जन्माष्टमी पूजा विधि
कृष्ण · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
घर में जन्माष्टमी की पूजा: दिन का व्रत, आधी रात को श्री कृष्ण के जन्म पर पंचामृत अभिषेक, पालना, भोग, आरती और पारण, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपंलसत्कुण्डलं गोकुले भ्राजमानम् ।यशोदाभियोलूखलाद्धावमानंपरामृष्टमत्यन्ततो द्रुत्य गोप्या ॥१॥
namāmīśvaraṃ saccidānandarūpaṃ
lasatkuṇḍalaṃ gokule bhrājamānam |
yaśodābhiyolūkhalāddhāvamānaṃ
parāmṛṣṭamatyantato drutya gopyā ||
अर्थ: मैं उन परमेश्वर को नमस्कार करता हूँ जो सत्-चित्-आनंद स्वरूप हैं, जिनके कानों में कुंडल झूल रहे हैं, जो गोकुल में शोभा पाते हैं; जो (मटकी फोड़ने के बाद) माँ यशोदा के डर से ऊखल से कूदकर भाग रहे हैं, और जिन्हें माँ यशोदा ने तेज़ी से पीछे दौड़कर पीठ से पकड़ लिया है।
रुदन्तं मुहुर्नेत्रयुग्मं मृजन्तंकराम्भोजयुग्मेन सातङ्कनेत्रम् ।मुहुः श्वासकम्पत्रिरेखाङ्ककण्ठ-स्थितग्रैवं दामोदरं भक्तिबद्धम् ॥२॥
rudantaṃ muhurnetrayugmaṃ mṛjantaṃ
karāmbhojayugmena sātaṅkanetram |
muhuḥ śvāsakampatrirekhāṅkakaṇṭha-
sthitagraivaṃ dāmodaraṃ bhaktibaddham ||
अर्थ: जो रोते हुए बार-बार अपने कमल जैसे दोनों हाथों से आँखें मल रहे हैं, जिनकी आँखों में डर है, बार-बार सिसकने से जिनके तीन रेखाओं वाले गले में पड़ा हार काँप रहा है, जिनके पेट पर रस्सी बँधी है और जो भक्ति (माँ के प्रेम) से बँध गए हैं, उन दामोदर को (मैं नमस्कार करता हूँ)।
इतीदृक् स्वलीलाभिरानन्दकुण्डेस्वघोषं निमज्जन्तमाख्यापयन्तम् ।तदीयेषितज्ञेषु भक्तैर्जितत्वंपुनः प्रेमतस्तं शतावृत्ति वन्दे ॥३॥
itīdṛk svalīlābhirānandakuṇḍe
svaghoṣaṃ nimajjantamākhyāpayantam |
tadīyeṣitajñeṣu bhaktairjitatvaṃ
punaḥ prematastaṃ śatāvṛtti vande ||
अर्थ: जो ऐसी बाल-लीलाओं से अपने पूरे गोकुल को आनंद के कुंड में डुबो देते हैं, और जो अपने ऐश्वर्य को जानने वाले भक्तों को यह दिखाते हैं कि वे (ऐश्वर्य से नहीं) प्रेम करने वाले भक्तों से जीत लिए जाते हैं, उन प्रभु को मैं फिर से प्रेम के साथ सैकड़ों बार प्रणाम करता हूँ।
वरं देव मोक्षं न मोक्षावधिं वान चान्यं वृणेऽहं वरेशादपीह ।इदं ते वपुर्नाथ गोपालबालंसदा मे मनस्याविरास्तां किमन्यैः ॥४॥
varaṃ deva mokṣaṃ na mokṣāvadhiṃ vā
na cānyaṃ vṛṇe’haṃ vareśādapīha |
idaṃ te vapurnātha gopālabālaṃ
sadā me manasyāvirāstāṃ kimanyaiḥ ||
अर्थ: हे देव, आप सब वर देने वालों के स्वामी हैं, फिर भी मैं आपसे न मोक्ष माँगता हूँ, न मोक्ष की परम अवस्था, न कोई और वरदान। हे नाथ, बस आपका यह बाल-गोपाल रूप सदा मेरे मन में प्रकट रहे; दूसरी चीज़ों से मुझे क्या लेना!
इदं ते मुखाम्भोजमत्यन्तनीलैर्-वृतं कुन्तलैः स्निग्धरक्तैश्च गोप्या ।मुहुश्चुम्बितं बिम्बरक्ताधरं मेमनस्याविरास्तामलं लक्षलाभैः ॥५॥
idaṃ te mukhāmbhojamatyantanīlair-
vṛtaṃ kuntalaiḥ snigdharaktaiśca gopyā |
muhuścumbitaṃ bimbaraktādharaṃ me
manasyāvirāstāmalaṃ lakṣalābhaiḥ ||
अर्थ: हे प्रभु, आपका यह मुख-कमल, जो बहुत गहरे श्याम, चिकने और हल्की ललाई लिए घुँघराले बालों से घिरा है, जिसे माँ यशोदा बार-बार चूमती हैं और जिसके होंठ बिम्ब फल जैसे लाल हैं, वह मेरे मन में प्रकट रहे। लाखों दूसरे लाभों से मुझे कुछ नहीं चाहिए।
नमो देव दामोदरानन्त विष्णोप्रसीद प्रभो दुःखजालाब्धिमग्नम् ।कृपादृष्टिवृष्ट्यातिदीनं बतानुगृहाणेश मां अज्ञमेध्यक्षिदृश्यः ॥६॥
namo deva dāmodarānanta viṣṇo
prasīda prabho duḥkhajālābdhimagnam |
kṛpādṛṣṭivṛṣṭyātidīnaṃ batānu
gṛhāṇeśa māṃ ajñamedhyakṣidṛśyaḥ ||
अर्थ: हे देव, हे दामोदर, हे अनन्त, हे विष्णु, आपको नमस्कार। हे प्रभु, प्रसन्न होइए; मैं दुःखों के जाल रूपी समुद्र में डूबा हूँ। अपनी कृपा-दृष्टि की वर्षा से इस अति दीन पर अनुग्रह कीजिए; हे ईश, मुझ अज्ञानी को अपना लीजिए और मेरी आँखों के सामने प्रकट होइए।
कुवेरात्मजौ बद्धमूर्त्यैव यद्वत्त्वया मोचितौ भक्तिभाजौ कृतौ च ।तथा प्रेमभक्तिं स्वकां मे प्रयच्छन मोक्षे ग्रहो मेऽस्ति दामोदरेह ॥७॥
kuverātmajau baddhamūrtyaiva yadvat
tvayā mocitau bhaktibhājau kṛtau ca |
tathā premabhaktiṃ svakāṃ me prayaccha
na mokṣe graho me’sti dāmodareha ||
अर्थ: जैसे आपने ऊखल से बँधे रहते हुए ही कुबेर के दोनों पुत्रों को (जो वृक्ष बनकर खड़े थे) मुक्त किया और उन्हें भक्ति का अधिकारी बना दिया, वैसे ही मुझे भी अपनी प्रेम-भक्ति दीजिए। हे दामोदर, मुझे यहाँ मोक्ष की कोई चाह नहीं है।
नमस्तेऽस्तु दाम्ने स्फुरद्दीप्तिधाम्नेत्वदीयोदरायाथ विश्वस्य धाम्ने ।नमो राधिकायै त्वदीयप्रियायैनमोऽनन्तलीलाय देवाय तुभ्यम् ॥८॥
namaste’stu dāmne sphuraddīptidhāmne
tvadīyodarāyātha viśvasya dhāmne |
namo rādhikāyai tvadīyapriyāyai
namo’nantalīlāya devāya tubhyam ||
अर्थ: हे देव, आपके पेट पर बँधी उस रस्सी को नमस्कार, जो चमकते तेज का घर है; और आपके उस उदर को नमस्कार, जो पूरे विश्व का आधार है। आपकी प्रियतमा श्री राधिका को नमस्कार, और अनन्त लीलाएँ करने वाले आप भगवान को नमस्कार।
दामोदराष्टकम् बाल कृष्ण की उस लीला पर है जब माँ यशोदा ने उन्हें ऊखल से बाँध दिया था। "दाम" यानी रस्सी और "उदर" यानी पेट: जिनके पेट पर माँ के प्रेम की रस्सी बँधी, वे दामोदर। अष्टक में डरकर भागते, रोते और फिर बँधे हुए कान्हा का चित्र है, और भक्त कहता है कि उसे मोक्ष नहीं चाहिए, बस यही बाल-गोपाल रूप हृदय में बसा रहे।
परंपरा इसे पद्मपुराण में सत्यव्रत मुनि की कही स्तुति मानती है, और कार्तिक मास (जिसे दामोदर मास भी कहते हैं) में रोज़ संध्या को दीप जलाकर इसे गाने की परंपरा है। ध्यान दें: इसके दो रूप छपे मिलते हैं। sanskritdocuments.org का पद्मपुराण वाला पाठ सात श्लोकों का है और उसके कई शब्द अलग हैं; यहाँ आठ श्लोकों वाला प्रचलित पाठ दिया है, और पद्मपुराण वाले पाठ के अंतर नीचे पाठ-भेद में हैं।
पहले तीन श्लोक लीला का चित्र हैं। सच्चिदानंद परमेश्वर गोकुल में एक बालक बनकर माँ यशोदा से डरकर भागते हैं, पकड़े जाते हैं, रोते-सिसकते हैं और प्रेम की रस्सी से बँध जाते हैं। तीसरा श्लोक इसका रहस्य बताता है: जो भगवान ऐश्वर्य से नहीं बँधते, वे प्रेम से जीत लिए जाते हैं।
अगले चार श्लोक भक्त की प्रार्थना हैं, और उसकी माँग अनोखी है। वह मोक्ष नहीं माँगता, कोई वरदान नहीं माँगता; माँगता है कि बाल-गोपाल का वह रूप, जिसे माँ यशोदा बार-बार चूमती हैं, सदा उसके मन में रहे। यमलार्जुन वृक्षों (कुबेर के पुत्रों) की कथा याद दिलाकर वह कहता है: जैसे बँधे रहकर भी आपने उन्हें भक्ति दी, वैसे ही मुझे प्रेम-भक्ति दीजिए।
अंतिम श्लोक में भक्त उस रस्सी को भी नमस्कार करता है जिसने भगवान को बाँधा, उस उदर को भी जिसमें पूरा विश्व है, श्री राधा को भी, और अनन्त लीलाओं वाले प्रभु को भी। इसलिए यह अष्टक प्रेम-भक्ति की, यानी बिना किसी माँग के प्रेम की, स्तुति माना जाता है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| श्लोक 1, तीसरा-चौथा चरण | यशोदाभियोलूखले धावमानं / परामृष्टमत्यन्ततो दूतगोप्या | sanskritdocuments.org का पद्मपुराण वाला पाठ (stotranidhi.com के "श्री दामोदर स्तोत्रम्" में भी यही)। |
| श्लोक 2, तीसरा-चौथा चरण | मुहुःश्वासकं पत्रिरेखाङ्ककण्ठं / स्थितं नौमि दामोदरं भक्तवन्द्यम् | sanskritdocuments.org का पद्मपुराण वाला पाठ: "भक्तों के वन्दनीय दामोदर को मैं नमस्कार करता हूँ"। |
| श्लोक 3 | (श्लोक नहीं है) | sanskritdocuments.org के पद्मपुराण वाले पाठ में "इतीदृक् स्वलीलाभिः" वाला श्लोक नहीं है; वहाँ सत्यव्रत की स्तुति सात श्लोकों की है। यह श्लोक stotranidhi.com, bhaktibharat.com और kksongs.org के पाठ में है। |
| श्लोक 3, तीसरा चरण | तदीयेषिताज्ञेषु भक्तैर्जितत्वं | stotranidhi.com का पाठ; यहाँ bhaktibharat.com और kksongs.org (tadīyeṣita-jñeṣu) वाला पाठ रखा गया। |
| श्लोक 4, पहला-दूसरा चरण | वरं देव देहीश मोक्षावधिं वा / न चान्यं वृणेऽहं वरेशादपीह | पहला चरण sanskritdocuments.org के पद्मपुराण वाले पाठ में ऐसा है। दूसरे चरण में stotranidhi.com और kksongs.org "वरेषादपीह" पढ़ते हैं। |
| श्लोक 5, दूसरा चरण | वृतं कुन्तलैः स्निग्धवक्त्रैश्च गोप्या | sanskritdocuments.org का पद्मपुराण वाला पाठ। |
| श्लोक 6, तीसरा-चौथा चरण | कृपादृष्टिवृष्ट्याऽतिदीनं च रक्ष / गृहाणेश मामज्ञमेवाक्षिदृश्यम् | sanskritdocuments.org का पद्मपुराण वाला पाठ: "इस अति दीन की रक्षा कीजिए"। |
| श्लोक 7, पहला चरण | कुबेरात्मजौ वृक्षमूर्ती च यद्वत् | sanskritdocuments.org का पद्मपुराण वाला पाठ: "वृक्ष बने कुबेर के दोनों पुत्रों को जैसे"। |
| श्लोक 8, पहला-दूसरा चरण | नमस्ते सुदाम्ने स्फुरद्दीप्तधाम्ने / तथोरस्थविश्वस्य धाम्ने नमस्ते | sanskritdocuments.org का पद्मपुराण वाला पाठ। |
परंपरा के अनुसार यह स्तुति सत्यव्रत मुनि ने की थी; sanskritdocuments.org का पद्मपुराण वाला पाठ भी इसे "सत्यव्रत उवाच" कहकर देता है। यह ग्रंथ का कथन है, इसकी अलग ऐतिहासिक पुष्टि नहीं।
sanskritdocuments.org पर यह स्तुति पद्मपुराण के रुक्माङ्गद-मोहिनी संवाद से दी गई है: सिन्धु देश के ब्राह्मण सत्यव्रत वृन्दावन में रहकर कार्तिक मास में दामोदर की पूजा करते हैं और यह स्तुति करते हैं। उस पाठ में "इतीदृक्" वाला श्लोक नहीं है। आठ श्लोकों वाला प्रचलित पाठ stotranidhi.com, bhaktibharat.com और ISKCON-परंपरा के kksongs.org (रोमन लिपि) पर एक जैसा मिलता है।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): आठ श्लोकों वाला पाठ stotranidhi.com (दामोदराष्टकम्) और bhaktibharat.com से मिलाया गया, और kksongs.org के रोमन पाठ से शब्द-शब्द देखा गया; जहाँ stotranidhi.com में टाइप-भूल थी (श्लोक 5 "बिम्बरक्तधरं"), वहाँ दूसरे स्रोत की पंक्ति ली गई। sanskritdocuments.org का पद्मपुराण वाला पाठ और stotranidhi.com का "श्री दामोदर स्तोत्रम्" एक-दूसरे से मेल खाते हैं; उनके अंतर पाठ-भेद में दिए गए। sanskritdocuments.org के पद्मपुराण पाठ में सत्यव्रत की स्तुति सात श्लोकों की है (कथा-भाग के साथ श्लोक 5–11)। यह पृष्ठ "अष्टकम्" के रूप में आठ श्लोकों वाला प्रचलित पाठ देता है और यह बात परिचय, स्रोत और पाठ-भेद में साफ़ लिखी है। कथा-भाग (सत्यव्रत का परिचय, नारद का अंतिम श्लोक) यहाँ नहीं जोड़ा गया।
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अच्युतं केशवं रामनारायणं
दाम यानी रस्सी और उदर यानी पेट। माँ यशोदा ने बाल कृष्ण को पेट से रस्सी बाँधकर ऊखल से बाँध दिया था, इसलिए उनका नाम दामोदर पड़ा।
कार्तिक मास को दामोदर मास भी कहा जाता है। पद्मपुराण वाली कथा में सत्यव्रत मुनि कार्तिक में ही दामोदर की पूजा करके यह स्तुति करते हैं, और इस महीने संध्या को दीप जलाकर इसे गाने की परंपरा है।
दोनों रूप छपे मिलते हैं। sanskritdocuments.org का पद्मपुराण वाला पाठ सात श्लोकों का है और उसके कई शब्द अलग हैं; आठ श्लोकों वाला रूप ज़्यादा गाया जाता है और यहाँ वही दिया है। अंतर पाठ-भेद में लिखे हैं।
परंपरा के अनुसार यह सत्यव्रत मुनि की स्तुति है, जो पद्मपुराण में आती है। यह ग्रंथ और परंपरा का कथन है।
कुबेर के दो पुत्र, नलकूबर और मणिग्रीव, नारद जी के शाप से यमलार्जुन वृक्ष बन गए थे। ऊखल से बँधे बाल कृष्ण ने ऊखल घसीटकर उन वृक्षों को गिराया और दोनों को मुक्त किया।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।