरी है?

नहीं। रात में एक बार की पूजा भी पूरी पूजा है; एक बार करें तो आधी रात का निशीथ काल सबसे उत्तम माना जाता है। चारों पहर की पूजा उन लोगों के लिए है जो रात भर जागकर साधना करना चाहते हैं। परिवार में पहर बाँट लेना भी अच्छा तरीका है।

क्या पूरी रात जागना ज़रूरी है?

जागरण इस पर्व का केंद्र है, पर इसे ज़बरदस्ती न बनाएँ। जितना जाग सकें, उतना समय नाम-स्मरण, कथा और भजन में बिताएँ। बच्चों, बुज़ुर्गों, बीमार लोगों और जिन्हें सुबह काम पर जाना हो, उनके लिए कुछ घंटे का जागरण भी पूरा है।

व्रत में पानी पी सकते हैं? दवा ले सकते हैं?

निर्जल व्रत एक परंपरा है, नियम नहीं। फल, दूध और पानी लेकर भी व्रत रखा जाता है। नियमित दवा कभी न छोड़ें। गर्भावस्था, मधुमेह, रक्तचाप या किसी बीमारी में व्रत रखने से पहले अपने चिकित्सक से पूछ लें। व्रत न रख सकें तो भी पूजा और जागरण पूरे हैं; शिव पुराण भी व्रत को अपनी शक्ति के अनुसार करने की बात कहता है।

निशीथ काल क्या होता है?

आधी रात के आसपास का लगभग पौन घंटे का समय निशीथ काल कहलाता है। शिवरात्रि की पूजा के लिए इसे सबसे मुख्य समय माना जाता है। यह हर शहर में थोड़ा अलग होता है; यहीं के महाशिवरात्रि वाले पन्ने पर हर साल का निशीथ काल दिया गया है।

महाशिवरात्रि और मासिक शिवरात्रि में क्या अंतर है?

हर महीने की कृष्ण चतुर्दशी मासिक शिवरात्रि है। फाल्गुन महीने की कृष्ण चतुर्दशी (अमांत में माघ) महाशिवरात्रि कहलाती है और साल की सबसे बड़ी शिवरात्रि मानी जाती है। मासिक शिवरात्रि पर भी यही पूजा छोटे रूप में की जा सकती है।

घर में शिवलिंग न हो तो क्या करें?

शिव जी की तस्वीर के सामने यही क्रम रखें और जल एक पात्र में अर्पित करें। दिन में मंदिर जाकर शिवलिंग पर जल चढ़ा सकते हैं और रात का जागरण घर में। शिव मानस पूजा का पाठ भी कर सकते हैं, जिसमें पूरी पूजा मन से होती है।

मासिक धर्म के दिनों में महाशिवरात्रि आए तो?

इस पर परिवारों की रीतियाँ अलग हैं। कई घरों में इन दिनों शिवलिंग छूने और विधिवत पूजा से विराम लिया जाता है और पूजा कोई और सदस्य करता है; कई घर ऐसा नहीं मानते। व्रत, जागरण, मन में "ॐ नमः शिवाय" का जाप और कथा सुनना आम तौर पर हर स्थिति में किया जाता है। अपने घर की रीति और अपनी सेहत के अनुसार चलें; इसमें अपराध-बोध की कोई बात नहीं।

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इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।

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