शिव

स्तोत्र · शिव · स्तोत्र

द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग स्तोत्रम्

बारह ज्योतिर्लिंगों की स्तुति के बारह श्लोक, सोमनाथ से घृष्णेश्वर तक, हर एक का स्थान और महिमा। आदि शंकराचार्य का माना जाने वाला स्तोत्र, अर्थ सहित।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. भावार्थ
  4. फलश्रुति
  5. कब पढ़ें
  6. विधि
  7. पाठ-भेद
  8. रचयिता और स्रोत
  9. ये भी पढ़ें
  10. सवाल-जवाब
  11. सुधार सुझाएँ

सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम् ।भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये ॥१॥

saurāṣṭradeśe viśade’tiramye jyotirmayaṃ candrakalāvataṃsam |
bhaktipradānāya kṛpāvatīrṇaṃ taṃ somanāthaṃ śaraṇaṃ prapadye ||

अर्थ: जो सौराष्ट्र के निर्मल और अत्यंत रमणीय प्रदेश में ज्योति-स्वरूप होकर विराजते हैं, जिनके सिर पर चन्द्रमा की कला आभूषण है, और जो भक्ति देने के लिए कृपा करके अवतरित हुए, उन सोमनाथ की मैं शरण लेता हूँ।

सौराष्ट्र
गुजरात का सौराष्ट्र प्रदेश
विशद
निर्मल, उजला
ज्योतिर्मय
प्रकाश-स्वरूप
चन्द्रकलावतंस
चन्द्रमा की कला को आभूषण बनाने वाले
कृपावतीर्ण
कृपा से अवतरित
शरणं प्रपद्ये
शरण लेता हूँ

श्रीशैलशृङ्गे विविधप्रसङ्गे शेषाद्रिशृङ्गेऽपि सदा वसन्तम् ।तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेनं नमामि संसारसमुद्रसेतुम् ॥२॥

śrīśailaśṛṅge vividhaprasaṅge śeṣādriśṛṅge’pi sadā vasantam |
tamarjunaṃ mallikapūrvamenaṃ namāmi saṃsārasamudrasetum ||

अर्थ: जो अनेक प्रसंगों (कथाओं) वाले श्रीशैल पर्वत के शिखर पर और शेषाद्रि के शिखर पर भी सदा निवास करते हैं, संसार-सागर के पुल उन मल्लिकार्जुन को मैं नमस्कार करता हूँ।

श्रीशैल
आंध्र प्रदेश का पर्वत, मल्लिकार्जुन का धाम
शृङ्ग
शिखर
प्रसङ्ग
कथा, घटना
शेषाद्रि
शेष पर्वत
मल्लिकार्जुन
श्रीशैल के शिव; परंपरा में मल्लिका को पार्वती और अर्जुन को शिव का नाम माना जाता है
सेतु
पुल

अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम् ।अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम् ॥३॥

avantikāyāṃ vihitāvatāraṃ muktipradānāya ca sajjanānām |
akālamṛtyoḥ parirakṣaṇārthaṃ vande mahākālamahāsureśam ||

अर्थ: जिन्होंने सज्जनों को मुक्ति देने और अकाल मृत्यु से रक्षा करने के लिए अवन्तिका (उज्जैन) में अवतार लिया, देवताओं के महान स्वामी उन महाकाल की मैं वन्दना करता हूँ।

अवन्तिका
उज्जैन का प्राचीन नाम
विहितावतार
जिन्होंने अवतार लिया
सज्जन
भले लोग
अकालमृत्यु
समय से पहले मृत्यु
परिरक्षण
रक्षा
महासुरेश
देवताओं के महान स्वामी

कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय ।सदैव मान्धातृपुरे वसन्तं ओङ्कारमीशं शिवमेकमीडे ॥४॥

kāverikānarmadayoḥ pavitre samāgame sajjanatāraṇāya |
sadaiva māndhātṛpure vasantaṃ oṅkāramīśaṃ śivamekamīḍe ||

अर्थ: जो कावेरी और नर्मदा के पवित्र संगम पर, सज्जनों को तारने के लिए मान्धाता नगर में सदा निवास करते हैं, उन एक ओंकारेश्वर शिव की मैं स्तुति करता हूँ।

कावेरिका
कावेरी, ओंकारेश्वर में नर्मदा से मिलने वाली धारा
समागम
संगम
तारण
पार उतारना
मान्धातृपुर
मान्धाता, ओंकारेश्वर का द्वीप-नगर
ईडे
स्तुति करता हूँ

पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने सदा वसन्तं गिरिजासमेतम् ।सुरासुराराधितपादपद्मं श्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि ॥५॥

pūrvottare prajvalikānidhāne sadā vasantaṃ girijāsametam |
surāsurārādhitapādapadmaṃ śrīvaidyanāthaṃ tamahaṃ namāmi ||

अर्थ: जो पूर्व-उत्तर दिशा में प्रज्वलिका नामक स्थान पर पार्वती सहित सदा निवास करते हैं, जिनके चरण-कमलों की आराधना देवता और असुर दोनों करते हैं, उन श्रीवैद्यनाथ को मैं नमस्कार करता हूँ।

पूर्वोत्तर
पूर्व और उत्तर के बीच की दिशा
निधान
स्थान
गिरिजा
पार्वती
समेत
सहित
आराधित
पूजित
पादपद्म
चरण-कमल

याम्ये सदङ्गे नगरेऽतिरम्ये विभूषिताङ्गं विविधैश्च भोगैः ।सद्भक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकं श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये ॥६॥

yāmye sadaṅge nagare’tiramye vibhūṣitāṅgaṃ vividhaiśca bhogaiḥ |
sadbhaktimuktipradamīśamekaṃ śrīnāganāthaṃ śaraṇaṃ prapadye ||

अर्थ: जो दक्षिण दिशा के अत्यंत रमणीय सदङ्ग नगर में अनेक प्रकार के भोगों (उपचारों) से सजे हुए विराजते हैं, सच्ची भक्ति और मुक्ति देने वाले उन एक ईश्वर श्रीनागनाथ की मैं शरण लेता हूँ।

याम्य
दक्षिण दिशा का
विभूषित
सजा हुआ
भोग
पूजा के उपचार, भोग-सामग्री
सद्भक्ति
सच्ची भक्ति
मुक्तिप्रद
मुक्ति देने वाले
नागनाथ
नागों के स्वामी, नागेश्वर

महाद्रिपार्श्वे च तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः ।सुरासुरैर्यक्षमहोरगाढ्यैः केदारमीशं शिवमेकमीडे ॥७॥

mahādripārśve ca taṭe ramantaṃ sampūjyamānaṃ satataṃ munīndraiḥ |
surāsurairyakṣamahoragāḍhyaiḥ kedāramīśaṃ śivamekamīḍe ||

अर्थ: जो महान पर्वत (हिमालय) के पास नदी-तट पर रमते हैं, जिनकी पूजा श्रेष्ठ मुनि, देवता, असुर, यक्ष और बड़े नाग निरंतर करते हैं, उन एक केदारेश्वर शिव की मैं स्तुति करता हूँ।

महाद्रि
महान पर्वत
पार्श्व
पास, बगल
तट
किनारा
सम्पूज्यमान
पूजे जाते हुए
मुनीन्द्र
श्रेष्ठ मुनि
महोरग
बड़े नाग
केदार
केदारनाथ

सह्याद्रिशीर्षे विमले वसन्तं गोदावरितीरपवित्रदेशे ।यद्दर्शनात्पातकमाशु नाशं प्रयाति तं त्र्यम्बकमीशमीडे ॥८॥

sahyādriśīrṣe vimale vasantaṃ godāvaritīrapavitradeśe |
yaddarśanātpātakamāśu nāśaṃ prayāti taṃ tryambakamīśamīḍe ||

अर्थ: जो सह्याद्रि पर्वत के निर्मल शिखर पर, गोदावरी के तट के पवित्र प्रदेश में निवास करते हैं, और जिनके दर्शन से पाप शीघ्र नष्ट होते हैं, ऐसा श्लोक कहता है, उन त्र्यम्बकेश्वर की मैं स्तुति करता हूँ।

सह्याद्रि
पश्चिमी घाट का पर्वत
शीर्ष
शिखर
विमल
निर्मल
गोदावरी
नदी, जिसका उद्गम त्र्यम्बक के पास है
पातक
पाप
आशु
शीघ्र
त्र्यम्बक
तीन नेत्रों वाले शिव

सुताम्रपर्णीजलराशियोगे निबध्य सेतुं विशिखैरसङ्ख्यैः ।श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तं रामेश्वराख्यं नियतं नमामि ॥९॥

sutāmraparṇījalarāśiyoge nibadhya setuṃ viśikhairasaṅkhyaiḥ |
śrīrāmacandreṇa samarpitaṃ taṃ rāmeśvarākhyaṃ niyataṃ namāmi ||

अर्थ: जहाँ ताम्रपर्णी नदी समुद्र से मिलती है, वहाँ अनगिनत बाणों से सेतु बाँधकर श्रीरामचन्द्र ने जिनकी स्थापना और पूजा की, उन रामेश्वर को मैं नियम से नमस्कार करता हूँ।

ताम्रपर्णी
दक्षिण भारत की एक नदी
जलराशि
समुद्र
योग
मिलन
निबध्य
बाँधकर
सेतु
पुल
विशिख
बाण
नियतम्
नियम से, सदा

यं डाकिनिशाकिनिकासमाजे निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च ।सदैव भीमादिपदप्रसिद्धं तं शङ्करं भक्तहितं नमामि ॥१०॥

yaṃ ḍākiniśākinikāsamāje niṣevyamāṇaṃ piśitāśanaiśca |
sadaiva bhīmādipadaprasiddhaṃ taṃ śaṅkaraṃ bhaktahitaṃ namāmi ||

अर्थ: जिनकी सेवा डाकिनी-शाकिनियों के समूह और मांस खाने वाले भूत-गण करते हैं, जो सदा 'भीम' नाम से प्रसिद्ध हैं, भक्तों का हित करने वाले उन (भीमशंकर) शंकर को मैं नमस्कार करता हूँ।

डाकिनी-शाकिनी
शिव और देवी के गणों में गिनी जाने वाली शक्तियाँ; 'डाकिनी' भीमशंकर के क्षेत्र का नाम भी बताया जाता है
समाज
समूह
निषेव्यमाण
जिनकी सेवा होती है
पिशिताशन
मांस खाने वाले, भूत-गण
भीम
भीमशंकर
भक्तहित
भक्तों का भला करने वाले

सानन्दमानन्दवने वसन्तमानन्दकन्दं हतपापवृन्दम् ।वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये ॥११॥

sānandamānandavane vasantamānandakandaṃ hatapāpavṛndam |
vārāṇasīnāthamanāthanāthaṃ śrīviśvanāthaṃ śaraṇaṃ prapadye ||

अर्थ: जो आनन्दवन (काशी) में आनंद से निवास करते हैं, जो आनंद के मूल हैं और पापों के समूह का नाश करते हैं, उन वाराणसी के स्वामी, अनाथों के नाथ श्रीविश्वनाथ की मैं शरण लेता हूँ।

आनन्दवन
काशी का एक नाम
आनन्दकन्द
आनंद की जड़
हत
नष्ट किया
वृन्द
समूह
अनाथनाथ
अनाथों के स्वामी
विश्वनाथ
विश्व के स्वामी

इलापुरे रम्यविशालकेऽस्मिन् समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम् ।वन्दे महोदारतरस्वभावं घृष्णेश्वराख्यं शरणं प्रपद्ये ॥१२॥

ilāpure ramyaviśālake’smin samullasantaṃ ca jagadvareṇyam |
vande mahodāratarasvabhāvaṃ ghṛṣṇeśvarākhyaṃ śaraṇaṃ prapadye ||

अर्थ: जो इलापुर के रमणीय और विशाल स्थान में शोभा पाते हैं, जो जगत में सबसे वरणीय हैं, जिनका स्वभाव अत्यंत उदार है, उन घृष्णेश्वर की मैं वन्दना करता हूँ और उनकी शरण लेता हूँ।

इलापुर
एलोरा के पास का क्षेत्र
विशालक
विशाल स्थान
समुल्लसन्त
शोभा पाते हुए
जगद्वरेण्य
जगत में सबसे श्रेष्ठ
महोदार
बहुत उदार
घृष्णेश्वर
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

ज्योतिर्मयद्वादशलिङ्गकानां शिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण ।स्तोत्रं पठित्वा मनुजोऽतिभक्त्या फलं तदालोक्य निजं भजेच्च ॥१३॥

jyotirmayadvādaśaliṅgakānāṃ śivātmanāṃ proktamidaṃ krameṇa |
stotraṃ paṭhitvā manujo’tibhaktyā phalaṃ tadālokya nijaṃ bhajecca ||

अर्थ: शिव-स्वरूप बारह ज्योतिर्मय लिंगों का यह स्तोत्र क्रम से कहा गया है। श्लोक कहता है कि मनुष्य इसे बड़ी भक्ति से पढ़े, उसका फल अपने जीवन में देखे और अपने इष्ट (शिव) का भजन करता रहे।

ज्योतिर्मय
प्रकाश-स्वरूप
द्वादश
बारह
शिवात्मन्
शिव-स्वरूप
क्रमेण
क्रम से
अतिभक्त्या
बड़ी भक्ति से
आलोक्य
देखकर

॥ इति श्रीमद्शङ्कराचार्यविरचितं द्वादशज्योतिर्लिङ्गस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

|| iti śrīmadśaṅkarācāryaviracitaṃ dvādaśajyotirliṅgastotraṃ sampūrṇam ||

अर्थ: इस प्रकार श्री शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाने वाला द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग स्तोत्र पूरा हुआ।

परिचय

द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग स्तोत्र में शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों की एक-एक श्लोक में वन्दना है: सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकाल, ओंकारेश्वर, वैद्यनाथ, नागनाथ, केदारनाथ, त्र्यम्बकेश्वर, रामेश्वर, भीमशंकर, विश्वनाथ और घृष्णेश्वर। हर श्लोक उस धाम का स्थान, उसकी कथा का संकेत और शिव का कोई गुण बताता है।

यह तेरह श्लोकों का स्तोत्र है, जिसका अंतिम श्लोक फलश्रुति है। परंपरा इसे आदि शंकराचार्य की रचना मानती है। 'सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्' से आरम्भ होने वाला छोटा ज्योतिर्लिंग-स्मरण इससे अलग रचना है, जिसमें केवल धामों के नाम हैं।

भावार्थ

ज्योतिर्लिंग वे बारह धाम हैं जहाँ शिव को ज्योति-स्वरूप लिंग के रूप में पूजा जाता है। यह स्तोत्र पश्चिम में सौराष्ट्र के सोमनाथ से आरम्भ होकर दक्षिण में श्रीशैल के मल्लिकार्जुन, मध्य भारत में उज्जैन के महाकाल और नर्मदा के ओंकारेश्वर, फिर वैद्यनाथ, नागनाथ, हिमालय के केदारनाथ, गोदावरी तट के त्र्यम्बकेश्वर, समुद्र-तट के रामेश्वर, भीमशंकर, काशी के विश्वनाथ और इलापुर के घृष्णेश्वर तक जाता है।

हर श्लोक में धाम के साथ शिव का कोई भाव जुड़ा है: सोमनाथ भक्ति देने के लिए अवतरित हैं, मल्लिकार्जुन संसार-सागर का पुल हैं, महाकाल अकाल मृत्यु से रक्षा करते हैं, रामेश्वर की स्थापना श्रीराम ने की, और विश्वनाथ अनाथों के नाथ हैं। इस तरह यह स्तोत्र पढ़ने वाले को घर बैठे बारहों धामों का स्मरण करा देता है।

अंतिम श्लोक फलश्रुति है, जो भक्ति से इसके पाठ और फिर शिव-भजन की बात कहता है।

फलश्रुति

इस स्तोत्र की फलश्रुति कहती है कि बारह ज्योतिर्लिंगों का यह स्तोत्र क्रम से कहा गया है, और मनुष्य इसे बड़ी भक्ति से पढ़कर उसका फल देखे और शिव का भजन करे। यह स्तोत्र के अपने शब्द हैं।

ज्योतिर्मयद्वादशलिङ्गकानां शिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण ।
स्तोत्रं पठित्वा मनुजोऽतिभक्त्या फलं तदालोक्य निजं भजेच्च ॥

शिव-स्वरूप बारह ज्योतिर्मय लिंगों का यह स्तोत्र क्रम से कहा गया है। श्लोक कहता है कि मनुष्य इसे बड़ी भक्ति से पढ़े, उसका फल अपने जीवन में देखे और अपने इष्ट (शिव) का भजन करता रहे।

यह स्तोत्र कब पढ़ा जाता है

  • सावन मास, सोमवार और महाशिवरात्रि पर
  • किसी ज्योतिर्लिंग की यात्रा से पहले या दर्शन के समय
  • रोज़ सुबह की शिव पूजा में, बारहों धामों के स्मरण के लिए

पढ़ने की विधि

  • हर श्लोक पढ़ते समय उस ज्योतिर्लिंग का नाम और स्थान मन में लाएँ; अर्थ के साथ पढ़ने पर यह भारत की एक तीर्थ-यात्रा जैसा लगता है।
  • श्लोक उपजाति छन्द में हैं; हर पंक्ति के दो चरणों के बीच हल्का विराम लें।
  • पूरा स्तोत्र न हो सके तो केवल उस ज्योतिर्लिंग वाला श्लोक भी पढ़ सकते हैं जिसके दर्शन करने जा रहे हों।
पूरी विधिमहाशिवरात्रि पूजा विधिमहाशिवरात्रि पर घर में शिव पूजा: सुबह संकल्प, सेहत के अनुसार व्रत, रात में एक बार या चारों पहर की पूजा, जागरण, निशीथ काल और अगली सुबह पारण।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
श्लोक 1भक्तप्रदानाय कृपावतीर्णंstotranidhi.com और vignanam.org के एक पेज का पाठ; vignanam.org का दूसरा पेज sanskritdocuments.org की तरह 'भक्तिप्रदानाय' पढ़ता है। sanskritdocuments.org पर 'कृतावतारं' भी दूसरे पाठ के रूप में दिया है।
श्लोक 2श्रीशैलशृङ्गे विबुधातिसङ्गे तुलाद्रितुङ्गेऽपि मुदा वसन्तम् । तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकंsanskritdocuments.org का मुख्य पाठ। यहाँ उसका दिया दूसरा पाठ ('विविधप्रसङ्गे शेषाद्रिशृङ्गेऽपि सदा वसन्तम्', 'पूर्वमेनं') रखा गया, क्योंकि वही stotranidhi.com और vignanam.org में भी है।
श्लोक 5सदाशिवं तं गिरिजासमेतम्sanskritdocuments.org का पाठ; stotranidhi.com और vignanam.org में 'सदा वसन्तं' है, जो यहाँ रखा गया। sanskritdocuments.org पर 'पारलिकाभिधाने' और 'सततं नमामि' भी दूसरे पाठ हैं।
श्लोक 6सद्भुक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकंsanskritdocuments.org का पाठ (भोग और मोक्ष देने वाले); stotranidhi.com और vignanam.org में 'सद्भक्ति' है, जो यहाँ रखा गया। sanskritdocuments.org पर 'आमर्दसज्ञे नगरे च रम्ये' भी दूसरा पाठ है।
श्लोक 7हिमाद्रिपार्श्वे ... महोरगाद्यैःsanskritdocuments.org पर दूसरे पाठ के रूप में; stotranidhi.com में 'महोरगाद्यैः' है।
श्लोक 9श्रीताम्रपर्णीजलराशियोगे निबध्य सेतुं निशि बिल्वपत्रैःsanskritdocuments.org पर दूसरे पाठ के रूप में; vignanam.org के एक संस्करण में 'श्रीताम्रपर्णी' है।
श्लोक 12एलापुरीरम्यशिवालयेऽस्मिन् ... सदाशिवं तं विषणेश्वराख्यम्sanskritdocuments.org पर दूसरे पाठ के रूप में।
फलश्रुति के बादएतानि लिङ्गानि सदैव मर्त्याः प्रातः पठन्तोऽमलमानसाश्च । ते पुत्रपौत्रैश्च धनैरुदारैः सत्कीर्तिभाजः सुखिनो भवन्ति ॥sanskritdocuments.org कोष्ठक में यह एक और फलश्रुति श्लोक देता है; यह दूसरे स्रोतों में नहीं है, इसलिए पाठ में नहीं जोड़ा गया।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
आदि शंकराचार्य (परंपरा के अनुसार)
भाषा
संस्कृत

आदि शंकराचार्य की रचना मानी जाती है; संस्करणों के अंत में यही लिखा मिलता है, पर इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पाठ sanskritdocuments.org से लिया गया और हर पंक्ति stotranidhi.com और vignanam.org के दो संस्करणों से मिलाई गई। इस स्तोत्र में पाठ-भेद बहुत हैं। मुख्य पाठ sanskritdocuments.org का रखा गया; जहाँ उसका पाठ किसी और स्रोत में नहीं मिला और बाकी सब स्रोत एक दूसरा पाठ देते हैं (श्लोक 2, 5, 6), वहाँ वह दूसरा पाठ रखा गया। श्लोक 1 में sanskritdocuments.org की वर्तनी-भूल ('विश् अदे') और श्लोक 8 में 'यद्धर्शनात्' की जगह दूसरे स्रोतों का शुद्ध रूप लिया गया। सब पाठ-भेद ऊपर दिए गए हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

बारह ज्योतिर्लिंग कौन-से हैं?

सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर, वैद्यनाथ, नागेश्वर (नागनाथ), केदारनाथ, त्र्यम्बकेश्वर, रामेश्वरम्, भीमशंकर, काशी विश्वनाथ और घृष्णेश्वर। इस स्तोत्र में इन सबकी एक-एक श्लोक में वन्दना है।

'सौराष्ट्रे सोमनाथं च' वाला श्लोक और यह स्तोत्र एक ही हैं?

नहीं। 'सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्' से आरम्भ होने वाला छोटा पाठ ज्योतिर्लिंगों के नामों का स्मरण है। यह पेज 'सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये' से आरम्भ होने वाले तेरह श्लोकों के स्तोत्र का है।

क्या इसे आदि शंकराचार्य ने लिखा?

परंपरा इसे आदि शंकराचार्य की रचना मानती है और स्तोत्र के अंत में यही लिखा मिलता है। इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

कुछ ज्योतिर्लिंगों के स्थान को लेकर मतभेद क्यों है?

वैद्यनाथ, नागनाथ और भीमशंकर जैसे कुछ धामों के लिए एक से अधिक मंदिर अपना दावा करते हैं। स्तोत्र दिशा और संकेत देता है (जैसे पूर्वोत्तर, दक्षिण का सदङ्ग नगर, डाकिनी क्षेत्र), पर आज के किसी एक मंदिर का नाम नहीं लेता।

इसे कब पढ़ना अच्छा माना जाता है?

सावन, सोमवार और महाशिवरात्रि पर, और किसी ज्योतिर्लिंग की यात्रा के समय इसका पाठ बहुत होता है। इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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