यमुना

स्तोत्र · यमुना, कृष्ण · अष्टकम्

यमुनाष्टकम्

श्री वल्लभाचार्य का "नमामि यमुनामहं सकलसिद्धिहेतुं मुदा" से शुरू होने वाला यमुनाष्टक: श्रीकृष्ण की प्रिया यमुना जी की स्तुति, अर्थ सहित।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. भावार्थ
  4. फलश्रुति
  5. कब पढ़ें
  6. विधि
  7. पाठ-भेद
  8. रचयिता और स्रोत
  9. ये भी पढ़ें
  10. सवाल-जवाब
  11. सुधार सुझाएँ

नमामि यमुनामहं सकलसिद्धिहेतुं मुदामुरारिपदपङ्कजस्फुरदमन्दरेणूत्कटाम् ।तटस्थनवकाननप्रकटमोदपुष्पाम्बुनासुरासुरसुपूजितस्मरपितुः श्रियं बिभ्रतीम् ॥१॥

namāmi yamunāmahaṃ sakalasiddhihetuṃ mudā
murāripadapaṅkajasphuradamandareṇūtkaṭām |
taṭasthanavakānanaprakaṭamodapuṣpāmbunā
surāsurasupūjitasmarapituḥ śriyaṃ bibhratīm ||

अर्थ: सब सिद्धियों का कारण, मुरारि श्रीकृष्ण के चरण-कमलों की चमकती, भरपूर रज से सजी, अपने तट के नए वनों के खिले फूलों से सुगंधित जल के कारण देवताओं और असुरों द्वारा भली-भाँति पूजित, और कामदेव के पिता श्रीकृष्ण की शोभा धारण करने वाली यमुना जी को मैं आनंद से प्रणाम करता हूँ।

सकलसिद्धिहेतुं
सब सिद्धियों का कारण
मुदा
आनंद से
मुरारिपदपङ्कज
श्रीकृष्ण के चरण-कमल
रेणूत्कटाम्
रज (धूल) से भरपूर
तटस्थनवकानन
तट पर बसे नए वन
स्मरपितुः
कामदेव के पिता (श्रीकृष्ण) की

कलिन्दगिरिमस्तके पतदमन्दपूरोज्ज्वलाविलासगमनोल्लसत्प्रकटगण्डशैलोन्नता ।सघोषगतिदन्तुरा समधिरूढदोलोत्तमामुकुन्दरतिवर्धिनी जयति पद्मबन्धोः सुता ॥२॥

kalindagirimastake patadamandapūrojjvalā
vilāsagamanollasatprakaṭagaṇḍaśailonnatā |
saghoṣagatidanturā samadhirūḍhadolottamā
mukundarativardhinī jayati padmabandhoḥ sutā ||

अर्थ: कलिंद पर्वत की चोटी से वेग से गिरती, अपनी तेज़ धारा से उज्ज्वल, लीला भरी चाल से चट्टानों पर उछलती और ऊँची उठती, कल-कल शब्द के साथ ऊँची-नीची लहरों में बहती, मानो किसी सुंदर झूले पर बैठी हों, श्रीकृष्ण में प्रेम बढ़ाने वाली सूर्य-पुत्री यमुना की जय हो।

कलिन्दगिरिमस्तके
कलिंद पर्वत की चोटी पर
अमन्दपूर
तेज़ धारा
गण्डशैल
बड़ी चट्टानें
सघोषगति
कल-कल शब्द के साथ बहना
दोला
झूला
पद्मबन्धोः सुता
सूर्य की पुत्री

भुवं भुवनपावनीमधिगतामनेकस्वनैःप्रियाभिरिव सेवितां शुकमयूरहंसादिभिः ।तरङ्गभुजकङ्कणप्रकटमुक्तिकावालुकानितम्बतटसुन्दरीं नमत कृष्णतुर्यप्रियाम् ॥३॥

bhuvaṃ bhuvanapāvanīmadhigatāmanekasvanaiḥ
priyābhiriva sevitāṃ śukamayūrahaṃsādibhiḥ |
taraṅgabhujakaṅkaṇaprakaṭamuktikāvālukā
nitambataṭasundarīṃ namata kṛṣṇaturyapriyām ||

अर्थ: संसार को पवित्र करने के लिए पृथ्वी पर उतरी, तोता, मोर, हंस आदि पक्षियों के अनेक स्वरों से ऐसे सेवित मानो सखियाँ सेवा कर रही हों, जिनकी लहरें भुजाएँ हैं और उनमें चमकती रेत मोतियों के कंगन जैसी है, जिनके तट सुंदर हैं, श्रीकृष्ण की चौथी प्रिया उन यमुना जी को नमस्कार करो।

भुवनपावनीम्
संसार को पवित्र करने वाली
अनेकस्वनैः
अनेक स्वरों से
शुकमयूरहंस
तोता, मोर, हंस
मुक्तिकावालुका
मोती जैसी रेत
कृष्णतुर्यप्रियाम्
श्रीकृष्ण की चौथी प्रिया

अनन्तगुण भूषिते शिवविरञ्चिदेवस्तुतेघनाघननिभे सदा ध्रुवपराशराभीष्टदे ।विशुद्धमथुरातटे सकलगोपगोपीवृतेकृपाजलधिसंश्रिते मम मनस्सुखं भावय ॥४॥

anantaguṇa bhūṣite śivavirañcidevastute
ghanāghananibhe sadā dhruvaparāśarābhīṣṭade |
viśuddhamathurātaṭe sakalagopagopīvṛte
kṛpājaladhisaṃśrite mama manassukhaṃ bhāvaya ||

अर्थ: हे अनंत गुणों से सुशोभित, शिव, ब्रह्मा आदि देवों से स्तुत, घने बादल जैसे श्याम वर्ण वाली, ध्रुव और पराशर को मनचाहा फल देने वाली, जिनके तट पर पवित्र मथुरा है, जो सब गोप-गोपियों से घिरी हैं और कृपा के सागर श्रीकृष्ण के आश्रय में हैं, मेरे मन को सुख दीजिए।

शिवविरञ्चि
शिव और ब्रह्मा
घनाघननिभे
घने बादल जैसी श्याम
ध्रुवपराशराभीष्टदे
ध्रुव और पराशर को मनचाहा देने वाली
कृपाजलधि
कृपा के सागर (श्रीकृष्ण)
भावय
उत्पन्न कीजिए, दीजिए

यया चरणपद्मजा मुररिपोः प्रियम्भावुकासमागमनतोऽभवत् सकलसिद्धिदा सेवताम् ।तया सदृशतामियात्कमलजा सपत्नीव य-द्धरिप्रियकलिन्दया मनसि मे सदा स्थीयताम् ॥५॥

yayā caraṇapadmajā muraripoḥ priyambhāvukā
samāgamanato’bhavat sakalasiddhidā sevatām |
tayā sadṛśatāmiyātkamalajā sapatnīva ya-
ddharipriyakalindayā manasi me sadā sthīyatām ||

अर्थ: श्रीकृष्ण के चरण-कमल से निकली गंगा, जिनके संगम से ही उन्हें प्रिय हुईं और सेवा करने वालों को सब सिद्धियाँ देने वाली बनीं; जिनकी बराबरी केवल लक्ष्मी जी सपत्नी की तरह कर सकती हैं; ऐसी हरि-प्रिया कलिंदनंदिनी यमुना मेरे मन में सदा बसी रहें।

चरणपद्मजा
चरण-कमल से जन्मी (गंगा)
मुररिपोः
मुर के शत्रु श्रीकृष्ण की
समागमनतः
संगम से
कमलजा
लक्ष्मी
सपत्नी
सौत, बराबर की संगिनी
स्थीयताम्
बसी रहें

नमोऽस्तु यमुने सदा तव चरित्रमत्यद्भुतंन जातु यमयातना भवति ते पयः पानतः ।यमोऽपि भगिनीसुतान्कथमु हन्ति दुष्टानपिप्रियो भवति सेवनात्तव हरेर्यथा गोपिकाः ॥६॥

namo’stu yamune sadā tava caritramatyadbhutaṃ
na jātu yamayātanā bhavati te payaḥ pānataḥ |
yamo’pi bhaginīsutānkathamu hanti duṣṭānapi
priyo bhavati sevanāttava hareryathā gopikāḥ ||

अर्थ: हे यमुने, आपको सदा नमस्कार; आपका चरित्र अत्यंत अद्भुत है। आपका जल पीने से कभी यम-यातना नहीं होती। यम भी अपनी बहन की संतानों (आपके भक्तों) को, चाहे वे दोषी हों, कैसे दंड दे सकते हैं? आपकी सेवा से मनुष्य श्रीहरि को वैसे ही प्रिय हो जाता है जैसे गोपियाँ।

चरित्रम्
चरित्र, लीला
यमयातना
यम की पीड़ा
पयः पानतः
जल पीने से
भगिनीसुतान्
बहन की संतानों को
सेवनात्
सेवा से

ममाऽस्तु तव सन्निधौ तनुनवत्वमेतावतान दुर्लभतमा रतिर्मुररिपौ मुकुन्दप्रिये ।अतोऽस्तु तव लालना सुरधुनी परं सङ्गमा-त्तवैव भुवि कीर्तिता न तु कदापि पुष्टिस्थितैः ॥७॥

mamā’stu tava sannidhau tanunavatvametāvatā
na durlabhatamā ratirmuraripau mukundapriye |
ato’stu tava lālanā suradhunī paraṃ saṅgamā-
ttavaiva bhuvi kīrtitā na tu kadāpi puṣṭisthitaiḥ ||

अर्थ: हे मुकुन्दप्रिये, आपके पास रहकर मुझे नया (सेवा के योग्य) शरीर मिले; इतने से ही श्रीकृष्ण में प्रेम दुर्लभ नहीं रहता। इसलिए आपका ही लाड़-दुलार होता रहे। गंगा भी आपके संगम से ही पृथ्वी पर प्रसिद्ध हुईं, पर पुष्टिमार्ग के भक्तों ने उन्हें कभी आपसे अलग करके नहीं सराहा।

सन्निधौ
पास में
तनुनवत्वम्
नया शरीर मिलना
रतिः
प्रेम
लालना
लाड़, दुलार
सुरधुनी
देव-नदी गंगा
पुष्टिस्थितैः
पुष्टिमार्ग में स्थित भक्तों द्वारा

स्तुतिं तव करोति कः कमलजासपत्निप्रियेहरेर्यदनुसेवया भवति सौख्यमामोक्षतः ।इयं तव कथाऽधिका सकलगोपिकासङ्गम-स्मरश्रमजलाणुभिः सकलगात्रजैः सङ्गमः ॥८॥

stutiṃ tava karoti kaḥ kamalajāsapatnipriye
hareryadanusevayā bhavati saukhyamāmokṣataḥ |
iyaṃ tava kathā’dhikā sakalagopikāsaṅgama-
smaraśramajalāṇubhiḥ sakalagātrajaiḥ saṅgamaḥ ||

अर्थ: हे लक्ष्मी की सपत्नी, श्रीकृष्ण की प्रिये, आपकी स्तुति कौन कर सकता है? हरि की सेवा से मोक्ष तक का सुख मिलता है, पर आपकी कथा उससे भी बढ़कर है, क्योंकि रास-लीला में गोपियों के संग के श्रम से श्रीकृष्ण और गोपियों के अंगों से निकले जल-कणों का संगम आप में हुआ है।

कमलजासपत्नि
लक्ष्मी की सपत्नी
अनुसेवया
सेवा से
आमोक्षतः
मोक्ष तक
अधिका
बढ़कर
स्मरश्रमजलाणुभिः
प्रेम-लीला के श्रम से निकले जल-कणों से
सङ्गमः
मिलन

तवाऽष्टकमिदं मुदा पठति सूरसूते सदासमस्तदुरितक्षयो भवति वै मुकुन्दे रतिः ।तया सकलसिद्धयो मुररिपुश्च सन्तुष्यतिस्वभावविजयो भवेद्वदति वल्लभः श्रीहरेः ॥९॥

tavā’ṣṭakamidaṃ mudā paṭhati sūrasūte sadā
samastaduritakṣayo bhavati vai mukunde ratiḥ |
tayā sakalasiddhayo muraripuśca santuṣyati
svabhāvavijayo bhavedvadati vallabhaḥ śrīhareḥ ||

अर्थ: हे सूर्य-पुत्री, जो आपका यह अष्टक आनंद से सदा पढ़ता है, उसके सब पाप नष्ट होते हैं और मुकुन्द में प्रेम होता है; उस प्रेम से सब सिद्धियाँ मिलती हैं, श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और स्वभाव पर विजय मिलती है, ऐसा श्रीहरि के प्रिय वल्लभ कहते हैं।

सूरसूते
हे सूर्य की पुत्री
दुरितक्षयः
पापों का नाश
मुकुन्दे रतिः
श्रीकृष्ण में प्रेम
सन्तुष्यति
प्रसन्न होते हैं
स्वभावविजयः
अपने स्वभाव पर विजय
वदति वल्लभः
वल्लभ कहते हैं

इति श्रीवल्लभाचार्यविरचितं श्रीयमुनाष्टकं सम्पूर्णम् ।

iti śrīvallabhācāryaviracitaṃ śrīyamunāṣṭakaṃ sampūrṇam |

अर्थ: इस प्रकार श्री वल्लभाचार्य द्वारा रचित श्री यमुनाष्टक पूरा हुआ।

विरचितं
रचा गया
सम्पूर्णम्
पूरा हुआ

परिचय

यमुनाष्टकम् "नमामि यमुनामहं सकलसिद्धिहेतुं मुदा" से शुरू होता है। यह श्री वल्लभाचार्य के सोलह छोटे ग्रंथों (षोडश ग्रंथ) में पहला है और पुष्टिमार्ग में इसका पाठ रोज़ की सेवा का हिस्सा है। इसमें यमुना जी को नदी के साथ-साथ श्रीकृष्ण की प्रिया और कृपा करने वाली देवी के रूप में देखा गया है।

आठ श्लोकों में यमुना जी का कलिंद पर्वत से उतरना, ब्रज में बहना, उनके तट के वन, पक्षी और रेत, उनकी कृपा और श्रीकृष्ण से उनका प्रेम, सब आता है। नौवाँ श्लोक फलश्रुति है, जिसमें "वदति वल्लभः" (वल्लभ कहते हैं) आता है।

भावार्थ

यमुनाष्टक में यमुना जी एक नदी भी हैं और एक कृपालु देवी भी। पहले श्लोकों में उनका रूप है: कलिंद पर्वत से वेग से उतरती धारा, ब्रज के वन, पक्षियों की आवाज़ें, मोतियों जैसी रेत और श्रीकृष्ण के चरणों की रज से भरा जल। फिर उनकी कृपा है: वे मन को सुख देती हैं, यम-यातना से बचाती हैं और भक्त को श्रीहरि का प्रिय बना देती हैं।

पुष्टिमार्ग की दृष्टि में यमुना जी श्रीकृष्ण की प्रिया हैं, और उनकी कृपा से ही श्रीकृष्ण में सच्चा प्रेम जागता है। इसीलिए वल्लभाचार्य उनसे माँगते हैं कि आपके पास रहकर सेवा के योग्य शरीर मिले और आप मेरे मन में सदा बसी रहें। फलश्रुति का सार भी यही है: इस पाठ का सबसे बड़ा फल श्रीकृष्ण में प्रेम है।

फलश्रुति

इस स्तोत्र की फलश्रुति कहती है कि जो इस अष्टक को आनंद से पढ़ता है, उसके पाप नष्ट होते हैं, श्रीकृष्ण में प्रेम होता है, उससे सब सिद्धियाँ मिलती हैं, श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और स्वभाव पर विजय मिलती है। यह स्तोत्र का अपना वचन है।

तवाऽष्टकमिदं मुदा पठति सूरसूते सदा
समस्तदुरितक्षयो भवति वै मुकुन्दे रतिः ।
तया सकलसिद्धयो मुररिपुश्च सन्तुष्यति
स्वभावविजयो भवेद्वदति वल्लभः श्रीहरेः ॥

हे सूर्य-पुत्री, जो आपका यह अष्टक आनंद से सदा पढ़ता है, उसके सब पाप नष्ट होते हैं और मुकुन्द में प्रेम होता है; उस प्रेम से सब सिद्धियाँ मिलती हैं, श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और स्वभाव पर विजय मिलती है, ऐसा श्रीहरि के प्रिय वल्लभ कहते हैं।

यह अष्टकम् कब पढ़ा जाता है

  • रोज़ सुबह, विशेषकर पुष्टिमार्गीय घरों में सेवा के आरम्भ में
  • यमुना जयंती (यमुना छठ) पर
  • यम द्वितीया (भाई दूज) पर, जिसका संबंध यमुना और यम की कथा से है
  • यमुना स्नान, ब्रज-यात्रा या यमुना तट पर दीपदान के समय

पढ़ने की विधि

  • श्रीकृष्ण और यमुना जी का स्मरण करते हुए दीप जलाकर बैठें; यमुना तट पर हों तो वहाँ पढ़ें।
  • हर श्लोक लंबा है; उसे धीरे-धीरे, लय के साथ पढ़ें या गाएँ।
  • आठ श्लोकों के बाद फलश्रुति का नौवाँ श्लोक पढ़ें और यमुना जी को प्रणाम करें।
पूरी विधिजन्माष्टमी पूजा विधिघर में जन्माष्टमी की पूजा: दिन का व्रत, आधी रात को श्री कृष्ण के जन्म पर पंचामृत अभिषेक, पालना, भोग, आरती और पारण, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
श्लोक 8इयं तव कथाऽधिका सकलगोपिकासङ्गमः ।sanskritdocuments.org यहाँ विसर्ग और पूर्ण विराम छापता है, जिससे समास टूट जाता है। 1916 और 1950 के छपे संस्करण और bhaktibharat.com इसे अगली पंक्ति से जुड़ा एक समास ("सकलगोपिकासङ्गमस्मरश्रमजलाणुभिः") पढ़ते हैं, जो यहाँ लिया गया है।
श्लोक 4कृपाजलधिसंश्रिते मम मनः सुखं भावय1950 (काशी) के संस्करण का पाठ; अर्थ वही है।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
श्री वल्लभाचार्य (परंपरा के अनुसार)
ग्रंथ / स्रोत
श्री वल्लभाचार्य के षोडश ग्रंथ (पहला ग्रंथ)
भाषा
संस्कृत

नौवें श्लोक में "वदति वल्लभः श्रीहरेः" आता है और अंतिम वाक्य इसे श्री वल्लभाचार्य की रचना बताता है। पुष्टिमार्ग की परंपरा इसे उनके षोडश ग्रंथों में पहला मानती है।

1916 (निर्णय सागर प्रेस) और 1950 (काशी, षोडश ग्रंथ, पदच्छेद और अन्वयार्थ सहित) के छपे संस्करणों से, जो archive.org पर हैं, कठिन जगहों के शब्द मिलाए गए।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पाठ sanskritdocuments.org से लिया गया और bhaktibharat.com से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया; कठिन और संदिग्ध स्थान (श्लोक 1, 3, 4, 5, 7, 8, 9) archive.org पर 1916 (निर्णय सागर) और 1950 (काशी) के छपे संस्करणों के स्कैन से पढ़े पाठ से जाँचे गए। vignanam.org और stotranidhi.com पर "यमुनाष्टकम्" नाम से शंकराचार्य के दूसरे अष्टक हैं, वल्लभाचार्य का नहीं; इसलिए दूसरा पूरा पाठ bhaktibharat.com से लिया गया। श्लोक 8 में sanskritdocuments.org का विसर्ग और विराम छपे संस्करणों से मेल नहीं खाता, इसलिए वहाँ छपे संस्करणों वाला समास रखा गया।

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अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम्

माँ यमुना के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

यमुनाष्टक किसने लिखा?

श्री वल्लभाचार्य ने, ऐसी पुष्टिमार्ग की परंपरा है। नौवें श्लोक में स्वयं "वदति वल्लभः" आता है और यह उनके षोडश ग्रंथों में पहला है।

"कृष्णतुर्यप्रिया" का क्या अर्थ है?

तुर्य यानी चौथा। पुष्टिमार्ग की परंपरा में यमुना जी को श्रीकृष्ण की चौथी प्रिया माना जाता है, इसलिए उन्हें कृष्णतुर्यप्रिया कहा गया है।

यमुना जी को यम की बहन क्यों कहते हैं?

यमुना और यम, दोनों सूर्य की संतान माने जाते हैं। श्लोक 6 इसी रिश्ते से कहता है कि यम अपनी बहन के भक्तों को कैसे दंड दे सकते हैं।

इसे कब पढ़ें?

पुष्टिमार्गीय घरों में इसे रोज़ सुबह पढ़ा जाता है। यमुना छठ, भाई दूज और यमुना स्नान के समय भी इसका पाठ होता है।

शंकराचार्य का यमुनाष्टक क्या यही है?

नहीं। शंकराचार्य के नाम से "मुरारिकायकालिमाललामवारिधारिणी" और "कृपापारावारां" से शुरू होने वाले दूसरे यमुनाष्टक प्रचलित हैं। यहाँ वल्लभाचार्य का "नमामि यमुनामहं" वाला अष्टक दिया गया है।

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