शिव पूजा विधि
शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम् ।त्रिजन्मपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१॥
tridalaṃ triguṇākāraṃ trinetraṃ ca triyāyudham |
trijanmapāpasaṃhāraṃ ekabilvaṃ śivārpaṇam ||
अर्थ: तीन पत्तों वाला, तीनों गुणों का रूप, शिव के तीन नेत्रों और तीन आयुधों जैसा, और तीन जन्मों के पापों को मिटाने वाला एक बिल्वपत्र मैं शिव को अर्पित करता हूँ।
त्रिशाखैः बिल्वपत्रैश्च ह्यच्छिद्रैः कोमलैः शुभैः ।शिवपूजां करिष्यामि ह्येकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२॥
triśākhaiḥ bilvapatraiśca hyacchidraiḥ komalaiḥ śubhaiḥ |
śivapūjāṃ kariṣyāmi hyekabilvaṃ śivārpaṇam ||
अर्थ: तीन शाखाओं (पत्तों) वाले, बिना छेद के, कोमल और शुभ बिल्वपत्रों से मैं शिव की पूजा करूँगा; एक बिल्वपत्र शिव को अर्पित है।
अखण्ड बिल्व पत्रेण पूजिते नन्दिकेश्वरे ।शुद्ध्यन्ति सर्वपापेभ्यो ह्येकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३॥
akhaṇḍa bilva patreṇa pūjite nandikeśvare |
śuddhyanti sarvapāpebhyo hyekabilvaṃ śivārpaṇam ||
अर्थ: श्लोक कहता है कि नन्दी के स्वामी शिव की अखण्ड (बिना कटे-फटे) बिल्वपत्र से पूजा करने पर लोग सब पापों से शुद्ध हो जाते हैं; एक बिल्वपत्र शिव को अर्पित है।
शालिग्राम शिलामेकां विप्राणां जातु चार्पयेत् ।सोमयज्ञ महापुण्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४॥
śāligrāma śilāmekāṃ viprāṇāṃ jātu cārpayet |
somayajña mahāpuṇyaṃ ekabilvaṃ śivārpaṇam ||
अर्थ: श्लोक के अनुसार कभी ब्राह्मणों को एक शालिग्राम-शिला अर्पित करने और सोमयज्ञ करने का जो महान पुण्य है, वैसा ही है एक बिल्वपत्र शिव को अर्पित करना।
दन्तिकोटि सहस्राणि वाजपेय शतानि च ।कोटिकन्या महादानं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५॥
dantikoṭi sahasrāṇi vājapeya śatāni ca |
koṭikanyā mahādānaṃ ekabilvaṃ śivārpaṇam ||
अर्थ: श्लोक कहता है कि हज़ारों करोड़ हाथियों के दान, सैकड़ों वाजपेय यज्ञों और करोड़ों कन्यादान जैसे महादान के समान है एक बिल्वपत्र शिव को अर्पित करना।
लक्ष्म्यास्तनुत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम् ।बिल्ववृक्षं प्रयच्छामि ह्येकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६॥
lakṣmyāstanuta utpannaṃ mahādevasya ca priyam |
bilvavṛkṣaṃ prayacchāmi hyekabilvaṃ śivārpaṇam ||
अर्थ: जो लक्ष्मी जी के शरीर से उत्पन्न हुआ और महादेव को प्रिय है, वह बिल्ववृक्ष (उसका पत्र) मैं अर्पित करता हूँ; एक बिल्वपत्र शिव को अर्पित है।
दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम् ।अघोरपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७॥
darśanaṃ bilvavṛkṣasya sparśanaṃ pāpanāśanam |
aghorapāpasaṃhāraṃ ekabilvaṃ śivārpaṇam ||
अर्थ: श्लोक के अनुसार बिल्ववृक्ष का दर्शन और उसका स्पर्श पापों का नाश करता है और घोर पापों को मिटाता है; एक बिल्वपत्र शिव को अर्पित है।
मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे ।अग्रतः शिवरूपाय ह्येकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८॥
mūlato brahmarūpāya madhyato viṣṇurūpiṇe |
agrataḥ śivarūpāya hyekabilvaṃ śivārpaṇam ||
अर्थ: जो मूल में ब्रह्मा रूप, बीच में विष्णु रूप और अग्रभाग में शिव रूप है, उसे एक बिल्वपत्र अर्पित है।
बिल्वाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ ।सर्वपाप विनिर्मुक्तः शिवलोकमवाप्नुयात् ॥९॥
bilvāṣṭakamidaṃ puṇyaṃ yaḥ paṭhet śivasannidhau |
sarvapāpa vinirmuktaḥ śivalokamavāpnuyāt ||
अर्थ: यह श्लोक कहता है कि जो शिव के समीप इस पवित्र बिल्वाष्टक का पाठ करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर शिवलोक को प्राप्त करता है।
॥ इति बिल्वाष्टकम् ॥
|| iti bilvāṣṭakam ||
अर्थ: इस प्रकार बिल्वाष्टक पूरा हुआ।
बिल्वाष्टकम् बिल्वपत्र (बेलपत्र) की महिमा के आठ श्लोक हैं। हर श्लोक का अंत 'एकबिल्वं शिवार्पणम्' से होता है, यानी एक बिल्वपत्र शिव को अर्पित है। शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाते समय यह बहुत पढ़ा जाता है।
बिल्वाष्टक के कई संस्करण मिलते हैं और उनके श्लोक आपस में काफ़ी अलग हैं। यहाँ आठ श्लोकों और फलश्रुति वाला वह पाठ दिया गया है जो sanskritdocuments.org और stotranidhi.com दोनों पर इसी क्रम में मिलता है।
बिल्वाष्टकम् शिव को बिल्वपत्र अर्पित करने की भावना का स्तोत्र है। बेल का तीन पत्तों वाला पत्ता शिव के तीन नेत्रों, तीन गुणों और त्रिशूल जैसे तीन आयुधों का प्रतीक माना गया है, और स्तोत्र कहता है कि साबुत, कोमल और शुभ पत्तों से पूजा की जाए।
बीच के श्लोक बड़े-बड़े दानों और यज्ञों का नाम लेकर बताते हैं कि भक्ति से चढ़ाया गया एक बिल्वपत्र भी शिव को उतना ही प्रिय है। इसका भाव यह है कि शिव की पूजा में महँगी सामग्री से अधिक मूल्य सच्चे अर्पण का है।
अंतिम श्लोक फलश्रुति है, जो शिव के समीप इस अष्टक के पाठ का फल पापों से मुक्ति और शिवलोक की प्राप्ति बताता है।
इस स्तोत्र की फलश्रुति कहती है कि जो शिव के समीप इस पवित्र बिल्वाष्टक का पाठ करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर शिवलोक पाता है। बीच के कुछ श्लोक भी बिल्वपत्र अर्पण के पुण्य की बात करते हैं; ये सब स्तोत्र के अपने शब्द हैं।
बिल्वाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ ।
सर्वपाप विनिर्मुक्तः शिवलोकमवाप्नुयात् ॥यह श्लोक कहता है कि जो शिव के समीप इस पवित्र बिल्वाष्टक का पाठ करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर शिवलोक को प्राप्त करता है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| श्लोक 2 | त्रिशाखैर्बिल्वपत्रैश्च ... शिवपूजां करिष्यामि एकबिल्वं शिवार्पणम् | stotranidhi.com; कई जगह 'ह्येकबिल्वं' की जगह केवल 'एकबिल्वं' मिलता है, अर्थ वही है। |
| श्लोक 4 | सालग्रामशिलामेकां जातु विप्राय योऽर्पयेत् | stotranidhi.com का पाठ: जो कभी ब्राह्मण को एक शालिग्राम-शिला अर्पित करे। |
| श्लोक 6 | पार्वत्याः स्वेदसञ्जातं महादेवस्य च प्रियम् । बिल्ववृक्षं नमस्यामि एकबिल्वं शिवार्पणम् | stotranidhi.com का पाठ: पार्वती के स्वेद से उत्पन्न बिल्ववृक्ष को मैं नमस्कार करता हूँ। |
| श्लोक 7 और 8 के बीच | काशीक्षेत्रनिवासं च कालभैरवदर्शनम् । प्रयागमाधवं दृष्ट्वा ह्येकबिल्वं शिवार्पणम् | sanskritdocuments.org इस श्लोक को बिना संख्या के छापता है; stotranidhi.com के इस संस्करण में यह नहीं है, इसलिए यह आठ श्लोकों में नहीं गिना गया। |
| पूरा स्तोत्र | त्रिदलं त्रिगुणाकारं ... से आरम्भ होने वाला 14 श्लोकों का एक लंबा पाठ | vignanam.org पर यह अलग संस्करण है; पहला श्लोक और 'एकबिल्वं शिवार्पणम्' वाला अंत वही है, पर अधिकतर श्लोक भिन्न हैं। |
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पाठ sanskritdocuments.org से लिया गया और हर श्लोक stotranidhi.com के उसी संस्करण से मिलाया गया; vignanam.org का अलग संस्करण भी देखा गया। दोनों स्रोतों में आठ श्लोक और फलश्रुति इसी क्रम में हैं; श्लोक 4 और 6 के शब्द अलग हैं, यहाँ sanskritdocuments.org का पाठ रखा गया और दूसरा 'पाठ-भेद' में है। sanskritdocuments.org पर श्लोक 7 के बाद बिना संख्या का एक और श्लोक है, जिसे नहीं गिना गया। फलश्रुति की संख्या 9 stotranidhi.com के अनुसार है।
शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
शिव · आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा
शिव · चालीसा
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान
शिव · स्तोत्र · संस्कृत
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
शिव · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
महाशिवरात्रि पर घर में शिव पूजा: सुबह संकल्प, सेहत के अनुसार व्रत, रात में एक बार या चारों पहर की पूजा, जागरण, निशीथ काल और अगली सुबह पारण।
शिव · अष्टकम् · संस्कृत
नमामीशमीशाननिर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्
इसके रचयिता का नाम किसी प्रामाणिक स्रोत में नहीं मिलता। यह परंपरा से चला आ रहा स्तोत्र है।
इस स्तोत्र के कई क्षेत्रीय संस्करण बने, जिनमें 'एकबिल्वं शिवार्पणम्' वाला अंत समान है पर बीच के श्लोक बदलते हैं। यहाँ वह आठ श्लोकों वाला पाठ है जो दो स्रोतों में एक जैसा मिला; दूसरे पाठ 'पाठ-भेद' में दिए गए हैं।
स्तोत्र स्वयं तीन पत्तों वाले, बिना छेद के, कोमल और अखण्ड बिल्वपत्र की बात करता है (श्लोक 2 और 3)। वही परंपरा में चढ़ाया जाता है।
स्तोत्र का भाव अर्पण का है। बेलपत्र न मिले तो जल, फूल या केवल श्रद्धा से पाठ करना भी पूजा है।
इसका अर्थ है: एक बिल्वपत्र शिव को अर्पित है। हर श्लोक इसी वाक्य पर समाप्त होता है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।