शिव पूजा विधि
शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गंनिर्मलभासितशोभितलिङ्गम् ।जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गंतत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥१॥
brahmamurārisurārcitaliṅgaṃ
nirmalabhāsitaśobhitaliṅgam |
janmajaduḥkhavināśakaliṅgaṃ
tatpraṇamāmi sadāśivaliṅgam ||
अर्थ: जिस लिंग की पूजा ब्रह्मा, विष्णु (मुरारि) और सब देवता करते हैं, जो निर्मल प्रकाश से शोभित है और जो जन्म से जुड़े दुःखों का नाश करता है, उस सदाशिव लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गंकामदहं करुणाकरलिङ्गम् ।रावणदर्पविनाशनलिङ्गंतत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥२॥
devamunipravarārcitaliṅgaṃ
kāmadahaṃ karuṇākaraliṅgam |
rāvaṇadarpavināśanaliṅgaṃ
tatpraṇamāmi sadāśivaliṅgam ||
अर्थ: जिसकी पूजा देवता और श्रेष्ठ मुनि करते हैं, जिसने कामदेव को भस्म किया, जो करुणा का भंडार है और जिसने रावण का घमंड तोड़ा, उस सदाशिव लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
सर्वसुगन्धसुलेपितलिङ्गंबुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम् ।सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गंतत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥३॥
sarvasugandhasulepitaliṅgaṃ
buddhivivardhanakāraṇaliṅgam |
siddhasurāsuravanditaliṅgaṃ
tatpraṇamāmi sadāśivaliṅgam ||
अर्थ: जिस पर हर प्रकार की सुगंध का लेप होता है, जो बुद्धि को बढ़ाने का कारण है और जिसकी वन्दना सिद्ध, देवता और असुर सभी करते हैं, उस सदाशिव लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
कनकमहामणिभूषितलिङ्गंफणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम् ।दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गंतत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥४॥
kanakamahāmaṇibhūṣitaliṅgaṃ
phaṇipativeṣṭitaśobhitaliṅgam |
dakṣasuyajñavināśanaliṅgaṃ
tatpraṇamāmi sadāśivaliṅgam ||
अर्थ: जो सोने और बड़ी-बड़ी मणियों से सजा है, जिस पर लिपटा सर्पराज उसकी शोभा बढ़ाता है और जिसने दक्ष के यज्ञ का नाश किया, उस सदाशिव लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गंपङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम् ।सञ्चितपापविनाशनलिङ्गंतत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥५॥
kuṅkumacandanalepitaliṅgaṃ
paṅkajahārasuśobhitaliṅgam |
sañcitapāpavināśanaliṅgaṃ
tatpraṇamāmi sadāśivaliṅgam ||
अर्थ: जो कुंकुम और चन्दन से लिपा है, कमल के हार से सुशोभित है और इकट्ठे हुए पापों का नाश करता है, उस सदाशिव लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
देवगणार्चितसेवितलिङ्गंभावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम् ।दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गंतत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥६॥
devagaṇārcitasevitaliṅgaṃ
bhāvairbhaktibhireva ca liṅgam |
dinakarakoṭiprabhākaraliṅgaṃ
tatpraṇamāmi sadāśivaliṅgam ||
अर्थ: जिसकी पूजा और सेवा देवगण करते हैं, जिसकी आराधना सच्चे भाव और भक्ति से ही होती है, और जिसकी प्रभा करोड़ों सूर्यों जैसी है, उस सदाशिव लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
अष्टदलोपरिवेष्टितलिङ्गंसर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम् ।अष्टदरिद्रविनाशनलिङ्गंतत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥७॥
aṣṭadalopariveṣṭitaliṅgaṃ
sarvasamudbhavakāraṇaliṅgam |
aṣṭadaridravināśanaliṅgaṃ
tatpraṇamāmi sadāśivaliṅgam ||
अर्थ: जो आठ पंखुड़ियों वाले कमल से घिरा है, जो सबकी उत्पत्ति का कारण है और जो आठ प्रकार की दरिद्रता का नाश करता है, उस सदाशिव लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
सुरगुरुसुरवरपूजितलिङ्गंसुरवनपुष्पसदार्चितलिङ्गम् ।परात्परं परमात्मकलिङ्गंतत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥८॥
suragurusuravarapūjitaliṅgaṃ
suravanapuṣpasadārcitaliṅgam |
parātparaṃ paramātmakaliṅgaṃ
tatpraṇamāmi sadāśivaliṅgam ||
अर्थ: जिसकी पूजा देवगुरु बृहस्पति और श्रेष्ठ देवता करते हैं, जिसकी अर्चना सदा देवताओं के उपवन के फूलों से होती है, जो परे से भी परे और परमात्मा-स्वरूप है, उस सदाशिव लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥९॥
liṅgāṣṭakamidaṃ puṇyaṃ yaḥ paṭhecchivasannidhau |
śivalokamavāpnoti śivena saha modate ||
अर्थ: यह श्लोक कहता है कि जो शिव के समीप इस पवित्र लिङ्गाष्टक का पाठ करता है, वह शिवलोक पाता है और शिव के साथ आनंदित होता है।
लिङ्गाष्टकम् शिवलिंग की स्तुति के आठ छोटे श्लोक हैं। हर श्लोक में शिवलिंग के तीन गुण बताए जाते हैं और चौथी पंक्ति हर बार एक ही रहती है: तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्, यानी उस सदाशिव लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
भाषा सरल है और लय गाने जैसी, इसलिए यह घरों और मंदिरों में शिवलिंग के अभिषेक और पूजा के समय बहुत गाया जाता है। अंत में एक श्लोक इसकी फलश्रुति है।
लिङ्गाष्टकम् शिवलिंग को शिव का प्रत्यक्ष रूप मानकर उसकी वन्दना करता है। पहले आठ श्लोकों में बताया गया है कि ब्रह्मा, विष्णु, देवता, मुनि, सिद्ध और असुर सब इस लिंग की पूजा करते हैं; यह चन्दन, कुंकुम, कमल-हार, सोने और मणियों से सजा है; और इसी ने कामदेव, दक्ष के यज्ञ और रावण के घमंड को परास्त किया।
स्तोत्र बार-बार याद दिलाता है कि यह लिंग केवल पत्थर का आकार नहीं, बल्कि परात्पर परमात्मा है, जो सबकी उत्पत्ति का कारण है और जिसकी आराधना सच्चे भाव और भक्ति से होती है। हर श्लोक के अंत का 'तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्' पाठ करने वाले के मन को बार-बार प्रणाम के भाव में लौटाता है।
अंतिम श्लोक फलश्रुति है, जो शिव के समीप इस अष्टक के पाठ का फल शिवलोक की प्राप्ति बताता है।
इस स्तोत्र की फलश्रुति कहती है कि जो शिव के समीप इस पवित्र लिङ्गाष्टक का पाठ करता है, वह शिवलोक को प्राप्त करता है और शिव के साथ आनंदित होता है। यह स्तोत्र के अपने शब्द हैं।
लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥यह श्लोक कहता है कि जो शिव के समीप इस पवित्र लिङ्गाष्टक का पाठ करता है, वह शिवलोक पाता है और शिव के साथ आनंदित होता है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| श्लोक 1 | निर्मलभाषितशोभितलिङ्गम् | sanskritdocuments.org पर दूसरे पाठ के रूप में दिया गया है। |
| श्लोक 2 | कामदहन करुणाकर लिङ्गम् | vignanam.org और sa.wikisource.org पर यही पाठ है; अर्थ वही है, कामदेव को जलाने वाला। |
| श्लोक 3 | सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गम् | sanskritdocuments.org का पाठ। stotranidhi.com, vignanam.org और sa.wikisource.org में 'सुगन्ध' है, इसलिए वही रखा गया। |
| श्लोक 7 | अष्टदरिद्रविनाशितलिङ्गम् | sanskritdocuments.org पर दूसरे पाठ के रूप में दिया गया है। |
| श्लोक 8 | परमपदं परमात्मकलिङ्गम् | stotranidhi.com और vignanam.org 'परात्परं' की जगह यह पाठ भी देते हैं। |
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति sanskritdocuments.org, stotranidhi.com और vignanam.org के पाठ से मिलाई गई; sa.wikisource.org का पाठ भी देखा गया। शब्द तीनों स्रोतों में एक हैं, केवल श्लोक 3 में sanskritdocuments.org 'सुगन्धि' पढ़ता है; वहाँ अधिक स्रोतों वाला 'सुगन्ध' रखा गया। वर्तनी (लिङ्गं, लिङ्गम्) और चार चरणों में पंक्तियाँ stotranidhi.com के अनुसार हैं। फलश्रुति वाले श्लोक पर स्रोतों में संख्या नहीं है; यहाँ उसे 9 गिना गया है।
शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
शिव · आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा
शिव · चालीसा
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान
शिव · स्तोत्र · संस्कृत
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
शिव · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
महाशिवरात्रि पर घर में शिव पूजा: सुबह संकल्प, सेहत के अनुसार व्रत, रात में एक बार या चारों पहर की पूजा, जागरण, निशीथ काल और अगली सुबह पारण।
शिव · अष्टकम् · संस्कृत
नमामीशमीशाननिर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्
इसके रचयिता का नाम किसी प्रामाणिक स्रोत में नहीं मिलता। यह परंपरा से चला आ रहा लोकप्रिय स्तोत्र है।
आठ श्लोक शिवलिंग की स्तुति के हैं और एक श्लोक अंत में फलश्रुति का है। 'अष्टक' नाम इन्हीं आठ श्लोकों के कारण है।
सदाशिव शिव का नाम है, जिसका अर्थ है सदा कल्याण करने वाले। सदाशिवलिङ्ग यानी सदाशिव का प्रतीक लिंग, जिसे भक्त शिव का ही रूप मानते हैं।
हाँ, बहुत से लोग जल या दूध से अभिषेक करते हुए या बिल्वपत्र चढ़ाते हुए इसे गाते हैं। फलश्रुति भी शिव के समीप पाठ की बात करती है।
स्तोत्र इनके नाम नहीं गिनाता। सामान्य अर्थ है जीवन के हर प्रकार का अभाव, चाहे धन का हो, ज्ञान का या मन की शांति का।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।