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स्तोत्र · शिव · श्लोक

कर्पूरगौरं करुणावतारं

आरती के अंत में गाया जाने वाला शिव-पार्वती का प्रसिद्ध श्लोक 'कर्पूरगौरं करुणावतारं', उसका अर्थ, शब्दार्थ और उसके स्रोत के बारे में सही जानकारी।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. भावार्थ
  4. कब पढ़ें
  5. विधि
  6. पाठ-भेद
  7. रचयिता और स्रोत
  8. ये भी पढ़ें
  9. सवाल-जवाब
  10. सुधार सुझाएँ

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् ।सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि ॥

karpūragauraṃ karuṇāvatāraṃ saṃsārasāraṃ bhujagendrahāram |
sadā vasantaṃ hṛdayāravinde bhavaṃ bhavānīsahitaṃ namāmi ||

अर्थ: जो कपूर के समान उजले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं और सर्पों के राजा को हार की तरह पहनते हैं, जो सदा (भक्तों के) हृदय-कमल में निवास करते हैं, उन भव (शिव) को भवानी (पार्वती) सहित मैं नमस्कार करता हूँ।

कर्पूरगौर
कपूर जैसा उजला
करुणावतार
करुणा के अवतार
संसारसार
संसार का सार
भुजगेन्द्रहार
सर्पराज का हार पहनने वाले
हृदयारविन्द
हृदय रूपी कमल
भव
शिव का एक नाम
भवानी
पार्वती
नमामि
मैं नमस्कार करता हूँ

परिचय

'कर्पूरगौरं करुणावतारं' शिव का एक छोटा श्लोक है, जो घरों और मंदिरों में आरती के अंत में, कपूर की लौ घुमाते समय गाया जाता है। इसमें शिव को कपूर जैसा उजला, करुणा का अवतार, संसार का सार और सर्पराज का हार पहनने वाला बताकर, पार्वती सहित प्रणाम किया गया है।

यह श्लोक बहुत प्रसिद्ध है, पर इसका मूल ग्रंथ निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। यह बृहत्स्तोत्ररत्नाकर जैसे स्तोत्र-संग्रहों में शिव-स्तुति के एक श्लोक के रूप में मिलता है, और जीवनाथ के 'दीक्षाप्रकाश' नामक पूजा-ग्रंथ में शिव के ध्यान-श्लोक के रूप में उद्धृत है।

भावार्थ

इस एक श्लोक में शिव के रूप और स्वभाव दोनों का सार है। 'कर्पूरगौर' उनका उजला, शांत रूप है; 'करुणावतार' बताता है कि वे करुणा से ही प्रकट होते हैं; 'संसारसार' का अर्थ है कि वे इस संसार का सार और आधार हैं; और 'भुजगेन्द्रहार' उनके वैरागी वेश की याद दिलाता है।

दूसरी पंक्ति में भक्त उन्हें दूर कैलास पर नहीं, अपने हृदय-कमल में सदा निवास करते हुए देखता है, और शिव को अकेले नहीं, भवानी के साथ प्रणाम करता है। आरती के अंत में यह श्लोक पूरी पूजा को शिव-पार्वती के प्रणाम पर समाप्त करता है।

यह श्लोक कब पढ़ा जाता है

  • किसी भी आरती के अंत में, कपूर की आरती करते समय
  • शिव पूजा, सोमवार, प्रदोष, सावन और महाशिवरात्रि पर
  • दिन में कभी भी शिव और पार्वती के स्मरण के लिए

पढ़ने की विधि

  • आरती पूरी होने पर कपूर या दीप की लौ घुमाते हुए यह श्लोक धीमे, स्पष्ट स्वर में गाया जाता है। कितनी बार गाएँ, इसका कोई नियम नहीं है।
  • पढ़ते समय शिव का वह रूप मन में लाएँ जो श्लोक बताता है: कपूर जैसा उजला, करुणामय, गले में सर्प, और साथ में पार्वती।
  • अंतिम शब्द 'नमामि' पर हाथ जोड़कर प्रणाम करें।
पूरी विधिशिव पूजा विधिघर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
दूसरी पंक्तिसदा रमन्तं हृदयारविन्देजीवनाथ शर्मा के 'दीक्षाप्रकाश' (sa.wikisource.org) में शिव के ध्यान में यही पाठ है: जो सदा हृदय-कमल में रमण करते हैं।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
ज्ञात नहीं
ग्रंथ / स्रोत
मूल ग्रंथ निश्चित नहीं; स्तोत्र-संग्रहों (जैसे बृहत्स्तोत्ररत्नाकर) में मिलता है
भाषा
संस्कृत

sanskritdocuments.org पर यह शिवदत्त शास्त्री द्वारा संपादित बृहत्स्तोत्ररत्नाकर पर आधारित 'स्तुतिसङ्ग्रह' में शिवस्तुति का पहला श्लोक है। जीवनाथ शर्मा के 'दीक्षाप्रकाश' में यह शिव के ध्यान में 'सदा रमन्तं' पाठ के साथ आता है। इसे यजुर्वेद का मंत्र बताना सही नहीं है; वेद-संहिताओं में यह श्लोक नहीं मिलता।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): श्लोक sanskritdocuments.org के स्तुतिसङ्ग्रह (बृहत्स्तोत्ररत्नाकर पर आधारित) से लिया गया और sa.wikisource.org पर दीक्षाप्रकाश के पाठ से मिलाया गया। पहली पंक्ति दोनों स्रोतों में एक है; दूसरी पंक्ति में दीक्षाप्रकाश 'सदा रमन्तं' पढ़ता है, जबकि प्रचलित और स्तोत्र-संग्रह का पाठ 'सदा वसन्तं' है, जो यहाँ रखा गया। मूल ग्रंथ का पता नहीं चला, इसलिए रचयिता 'ज्ञात नहीं' लिखा गया है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या 'कर्पूरगौरं करुणावतारं' यजुर्वेद का मंत्र है?

नहीं। ऐसा अक्सर लिखा मिलता है, पर वेद-संहिताओं में यह श्लोक नहीं है। इसकी भाषा और छन्द (उपजाति) बाद के लौकिक संस्कृत के हैं।

इसे किसने लिखा?

रचयिता ज्ञात नहीं है। लोक में इसके बारे में कई कथाएँ कही जाती हैं, पर किसी प्रामाणिक ग्रंथ से उनकी पुष्टि नहीं होती।

यह कहाँ मिलता है?

यह बृहत्स्तोत्ररत्नाकर जैसे स्तोत्र-संग्रहों में शिवस्तुति के श्लोक के रूप में मिलता है, और 'दीक्षाप्रकाश' जैसे पूजा-ग्रंथों में शिव के ध्यान में उद्धृत है। इसका मूल ग्रंथ निश्चित नहीं है।

इसे आरती के अंत में क्यों गाते हैं?

आरती अक्सर कपूर से की जाती है, और यह श्लोक 'कर्पूरगौर' शिव का स्मरण कराता है; इसलिए यह आरती के समापन से जुड़ गया। यह एक परंपरा है, कोई अनिवार्य नियम नहीं।

'भवं भवानीसहितं नमामि' का क्या अर्थ है?

भव शिव का नाम है और भवानी पार्वती का। अर्थ है: मैं भव (शिव) को भवानी (पार्वती) सहित नमस्कार करता हूँ।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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