कृष्ण

चालीसा · कृष्ण

कृष्ण चालीसा

“बंशी शोभित कर मधुर” वाली कृष्ण चालीसा का मूल पाठ, हर चौपाई का सरल अर्थ और उसकी कथा, कठिन शब्द, भावार्थ और पाठभेद।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. चौपाई-वार अर्थ
  4. भावार्थ
  5. कठिन शब्द
  6. कब पढ़ें
  7. विधि
  8. महत्व
  9. पाठ-भेद
  10. रचयिता और स्रोत
  11. ये भी पढ़ें
  12. सवाल-जवाब
  13. सुधार सुझाएँ

॥ दोहा ॥

बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।अरुण अधर जनु बिम्बफल, नयन कमल अभिराम॥

अर्थ: आपके हाथ में मधुर बंसी शोभित है और शरीर नीले बादल जैसा श्यामल है। आपके होंठ बिंब फल जैसे लाल हैं और आँखें कमल जैसी सुंदर हैं।

पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज।जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥

अर्थ: आपका मुख पूर्ण चंद्रमा और कमल जैसा है, और शरीर पर शुभ पीतांबर सजा है। मन मोहने वाले, कामदेव जैसी सुंदर छवि वाले महाराज कृष्णचंद्र, आपकी जय हो।

॥ चौपाई ॥

जय यदुनंदन जय जगवंदन।जय वसुदेव देवकी नन्दन ॥१॥

अर्थ: हे यदुकुल के नंदन, सारे जगत के वंदनीय, आपकी जय हो। हे वसुदेव और देवकी के पुत्र, आपकी जय हो।

जय यशुदा सुत नन्द दुलारे।जय प्रभु भक्तन के दृग तारे ॥२॥

अर्थ: हे यशोदा के पुत्र और नंद बाबा के दुलारे, आपकी जय हो। हे प्रभु, भक्तों की आँखों के तारे, आपकी जय हो।

जय नट-नागर, नाग नथैया।कृष्ण कन्हैया धेनु चरैया ॥३॥

अर्थ: हे नटनागर, कालिय नाग को नाथने वाले, आपकी जय हो। हे कृष्ण कन्हैया, गायें चराने वाले, आपकी जय हो।

पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो।आओ दीनन कष्ट निवारो ॥४॥

अर्थ: हे प्रभु, फिर से अपने नख पर पर्वत उठाइए, और आकर दीनों का कष्ट दूर कीजिए।

वंशी मधुर अधर धरि टेरौ।होवे पूर्ण विनय यह मेरौ ॥५॥

अर्थ: होंठों पर मधुर बंसी रखकर उसकी तान छेड़िए; मेरी यह विनती पूरी हो।

आओ हरि पुनि माखन चाखो।आज लाज भारत की राखो ॥६॥

अर्थ: हे हरि, फिर से आकर माखन चखिए, और आज भारत की लाज रखिए।

गोल कपोल, चिबुक अरुणारे।मृदु मुस्कान मोहिनी डारे ॥७॥

अर्थ: आपके गोल गाल हैं और ठोड़ी लालिमा लिए है; आपकी कोमल मुस्कान सब पर मोहिनी डाल देती है।

राजित राजिव नयन विशाला।मोर मुकुट वैजन्तीमाला ॥८॥

अर्थ: कमल जैसे बड़े-बड़े नेत्र शोभित हैं; सिर पर मोर-मुकुट है और गले में वैजयंती माला।

कुंडल श्रवण, पीत पट आछे।कटि किंकिणी काछनी काछे ॥९॥

अर्थ: कानों में कुंडल और शरीर पर सुंदर पीला वस्त्र है; कमर में करधनी है और काछनी कसी हुई है।

नील जलज सुन्दर तनु सोहे।छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे ॥१०॥

अर्थ: नीले कमल जैसा सुंदर शरीर शोभित है; आपकी छवि देखकर देवता, मनुष्य और मुनियों के मन मोहित हो जाते हैं।

मस्तक तिलक, अलक घुंघराले।आओ कृष्ण बांसुरी वाले ॥११॥

अर्थ: माथे पर तिलक है और बाल घुँघराले हैं। हे बाँसुरी वाले कृष्ण, आइए।

करि पय पान, पूतनहि तार्यो।अका बका कागासुर मार्यो ॥१२॥

अर्थ: आपने दूध पीते-पीते पूतना का उद्धार कर दिया, और अघासुर, बकासुर और कागासुर को मारा।

मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला।भै शीतल लखतहिं नंदलाला ॥१३॥

अर्थ: जब वन में आग की ज्वाला जल रही थी, तब नंदलाल के देखते ही वह शीतल हो गई।

सुरपति जब ब्रज चढ़्यो रिसाई।मूसर धार वारि वर्षाई ॥१४॥

अर्थ: जब इंद्र क्रोध करके ब्रज पर चढ़ आए और मूसलधार वर्षा कराई,

लगत लगत व्रज चहन बहायो।गोवर्धन नख धारि बचायो ॥१५॥

अर्थ: और ब्रज बहने ही वाला था, तब आपने गोवर्धन पर्वत को नख पर उठाकर उसे बचा लिया।

लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई।मुख मंह चौदह भुवन दिखाई ॥१६॥

अर्थ: माता यशोदा के मन में जब भ्रम बढ़ा, तब आपने उन्हें अपने मुख में चौदहों भुवन दिखा दिए।

दुष्ट कंस अति उधम मचायो।कोटि कमल जब फूल मंगायो ॥१७॥

अर्थ: दुष्ट कंस ने बहुत उत्पात मचाया, जब उसने ब्रज से करोड़ों कमल के फूल मँगवाए।

नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें।चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें ॥१८॥

अर्थ: तब आपने यमुना में कालिय नाग को नाथ लिया, और उसके फनों पर अपने चरण-चिह्न देकर उसे निर्भय कर दिया।

करि गोपिन संग रास विलासा।सबकी पूरण करी अभिलाषा ॥१९॥

अर्थ: आपने गोपियों के साथ रास रचाया और सबकी अभिलाषा पूरी की।

केतिक महा असुर संहारयो।कंसहि केस पकड़ि दै मारयो ॥२०॥

अर्थ: आपने कितने ही बड़े असुरों का संहार किया, और कंस को बाल पकड़कर पटका और मार दिया।

मात-पिता की बन्दि छुड़ाई।उग्रसेन कहँ राज दिलाई ॥२१॥

अर्थ: आपने माता-पिता को कारागार से छुड़ाया और उग्रसेन को उनका राज्य लौटाया।

महि से मृतक छहों सुत लायो।मातु देवकी शोक मिटायो ॥२२॥

अर्थ: आप माता देवकी के छहों मृत पुत्रों को पाताल से ले आए और उनका शोक मिटाया।

भौमासुर मुर दैत्य संहारी।लाये षट दश सहसकुमारी ॥२३॥

अर्थ: आपने भौमासुर (नरकासुर) और मुर दैत्य का संहार किया, और उसकी कैद से सोलह हज़ार कुमारियों को छुड़ाकर लाए।

दै भीमहिं तृण चीर सहारा।जरासिंधु राक्षस कहँ मारा ॥२४॥

अर्थ: आपने तिनका चीरकर भीम को संकेत दिया और इस सहारे से जरासंध का वध करवाया।

असुर बकासुर आदिक मार्यो।भक्तन के तब कष्ट निवार्यो ॥२५॥

अर्थ: आपने बकासुर जैसे असुरों को मारा और भक्तों के कष्ट दूर किए।

दीन सुदामा के दुःख टार्यो।तंदुल तीन मूंठ मुख डार्यो ॥२६॥

अर्थ: आपने दीन सुदामा का दुःख दूर किया, और उनके लाए चावल की तीन मुट्ठियाँ प्रेम से खाईं।

प्रेम के साग विदुर घर माँगे।दुर्योधन के मेवा त्यागे ॥२७॥

अर्थ: आपने विदुर के घर प्रेम से बना साग माँगकर खाया, और दुर्योधन के मेवे त्याग दिए।

लखी प्रेम की महिमा भारी।ऐसे श्याम दीन हितकारी ॥२८॥

अर्थ: आपने प्रेम की महिमा को सबसे बड़ा माना; श्याम ऐसे ही दीनों का हित करने वाले हैं।

भारत के पारथ रथ हाँके।लिये चक्र कर नहिं बल थाके ॥२९॥

अर्थ: महाभारत के युद्ध में आपने अर्जुन (पार्थ) का रथ हाँका; हाथ में चक्र भी उठाया, और आपका बल कभी नहीं थका।

निज गीता के ज्ञान सुनाए।भक्तन हृदय सुधा वर्षाए ॥३०॥

अर्थ: आपने अपनी गीता का ज्ञान सुनाया, और भक्तों के हृदय में अमृत बरसाया।

मीरा थी ऐसी मतवाली।विष पी गई बजाकर ताली ॥३१॥

अर्थ: मीराबाई आपकी भक्ति में ऐसी मतवाली थीं कि ताली बजाते हुए विष पी गईं।

राणा भेजा साँप पिटारी।शालिग्राम बने बनवारी ॥३२॥

अर्थ: राणा ने पिटारी में साँप भेजा, तो बनवारी स्वयं शालिग्राम बन गए।

निज माया तुम विधिहिं दिखायो।उर ते संशय सकल मिटायो ॥३३॥

अर्थ: आपने ब्रह्मा जी को अपनी माया दिखाई और उनके हृदय का सारा संशय मिटा दिया।

तव शत निन्दा करि तत्काला।जीवन मुक्त भयो शिशुपाला ॥३४॥

अर्थ: आपकी सौ निंदाएँ करने के तुरंत बाद आपके हाथों मरकर शिशुपाल भी मुक्त हो गया।

जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।दीनानाथ लाज अब जाई ॥३५॥

अर्थ: जब द्रौपदी ने पुकार लगाई: हे दीनानाथ, अब मेरी लाज जा रही है,

तुरतहि वसन बने नंदलाला।बढ़े चीर भै अरि मुंह काला ॥३६॥

अर्थ: तब नंदलाल तुरंत वस्त्र बन गए; चीर बढ़ता ही गया और शत्रुओं को लज्जित होना पड़ा।

अस अनाथ के नाथ कन्हैया।डूबत भंवर बचावै नैया ॥३७॥

अर्थ: कन्हैया ऐसे अनाथों के नाथ हैं, जो भँवर में डूबती नाव को भी बचा लेते हैं।

सुन्दरदास आस उर धारी।दया दृष्टि कीजै बनवारी ॥३८॥

अर्थ: सुंदरदास हृदय में आशा लिए विनती करते हैं: हे बनवारी, मुझ पर दया की दृष्टि कीजिए।

नाथ सकल मम कुमति निवारो।क्षमहु बेगि अपराध हमारो ॥३९॥

अर्थ: हे नाथ, मेरी सारी कुमति दूर कीजिए, और जल्दी मेरे अपराध क्षमा कीजिए।

खोलो पट अब दर्शन दीजै।बोलो कृष्ण कन्हैया की जै ॥४०॥

अर्थ: अब पट खोलकर दर्शन दीजिए। बोलो, कृष्ण कन्हैया की जय!

॥ दोहा ॥

यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥

अर्थ: चालीसा का अंतिम दोहा कहता है कि जो कृष्ण की इस चालीसा को हृदय में धारण कर पाठ करता है, वह आठ सिद्धियाँ, नौ निधियाँ और चारों पदार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) पाता है।

हर चौपाई का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।

परिचय

कृष्ण चालीसा भगवान श्री कृष्ण की प्रचलित हिन्दी स्तुति है। आरंभ में श्री कृष्ण के रूप का वर्णन करने वाले दो दोहे हैं, फिर चालीस चौपाइयाँ और अंत में फलश्रुति का एक दोहा।

चौपाइयों में श्री कृष्ण का बाल-रूप और शृंगार आता है, फिर उनकी लीलाएँ एक के बाद एक: पूतना का उद्धार, गोवर्धन धारण, यशोदा को मुख में चौदह भुवन दिखाना, कालिय नाग, रास, कंस-वध, सुदामा और विदुर का प्रेम, अर्जुन का रथ और गीता, मीरा, शिशुपाल और द्रौपदी का चीर। अंत में भक्त सुंदरदास अपनी कुमति दूर करने और दर्शन देने की विनती करते हैं।

चौपाई-वार अर्थ

  1. दोहा बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम…

    आपके हाथ में मधुर बंसी शोभित है और शरीर नीले बादल जैसा श्यामल है। आपके होंठ बिंब फल जैसे लाल हैं और आँखें कमल जैसी सुंदर हैं।

  2. दोहा पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज…

    आपका मुख पूर्ण चंद्रमा और कमल जैसा है, और शरीर पर शुभ पीतांबर सजा है। मन मोहने वाले, कामदेव जैसी सुंदर छवि वाले महाराज कृष्णचंद्र, आपकी जय हो।

  3. चौपाई १ जय यदुनंदन जय जगवंदन…

    हे यदुकुल के नंदन, सारे जगत के वंदनीय, आपकी जय हो। हे वसुदेव और देवकी के पुत्र, आपकी जय हो।

  4. चौपाई २ जय यशुदा सुत नन्द दुलारे…

    हे यशोदा के पुत्र और नंद बाबा के दुलारे, आपकी जय हो। हे प्रभु, भक्तों की आँखों के तारे, आपकी जय हो।

  5. चौपाई ३ जय नट-नागर, नाग नथैया…

    हे नटनागर, कालिय नाग को नाथने वाले, आपकी जय हो। हे कृष्ण कन्हैया, गायें चराने वाले, आपकी जय हो।

  6. चौपाई ४ पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो…

    हे प्रभु, फिर से अपने नख पर पर्वत उठाइए, और आकर दीनों का कष्ट दूर कीजिए।

  7. चौपाई ५ वंशी मधुर अधर धरि टेरौ…

    होंठों पर मधुर बंसी रखकर उसकी तान छेड़िए; मेरी यह विनती पूरी हो।

  8. चौपाई ६ आओ हरि पुनि माखन चाखो…

    हे हरि, फिर से आकर माखन चखिए, और आज भारत की लाज रखिए।

  9. चौपाई ७ गोल कपोल, चिबुक अरुणारे…

    आपके गोल गाल हैं और ठोड़ी लालिमा लिए है; आपकी कोमल मुस्कान सब पर मोहिनी डाल देती है।

  10. चौपाई ८ राजित राजिव नयन विशाला…

    कमल जैसे बड़े-बड़े नेत्र शोभित हैं; सिर पर मोर-मुकुट है और गले में वैजयंती माला।

  11. चौपाई ९ कुंडल श्रवण, पीत पट आछे…

    कानों में कुंडल और शरीर पर सुंदर पीला वस्त्र है; कमर में करधनी है और काछनी कसी हुई है।

  12. चौपाई १० नील जलज सुन्दर तनु सोहे…

    नीले कमल जैसा सुंदर शरीर शोभित है; आपकी छवि देखकर देवता, मनुष्य और मुनियों के मन मोहित हो जाते हैं।

  13. चौपाई ११ मस्तक तिलक, अलक घुंघराले…

    माथे पर तिलक है और बाल घुँघराले हैं। हे बाँसुरी वाले कृष्ण, आइए।

  14. चौपाई १२ करि पय पान, पूतनहि तार्यो…

    आपने दूध पीते-पीते पूतना का उद्धार कर दिया, और अघासुर, बकासुर और कागासुर को मारा।

  15. चौपाई १३ मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला…

    जब वन में आग की ज्वाला जल रही थी, तब नंदलाल के देखते ही वह शीतल हो गई।

  16. चौपाई १४ सुरपति जब ब्रज चढ़्यो रिसाई…

    जब इंद्र क्रोध करके ब्रज पर चढ़ आए और मूसलधार वर्षा कराई,

  17. चौपाई १५ लगत लगत व्रज चहन बहायो…

    और ब्रज बहने ही वाला था, तब आपने गोवर्धन पर्वत को नख पर उठाकर उसे बचा लिया।

  18. चौपाई १६ लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई…

    माता यशोदा के मन में जब भ्रम बढ़ा, तब आपने उन्हें अपने मुख में चौदहों भुवन दिखा दिए।

  19. चौपाई १७ दुष्ट कंस अति उधम मचायो…

    दुष्ट कंस ने बहुत उत्पात मचाया, जब उसने ब्रज से करोड़ों कमल के फूल मँगवाए।

  20. चौपाई १८ नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें…

    तब आपने यमुना में कालिय नाग को नाथ लिया, और उसके फनों पर अपने चरण-चिह्न देकर उसे निर्भय कर दिया।

  21. चौपाई १९ करि गोपिन संग रास विलासा…

    आपने गोपियों के साथ रास रचाया और सबकी अभिलाषा पूरी की।

  22. चौपाई २० केतिक महा असुर संहारयो…

    आपने कितने ही बड़े असुरों का संहार किया, और कंस को बाल पकड़कर पटका और मार दिया।

  23. चौपाई २१ मात-पिता की बन्दि छुड़ाई…

    आपने माता-पिता को कारागार से छुड़ाया और उग्रसेन को उनका राज्य लौटाया।

  24. चौपाई २२ महि से मृतक छहों सुत लायो…

    आप माता देवकी के छहों मृत पुत्रों को पाताल से ले आए और उनका शोक मिटाया।

  25. चौपाई २३ भौमासुर मुर दैत्य संहारी…

    आपने भौमासुर (नरकासुर) और मुर दैत्य का संहार किया, और उसकी कैद से सोलह हज़ार कुमारियों को छुड़ाकर लाए।

  26. चौपाई २४ दै भीमहिं तृण चीर सहारा…

    आपने तिनका चीरकर भीम को संकेत दिया और इस सहारे से जरासंध का वध करवाया।

  27. चौपाई २५ असुर बकासुर आदिक मार्यो…

    आपने बकासुर जैसे असुरों को मारा और भक्तों के कष्ट दूर किए।

  28. चौपाई २६ दीन सुदामा के दुःख टार्यो…

    आपने दीन सुदामा का दुःख दूर किया, और उनके लाए चावल की तीन मुट्ठियाँ प्रेम से खाईं।

  29. चौपाई २७ प्रेम के साग विदुर घर माँगे…

    आपने विदुर के घर प्रेम से बना साग माँगकर खाया, और दुर्योधन के मेवे त्याग दिए।

  30. चौपाई २८ लखी प्रेम की महिमा भारी…

    आपने प्रेम की महिमा को सबसे बड़ा माना; श्याम ऐसे ही दीनों का हित करने वाले हैं।

  31. चौपाई २९ भारत के पारथ रथ हाँके…

    महाभारत के युद्ध में आपने अर्जुन (पार्थ) का रथ हाँका; हाथ में चक्र भी उठाया, और आपका बल कभी नहीं थका।

  32. चौपाई ३० निज गीता के ज्ञान सुनाए…

    आपने अपनी गीता का ज्ञान सुनाया, और भक्तों के हृदय में अमृत बरसाया।

  33. चौपाई ३१ मीरा थी ऐसी मतवाली…

    मीराबाई आपकी भक्ति में ऐसी मतवाली थीं कि ताली बजाते हुए विष पी गईं।

  34. चौपाई ३२ राणा भेजा साँप पिटारी…

    राणा ने पिटारी में साँप भेजा, तो बनवारी स्वयं शालिग्राम बन गए।

  35. चौपाई ३३ निज माया तुम विधिहिं दिखायो…

    आपने ब्रह्मा जी को अपनी माया दिखाई और उनके हृदय का सारा संशय मिटा दिया।

  36. चौपाई ३४ तव शत निन्दा करि तत्काला…

    आपकी सौ निंदाएँ करने के तुरंत बाद आपके हाथों मरकर शिशुपाल भी मुक्त हो गया।

  37. चौपाई ३५ जबहिं द्रौपदी टेर लगाई…

    जब द्रौपदी ने पुकार लगाई: हे दीनानाथ, अब मेरी लाज जा रही है,

  38. चौपाई ३६ तुरतहि वसन बने नंदलाला…

    तब नंदलाल तुरंत वस्त्र बन गए; चीर बढ़ता ही गया और शत्रुओं को लज्जित होना पड़ा।

  39. चौपाई ३७ अस अनाथ के नाथ कन्हैया…

    कन्हैया ऐसे अनाथों के नाथ हैं, जो भँवर में डूबती नाव को भी बचा लेते हैं।

  40. चौपाई ३८ सुन्दरदास आस उर धारी…

    सुंदरदास हृदय में आशा लिए विनती करते हैं: हे बनवारी, मुझ पर दया की दृष्टि कीजिए।

  41. चौपाई ३९ नाथ सकल मम कुमति निवारो…

    हे नाथ, मेरी सारी कुमति दूर कीजिए, और जल्दी मेरे अपराध क्षमा कीजिए।

  42. चौपाई ४० खोलो पट अब दर्शन दीजै…

    अब पट खोलकर दर्शन दीजिए। बोलो, कृष्ण कन्हैया की जय!

  43. दोहा यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि…

    चालीसा का अंतिम दोहा कहता है कि जो कृष्ण की इस चालीसा को हृदय में धारण कर पाठ करता है, वह आठ सिद्धियाँ, नौ निधियाँ और चारों पदार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) पाता है।

विषय और भावार्थ

कृष्ण चालीसा श्री कृष्ण के रूप और लीलाओं की माला है। दोहे और आरंभ की चौपाइयाँ उनके रूप का ध्यान कराती हैं: श्यामल शरीर, हाथ में बंसी, मोर-मुकुट, पीतांबर और मोहिनी मुस्कान। फिर बचपन से महाभारत तक की लीलाएँ आती हैं, जिनमें हर बार वे किसी अपने को संकट से बचाते हैं: ब्रज को इंद्र की वर्षा से, देवकी-वसुदेव को कारागार से, सुदामा को दरिद्रता से, मीरा को विष से, और द्रौपदी को अपमान से।

चालीसा का बार-बार लौटने वाला भाव प्रेम है: श्री कृष्ण दुर्योधन के मेवे छोड़कर विदुर का साग खाते हैं और सुदामा के चावल प्रेम से स्वीकार करते हैं। इसलिए अंत में भक्त अपने लिए भी यही माँगता है: दया की दृष्टि, कुमति का नाश और अपराधों की क्षमा, और फिर पट खोलकर दर्शन।

कठिन शब्दों के अर्थ

जलद
बादल
अधर
होंठ
बिम्बफल
लाल रंग का एक फल
अभिराम
सुंदर, मन को भाने वाला
पूर्ण इन्द्र
यहाँ पूर्ण चंद्रमा के अर्थ में
अरविन्द
कमल
मदन
कामदेव
जगवंदन
जगत के वंदनीय
दृग तारे
आँखों के तारे, अत्यंत प्रिय
नाग नथैया
नाग को नाथने वाले
धेनु
गाय
टेरौ
तान छेड़ो, पुकारो
कपोल
गाल
चिबुक
ठोड़ी
राजिव
कमल
वैजन्तीमाला
वैजयंती फूलों की माला
किंकिणी
घुँघरू वाली करधनी
काछनी
कसकर बाँधी गई धोती
अलक
बालों की लट
पय
दूध
सुरपति
इंद्र
रिसाई
क्रोध करके
षट दश सहस
सोलह हज़ार
तृण
तिनका
तंदुल
चावल
पारथ
पार्थ, अर्जुन
विधि
ब्रह्मा
वसन
वस्त्र
पदारथ चारि
चार पुरुषार्थ: धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष

यह चालीसा कब पढ़ी जाता है

  • जन्माष्टमी पर
  • रोज़ सुबह या शाम की पूजा में, लड्डू गोपाल की सेवा के साथ
  • एकादशी और गुरुवार को
  • कार्तिक मास और ब्रज के उत्सवों में

पढ़ने की विधि

  • शांत होकर बैठें। चाहें तो श्री कृष्ण या लड्डू गोपाल के सामने दीपक जलाकर पाठ करें।
  • आरंभ के दोनों दोहे, चालीस चौपाइयाँ और अंत का दोहा एक जैसी, आराम की गति से पढ़ें या गाएँ।
  • चौपाइयों में आने वाली लीलाओं को मन में याद करते हुए पढ़ें; हर चौपाई के साथ उसकी कथा का संकेत दिया गया है।
पूरी विधिजन्माष्टमी पूजा विधिघर में जन्माष्टमी की पूजा: दिन का व्रत, आधी रात को श्री कृष्ण के जन्म पर पंचामृत अभिषेक, पालना, भोग, आरती और पारण, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

पारंपरिक महत्व

कृष्ण चालीसा जन्माष्टमी पर सबसे अधिक पढ़ी जाती है, और बहुत से घरों में लड्डू गोपाल की रोज़ की सेवा, एकादशी और कार्तिक मास में भी इसका पाठ होता है।

इस चालीसा की विशेषता यह है कि यह एक ही पाठ में श्री कृष्ण की लगभग पूरी कथा याद करा देती है: बाल-लीला, ब्रज, मथुरा, द्वारका, महाभारत, और मीरा जैसे बाद के भक्त भी। इसलिए इसे पढ़ना श्री कृष्ण की लीलाओं के स्मरण का सरल माध्यम माना जाता है। इसकी फलश्रुति अंतिम दोहे में है।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
चौपाई 5बंशी मधुर अधर धरि टेरी। होवे पूर्ण विनय यह मेरी॥रणधीर प्रकाशन की पुस्तक में; भक्ति भारत में दूसरी पंक्ति “होवे पूर्ण मनोरथ मेरो”।
चौपाई 8रंजित राजिव नयन विशालारणधीर प्रकाशन और भक्ति भारत में “राजित” की जगह “रंजित”।
चौपाई 20कंसहि केस पकिड़ दै मार्योsanskritdocuments.org में “पकड़ि” की जगह छपाई की भूल; यहाँ भक्ति भारत और रणधीर प्रकाशन का शुद्ध रूप है।
चौपाई 34तब शत निन्दा करि तत्कालाsanskritdocuments.org और भक्ति भारत में “तव” की जगह “तब”; रणधीर प्रकाशन की पुस्तक में “तव” (आपकी), जो कथा के अर्थ से मेल खाता है।
चौपाई 37डूबत भंवर बचावत नैयाभक्ति भारत और रणधीर प्रकाशन में “बचावै” की जगह “बचावत”।
चौपाई 40बोलो कृष्ण कन्हैया की जयरणधीर प्रकाशन की पुस्तक में “जै” की जगह “जय”।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
सुन्दरदास (परंपरा के अनुसार)
भाषा
हिन्दी

चौपाई 38 “सुन्दरदास आस उर धारी” में यह नाम आता है, इसलिए इन्हें रचयिता माना जाता है। इनके बारे में और प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती; sanskritdocuments.org इसे “पारंपरिक” रचना बताता है।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): sanskritdocuments.org (krishna40) को रणधीर प्रकाशन की छपी पुस्तक “51 चालीसा संग्रह” (archive.org के पृष्ठ-चित्र और OCR) और भक्ति भारत के पाठ से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया। हर पंक्ति इनमें से किसी एक संदर्भ फ़ाइल में ज्यों की त्यों मिलती है। आधार sanskritdocuments.org का पाठ है। चौपाई 20 भक्ति भारत से ली (sanskritdocuments.org में “पकिड़”), और चौपाई 32 और 34 छपी पुस्तक से (“शालिग्राम” और “तव”), जिन्हें पृष्ठ-चित्र से जाँचा। sanskritdocuments.org की वर्तनी में “तार्यो” जैसे शब्दों में र के बाद अदृश्य जोड़ने वाला चिह्न है; यहाँ वही अक्षर सामान्य रूप में लिखे हैं। फलश्रुति केवल अंतिम दोहे में है, जिसका क्रमांक नहीं होता, इसलिए उसे अलग खंड में नहीं, दोहे पर ही चिह्नित किया है।

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कृष्ण

मधुराष्टकम्

कृष्ण, बाल गोपाल · अष्टकम् · संस्कृत

अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम्

कृष्ण

दामोदराष्टकम्

कृष्ण, बाल गोपाल · अष्टकम् · संस्कृत

नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं

श्री कृष्ण के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कृष्ण चालीसा किसने लिखी?

चौपाई 38 में “सुन्दरदास” नाम आता है, इसलिए उन्हें रचयिता माना जाता है। उनके बारे में और प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।

कृष्ण चालीसा कब पढ़ी जाती है?

सबसे अधिक जन्माष्टमी पर; इसके अलावा रोज़ की पूजा, लड्डू गोपाल की सेवा, एकादशी और कार्तिक मास में।

चौपाई 24 में “दै भीमहिं तृण चीर सहारा” का क्या अर्थ है?

महाभारत की कथा के अनुसार जरासंध से युद्ध के समय श्री कृष्ण ने एक तिनका बीच से चीरकर भीम को संकेत दिया कि जरासंध को कैसे मारना है।

चालीसा में मीरा का नाम क्यों आता है?

मीराबाई श्री कृष्ण की प्रसिद्ध भक्त थीं। चालीसा उनकी कथा कहती है कि राणा के भेजे विष और साँप से भी श्री कृष्ण ने उनकी रक्षा की।

इसकी फलश्रुति क्या कहती है?

अंतिम दोहा कहता है कि जो इसे हृदय में धारण कर पढ़ता है, वह अष्ट सिद्धि, नव निधि और चारों पदार्थ पाता है। यह चालीसा का अपना वचन है।

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