हनुमान पूजा विधि
हनुमान · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
मंगलवार और शनिवार को घर में हनुमान जी की सरल पूजा: राम नाम, दीपक, लाल फूल, सिंदूर का तिलक, गुड़-चने का भोग, हनुमान चालीसा और आरती।

बाल समय रबि भक्षि लियो तब तीनहुँ लोक भयो अँधियारो।ताहि सों त्रास भयो जग को यह संकट काहु सों जात न टारो।देवन आनि करी बिनती तब छाँड़ि दियो रबि कष्ट निवारो।को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो ॥१॥
अर्थ: बचपन में तुमने सूर्य को (फल समझकर) निगल लिया, तब तीनों लोकों में अँधेरा छा गया। इससे संसार भयभीत हो गया और यह संकट किसी से टल नहीं रहा था। तब देवताओं ने आकर विनती की और तुमने सूर्य को छोड़कर कष्ट दूर किया। हे कपि, संसार में कौन नहीं जानता कि तुम्हारा नाम संकटमोचन (संकट से छुड़ाने वाला) है?
बालि की त्रास कपीस बसै गिरि जात महाप्रभु पंथ निहारो।चौंकि महा मुनि साप दियो तब चाहिय कौन बिचार बिचारो।कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु सो तुम दास के सोक निवारो।को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो ॥२॥
अर्थ: बालि के डर से वानरराज सुग्रीव पर्वत पर रहते थे और महाप्रभु (श्री राम) की राह देखते थे। महामुनि (मतंग) के शाप के कारण बालि उस पर्वत पर नहीं आ सकता था, फिर भी सुग्रीव सोच में थे कि क्या उपाय करें। तब तुम ब्राह्मण का रूप धरकर महाप्रभु को साथ ले आए और अपने स्वामी सुग्रीव का शोक दूर किया।
अंगद के सँग लेन गये सिय खोज कपीस यह बैन उचारो।जीवत ना बचिहौ हम सो जु बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो।हेरि थके तट सिंधु सबै तब लाय सिया सुधि प्रान उबारो।को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो ॥३॥
अर्थ: अंगद के साथ सीता जी की खोज में जाते समय सुग्रीव ने कहा था कि बिना समाचार लाए यहाँ लौटे तो कोई जीवित नहीं बचेगा। सब वानर खोजते-खोजते समुद्र के किनारे थककर बैठ गए। तब तुमने (लंका जाकर) सीता जी का समाचार लाकर सबके प्राण बचाए।
रावन त्रास दई सिय को सब राक्षसि सों कहि सोक निवारो।ताहि समय हनुमान महाप्रभु जाय महा रजनीचर मारो।चाहत सीय असोक सों आगि सु दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो।को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो ॥४॥
अर्थ: रावण ने सीता जी को डराया और सब राक्षसियों से कहा कि वे सीता को समझा-धमकाकर उनका शोक छुड़ाएँ (यानी रावण की बात मनवाएँ)। उसी समय हनुमान जी ने जाकर बड़े-बड़े राक्षसों को मारा। सीता जी (दुख से) अशोक वृक्ष से अग्नि माँग रही थीं, तब तुमने प्रभु की अँगूठी देकर उनका शोक दूर किया।
बान लग्यो उर लछिमन के तब प्रान तजे सुत रावन मारो।लै गृह बैद्य सुषेन समेत तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो।आनि सजीवन हाथ दई तब लछिमन के तुम प्रान उबारो।को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो ॥५॥
अर्थ: रावण के पुत्र (मेघनाद) का चलाया बाण लक्ष्मण जी की छाती में लगा और उनके प्राण संकट में पड़ गए। तब तुम वैद्य सुषेण को उनके घर समेत उठा लाए और द्रोण पर्वत को उखाड़ लाए। संजीवनी लाकर तुमने हाथ में दी और लक्ष्मण जी के प्राण बचाए।
रावन जुद्ध अजान कियो तब नाग कि फाँस सबै सिर डारो।श्रीरघुनाथ समेत सबै दल मोह भयो यह संकट भारो।आनि खगेस तबै हनुमान जु बंधन काटि सुत्रास निवारो।को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो ॥६॥
अर्थ: रावण की ओर से छल भरा युद्ध हुआ और सब पर नागपाश (साँपों का फंदा) डाल दिया गया। श्री रघुनाथ समेत पूरी सेना मूर्छित-सी हो गई; यह बड़ा संकट था। तब हनुमान जी तुरंत पक्षीराज गरुड़ को ले आए, जिन्होंने बंधन काटकर भय दूर किया।
बंधु समेत जबै अहिरावन लै रघुनाथ पताल सिधारो।देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो।जाय सहाय भयो तब ही अहिरावन सैन्य समेत सँहारो।को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो ॥७॥
अर्थ: जब अहिरावण श्री रघुनाथ को भाई लक्ष्मण समेत पाताल ले गया, और वहाँ सबने मिलकर विचार किया कि देवी की विधि से पूजा करके दोनों की बलि दें। तब तुम वहाँ जाकर सहायक बने और अहिरावण को उसकी सेना समेत मार डाला। (अहिरावण की यह कथा लोक-परंपरा की रामकथाओं में आती है।)
काज किये बड़ देवन के तुम बीर महाप्रभु देखि बिचारो।कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसों नहिं जात है टारो।बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जो कछु संकट होय हमारो।को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो ॥८॥
अर्थ: हे वीर महाप्रभु, तुमने देवताओं के बड़े-बड़े काम किए हैं; ज़रा विचार करके देखो। मुझ गरीब का ऐसा कौन-सा संकट है जो तुमसे टल न सके? हे हनुमान महाप्रभु, हमारा जो भी संकट हो उसे जल्दी हर लो।
लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लँगूर।बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥
अर्थ: लाल शरीर पर लाली शोभा दे रही है और लाल पूँछ धारण किए हैं। वज्र जैसे शरीर वाले, दानवों का नाश करने वाले वीर कपि (हनुमान) की जय हो, जय हो, जय हो।
संकटमोचन हनुमानाष्टक हनुमान जी की स्तुति के आठ छंद हैं, जो “बाल समय रबि भक्षि लियो” से शुरू होते हैं। आठों छंद मत्तगयंद सवैया में हैं और अंत में एक दोहा है। हर छंद में रामायण की कोई कथा याद की गई है जिसमें हनुमान जी ने किसी का संकट दूर किया, और हर छंद एक ही पंक्ति पर रुकता है: “को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो”।
इसकी भाषा ब्रज है। परंपरा इसे गोस्वामी तुलसीदास की रचना मानती है, पर यह उनके मान्य ग्रंथों में नहीं गिना जाता, इसलिए रचयिता को निश्चित नहीं कहा जा सकता। अंतिम छंद में भक्त अपना संकट सामने रखता है: जिसने देवताओं के इतने बड़े काम किए, उसके लिए मेरे जैसे साधारण व्यक्ति का संकट दूर करना कठिन नहीं।
यह अष्टक हनुमान जी को उनके अपने कामों की याद दिलाकर की गई प्रार्थना है। पहले सात छंदों में एक-एक संकट है जो उन्होंने दूर किया: बचपन में सूर्य को निगलने से तीनों लोकों में छाया अँधेरा, बालि के डर से छिपे सुग्रीव की चिंता, सीता जी की खोज में थके वानरों की निराशा, अशोक वाटिका में सीता जी का दुख, लक्ष्मण जी का संकट, नागपाश का बंधन और अहिरावण का छल।
हर छंद के अंत में एक ही बात लौटती है: संसार में कौन नहीं जानता कि तुम्हारा नाम संकटमोचन है। आठवें छंद में भक्त अपनी ओर मुड़ता है और भरोसे से कहता है कि जिसने देवताओं के इतने बड़े काम किए, उसके लिए मेरा संकट दूर करना कुछ भी नहीं। अंतिम दोहा हनुमान जी के लाल, वज्र जैसे बलवान रूप की जय-जयकार है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| छंद 8, पहली पंक्ति | काज कियो बड़ देवन के तुम | द्रिक पंचांग के पाठ में “किये” की जगह “कियो”। |
| छंद 3, तीसरी पंक्ति | हरि थके तट सिंधु सबै | भारतडिस्कवरी के पाठ में “हेरि” (खोजकर) की जगह “हरि”; sanskritdocuments.org और द्रिक पंचांग में “हेरि”। |
| दोहा, दूसरी पंक्ति | बज्र देह दानव दलन, जय जय कपि सूर | द्रिक पंचांग के पाठ में “जय” दो बार। |
| दोहा, पहली पंक्ति | लाल देह लाली लसे अरू धरि लाल लँगूर | sanskritdocuments.org और द्रिक पंचांग में “अरू”; यहाँ भारतडिस्कवरी का “अरु” (और) लिया गया है। |
| दोहे के बाद | सियावर रामचन्द्र पद गहि रहुँ। उमावर शम्भुनाथ पद गहि रहुँ। … | sanskritdocuments.org के पाठ में दोहे के बाद ये जयकार-पंक्तियाँ दी हैं; ये पाठ के अंत में बोली जाती हैं, अष्टक का भाग नहीं, इसलिए यहाँ नहीं दी गईं। |
परंपरा और अधिकतर संस्करण (जैसे sanskritdocuments.org का पाठ, जिसके अंत में “इति गोस्वामि तुलसीदास कृत” लिखा है) इसे तुलसीदास की रचना मानते हैं; पर यह उनके उन बारह ग्रंथों में नहीं है जिन्हें विद्वान प्रायः प्रामाणिक मानते हैं, इसलिए रचयिता निश्चित नहीं।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): sanskritdocuments.org का पाठ (अनिल गुर और सुंदर हट्टंगडी द्वारा जाँचा हुआ) द्रिक पंचांग और भारतडिस्कवरी के पाठ से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया; तीनों में आठों सवैये एक ही क्रम में हैं। दोहा भारतडिस्कवरी के पाठ से लिया, क्योंकि उसमें “अरु” (और) सही लिखा है; बाकी दो में “अरू”। शब्द तीनों में एक ही हैं। sanskritdocuments के अंत की जयकार-पंक्तियाँ अष्टक का भाग न होने से छोड़ी गईं। रचयिता परंपरा से तुलसीदास, प्रमाणित नहीं।
हनुमान · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
मंगलवार और शनिवार को घर में हनुमान जी की सरल पूजा: राम नाम, दीपक, लाल फूल, सिंदूर का तिलक, गुड़-चने का भोग, हनुमान चालीसा और आरती।
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परंपरा इसे गोस्वामी तुलसीदास की रचना मानती है और अधिकतर संस्करण उन्हीं का नाम देते हैं। पर यह उनके मान्य ग्रंथों में नहीं गिना जाता, इसलिए रचयिता को निश्चित नहीं कहा जा सकता।
इसमें आठ छंद (सवैये) हैं, और अंत में एक दोहा। हर सवैये की अंतिम पंक्ति एक ही है।
बचपन में सूर्य को निगलना, सुग्रीव से श्री राम का मिलन, सीता जी की खोज, अशोक वाटिका में मुद्रिका देना, लक्ष्मण जी के लिए संजीवनी लाना, नागपाश से छुड़ाना और अहिरावण का वध।
मंगलवार, शनिवार और हनुमान जयंती को इसे विशेष रूप से पढ़ा जाता है; कई लोग हनुमान चालीसा के बाद रोज़ पढ़ते हैं। कोई तय नियम नहीं है।
हाँ, संस्कृत में इसी नाम का एक अलग स्तोत्र भी मिलता है। यहाँ दिया गया पाठ ब्रज भाषा का प्रसिद्ध अष्टक है, जो “बाल समय रबि भक्षि लियो” से शुरू होता है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।