हनुमान

स्तोत्र · हनुमान · श्लोक

मनोजवं मारुततुल्यवेगं (हनुमान वन्दना)

हनुमान जी का प्रसिद्ध शरणागति-श्लोक: मन जैसी गति, वायु जैसा वेग, जितेन्द्रिय, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ श्रीरामदूत की शरण। पाठ और अर्थ।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. भावार्थ
  4. कब पढ़ें
  5. विधि
  6. रचयिता और स्रोत
  7. ये भी पढ़ें
  8. सवाल-जवाब
  9. सुधार सुझाएँ

मनोजवं मारुततुल्यवेगंजितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।वातात्मजं वानरयूथमुख्यंश्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥

manojavaṃ mārutatulyavegaṃ
jitendriyaṃ buddhimatāṃ variṣṭham |
vātātmajaṃ vānarayūthamukhyaṃ
śrīrāmadūtaṃ śaraṇaṃ prapadye ||

अर्थ: जिनकी गति मन के समान है और वेग वायु के समान है, जिन्होंने इन्द्रियों को जीत लिया है, जो बुद्धिमानों में सबसे श्रेष्ठ हैं, जो वायुदेव के पुत्र और वानरों के समूह के मुखिया हैं, उन श्री राम के दूत (हनुमान जी) की मैं शरण लेता हूँ।

मनोजवं
मन जैसी गति वाले
मारुततुल्यवेगं
वायु के समान वेग वाले
जितेन्द्रियं
इन्द्रियों को जीतने वाले
बुद्धिमतां वरिष्ठम्
बुद्धिमानों में श्रेष्ठ
वातात्मजं
वायु के पुत्र
वानरयूथमुख्यं
वानर-समूह के प्रमुख
श्रीरामदूतं
श्री राम के दूत
शरणं प्रपद्ये
शरण में जाता हूँ

परिचय

"मनोजवं मारुततुल्यवेगं" हनुमान जी का सबसे प्रसिद्ध वन्दना-श्लोक है। इसमें उनके गुण गिनाकर अंत में कहा गया है: "श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये", मैं श्री राम के दूत की शरण लेता हूँ।

यह श्लोक प्रचलित रामरक्षा स्तोत्र में (sanskritdocuments.org और vignanam.org के पाठ में श्लोक 33) आता है। आनन्द रामायण के जन्मकाण्ड के पाँचवें सर्ग में दी गई रामरक्षा में भी यह श्लोक (वहाँ श्लोक 38) मिलता है। अलग से यह हनुमान जी की पूजा, सुंदरकाण्ड और हनुमान चालीसा के पाठ से पहले बहुत बोला जाता है।

भावार्थ

श्लोक के पहले तीन चरण हनुमान जी के गुण बताते हैं। मन से भी तेज़ और वायु जैसे वेगवान, यानी वे पल भर में सहायता के लिए पहुँचते हैं। जितेन्द्रिय, यानी अपार बल होने पर भी पूरी तरह संयमी। बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, यानी केवल बलवान नहीं, विवेकी भी। वायुपुत्र और वानर-सेना के प्रमुख।

पर इन सब गुणों के बाद भक्त उन्हें जिस नाम से पुकारता है, वह है "श्रीरामदूत"। हनुमान जी की सबसे बड़ी पहचान श्री राम की सेवा है, और उनकी शरण लेना राम-भक्ति का ही रास्ता माना गया है।

यह श्लोक कब पढ़ा जाता है

  • मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी की पूजा में
  • हनुमान जयंती पर
  • सुंदरकाण्ड या हनुमान चालीसा का पाठ शुरू करने से पहले
  • यात्रा या किसी कठिन काम पर निकलते समय स्मरण के लिए

पढ़ने की विधि

  • हनुमान जी के चित्र के सामने दीप जलाकर, हाथ जोड़कर यह श्लोक पढ़ें।
  • पढ़ते समय उनके गुणों पर ध्यान दें: तेज़ गति, इन्द्रियों पर संयम, बुद्धि और श्री राम की सेवा।
  • एक बार या तीन बार पढ़ सकते हैं; इसके बाद हनुमान चालीसा या कोई और पाठ किया जा सकता है।
पूरी विधिहनुमान पूजा विधिमंगलवार और शनिवार को घर में हनुमान जी की सरल पूजा: राम नाम, दीपक, लाल फूल, सिंदूर का तिलक, गुड़-चने का भोग, हनुमान चालीसा और आरती।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
ज्ञात नहीं
ग्रंथ / स्रोत
रामरक्षा स्तोत्र (प्रचलित पाठ, श्लोक 33); आनन्द रामायण, जन्मकाण्ड, सर्ग 5 (श्लोक 38)
भाषा
संस्कृत

यह श्लोक इन दोनों पाठों में छपा मिलता है। रामरक्षा अपने विनियोग में बुधकौशिक ऋषि का नाम देती है, पर उसके अंत के कई वन्दना-श्लोक अलग-अलग संस्करणों में अलग क्रम और संख्या में मिलते हैं। इसलिए इस श्लोक का मूल रचयिता निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता; यहाँ रचयिता अज्ञात रखा गया है।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): श्लोक sanskritdocuments.org के रामरक्षास्तोत्र (श्लोक 33), उसी साइट की आनन्द रामायण वाली रामरक्षा (श्लोक 38) और vignanam.org के रामरक्षा स्तोत्र से मिलाया गया; तीनों में शब्द एक जैसे हैं। sa.wikisource.org की आनन्द रामायण वाली रामरक्षा में भी यही श्लोक है। मूल रचयिता अज्ञात है; जहाँ-जहाँ यह छपा मिला, वह source में लिखा है।

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हनुमान जी के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

"मनोजवं मारुततुल्यवेगं" किस स्तोत्र का श्लोक है?

यह प्रचलित रामरक्षा स्तोत्र में (sanskritdocuments.org और vignanam.org के पाठ में श्लोक 33) आता है। आनन्द रामायण के जन्मकाण्ड, सर्ग 5 में दी गई रामरक्षा में भी यह मिलता है।

इस श्लोक के रचयिता कौन हैं?

पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता। यह रामरक्षा के अंत वाले वन्दना-श्लोकों में आता है, जिनका क्रम और संख्या अलग-अलग पाठों में बदलती है।

"श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये" का क्या अर्थ है?

"मैं श्री राम के दूत की शरण लेता हूँ।" हनुमान जी को यहाँ श्री राम के दूत के रूप में पुकारा गया है, क्योंकि राम-सेवा ही उनकी सबसे बड़ी पहचान है।

यह श्लोक कब पढ़ें?

मंगलवार और शनिवार की पूजा में, हनुमान जयंती पर, और हनुमान चालीसा या सुंदरकाण्ड के पाठ से पहले। कोई विशेष नियम नहीं है; श्रद्धा से कभी भी पढ़ा जा सकता है।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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