हनुमान पूजा विधि
हनुमान · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
मंगलवार और शनिवार को घर में हनुमान जी की सरल पूजा: राम नाम, दीपक, लाल फूल, सिंदूर का तिलक, गुड़-चने का भोग, हनुमान चालीसा और आरती।

निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान।तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥
अर्थ: जो लोग पक्के विश्वास, प्रेम और श्रद्धा के साथ सम्मानपूर्वक विनती करते हैं, उनके सब शुभ काम हनुमान जी सिद्ध करते हैं।
जय हनुमंत संत हितकारी।सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ॥१॥
अर्थ: संतों का हित करने वाले हनुमंत की जय हो। हे प्रभु, हमारी विनती सुन लीजिए।
जन के काज बिलंब न कीजै।आतुर दौरि महा सुख दीजै ॥२॥
अर्थ: अपने भक्त के काम में देर न कीजिए; जल्दी दौड़कर आइए और बड़ा सुख दीजिए।
जैसे कूदि सिंधु महिपारा।सुरसा बदन पैठि बिस्तारा ॥३॥
अर्थ: जैसे आप कूदकर समुद्र के पार गए थे, और सुरसा ने जब अपना मुँह फैलाया तो आप उसमें प्रवेश करके (बाहर निकल आए थे)। (सुरसा नागों की माता थी, जिसे देवताओं ने हनुमान जी की परीक्षा लेने भेजा था।)
आगे जाय लंकिनी रोका।मारेहु लात गई सुरलोका ॥४॥
अर्थ: आगे लंका के द्वार पर लंकिनी ने आपको रोका; आपने उसे लात मारी और वह सुरलोक चली गई। (लंकिनी लंका की रखवाली करने वाली राक्षसी थी, जो हनुमान जी के प्रहार से मुक्त हो गई।)
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा।सीता निरखि परमपद लीन्हा ॥५॥
अर्थ: आपने जाकर विभीषण को सुख दिया, और सीता जी के दर्शन करके परम पद (सबसे बड़ा आनंद) पाया।
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा।अति आतुर जमकातर तोरा ॥६॥
अर्थ: आपने अशोक वाटिका उजाड़कर मानो उसे समुद्र में डुबो दिया, और बड़ी तेज़ी से यमराज जैसे भयानक रखवालों को भी तोड़ डाला।
अक्षय कुमार मारि संहारा।लूम लपेटि लंक को जारा ॥७॥
अर्थ: आपने रावण के पुत्र अक्षय कुमार को मार गिराया, और पूँछ में (आग) लपेटकर लंका को जला दिया।
लाह समान लंक जरि गई।जय जय धुनि सुरपुर नभ भई ॥८॥
अर्थ: लंका लाख की तरह जल गई, और देवलोक व आकाश में जय-जयकार की ध्वनि होने लगी।
अब बिलंब केहि कारन स्वामी।कृपा करहु उर अंतरयामी ॥९॥
अर्थ: हे स्वामी, अब देर किस कारण है? हे हृदय की बात जानने वाले, कृपा कीजिए।
जय जय लखन प्रान के दाता।आतुर ह्वै दुख करहु निपाता ॥१०॥
अर्थ: लक्ष्मण जी के प्राण देने वाले (उन्हें जीवन लौटाने वाले) हनुमान जी की जय हो। जल्दी आकर दुख का नाश कीजिए।
जै हनुमान जयति बलसागर।सुर समूह समरथ भटनागर ॥११॥
अर्थ: हे हनुमान, बल के सागर, आपकी जय हो। आप देवताओं के समूह में भी समर्थ और श्रेष्ठ योद्धा हैं।
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले।बैरिहि मारू बज्र की कीले ॥१२॥
अर्थ: हे हठीले (दृढ़ निश्चय वाले) हनुमंत! शत्रु को वज्र की कील से मारो। (“हनु हनु” में पुकार भी है और “मारो” का भाव भी।)
गदा बज्र लै बैरिहिं मारो।महाराज प्रभु दास उबारो ॥१३॥
अर्थ: गदा और वज्र लेकर शत्रु को मारो। हे महाराज, हे प्रभु, अपने दास को उबारो।
ॐकार हुंकार महाप्रभु धावो।बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो ॥१४॥
अर्थ: हे महाप्रभु, ॐकार और हुंकार करते हुए दौड़ो; वज्र और गदा से (बाधा को) मारो, देर मत करो।
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीशा।ॐ हुं हुं हुं हनु अरिउरसीशा ॥१५॥
अर्थ: “ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं” — हे कपियों के स्वामी हनुमंत! “ॐ हुं हुं हुं” — शत्रु की छाती और सिर पर प्रहार करो। (ह्रीं, हुं बीज-ध्वनियाँ हैं, जो पुकार की तीव्रता बताती हैं।)
सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै।राम दूत धरू मारू धाइ कै ॥१६॥
अर्थ: हरि (श्री राम) की शपथ मानकर अपना वचन सच करो। हे रामदूत, दौड़कर (शत्रु को) पकड़ो और मारो।
जय जय जय हनुमंत अगाधा।दुख पावत जन केहि अपराधा ॥१७॥
अर्थ: हे अथाह (अपार) हनुमंत, आपकी जय हो। आपका भक्त किस अपराध से दुख पा रहा है?
पूजा जप तप नेम अचारा।नहिं जानत हौं दास तुम्हारा ॥१८॥
अर्थ: पूजा, जप, तप, नियम और आचार मैं नहीं जानता; मैं तो बस आपका दास हूँ।
बन उपबन मग गिरि गृह माहीं।तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं ॥१९॥
अर्थ: वन में, उपवन में, रास्ते में, पर्वत पर या घर में, कहीं भी आपके बल के भरोसे मैं नहीं डरता।
जय अंजनि कुमार बलवन्ता।शंकरसुवन बीर हनुमन्ता ॥२०॥
अर्थ: हे अंजनी के बलवान पुत्र, हे शंकर के अंश (शंकर-सुवन) वीर हनुमंत, आपकी जय हो।
बदन कराल काल-कुल-घालक।राम सहाय सदा प्रतिपालक ॥२१॥
अर्थ: आपका मुख विकराल है और आप काल के कुल का भी नाश करने वाले हैं। आप श्री राम के सहायक और (भक्तों का) सदा पालन करने वाले हैं।
भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर।अगिन बेताल काल मारी मर ॥२२॥
अर्थ: भूत, प्रेत, पिशाच, निशाचर, अग्नि-बेताल, काल और महामारी: भक्त इन सब बाधाओं का नाम लेकर पुकारता है।
इन्हें मारू, तोहि सपथ राम की।राखउ नाथ मरजाद नाम की ॥२३॥
अर्थ: इन्हें मारो, आपको श्री राम की शपथ है। हे नाथ, अपने नाम की मर्यादा रखो।
जनकसुता हरि दास कहावौ।ताकी सपथ बिलंब न लावौ ॥२४॥
अर्थ: आप जानकी जी और श्री हरि (राम) के दास कहलाते हैं; उन्हीं की शपथ है, देर मत करो।
जै जै जै धुनि होत अकासा।सुमिरत होय दुसह दुख नासा ॥२५॥
अर्थ: आकाश में आपकी जय-जय की ध्वनि हो रही है; आपका स्मरण करते ही असहनीय दुख का भी नाश होता है।
चरन पकरि, कर जोरि मनावौं।यहि औसर अब केहि गोहरावौं ॥२६॥
अर्थ: चरण पकड़कर और हाथ जोड़कर मैं आपको मना रहा हूँ; इस घड़ी में अब और किसे पुकारूँ?
उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई।पायँ परौं, कर जोरि मनाई ॥२७॥
अर्थ: उठो, उठो, चलो, तुम्हें श्री राम की दुहाई है। मैं पैरों पड़ता हूँ, हाथ जोड़कर मनाता हूँ।
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता।ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता ॥२८॥
अर्थ: “ॐ चं चं चं चं” — हे चपलता से चलने वाले! “ॐ हनु हनु हनु हनु” — हे हनुमंत! (चं बीज-ध्वनि है; यहाँ पुकार और तेज़ होती है।)
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल।ॐ सं सं सहमि पराने खलदल ॥२९॥
अर्थ: चंचल कपि “हं हं” की हाँक (ललकार) देते हैं, और “सं सं” — दुष्टों के दल सहमकर भाग जाते हैं।
अपने जन को तुरत उबारौ।सुमिरत होय आनंद हमारौ ॥३०॥
अर्थ: अपने भक्त को तुरंत उबार लीजिए; आपका स्मरण करते ही हमें आनंद हो।
यह बजरंग-बाण जेहि मारै।ताहि कहौ फिरि कवन उबारै ॥३१॥
अर्थ: यह बजरंग बाण जिस पर चले, उसे फिर कौन बचा सकता है? (यहाँ पूरी विनती को ही हनुमान जी के नाम का “बाण” कहा गया है; पाठ कहता है कि यह निष्फल नहीं जाता।)
पाठ करै बजरंग-बाण की।हनुमत रक्षा करै प्रान की ॥३२॥
अर्थ: जो बजरंग बाण का पाठ करता है, हनुमान जी उसके प्राणों की रक्षा करते हैं, ऐसा पाठ कहता है।
यह बजरंग बाण जो जापैं।तासौं भूत प्रेत सब काँपै ॥३३॥
अर्थ: जो यह बजरंग बाण जपता है, उससे भूत-प्रेत सब काँपते हैं।
धूप देय जो जपै हमेसा।ताके तन नहिं रहै कलेसा ॥३४॥
अर्थ: जो धूप देकर सदा इसका जप करता है, उसके शरीर में कोई क्लेश नहीं रहता, ऐसा पाठ कहता है।
उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान।बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान॥
अर्थ: जो हृदय में दृढ़ विश्वास रखकर, शरण में आकर और ध्यान लगाकर इसका पाठ करता है, हनुमान जी उसकी सब बाधाएँ हरकर उसके सब काम सफल करते हैं।
बजरंग बाण हनुमान जी से की गई एक लंबी, आग्रह भरी विनती है। इसमें भक्त पहले हनुमान जी को उनके पराक्रम याद दिलाता है: समुद्र लाँघना, लंकिनी को हराना, लंका जलाना, लक्ष्मण जी के प्राण बचाना। फिर वह श्री राम और जानकी जी की शपथ देकर बार-बार पुकारता है कि देर न करो, अपने जन को उबारो। पाठ स्वयं को “बजरंग बाण” कहता है, यानी हनुमान जी के नाम का बाण।
इसकी भाषा अवधी है और रूप हनुमान चालीसा जैसा है: आरंभ और अंत में दोहा, बीच में चौपाइयाँ। बीच-बीच में “ॐ ह्रीं”, “हुं”, “चं” जैसी बीज-ध्वनियाँ आती हैं, जो पुकार की तीव्रता बताती हैं। परंपरा इसे गोस्वामी तुलसीदास की रचना मानती है, पर यह प्रमाणित नहीं है। अलग-अलग संस्करणों में इसका पाठ और लंबाई काफ़ी बदलती है; यहाँ sanskritdocuments.org का मुख्य पाठ दिया गया है और दूसरे पाठ “पाठभेद” में।
बजरंग बाण का भाव शरण में आए भक्त की पुकार है। भक्त पहले हनुमान जी के उन कामों को याद करता है जिनमें उन्होंने बिना देर किए दूसरों का संकट दूर किया: समुद्र लाँघकर सीता जी की खोज, लंका-दहन, लक्ष्मण जी के प्राण। फिर वह पूछता है: जब आप इतने तत्पर हैं, तो मेरे लिए देर किस कारण?
बीच की चौपाइयों में आग्रह बढ़ता जाता है। भक्त हनुमान जी को श्री राम और जानकी जी की शपथ देता है, उनके नाम की मर्यादा याद दिलाता है, और मानता है कि वह पूजा, जप, तप का विधान नहीं जानता, बस उनका दास है। शत्रुओं, भूत-प्रेत और बाधाओं को मारने की जो पुकार है, उसे भक्ति-परंपरा प्रायः हर उस भीतरी और बाहरी बाधा के रूप में समझती है जो मनुष्य को डराती है।
अंत में पाठ अपने बारे में कहता है कि जो इसे पढ़ता है उसकी हनुमान जी रक्षा करते हैं, और अंतिम दोहा इसकी शर्त भी बताता है: हृदय में दृढ़ विश्वास, शरण का भाव और ध्यान। इसका केंद्र भय नहीं, भरोसा है कि राम के दूत हनुमान अपने जन को नहीं छोड़ते।
चौपाई 31 से 34 और अंतिम दोहा बजरंग बाण की फलश्रुति हैं; आरंभ का दोहा भी यही बात कहता है। पाठ के अपने वचनों में: जो दृढ़ विश्वास और प्रेम से विनती करता है, हनुमान जी उसके काम सिद्ध करते हैं, उसके प्राणों की रक्षा करते हैं, और उसके भय और क्लेश दूर होते हैं। यहाँ इन्हें पाठ के वचन के रूप में ही दिया गया है; इनका सार विश्वास और शरणागति है।
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥जो लोग पक्के विश्वास, प्रेम और श्रद्धा के साथ सम्मानपूर्वक विनती करते हैं, उनके सब शुभ काम हनुमान जी सिद्ध करते हैं।
यह बजरंग-बाण जेहि मारै।
ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥यह बजरंग बाण जिस पर चले, उसे फिर कौन बचा सकता है? (यहाँ पूरी विनती को ही हनुमान जी के नाम का “बाण” कहा गया है; पाठ कहता है कि यह निष्फल नहीं जाता।)
पाठ करै बजरंग-बाण की।
हनुमत रक्षा करै प्रान की॥जो बजरंग बाण का पाठ करता है, हनुमान जी उसके प्राणों की रक्षा करते हैं, ऐसा पाठ कहता है।
यह बजरंग बाण जो जापैं।
तासौं भूत प्रेत सब काँपै॥जो यह बजरंग बाण जपता है, उससे भूत-प्रेत सब काँपते हैं।
धूप देय जो जपै हमेसा।
ताके तन नहिं रहै कलेसा॥जो धूप देकर सदा इसका जप करता है, उसके शरीर में कोई क्लेश नहीं रहता, ऐसा पाठ कहता है।
उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान।
बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान॥जो हृदय में दृढ़ विश्वास रखकर, शरण में आकर और ध्यान लगाकर इसका पाठ करता है, हनुमान जी उसकी सब बाधाएँ हरकर उसके सब काम सफल करते हैं।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| चौपाई 13 और 14 | (ये दोनों चौपाइयाँ नहीं) | कविता कोश के पाठ में “गदा बज्र लै बैरिहिं मारो…” और “ॐकार हुंकार महाप्रभु धावो…” नहीं हैं, और कुछ चौपाइयों का क्रम अलग है: “जय अंजनि कुमार…” चौपाई 15 के ठीक बाद और “सत्य होहु हरि सपथ…” चौपाई 23 के बाद आती है। sanskritdocuments.org, भारतडिस्कवरी और द्रिक पंचांग में ये दोनों चौपाइयाँ हैं और क्रम यही है। |
| चौपाई 11 | जय गिरिधर जय जय सुखसागर | भारतडिस्कवरी और द्रिक पंचांग में “जै हनुमान जयति बलसागर” की जगह। |
| चौपाई 18 | नहिं जानत कछु दास तुम्हारा | कविता कोश और द्रिक पंचांग में “हौं” की जगह “कछु”। |
| चौपाई 19 के बाद | पाँय परौं कर जोरि मनावौं। यहि अवसर अब केहि गोहरावौं॥ | भारतडिस्कवरी और द्रिक पंचांग में यह एक चौपाई और है; sanskritdocuments.org और कविता कोश में नहीं। |
| चौपाई 30 के बाद | ताते विनती करौं पुकारी। हरहु सकल दुःख विपति हमारी॥ … (27 चौपाइयाँ) | कुछ संस्करणों में यहाँ 27 चौपाइयाँ और जुड़ी मिलती हैं; sanskritdocuments.org ने उन्हें वेबदुनिया से संदर्भ के लिए कोष्ठक में अलग दिया है। वे मुख्य पाठ में नहीं हैं, इसलिए यहाँ नहीं दी गईं। |
| चौपाई 33 | तासों भूत-प्रेत सब कापंऐ | sanskritdocuments.org के पाठ में छपाई की भूल; यह अर्धाली कविता कोश के पाठ (“तासौं भूत प्रेत सब काँपै”) से ली गई है। |
| अंतिम दोहा | प्रेम प्रतीतिहि कपि भजै, सदा धरैं उर ध्यान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥ | भारतडिस्कवरी और द्रिक पंचांग में अंतिम दोहा यह है; sanskritdocuments.org इसे कोष्ठक में दूसरे पाठ के रूप में देता है। |
परंपरा से इसे तुलसीदास की रचना कहा जाता है, और sanskritdocuments.org व कविता कोश भी उन्हीं के नाम से देते हैं; पर यह प्रमाणित नहीं है। यह उनके उन बारह ग्रंथों में नहीं है जिन्हें विद्वान प्रायः प्रामाणिक मानते हैं, और इसका पाठ संस्करणों में काफ़ी बदलता है।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): sanskritdocuments.org का मुख्य पाठ (कोष्ठक वाले वेबदुनिया अंश के बिना) कविता कोश, द्रिक पंचांग और भारतडिस्कवरी के पाठ से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया। चार में से तीन स्रोतों में चौपाई 13–14 हैं और क्रम sanskritdocuments जैसा है। चौपाई 33 की दूसरी अर्धाली कविता कोश से ली (sanskritdocuments में “कापंऐ” भूल)। रचयिता परंपरा से तुलसीदास, प्रमाणित नहीं। कुछ जगहों पर मिलने वाले डर वाले दावे (क्रोध, दंड, केवल संकट में पढ़ना) पाठ में नहीं हैं और यहाँ नहीं दोहराए गए।
हनुमान · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
मंगलवार और शनिवार को घर में हनुमान जी की सरल पूजा: राम नाम, दीपक, लाल फूल, सिंदूर का तिलक, गुड़-चने का भोग, हनुमान चालीसा और आरती।
हनुमान · आरती
आरती कीजै हनुमान लला की
हनुमान · चालीसा · अवधी
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि
हनुमान · अष्टकम् · ब्रज
बाल समय रबि भक्षि लियो तब तीनहुँ लोक भयो अँधियारो
हनुमान · श्लोक · संस्कृत
मनोजवं मारुततुल्यवेगं
राम · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में श्री राम और राम दरबार की सरल पूजा: ध्यान, तुलसी, भोग, राम-नाम जप, रामचरितमानस पाठ, आरती और क्षमा प्रार्थना, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
परंपरा इसे गोस्वामी तुलसीदास की रचना मानती है, पर यह प्रमाणित नहीं है; यह उनके मान्य ग्रंथों में नहीं गिना जाता।
हनुमान चालीसा मुख्य रूप से हनुमान जी के गुणों और कथाओं की स्तुति है। बजरंग बाण में स्तुति के साथ आग्रह भरी पुकार है, जिसमें भक्त श्री राम और जानकी जी की शपथ देकर तुरंत सहायता माँगता है।
पाठ में ऐसा कोई नियम नहीं लिखा है। यह हनुमान जी से की गई विनती है और लोग इसे अपनी श्रद्धा के अनुसार पढ़ते हैं; अंतिम दोहे के अनुसार इसका भाव विश्वास और शरण है, भय नहीं।
ये बीज-ध्वनियाँ हैं; इनका सीधा शब्दार्थ नहीं होता। पाठ में ये पुकार की तीव्रता और एकाग्रता को बताती हैं।
इसका पाठ संस्करणों में काफ़ी बदलता है: कहीं दो चौपाइयाँ कम हैं, कहीं क्रम अलग है, और कुछ में 27 चौपाइयाँ और जुड़ी हैं। यहाँ sanskritdocuments.org का मुख्य पाठ है; बाकी अंतर पाठभेद में दिए हैं।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।