श्री राम पूजा विधि
राम · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में श्री राम और राम दरबार की सरल पूजा: ध्यान, तुलसी, भोग, राम-नाम जप, रामचरितमानस पाठ, आरती और क्षमा प्रार्थना, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

आरती · राम
तुलसीदास की विनय पत्रिका से श्री राम की आरती, जिसमें धूप, दीप और नैवेद्य मन के भाव हैं। पूरा पाठ, हर अंतरे का सरल अर्थ और भावार्थ।
ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन।हरन दुखदुंद गोबिंद आनंदघन॥
अर्थ: हे मन, रघुवीर श्री राम की ऐसी आरती कर, जो दुख और द्वंद्व हरने वाले हैं, स्वयं गोविंद हैं और आनंद से भरे हुए हैं।
अचर चर रूप हरि, सर्वगत, सर्वदाबसत, इति बासना धूप दीजै।दीप निजबोधगत कोह-मद-मोह-तमप्रौढ़ अभिमान चित्तवृत्ति छीजै॥
॥ ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन ॥
अर्थ: हरि जड़ और चेतन सब रूपों में, सब जगह और सदा बसते हैं; यही भावना धूप बनाकर अर्पित करो। आत्मज्ञान का दीपक जलाओ, जिससे क्रोध, घमंड और मोह का अँधेरा, और चित्त का बढ़ा हुआ अभिमान क्षीण हो जाए।
भाव अतिशय विशद प्रवर नैवेद्य शुभश्रीरमण परम संतोषकारी।प्रेम-तांबूल गत शूल संशय सकल,विपुल भव-बासना-बीजहारी॥
॥ ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन ॥
अर्थ: अत्यंत निर्मल और उत्तम भाव ही शुभ नैवेद्य है, जो लक्ष्मीपति भगवान को परम संतोष देता है। प्रेम ही पान है, जिससे सारी पीड़ाएँ और संशय मिट जाते हैं और संसार की वासनाओं के अनगिनत बीज नष्ट हो जाते हैं।
अशुभ-शुभ कर्म घृतपूर्ण दशवर्तिका,त्याग पावक, सतोगुण प्रकासं।भक्ति-वैराग्य-विज्ञान दीपावली,अर्पि नीराजनं जगनिवासं॥
॥ ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन ॥
अर्थ: अपने शुभ और अशुभ, सारे कर्मों का घी दस बत्तियों में भरो, उन्हें त्याग की आग से जलाओ, तो सतोगुण का प्रकाश होगा। भक्ति, वैराग्य और अनुभव से मिले ज्ञान के दीपों की पंक्ति बनाकर जगत में बसे प्रभु की आरती अर्पित करो।
बिमल हृदि-भवन कृत शांति-पर्यंक शुभ,शयन विश्राम श्रीरामराया।क्षमा-करुणा प्रमुख तत्र परिचारिका,यत्र हरि तत्र नहिं भेद-माया॥
॥ ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन ॥
अर्थ: निर्मल हृदय को भवन बनाओ और उसमें शांति का सुंदर पलंग बिछाओ, जिस पर राजा श्री राम विश्राम करें। वहाँ क्षमा और करुणा जैसी सेविकाएँ सेवा में रहें; जहाँ हरि हैं, वहाँ भेद और माया नहीं रहते।
आरती-निरत सनकादि, श्रुति, शेष, शिव,देवरिषि, अखिलमुनि तत्त्व-दरसी।करै सोइ तरै, परिहरै कामादि मल,वदति इति अमलमति दास तुलसी॥
॥ ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन ॥
अर्थ: आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि सनक आदि ऋषि, वेद, शेषनाग, शिव, देवर्षि नारद और तत्त्व को जानने वाले सब मुनि इसी आरती में लगे रहते हैं, और जो ऐसी आरती करता है, वह काम आदि मलों को छोड़कर तर जाता है। निर्मल बुद्धि वाले दास तुलसी यही कहते हैं।
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“ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन” गोस्वामी तुलसीदास का पद है, जो उनकी विनय पत्रिका में श्रीराम-आरती के रूप में आता है (पद 47)। गीता प्रेस के आरती-संग्रह में भी यह “भगवान् श्रीराम रघुवीर” शीर्षक से छपा है। यह मन से की जाने वाली आरती है: इसमें धूप, दीप, नैवेद्य और पान बाहर की चीज़ें नहीं, मन के भाव हैं।
तुलसीदास अपने मन से कहते हैं कि राम की आरती ऐसे कर: “हरि सब में बसते हैं”, यह भावना धूप हो; आत्मज्ञान दीपक हो; निर्मल भाव नैवेद्य हो; प्रेम पान हो; सारे कर्म घी बनकर त्याग की आग में जलें; और हृदय वह भवन हो जहाँ श्री राम शांति के पलंग पर विश्राम करें। भाषा ब्रज है और कुछ संस्कृतनिष्ठ; हर अंतरे का सरल अर्थ नीचे दिया है।
हे मन, रघुवीर श्री राम की ऐसी आरती कर, जो दुख और द्वंद्व हरने वाले हैं, स्वयं गोविंद हैं और आनंद से भरे हुए हैं।
हरि जड़ और चेतन सब रूपों में, सब जगह और सदा बसते हैं; यही भावना धूप बनाकर अर्पित करो। आत्मज्ञान का दीपक जलाओ, जिससे क्रोध, घमंड और मोह का अँधेरा, और चित्त का बढ़ा हुआ अभिमान क्षीण हो जाए।
अत्यंत निर्मल और उत्तम भाव ही शुभ नैवेद्य है, जो लक्ष्मीपति भगवान को परम संतोष देता है। प्रेम ही पान है, जिससे सारी पीड़ाएँ और संशय मिट जाते हैं और संसार की वासनाओं के अनगिनत बीज नष्ट हो जाते हैं।
अपने शुभ और अशुभ, सारे कर्मों का घी दस बत्तियों में भरो, उन्हें त्याग की आग से जलाओ, तो सतोगुण का प्रकाश होगा। भक्ति, वैराग्य और अनुभव से मिले ज्ञान के दीपों की पंक्ति बनाकर जगत में बसे प्रभु की आरती अर्पित करो।
निर्मल हृदय को भवन बनाओ और उसमें शांति का सुंदर पलंग बिछाओ, जिस पर राजा श्री राम विश्राम करें। वहाँ क्षमा और करुणा जैसी सेविकाएँ सेवा में रहें; जहाँ हरि हैं, वहाँ भेद और माया नहीं रहते।
आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि सनक आदि ऋषि, वेद, शेषनाग, शिव, देवर्षि नारद और तत्त्व को जानने वाले सब मुनि इसी आरती में लगे रहते हैं, और जो ऐसी आरती करता है, वह काम आदि मलों को छोड़कर तर जाता है। निर्मल बुद्धि वाले दास तुलसी यही कहते हैं।
बाहर की आरती में धूप, दीप, नैवेद्य, पान और घी की बत्तियाँ होती हैं। तुलसीदास कहते हैं कि राम की सच्ची आरती में ये सब मन के भीतर होते हैं: “हरि सब में बसते हैं” यह भावना धूप है; आत्मज्ञान दीपक है, जिससे क्रोध, घमंड, मोह और अभिमान का अँधेरा मिटता है; निर्मल भाव नैवेद्य है; प्रेम पान है; अपने सारे अच्छे-बुरे कर्म घी हैं, जो त्याग की आग में जलकर सतोगुण का प्रकाश देते हैं; और भक्ति, वैराग्य और ज्ञान दीपों की पंक्ति हैं।
फिर आरती के बाद भगवान के विश्राम का चित्र है: निर्मल हृदय भवन है, शांति पलंग है, और क्षमा व करुणा सेविकाएँ हैं। जहाँ हरि ऐसे बसते हैं, वहाँ भेद और माया नहीं रहते। अंत में तुलसीदास कहते हैं कि ऋषि, देवता और मुनि भी इसी आरती में लगे हैं, और जो इसे करता है, वह काम आदि मलों को छोड़कर पार हो जाता है।
अंतरा 5 इस पद की फलश्रुति है। आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि जो ऐसी (मन की) आरती करता है, वह काम आदि मल छोड़कर तर जाता है; यहाँ यह तुलसीदास के अपने वचन के रूप में दिया है।
आरती-निरत सनकादि, श्रुति, शेष, शिव,
देवरिषि, अखिलमुनि तत्त्व-दरसी।
करै सोइ तरै, परिहरै कामादि मल,
वदति इति अमलमति दास तुलसी॥आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि सनक आदि ऋषि, वेद, शेषनाग, शिव, देवर्षि नारद और तत्त्व को जानने वाले सब मुनि इसी आरती में लगे रहते हैं, और जो ऐसी आरती करता है, वह काम आदि मलों को छोड़कर तर जाता है। निर्मल बुद्धि वाले दास तुलसी यही कहते हैं।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| अंतरा 1 | अचरचर रूप हरि, सरबगत, सरबदा बसत, इति बासना धूप दीजै। दीप निजबोधगत-कोह-मद-मोह-तम, प्रौढ़ऽभिमान चितबृति छीजै॥ | sanskritdocuments.org पर विनय पत्रिका के पाठ की वर्तनी; गीता प्रेस के आरती-संग्रह और द्रिक पंचांग में “सर्वगत, सर्वदा” और “प्रौढ़ अभिमान चित्तवृत्ति”। |
| अंतरा 2 | विपुल भव-वासना-बीजहारी | गीता प्रेस के आरती-संग्रह में “वासना”; विनय पत्रिका (sanskritdocuments) और द्रिक पंचांग में “बासना”। |
| अंतरा 4 | विमल हृदि-भवन कृत शांति-पर्यक शुभ … यत्र हरि तत्र नहि भेद माया | गीता प्रेस के आरती-संग्रह की वर्तनी (“विमल”, “नहि”)। |
विनय पत्रिका का पद 47, जिसे विनय पत्रिका की विषय-सूची “श्रीराम-आरती” कहती है; अंतिम पंक्ति में “दास तुलसी” की छाप है।
गीता प्रेस के आरती-संग्रह में “भगवान् श्रीराम रघुवीर” शीर्षक से भी है। विनय पत्रिका का अगला पद 48, “हरति सब आरती आरती राम की”, भी श्री राम की आरती है।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): sanskritdocuments.org पर विनय पत्रिका के पद 47 का पाठ, गीता प्रेस के आरती-संग्रह (कोड 153, archive.org पर स्कैन से पढ़ा गया पाठ) और द्रिक पंचांग का पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया। तीनों में एक ही छह खंड (मुखड़ा और पाँच अंतरे) हैं; अंतर केवल वर्तनी के हैं। पंक्तियाँ गीता प्रेस के आरती-संग्रह की तरह आधी-आधी दी हैं। वर्तनी गीता प्रेस के आरती-संग्रह और द्रिक पंचांग की रखी (“सर्वगत, सर्वदा”, “चित्तवृत्ति”), जो परिवारों के लिए पढ़ने में सरल है; विनय पत्रिका की ब्रज वर्तनी पाठभेद में है। अंतरा 2 में “बासना” और अंतरा 4 में “बिमल … नहिं भेद-माया” विनय पत्रिका और द्रिक पंचांग जैसे हैं। sanskritdocuments के पाठ में अंतरा 4 के बाद एक भटका हुआ शब्द “एहि” है, जो पद का अंश नहीं लगता। गीता प्रेस के स्कैन से पढ़े गए पाठ में “बसत” की जगह “खसत” पढ़ने की भूल है। अंतरा संख्या 1–5 है; विनय पत्रिका मुखड़े को 1 गिनकर अंतरों को 2–6 गिनती है।
राम · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में श्री राम और राम दरबार की सरल पूजा: ध्यान, तुलसी, भोग, राम-नाम जप, रामचरितमानस पाठ, आरती और क्षमा प्रार्थना, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
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मंगलवार और शनिवार को घर में हनुमान जी की सरल पूजा: राम नाम, दीपक, लाल फूल, सिंदूर का तिलक, गुड़-चने का भोग, हनुमान चालीसा और आरती।
हाँ। यह विनय पत्रिका का 47वाँ पद है, जिसे विनय पत्रिका की विषय-सूची “श्रीराम-आरती” कहती है; अंतिम पंक्ति में “दास तुलसी” की छाप है।
यहाँ ये मन के भाव हैं: हरि को सब में देखना धूप है, आत्मज्ञान दीपक है, निर्मल भाव नैवेद्य है और प्रेम पान है। इसलिए इसे मन से की जाने वाली आरती कहा जा सकता है।
हाँ। यह पद स्वयं मन की आरती सिखाता है; दीपक हो तो उसके साथ गाएँ, न हो तो ध्यान करते हुए पढ़ें या गाएँ।
विनय पत्रिका का अगला पद “हरति सब आरती आरती राम की” भी श्री राम की आरती है। तुलसीदास की स्तुति “श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन” भी कई घरों में आरती के समय गाई जाती है।
रामनवमी पर, रामायण या रामचरितमानस के पाठ के बाद, और श्री राम की रोज़ की पूजा में।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।