दक्षिणामूर्ति

स्तोत्र · दक्षिणामूर्ति, शिव · स्तोत्र

दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्

गुरु रूप शिव, दक्षिणामूर्ति, की स्तुति के दस श्लोक, जिनमें अद्वैत वेदान्त का सार है। आदि शंकराचार्य का माना जाने वाला स्तोत्र, ध्यान-श्लोकों और सरल अर्थ सहित।

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  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. भावार्थ
  4. फलश्रुति
  5. कब पढ़ें
  6. विधि
  7. पाठ-भेद
  8. रचयिता और स्रोत
  9. ये भी पढ़ें
  10. सवाल-जवाब
  11. सुधार सुझाएँ

मौनव्याख्याप्रकटितपरब्रह्मतत्त्वं युवानंवर्षिष्ठान्ते वसदृषिगणैरावृतं ब्रह्मनिष्ठैः ।आचार्येन्द्रं करकलितचिन्मुद्रमानन्दरूपंस्वात्मारामं मुदितवदनं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥१॥

maunavyākhyāprakaṭitaparabrahmatattvaṃ yuvānaṃ
varṣiṣṭhānte vasadṛṣigaṇairāvṛtaṃ brahmaniṣṭhaiḥ |
ācāryendraṃ karakalitacinmudramānandarūpaṃ
svātmārāmaṃ muditavadanaṃ dakṣiṇāmūrtimīḍe ||

अर्थ: जो मौन व्याख्या से ही परब्रह्म का तत्त्व प्रकट करते हैं, जो युवा हैं और ब्रह्मनिष्ठ वृद्ध ऋषियों के समूह से घिरे हैं, जो आचार्यों में श्रेष्ठ हैं, हाथ में चिन्मुद्रा धारण किए हैं, आनंद-स्वरूप हैं, अपनी आत्मा में ही रमते हैं और प्रसन्नमुख हैं, उन दक्षिणामूर्ति की मैं स्तुति करता हूँ।

मौनव्याख्या
मौन से समझाना
युवा
युवा रूप वाले
वर्षिष्ठ
सबसे वृद्ध
ब्रह्मनिष्ठ
ब्रह्म में स्थित
चिन्मुद्रा
अंगूठे और तर्जनी को मिलाकर बनी ज्ञान-मुद्रा
स्वात्माराम
अपनी आत्मा में रमने वाले
ईडे
स्तुति करता हूँ

वटविटपिसमीपे भूमिभागे निषण्णंसकलमुनिजनानां ज्ञानदातारमारात् ।त्रिभुवनगुरुमीशं दक्षिणामूर्तिदेवंजननमरणदुःखच्छेददक्षं नमामि ॥२॥

vaṭaviṭapisamīpe bhūmibhāge niṣaṇṇaṃ
sakalamunijanānāṃ jñānadātāramārāt |
tribhuvanagurumīśaṃ dakṣiṇāmūrtidevaṃ
jananamaraṇaduḥkhacchedadakṣaṃ namāmi ||

अर्थ: जो वटवृक्ष के पास भूमि पर बैठे हैं, सभी मुनियों को समीप से ज्ञान देते हैं, जो तीनों लोकों के गुरु और ईश्वर हैं, और जन्म-मरण के दुःख को काटने में कुशल हैं, उन दक्षिणामूर्ति देव को मैं नमस्कार करता हूँ।

वटविटपी
वटवृक्ष, बरगद
निषण्ण
बैठे हुए
आरात्
समीप से
त्रिभुवनगुरु
तीनों लोकों के गुरु
छेद
काटना
दक्ष
कुशल, समर्थ

चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धाः शिष्या गुरुर्युवा ।गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्नसंशयाः ॥३॥

citraṃ vaṭatarormūle vṛddhāḥ śiṣyā gururyuvā |
gurostu maunaṃ vyākhyānaṃ śiṣyāstu chinnasaṃśayāḥ ||

अर्थ: कैसा आश्चर्य है! वटवृक्ष के नीचे शिष्य वृद्ध हैं और गुरु युवा; गुरु का मौन ही व्याख्यान है, और शिष्यों के संशय कट गए हैं।

चित्रम्
आश्चर्य
वटतरु
बरगद का पेड़
मूल
जड़, नीचे
व्याख्यान
समझाना, प्रवचन
छिन्नसंशय
जिनके संदेह मिट गए

निधये सर्वविद्यानां भिषजे भवरोगिणाम् ।गुरवे सर्वलोकानां दक्षिणामूर्तये नमः ॥४॥

nidhaye sarvavidyānāṃ bhiṣaje bhavarogiṇām |
gurave sarvalokānāṃ dakṣiṇāmūrtaye namaḥ ||

अर्थ: जो सब विद्याओं के भंडार हैं, संसार रूपी रोग से पीड़ित लोगों के वैद्य हैं और सब लोकों के गुरु हैं, उन दक्षिणामूर्ति को नमस्कार।

निधि
भंडार
भिषक्
वैद्य
भवरोगी
संसार रूपी रोग से पीड़ित
गुरु
शिक्षक, मार्गदर्शक

ॐ नमः प्रणवार्थाय शुद्धज्ञानैकमूर्तये ।निर्मलाय प्रशान्ताय दक्षिणामूर्तये नमः ॥५॥

oṃ namaḥ praṇavārthāya śuddhajñānaikamūrtaye |
nirmalāya praśāntāya dakṣiṇāmūrtaye namaḥ ||

अर्थ: ॐ, जो प्रणव (ॐ) का अर्थ हैं, शुद्ध ज्ञान की एकमात्र मूर्ति हैं, निर्मल और परम शान्त हैं, उन दक्षिणामूर्ति को नमस्कार।

प्रणवार्थ
ॐ का अर्थ
शुद्धज्ञान
शुद्ध ज्ञान
एकमूर्ति
एकमात्र स्वरूप
प्रशान्त
पूरी तरह शान्त

विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतंपश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया ।यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयंतस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥१॥

viśvaṃ darpaṇadṛśyamānanagarītulyaṃ nijāntargataṃ
paśyannātmani māyayā bahirivodbhūtaṃ yathā nidrayā |
yaḥ sākṣātkurute prabodhasamaye svātmānamevādvayaṃ
tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye ||

अर्थ: यह विश्व दर्पण में दिखने वाली नगरी जैसा है; यह अपने भीतर ही है, फिर भी माया के कारण, जैसे नींद में स्वप्न, बाहर उत्पन्न हुआ-सा दिखता है। जो जागने पर (ज्ञान होने पर) अपनी ही अद्वितीय आत्मा का साक्षात्कार करता है, उन श्रीगुरु-रूप दक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार।

दर्पण
आईना
दृश्यमान
दिखाई देता हुआ
निजान्तर्गत
अपने भीतर स्थित
माया
भ्रम पैदा करने वाली शक्ति
प्रबोध
जागना, ज्ञान होना
अद्वय
जिसके समान दूसरा न हो, एक
गुरुमूर्ति
गुरु का रूप

बीजस्यान्तरिवाङ्कुरो जगदिदं प्राङ्निर्विकल्पं पुनःमायाकल्पितदेशकालकलनावैचित्र्यचित्रीकृतम् ।मायावीव विजृम्भयत्यपि महायोगीव यः स्वेच्छयातस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥२॥

bījasyāntarivāṅkuro jagadidaṃ prāṅnirvikalpaṃ punaḥ
māyākalpitadeśakālakalanāvaicitryacitrīkṛtam |
māyāvīva vijṛmbhayatyapi mahāyogīva yaḥ svecchayā
tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye ||

अर्थ: बीज के भीतर अंकुर की तरह यह जगत (प्रकट होने से) पहले बिना भेद के था; फिर माया से कल्पित देश और काल की विविधता से यह रंग-बिरंगा हो गया। जो जादूगर की तरह, या महायोगी की तरह, अपनी इच्छा से इसे फैलाते हैं, उन श्रीगुरु-रूप दक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार।

अङ्कुर
अंकुर
प्राक्
पहले
निर्विकल्प
भेद से रहित
देशकाल
स्थान और समय
वैचित्र्य
विविधता
मायावी
जादूगर
विजृम्भयति
फैलाता है

यस्यैव स्फुरणं सदात्मकमसत्कल्पार्थकं भासतेसाक्षात्तत्त्वमसीति वेदवचसा यो बोधयत्याश्रितान् ।यत्साक्षात्करणाद्भवेन्न पुनरावृत्तिर्भवाम्भोनिधौतस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥३॥

yasyaiva sphuraṇaṃ sadātmakamasatkalpārthakaṃ bhāsate
sākṣāttattvamasīti vedavacasā yo bodhayatyāśritān |
yatsākṣātkaraṇādbhavenna punarāvṛttirbhavāmbhonidhau
tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye ||

अर्थ: जिनका ही प्रकाश सत्य-स्वरूप है और जिससे असत् जैसे पदार्थ भी प्रकाशित होते हैं, जो शरण में आए शिष्यों को वेद के वचन 'तत्त्वमसि' (तुम वही हो) से साक्षात् बोध कराते हैं, और जिनके साक्षात्कार से संसार-सागर में फिर लौटना नहीं होता, उन श्रीगुरु-रूप दक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार।

स्फुरण
प्रकाश, चमक
सदात्मक
सत्य-स्वरूप
असत्कल्प
असत् जैसा
तत्त्वमसि
'तुम वही हो', उपनिषद् का महावाक्य
आश्रित
शरण में आए
पुनरावृत्ति
फिर लौटना, पुनर्जन्म
भवाम्भोनिधि
संसार-सागर

नानाच्छिद्रघटोदरस्थितमहादीपप्रभाभास्वरंज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरणद्वारा बहिः स्पन्दते ।जानामीति तमेव भान्तमनुभात्येतत्समस्तं जगत्तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥४॥

nānācchidraghaṭodarasthitamahādīpaprabhābhāsvaraṃ
jñānaṃ yasya tu cakṣurādikaraṇadvārā bahiḥ spandate |
jānāmīti tameva bhāntamanubhātyetatsamastaṃ jagat
tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye ||

अर्थ: जैसे अनेक छेदों वाले घड़े के भीतर रखे बड़े दीपक का प्रकाश छेदों से बाहर निकलता है, वैसे ही जिनका ज्ञान आँख आदि इन्द्रियों के द्वारा बाहर फैलता है; 'मैं जानता हूँ', इस रूप में चमकते उन्हीं के प्रकाश के पीछे यह सारा जगत चमकता है, उन श्रीगुरु-रूप दक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार।

छिद्र
छेद
घटोदर
घड़े का भीतरी भाग
प्रभा
प्रकाश
करण
इन्द्रिय
स्पन्दते
फैलता है, हिलता है
भान्त
चमकता हुआ
अनुभाति
पीछे-पीछे चमकता है

देहं प्राणमपीन्द्रियाण्यपि चलां बुद्धिं च शून्यं विदुःस्त्रीबालान्धजडोपमास्त्वहमिति भ्रान्ता भृशं वादिनः ।मायाशक्तिविलासकल्पितमहा व्यामोहसंहारिणेतस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥५॥

dehaṃ prāṇamapīndriyāṇyapi calāṃ buddhiṃ ca śūnyaṃ viduḥ
strībālāndhajaḍopamāstvahamiti bhrāntā bhṛśaṃ vādinaḥ |
māyāśaktivilāsakalpitamahā vyāmohasaṃhāriṇe
tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye ||

अर्थ: कुछ वादी देह को, प्राण को, इन्द्रियों को, चंचल बुद्धि को या शून्य को 'मैं' (आत्मा) मानते हैं; मूल श्लोक के शब्दों में वे स्त्री, बालक, अंधे और जड़ व्यक्ति की तरह गहरे भ्रम में हैं। माया-शक्ति के खेल से बने इस महान मोह का नाश करने वाले उन श्रीगुरु-रूप दक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार।

देह
शरीर
प्राण
जीवन-श्वास
इन्द्रिय
ज्ञान और कर्म के साधन
शून्य
खालीपन, कुछ नहीं
वादी
मत रखने वाले, तर्क करने वाले
भ्रान्त
भ्रम में पड़े
व्यामोह
गहरा मोह

राहुग्रस्तदिवाकरेन्दुसदृशो मायासमाच्छादनात्सन्मात्रः करणोपसंहरणतो योऽभूत्सुषुप्तः पुमान् ।प्रागस्वाप्समिति प्रबोधसमये यः प्रत्यभिज्ञायतेतस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥६॥

rāhugrastadivākarendusadṛśo māyāsamācchādanāt
sanmātraḥ karaṇopasaṃharaṇato yo’bhūtsuṣuptaḥ pumān |
prāgasvāpsamiti prabodhasamaye yaḥ pratyabhijñāyate
tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye ||

अर्थ: जैसे राहु से ग्रसे सूर्य और चन्द्रमा छिपकर भी बने रहते हैं, वैसे ही माया से ढका होने पर, इन्द्रियों के सिमट जाने से जो पुरुष गहरी नींद में केवल 'सत्' (होने) के रूप में रहता है, और जागने पर 'मैं अब तक सोया था', इस रूप में जिसकी पहचान होती है, उन श्रीगुरु-रूप दक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार।

राहुग्रस्त
राहु से ग्रसा, ग्रहण में
दिवाकर
सूर्य
इन्दु
चन्द्रमा
सन्मात्र
केवल अस्तित्व रूप
उपसंहरण
समेट लेना
सुषुप्त
गहरी नींद में
प्रत्यभिज्ञा
पहचान

बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपिव्यावृत्तास्वनुवर्तमानमहमित्यन्तः स्फुरन्तं सदा ।स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रया भद्रयातस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥७॥

bālyādiṣvapi jāgradādiṣu tathā sarvāsvavasthāsvapi
vyāvṛttāsvanuvartamānamahamityantaḥ sphurantaṃ sadā |
svātmānaṃ prakaṭīkaroti bhajatāṃ yo mudrayā bhadrayā
tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye ||

अर्थ: बचपन आदि अवस्थाओं में, और जागने, स्वप्न तथा गहरी नींद आदि सब अवस्थाओं में, जो बदलती रहती हैं, उनमें भी 'मैं' के रूप में भीतर सदा एक-सी चमकने वाली अपनी आत्मा को, जो भजने वालों के सामने शुभ (चिन्) मुद्रा से प्रकट कर देते हैं, उन श्रीगुरु-रूप दक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार।

बाल्य
बचपन
जाग्रत्
जागने की अवस्था
अवस्था
दशा
व्यावृत्त
बदलती हुई, छूटती हुई
अनुवर्तमान
लगातार बना रहने वाला
मुद्रा
हाथ का संकेत, चिन्मुद्रा
भद्र
शुभ

विश्वं पश्यति कार्यकारणतया स्वस्वामिसंबन्धतःशिष्याचार्यतया तथैव पितृपुत्राद्यात्मना भेदतः ।स्वप्ने जाग्रति वा य एष पुरुषो मायापरिभ्रामितःतस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥८॥

viśvaṃ paśyati kāryakāraṇatayā svasvāmisaṃbandhataḥ
śiṣyācāryatayā tathaiva pitṛputrādyātmanā bhedataḥ |
svapne jāgrati vā ya eṣa puruṣo māyāparibhrāmitaḥ
tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye ||

अर्थ: स्वप्न में हो या जागते हुए, माया से भ्रमित-सा होकर जो यह पुरुष (आत्मा) विश्व को कार्य-कारण, स्वामी-सेवक, शिष्य-आचार्य और पिता-पुत्र आदि के भेद से देखता है, उन्हीं श्रीगुरु-रूप दक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार।

कार्यकारण
परिणाम और कारण
स्वस्वामी
सेवक और स्वामी
आचार्य
गुरु
भेद
अंतर, बँटवारा
पुरुष
आत्मा, चेतन
परिभ्रामित
भ्रम में घुमाया हुआ

भूरम्भांस्यनलोऽनिलोऽम्बरमहर्नाथो हिमांशुः पुमान्इत्याभाति चराचरात्मकमिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम् ।नान्यत्किञ्चन विद्यते विमृशतां यस्मात्परस्माद्विभोःतस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥९॥

bhūrambhāṃsyanalo’nilo’mbaramaharnātho himāṃśuḥ pumān
ityābhāti carācarātmakamidaṃ yasyaiva mūrtyaṣṭakam |
nānyatkiñcana vidyate vimṛśatāṃ yasmātparasmādvibhoḥ
tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye ||

अर्थ: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा और पुरुष (यजमान), इस प्रकार चर-अचर रूप यह जगत जिनकी ही आठ मूर्तियों के रूप में दिखता है, और विचार करने वालों के लिए जिन परम सर्वव्यापी प्रभु से अलग कुछ भी नहीं है, उन श्रीगुरु-रूप दक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार।

भू
पृथ्वी
अम्भस्
जल
अनल
अग्नि
अनिल
वायु
अम्बर
आकाश
अहर्नाथ
दिन के स्वामी, सूर्य
हिमांशु
ठंडी किरणों वाला, चन्द्रमा
मूर्त्यष्टक
आठ रूप

सर्वात्मत्वमिति स्फुटीकृतमिदं यस्मादमुष्मिन् स्तवेतेनास्य श्रवणात्तदर्थमननाद्ध्यानाच्च सङ्कीर्तनात् ।सर्वात्मत्वमहाविभूतिसहितं स्यादीश्वरत्वं स्वतःसिद्ध्येत्तत्पुनरष्टधा परिणतं चैश्वर्यमव्याहतम् ॥१०॥

sarvātmatvamiti sphuṭīkṛtamidaṃ yasmādamuṣmin stave
tenāsya śravaṇāttadarthamananāddhyānācca saṅkīrtanāt |
sarvātmatvamahāvibhūtisahitaṃ syādīśvaratvaṃ svataḥ
siddhyettatpunaraṣṭadhā pariṇataṃ caiśvaryamavyāhatam ||

अर्थ: इस स्तुति में सबका आत्मा होने (सर्वात्मभाव) का तत्त्व स्पष्ट किया गया है। स्तोत्र कहता है कि इसलिए इसके सुनने, इसके अर्थ पर मनन, ध्यान और कीर्तन से सर्वात्मभाव रूपी महान विभूति के साथ ईश्वरभाव अपने आप प्राप्त होता है, और फिर आठ प्रकार का अबाधित ऐश्वर्य भी सिद्ध होता है।

सर्वात्मत्व
सबका आत्मा होना
स्फुटीकृत
स्पष्ट किया गया
श्रवण
सुनना
मनन
विचार करना
विभूति
महिमा, ऐश्वर्य
अष्टधा
आठ प्रकार से
अव्याहत
बिना रुकावट का

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ दक्षिणामूर्त्यष्टकं सम्पूर्णम् ।

iti śrīmatparamahaṃsaparivrājakācāryasya śrīgovindabhagavatpūjyapādaśiṣyasya śrīmacchaṅkarabhagavataḥ kṛtau dakṣiṇāmūrtyaṣṭakaṃ sampūrṇam |

अर्थ: इस प्रकार परमहंस परिव्राजकाचार्य, श्री गोविन्द भगवत्पाद के शिष्य श्री शंकर भगवान की रचनाओं में से दक्षिणामूर्ति अष्टक पूरा हुआ।

परिचय

दक्षिणामूर्ति शिव का गुरु रूप हैं: वटवृक्ष के नीचे बैठे युवा गुरु, जिनके चारों ओर वृद्ध ऋषि शिष्य हैं, और जो मौन रहकर, हाथ की चिन्मुद्रा से ही परम सत्य का ज्ञान करा देते हैं। यह स्तोत्र उन्हीं की स्तुति है, और इसके हर श्लोक का अंत 'तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये' से होता है।

स्तोत्र के दस श्लोकों में अद्वैत वेदान्त की मुख्य बातें उदाहरणों से समझाई गई हैं: दर्पण में दिखती नगरी, बीज में छिपा अंकुर, छेद वाले घड़े में रखा दीपक, राहु से ढका सूर्य। परंपरा इसे आदि शंकराचार्य की रचना मानती है। यहाँ स्तोत्र से पहले पढ़े जाने वाले पाँच ध्यान-श्लोक भी दिए गए हैं।

भावार्थ

दक्षिणामूर्ति स्तोत्र गुरु के रूप में शिव की स्तुति है, और साथ ही अद्वैत वेदान्त का संक्षिप्त पाठ भी। इसका मुख्य भाव है कि जो सत्य गुरु बताते हैं, वह हमारी अपनी आत्मा ही है: जगत दर्पण में दिखती नगरी की तरह अपने भीतर ही है (श्लोक 1), बीज में अंकुर की तरह पहले अव्यक्त था और माया से विविध दिखता है (श्लोक 2), और उसी आत्मा के प्रकाश से सब कुछ प्रकाशित होता है (श्लोक 3, 4)।

बीच के श्लोक बताते हैं कि आत्मा न शरीर है, न प्राण, न इन्द्रियाँ, न बुद्धि, न शून्य (श्लोक 5); वह गहरी नींद में भी 'सत्' के रूप में बनी रहती है (श्लोक 6), और बचपन से बुढ़ापे तक, जागने से नींद तक, हर बदलती अवस्था में 'मैं' के रूप में एक-सी चमकती है (श्लोक 7)। गुरु यह ज्ञान बोलकर नहीं, चिन्मुद्रा के संकेत से करा देते हैं। पृथ्वी से सूर्य-चन्द्र तक सारा जगत उन्हीं की आठ मूर्तियाँ हैं (श्लोक 9)।

हर श्लोक का अंत 'तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये' बताता है कि गुरु, ईश्वर और आत्मा एक ही हैं। दसवाँ श्लोक फलश्रुति है, जो इसके श्रवण, मनन, ध्यान और कीर्तन का फल सर्वात्मभाव बताता है।

फलश्रुति

इस स्तोत्र की फलश्रुति कहती है कि इस स्तुति में सर्वात्मभाव का तत्त्व स्पष्ट किया गया है, इसलिए इसके सुनने, अर्थ पर मनन, ध्यान और कीर्तन से सर्वात्मभाव के साथ ईश्वरभाव और आठ प्रकार का ऐश्वर्य सिद्ध होता है। यह स्तोत्र के अपने शब्द हैं।

सर्वात्मत्वमिति स्फुटीकृतमिदं यस्मादमुष्मिन् स्तवे
तेनास्य श्रवणात्तदर्थमननाद्ध्यानाच्च सङ्कीर्तनात् ।
सर्वात्मत्वमहाविभूतिसहितं स्यादीश्वरत्वं स्वतः
सिद्ध्येत्तत्पुनरष्टधा परिणतं चैश्वर्यमव्याहतम् ॥

इस स्तुति में सबका आत्मा होने (सर्वात्मभाव) का तत्त्व स्पष्ट किया गया है। स्तोत्र कहता है कि इसलिए इसके सुनने, इसके अर्थ पर मनन, ध्यान और कीर्तन से सर्वात्मभाव रूपी महान विभूति के साथ ईश्वरभाव अपने आप प्राप्त होता है, और फिर आठ प्रकार का अबाधित ऐश्वर्य भी सिद्ध होता है।

यह स्तोत्र कब पढ़ा जाता है

  • गुरु पूर्णिमा पर
  • गुरुवार को, जिसे कई परंपराओं में दक्षिणामूर्ति की उपासना का दिन माना जाता है
  • वेदान्त या किसी भी विद्या के अध्ययन के आरम्भ में

पढ़ने की विधि

  • पहले ध्यान-श्लोक पढ़कर वटवृक्ष के नीचे बैठे, चिन्मुद्रा धारण किए दक्षिणामूर्ति का ध्यान करें, फिर स्तोत्र पढ़ें।
  • यह स्तोत्र दार्शनिक है; पहली बार पढ़ रहे हों तो हर श्लोक का अर्थ धीरे-धीरे समझें। एक-एक श्लोक पर कुछ दिन रुकना भी अच्छा अभ्यास है।
  • कई लोग पाठ के अंत में दूसरा ध्यान-श्लोक ('वटविटपिसमीपे...') फिर से पढ़ते हैं; कुछ संस्करणों में स्तोत्र से पहले श्वेताश्वतर उपनिषद् का एक मंत्र शान्तिपाठ के रूप में भी पढ़ा जाता है।
पूरी विधिशिव पूजा विधिघर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
ध्यान श्लोक 1आचार्येन्द्रं करकलितचिन्मुद्रमानन्दमूर्तिंvignanam.org का पाठ; यहाँ sanskritdocuments.org का 'आनन्दरूपं' रखा गया।
ध्यान श्लोकचिद्घनाय महेशाय वटमूलनिवासिने ... (तीन और श्लोक)vignanam.org के ध्यान में पाँच के बाद तीन और श्लोक हैं; sanskritdocuments.org में पाँच हैं, वही यहाँ दिए गए।
श्लोक 3सदात्मकमसत्कल्पार्थगं भासतेsanskritdocuments.org पर दूसरे पाठ के रूप में।
श्लोक 10स्यादीश्वरत्वं ततःsanskritdocuments.org पर 'स्वतः' की जगह दूसरे पाठ के रूप में।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
आदि शंकराचार्य (परंपरा के अनुसार)
भाषा
संस्कृत

आदि शंकराचार्य की रचना मानी जाती है। इस पर उनके शिष्य माने जाने वाले सुरेश्वराचार्य की 'मानसोल्लास' नाम की व्याख्या मिलती है, इसलिए यह परंपरा पुरानी है; फिर भी इसे पूरी तरह प्रमाणित नहीं कहा जा सकता।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पाठ sanskritdocuments.org से लिया गया और हर पंक्ति vignanam.org से मिलाई गई। दस श्लोकों के शब्द दोनों स्रोतों में एक हैं। ध्यान-श्लोक sanskritdocuments.org के अनुसार पाँच हैं; vignanam.org में आठ हैं। स्तोत्र से पहले का शान्तिपाठ (श्वेताश्वतर उपनिषद् का मंत्र) और अंत में ध्यान-श्लोक 2 की पुनरावृत्ति यहाँ नहीं दोहराई गई।

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रुद्राष्टकम्

शिव · अष्टकम् · संस्कृत

नमामीशमीशाननिर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्

दक्षिणामूर्ति के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

दक्षिणामूर्ति कौन हैं?

दक्षिणामूर्ति शिव का गुरु रूप हैं, जो वटवृक्ष के नीचे दक्षिण की ओर मुख करके बैठे हैं और मौन से, चिन्मुद्रा के द्वारा, ऋषियों को ज्ञान देते हैं।

इसे दक्षिणामूर्त्यष्टकम् भी क्यों कहते हैं?

यह नाम परंपरा में प्रचलित है, और sanskritdocuments.org के समापन वाक्य में भी इसे 'दक्षिणामूर्त्यष्टकं' कहा गया है, हालाँकि इसमें दस श्लोक हैं, जिनमें अंतिम फलश्रुति है। ऐसे नामों में श्लोक-संख्या हमेशा ठीक आठ नहीं होती।

क्या यह स्तोत्र कठिन है?

भाषा और विचार दोनों गहरे हैं, क्योंकि इसमें वेदान्त के सिद्धांत हैं। हर श्लोक का अर्थ धीरे-धीरे पढ़ने से, और किसी जानकार से समझने पर, यह सहज होता जाता है।

चिन्मुद्रा क्या है?

दाहिने हाथ के अंगूठे और तर्जनी को मिलाकर, बाकी तीन उँगलियाँ सीधी रखने वाली मुद्रा। दक्षिणामूर्ति इसी मुद्रा से जीव और ब्रह्म की एकता का संकेत करते हैं।

क्या इसे आदि शंकराचार्य ने लिखा?

परंपरा इसे आदि शंकराचार्य की रचना मानती है, और इस पर उनके शिष्य माने जाने वाले सुरेश्वराचार्य की 'मानसोल्लास' व्याख्या मिलती है। फिर भी इसे पूरी तरह प्रमाणित नहीं कहा जा सकता।

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