शिव

स्तोत्र · शिव · स्तोत्र

शिव मानस पूजा

मन में ही शिव की पूरी पूजा: आसन, स्नान, भोग, आरती और अंत में क्षमा-प्रार्थना। आदि शंकराचार्य का माना जाने वाला स्तोत्र, सरल अर्थ सहित।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. भावार्थ
  4. कब पढ़ें
  5. विधि
  6. रचयिता और स्रोत
  7. ये भी पढ़ें
  8. सवाल-जवाब
  9. सुधार सुझाएँ

रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरंनानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम् ।जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथादीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम् ॥१॥

ratnaiḥ kalpitamāsanaṃ himajalaiḥ snānaṃ ca divyāmbaraṃ
nānāratnavibhūṣitaṃ mṛgamadāmodāṅkitaṃ candanam |
jātīcampakabilvapatraracitaṃ puṣpaṃ ca dhūpaṃ tathā
dīpaṃ deva dayānidhe paśupate hṛtkalpitaṃ gṛhyatām ||

अर्थ: हे दयानिधि, हे पशुपति देव! रत्नों का आसन, हिमालय के शीतल जल से स्नान, अनेक रत्नों से सजा दिव्य वस्त्र, कस्तूरी की सुगंध वाला चन्दन, जूही, चम्पा और बिल्वपत्रों से बने फूल, धूप और दीप — यह सब मैंने हृदय में आपके लिए कल्पित किया है; इसे स्वीकार कीजिए।

कल्पित
कल्पना से रचा हुआ
हिमजल
बर्फ़ का, शीतल जल
दिव्याम्बर
दिव्य वस्त्र
मृगमद
कस्तूरी
जाती
जूही/चमेली का फूल
दयानिधि
दया के भंडार
हृत्कल्पित
हृदय में कल्पित

सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसंभक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम् ।शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्ज्वलंताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु ॥२॥

sauvarṇe navaratnakhaṇḍaracite pātre ghṛtaṃ pāyasaṃ
bhakṣyaṃ pañcavidhaṃ payodadhiyutaṃ rambhāphalaṃ pānakam |
śākānāmayutaṃ jalaṃ rucikaraṃ karpūrakhaṇḍojjvalaṃ
tāmbūlaṃ manasā mayā viracitaṃ bhaktyā prabho svīkuru ||

अर्थ: नवरत्नों के टुकड़ों से जड़े सोने के पात्र में घी, खीर, दूध-दही के साथ पाँच प्रकार के व्यंजन, केले, शरबत, अनेक प्रकार के शाक, कपूर से सुवासित स्वादिष्ट जल और पान — हे प्रभु, यह सब मैंने मन से भक्तिपूर्वक तैयार किया है; इसे स्वीकार कीजिए।

सौवर्ण
सोने का
पायस
खीर
भक्ष्य
खाने के पदार्थ
पयोदधि
दूध और दही
रम्भाफल
केला
पानक
शरबत, पेय
ताम्बूल
पान

छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलंवीणाभेरिमृदङ्गकाहलकला गीतं च नृत्यं तथा ।साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मयासङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो ॥३॥

chatraṃ cāmarayoryugaṃ vyajanakaṃ cādarśakaṃ nirmalaṃ
vīṇābherimṛdaṅgakāhalakalā gītaṃ ca nṛtyaṃ tathā |
sāṣṭāṅgaṃ praṇatiḥ stutirbahuvidhā hyetatsamastaṃ mayā
saṅkalpena samarpitaṃ tava vibho pūjāṃ gṛhāṇa prabho ||

अर्थ: छत्र, दो चँवर, पंखा, निर्मल दर्पण, वीणा, भेरी, मृदंग और काहल की मधुर ध्वनि, गीत और नृत्य, साष्टांग प्रणाम और अनेक प्रकार की स्तुतियाँ — हे विभु, यह सब मैंने संकल्प से आपको अर्पित किया है; हे प्रभु, मेरी यह पूजा ग्रहण कीजिए।

छत्र
छाता
चामर
चँवर
व्यजन
पंखा
आदर्श
दर्पण
भेरी
नगाड़ा
काहल
एक प्रकार का बड़ा वाद्य
साष्टाङ्ग
आठों अंगों से, लेटकर किया प्रणाम
सङ्कल्प
मन का निश्चय

आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहंपूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः ।सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरोयद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥४॥

ātmā tvaṃ girijā matiḥ sahacarāḥ prāṇāḥ śarīraṃ gṛhaṃ
pūjā te viṣayopabhogaracanā nidrā samādhisthitiḥ |
sañcāraḥ padayoḥ pradakṣiṇavidhiḥ stotrāṇi sarvā giro
yadyatkarma karomi tattadakhilaṃ śambho tavārādhanam ||

अर्थ: हे शम्भु! आप मेरी आत्मा हैं, गिरिजा (पार्वती) मेरी बुद्धि हैं, मेरे प्राण आपके साथी गण हैं, मेरा शरीर आपका घर है, इन्द्रियों से होने वाले भोग आपकी पूजा हैं, मेरी नींद समाधि की अवस्था है, मेरे पैरों का चलना आपकी परिक्रमा है, मेरी सारी वाणी आपकी स्तुति है; मैं जो-जो कर्म करता हूँ, वह सब आपकी आराधना है।

गिरिजा
पर्वत की पुत्री, पार्वती
मति
बुद्धि
सहचर
साथी
विषयोपभोग
इन्द्रियों के विषयों का भोग
समाधिस्थिति
समाधि की अवस्था
प्रदक्षिण
परिक्रमा
गिरः
वाणी, बातें
आराधन
उपासना

करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वाश्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम् ।विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्वजय जय करुणाब्धे श्रीमहादेवशम्भो ॥५॥

karacaraṇakṛtaṃ vākkāyajaṃ karmajaṃ vā
śravaṇanayanajaṃ vā mānasaṃ vāparādham |
vihitamavihitaṃ vā sarvametatkṣamasva
jaya jaya karuṇābdhe śrīmahādevaśambho ||

अर्थ: हाथों-पैरों से, वाणी और शरीर से, कर्मों से, कानों और आँखों से या मन से जो भी अपराध हुआ हो, चाहे वह करने योग्य काम छोड़ देने से हुआ हो या न करने योग्य काम करने से, हे करुणा के सागर महादेव शम्भु, उन सबको क्षमा कीजिए। आपकी जय हो, जय हो।

करचरण
हाथ और पैर
वाक्काय
वाणी और शरीर
श्रवणनयन
कान और आँखें
विहित
शास्त्र में बताया गया कर्तव्य
अविहित
जो करने योग्य न हो
क्षमस्व
क्षमा कीजिए
करुणाब्धि
करुणा का सागर

॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचिता शिवमानसपूजा समाप्ता ॥

|| iti śrīmacchaṅkarācāryaviracitā śivamānasapūjā samāptā ||

अर्थ: इस प्रकार श्री शंकराचार्य द्वारा रचित मानी जाने वाली शिव मानस पूजा पूरी हुई।

परिचय

शिव मानस पूजा में पूजा की हर सामग्री मन में कल्पित की जाती है: रत्नों का आसन, हिमालय के जल से स्नान, दिव्य वस्त्र, चन्दन, फूल, धूप-दीप, सोने के पात्र में भोग, छत्र-चँवर, गीत-नृत्य। भक्त कहता है कि यह सब मैंने हृदय में आपके लिए रचा है, इसे स्वीकार कीजिए।

चौथा श्लोक इस स्तोत्र का हृदय है: मेरी आत्मा आप हैं, मेरा शरीर आपका मन्दिर है, मेरा चलना आपकी परिक्रमा है और मैं जो भी करता हूँ, वह आपकी आराधना है। अंत में भूलों के लिए क्षमा माँगी जाती है। परंपरा इसे आदि शंकराचार्य की रचना मानती है।

भावार्थ

मानस पूजा का अर्थ है मन से की गई पूजा। पहले तीन श्लोकों में भक्त षोडशोपचार पूजा के सारे उपचार मन में रचकर शिव को अर्पित करता है: आसन, स्नान, वस्त्र, चन्दन, फूल, धूप, दीप, भोग, पान, छत्र, चँवर, दर्पण, संगीत, नृत्य, प्रणाम और स्तुति। ये सब सामग्रियाँ राजसी हैं, क्योंकि मन की पूजा में कोई कमी नहीं रहती।

चौथे श्लोक में पूजा पूरे जीवन में फैल जाती है। भक्त कहता है कि आप मेरी आत्मा हैं और मेरी बुद्धि पार्वती है; मेरा शरीर आपका मन्दिर है, नींद समाधि है, चलना परिक्रमा है और हर बात स्तुति है। इस तरह जो भी कर्म होता है, वह शिव की आराधना बन जाता है।

पाँचवें श्लोक में विनम्रता है: शरीर, वाणी, इन्द्रियों और मन से जाने-अनजाने हुई हर भूल के लिए करुणा के सागर शिव से क्षमा माँगी जाती है। इस स्तोत्र की कोई फलश्रुति नहीं है; इसका भाव ही इसका सार है।

यह स्तोत्र कब पढ़ा जाता है

  • रोज़ की शिव पूजा के अंत में, या जब बाहरी पूजा की सामग्री और समय न हो
  • सोमवार, प्रदोष, सावन और महाशिवरात्रि पर
  • यात्रा में, अस्पताल में या किसी भी ऐसी जगह जहाँ विधिवत पूजा संभव न हो

पढ़ने की विधि

  • आँखें बंद करके या शिव के चित्र के सामने बैठकर हर श्लोक पढ़ते हुए उसकी सामग्री को मन में देखें: आसन, स्नान, वस्त्र, फूल, भोग, आरती।
  • पहली बार पढ़ रहे हों तो पहले अर्थ पढ़ लें, क्योंकि इस स्तोत्र का भाव कल्पना से ही पूरा होता है।
  • पाँचवाँ श्लोक क्षमा-प्रार्थना है; इसे कई लोग किसी भी पूजा के अंत में भी पढ़ते हैं।
पूरी विधिशिव पूजा विधिघर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
आदि शंकराचार्य (परंपरा के अनुसार)
भाषा
संस्कृत

आदि शंकराचार्य की रचना मानी जाती है; संस्करणों के अंत में यही लिखा मिलता है, पर इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पाठ sanskritdocuments.org से लिया गया और हर पंक्ति stotranidhi.com से मिलाई गई; vignanam.org का पाठ भी देखा गया। तीनों स्रोतों में पाँचों श्लोकों के शब्द एक हैं; कोई पाठ-भेद नहीं मिला।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मानस पूजा क्या है?

मानस पूजा में पूजा की सामग्री और उपचार हाथ से नहीं, मन से अर्पित किए जाते हैं। इस स्तोत्र में भक्त हर वस्तु की कल्पना करके शिव को चढ़ाता है।

क्या मानस पूजा बाहरी पूजा की जगह कर सकते हैं?

जब सामग्री, समय या स्थान न हो, तब मन से की गई पूजा भी पूजा ही मानी जाती है। बहुत से लोग बाहरी पूजा के अंत में भी इसे पढ़ते हैं।

'आत्मा त्वं गिरिजा मतिः' का भाव क्या है?

भक्त अपने पूरे अस्तित्व को शिव-पार्वती का रूप मानता है: आत्मा शिव, बुद्धि पार्वती, शरीर मन्दिर। इससे रोज़ के हर काम को पूजा की तरह करने की प्रेरणा मिलती है।

क्या इसे आदि शंकराचार्य ने लिखा?

परंपरा इसे आदि शंकराचार्य की रचना मानती है और स्तोत्र के अंत में यही लिखा मिलता है। इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

इसकी कोई फलश्रुति है?

नहीं, इस स्तोत्र में कोई फलश्रुति नहीं है। अंत का श्लोक क्षमा-प्रार्थना है।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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