नरसिंह

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लक्ष्मीनृसिंह करावलम्ब स्तोत्रम्

"लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्": संसार के दुःखों में डूबते भक्त की भगवान लक्ष्मीनृसिंह से हाथ का सहारा माँगने वाली प्रार्थना। पाठ और अर्थ।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. भावार्थ
  4. फलश्रुति
  5. कब पढ़ें
  6. विधि
  7. पाठ-भेद
  8. रचयिता और स्रोत
  9. ये भी पढ़ें
  10. सवाल-जवाब
  11. सुधार सुझाएँ

श्रीमत्पयोनिधिनिकेतनचक्रपाणेभोगीन्द्रभोगमणिराजितपुण्यमूर्ते ।योगीश शाश्वत शरण्य भवाब्धिपोतलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥१॥

śrīmatpayonidhiniketanacakrapāṇe
bhogīndrabhogamaṇirājitapuṇyamūrte |
yogīśa śāśvata śaraṇya bhavābdhipota
lakṣmīnṛsiṃha mama dehi karāvalambam ||

अर्थ: हे श्रीमान, क्षीरसागर में निवास करने वाले, हाथ में चक्र धारण करने वाले, शेषनाग के फनों की मणियों से चमकती पवित्र मूर्ति वाले, योगियों के ईश्वर, शाश्वत, शरण देने वाले, संसार-सागर से पार कराने वाली नौका, हे लक्ष्मीनृसिंह, मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिए।

पयोनिधिनिकेतन
क्षीरसागर में रहने वाले
भोगीन्द्र
नागराज, शेषनाग
भोग
साँप का फन
शरण्य
शरण देने वाले
भवाब्धिपोत
संसार-सागर की नौका
करावलम्बम्
हाथ का सहारा

ब्रह्मेन्द्ररुद्रमरुदर्ककिरीटकोटि-सङ्घट्टिताङ्घ्रिकमलामलकान्तिकान्त ।लक्ष्मीलसत्कुचसरोरुहराजहंसलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥२॥

brahmendrarudramarudarkakirīṭakoṭi-
saṅghaṭṭitāṅghrikamalāmalakāntikānta |
lakṣmīlasatkucasaroruharājahaṃsa
lakṣmīnṛsiṃha mama dehi karāvalambam ||

अर्थ: प्रणाम करते समय ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, मरुद्गण और सूर्य के मुकुटों के सिरे जिनके चरण-कमलों से टकराते हैं, ऐसी निर्मल कांति से सुंदर, लक्ष्मी जी के वक्ष-कमलों पर विहार करने वाले राजहंस, हे लक्ष्मीनृसिंह, मुझे हाथ का सहारा दीजिए।

अर्क
सूर्य
किरीटकोटि
मुकुटों के सिरे
सङ्घट्टित
टकराए हुए
अङ्घ्रिकमल
चरण-कमल
राजहंस
हंसों का राजा

संसारदावदहनाकरभीकरोरु-ज्वालावलीभिरतिदग्धतनूरुहस्य ।त्वत्पादपद्मसरसीरुहमागतस्यलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥३॥

saṃsāradāvadahanākarabhīkaroru-
jvālāvalībhiratidagdhatanūruhasya |
tvatpādapadmasarasīruhamāgatasya
lakṣmīnṛsiṃha mama dehi karāvalambam ||

अर्थ: संसार रूपी दावानल की भयंकर, विशाल लपटों से जिसके रोम-रोम झुलस गए हैं और जो (ठंडक के लिए) आपके चरण-कमल रूपी सरोवर की शरण में आया है, उस मुझे, हे लक्ष्मीनृसिंह, हाथ का सहारा दीजिए।

दावदहन
जंगल की आग
ज्वालावली
लपटों की पंक्ति
तनूरुह
शरीर के रोएँ
सरसीरुह
कमल
आगतस्य
आए हुए का

संसारजालपतितस्य जगन्निवाससर्वेन्द्रियार्थबडिशाग्रझषोपमस्य ।प्रोत्कम्पितप्रचुरतालुकमस्तकस्यलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥४॥

saṃsārajālapatitasya jagannivāsa
sarvendriyārthabaḍiśāgrajhaṣopamasya |
protkampitapracuratālukamastakasya
lakṣmīnṛsiṃha mama dehi karāvalambam ||

अर्थ: हे जगत के निवास, संसार के जाल में गिरे, इन्द्रियों के विषय रूपी काँटे की नोक में फँसी मछली जैसे, जिसका तालु और सिर (पीड़ा से) बुरी तरह काँप रहा है, उस मुझे, हे लक्ष्मीनृसिंह, हाथ का सहारा दीजिए।

जगन्निवास
जगत जिनमें रहता है
इन्द्रियार्थ
इन्द्रियों के विषय
बडिश
मछली पकड़ने का काँटा
झष
मछली
प्रोत्कम्पित
बहुत काँपता हुआ

संसारकूपमतिघोरमगाधमूलंसम्प्राप्य दुःखशतसर्पसमाकुलस्य ।दीनस्य देव कृपया पदमागतस्यलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥५॥

saṃsārakūpamatighoramagādhamūlaṃ
samprāpya duḥkhaśatasarpasamākulasya |
dīnasya deva kṛpayā padamāgatasya
lakṣmīnṛsiṃha mama dehi karāvalambam ||

अर्थ: संसार रूपी अत्यंत भयानक और अथाह कुएँ में गिरकर जो सैकड़ों दुःख रूपी साँपों से घिर गया है, उस दीन को, जो हे देव, आपकी कृपा से आपके चरणों में आया है, हे लक्ष्मीनृसिंह, हाथ का सहारा दीजिए।

कूप
कुआँ
अगाधमूलं
जिसकी तली का पता न चले
सम्प्राप्य
पहुँचकर, गिरकर
समाकुलस्य
घिरे हुए, व्याकुल का
पदम्
चरण, शरण

संसारभीकरकरीन्द्रकराभिघात-निष्पीड्यमानवपुषः सकलार्तिनाश ।प्राणप्रयाणभवभीतिसमाकुलस्यलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥६॥

saṃsārabhīkarakarīndrakarābhighāta-
niṣpīḍyamānavapuṣaḥ sakalārtināśa |
prāṇaprayāṇabhavabhītisamākulasya
lakṣmīnṛsiṃha mama dehi karāvalambam ||

अर्थ: हे सब कष्टों का नाश करने वाले, संसार रूपी भयंकर गजराज की सूँड़ की चोट से जिसका शरीर पिस रहा है और जो प्राण निकलने तथा जन्म-मृत्यु के भय से व्याकुल है, उस मुझे, हे लक्ष्मीनृसिंह, हाथ का सहारा दीजिए।

करीन्द्र
गजराज
कर
सूँड़
अभिघात
चोट
निष्पीड्यमान
पिसता हुआ
सकलार्तिनाश
सब पीड़ाओं का नाश करने वाले
प्राणप्रयाण
प्राणों का निकलना

संसारसर्पविषदिग्धमहोग्रतीव्र-दंष्ट्राग्रकोटिपरिदष्टविनष्टमूर्तेः ।नागारिवाहन सुधाब्धिनिवास शौरेलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥७॥

saṃsārasarpaviṣadigdhamahogratīvra-
daṃṣṭrāgrakoṭiparidaṣṭavinaṣṭamūrteḥ |
nāgārivāhana sudhābdhinivāsa śaure
lakṣmīnṛsiṃha mama dehi karāvalambam ||

अर्थ: हे गरुड़ पर सवार होने वाले, क्षीरसागर में निवास करने वाले, शौरि! संसार रूपी साँप के विष में बुझे, अत्यंत उग्र और तीखे दाँतों की नोक से डँसे जाने से जिसका शरीर नष्ट हो रहा है, उस मुझे, हे लक्ष्मीनृसिंह, हाथ का सहारा दीजिए।

विषदिग्ध
विष में बुझा हुआ
दंष्ट्राग्र
दाँत की नोक
परिदष्ट
डँसा हुआ
नागारिवाहन
नागों के शत्रु (गरुड़) पर सवार
सुधाब्धि
अमृत (क्षीर) का सागर
शौरे
हे शौरि (विष्णु)

संसारवृक्षमघबीजमनन्तकर्म-शाखायुतं करणपत्रमनङ्गपुष्पम् ।आरुह्य दुःखफलितं पततो दयालोलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥८॥

saṃsāravṛkṣamaghabījamanantakarma-
śākhāyutaṃ karaṇapatramanaṅgapuṣpam |
āruhya duḥkhaphalitaṃ patato dayālo
lakṣmīnṛsiṃha mama dehi karāvalambam ||

अर्थ: हे दयालु, संसार एक वृक्ष है जिसका बीज पाप है, अनन्त कर्म जिसकी शाखाएँ हैं, इन्द्रियाँ जिसके पत्ते हैं, काम जिसके फूल हैं और दुःख जिसका फल है; उस पर चढ़कर नीचे गिरते हुए मुझे, हे लक्ष्मीनृसिंह, हाथ का सहारा दीजिए।

अघबीजम्
पाप जिसका बीज है
करणपत्रम्
इन्द्रियाँ जिसके पत्ते हैं
अनङ्गपुष्पम्
काम जिसका फूल है
आरुह्य
चढ़कर
पततः
गिरते हुए का

संसारसागरविशालकरालकाल-नक्रग्रहग्रसितनिग्रहविग्रहस्य ।व्यग्रस्य रागनिचयोर्मिनिपीडितस्यलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥९॥

saṃsārasāgaraviśālakarālakāla-
nakragrahagrasitanigrahavigrahasya |
vyagrasya rāganicayorminipīḍitasya
lakṣmīnṛsiṃha mama dehi karāvalambam ||

अर्थ: संसार रूपी विशाल सागर में भयंकर काल रूपी मगरमच्छ और ग्राह ने जिसके शरीर को निगलकर जकड़ लिया है, जो व्याकुल है और आसक्तियों की लहरों के थपेड़ों से पीड़ित है, उस मुझे, हे लक्ष्मीनृसिंह, हाथ का सहारा दीजिए।

कराल
भयंकर
नक्र
मगरमच्छ
ग्रह
ग्राह, पकड़ने वाला जल-जंतु
विग्रह
शरीर
व्यग्रस्य
व्याकुल का
रागनिचयोर्मि
आसक्तियों के ढेर की लहरें

संसारसागरनिमज्जनमुह्यमानंदीनं विलोकय विभो करुणानिधे माम् ।प्रह्लादखेदपरिहारपरावतारलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥१०॥

saṃsārasāgaranimajjanamuhyamānaṃ
dīnaṃ vilokaya vibho karuṇānidhe mām |
prahlādakhedaparihāraparāvatāra
lakṣmīnṛsiṃha mama dehi karāvalambam ||

अर्थ: हे विभो, हे करुणा के भंडार, संसार-सागर में डूबते हुए, मोह में पड़े मुझ दीन की ओर देखिए। हे प्रह्लाद का दुःख दूर करने के लिए श्रेष्ठ अवतार लेने वाले लक्ष्मीनृसिंह, मुझे हाथ का सहारा दीजिए।

निमज्जन
डूबना
मुह्यमानं
मोह में पड़े हुए को
विलोकय
देखिए
करुणानिधे
हे करुणा के भंडार
खेदपरिहार
दुःख दूर करना

संसारघोरगहने चरतो मुरारेमारोग्रभीकरमृगप्रचुरार्दितस्य ।आर्तस्य मत्सरनिदाघसुदुःखितस्यलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥११॥

saṃsāraghoragahane carato murāre
mārograbhīkaramṛgapracurārditasya |
ārtasya matsaranidāghasuduḥkhitasya
lakṣmīnṛsiṃha mama dehi karāvalambam ||

अर्थ: हे मुरारि, संसार रूपी घने और भयानक वन में भटकते हुए, काम रूपी उग्र और डरावने हिंसक पशुओं से बहुत सताए गए, ईर्ष्या रूपी तपन से अत्यंत दुःखी मुझ आर्त को, हे लक्ष्मीनृसिंह, हाथ का सहारा दीजिए।

गहने
घने वन में
मार
कामदेव, काम
मृग
वन्य पशु
अर्दित
सताया हुआ
मत्सर
ईर्ष्या
निदाघ
गर्मी की तपन

बद्ध्वा गले यमभटा बहु तर्जयन्तःकर्षन्ति यत्र भवपाशशतैर्युतं माम् ।एकाकिनं परवशं चकितं दयालोलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥१२॥

baddhvā gale yamabhaṭā bahu tarjayantaḥ
karṣanti yatra bhavapāśaśatairyutaṃ mām |
ekākinaṃ paravaśaṃ cakitaṃ dayālo
lakṣmīnṛsiṃha mama dehi karāvalambam ||

अर्थ: हे दयालु, जहाँ यम के दूत गले में (पाश) बाँधकर, बहुत धमकाते हुए, संसार के सैकड़ों बंधनों से जकड़े मुझे घसीटते हैं, उस समय अकेले, पराधीन और डरे हुए मुझे, हे लक्ष्मीनृसिंह, हाथ का सहारा दीजिए।

यमभटाः
यम के दूत
तर्जयन्तः
धमकाते हुए
कर्षन्ति
घसीटते हैं
भवपाश
संसार के बंधन
परवशं
पराधीन
चकितं
डरा हुआ

लक्ष्मीपते कमलनाभ सुरेश विष्णोयज्ञेश यज्ञ मधुसूदन विश्वरूप ।ब्रह्मण्य केशव जनार्दन वासुदेवलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥१३॥

lakṣmīpate kamalanābha sureśa viṣṇo
yajñeśa yajña madhusūdana viśvarūpa |
brahmaṇya keśava janārdana vāsudeva
lakṣmīnṛsiṃha mama dehi karāvalambam ||

अर्थ: हे लक्ष्मीपति, हे कमलनाभ, हे देवेश, हे विष्णु, हे यज्ञों के स्वामी, हे यज्ञ-स्वरूप, हे मधुसूदन, हे विश्वरूप, हे ब्राह्मणों के हितैषी, हे केशव, हे जनार्दन, हे वासुदेव, हे लक्ष्मीनृसिंह, मुझे हाथ का सहारा दीजिए।

कमलनाभ
जिनकी नाभि में कमल है
यज्ञेश
यज्ञों के स्वामी
मधुसूदन
मधु दैत्य को मारने वाले
विश्वरूप
विश्व जिनका रूप है
ब्रह्मण्य
ब्राह्मणों और वेद के हितैषी
जनार्दन
दुष्टों को पीड़ा देने वाले

एकेन चक्रमपरेण करेण शङ्ख-मन्येन सिन्धुतनयामवलम्ब्य तिष्ठन् ।वामेतरेण वरदाभयपद्मचिह्नंलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥१४॥

ekena cakramapareṇa kareṇa śaṅkha-
manyena sindhutanayāmavalambya tiṣṭhan |
vāmetareṇa varadābhayapadmacihnaṃ
lakṣmīnṛsiṃha mama dehi karāvalambam ||

अर्थ: जो एक हाथ में चक्र, दूसरे हाथ में शंख लिए, तीसरे हाथ से सागर-पुत्री लक्ष्मी जी को थामे हुए खड़े हैं, और (चौथे) दाहिने हाथ में वर, अभय और कमल का चिह्न है, वे लक्ष्मीनृसिंह मुझे हाथ का सहारा दें।

एकेन
एक (हाथ) से
अपरेण
दूसरे से
अन्येन
तीसरे से
सिन्धुतनया
सागर की पुत्री, लक्ष्मी
अवलम्ब्य
थामकर
वामेतरेण
बाएँ से भिन्न, यानी दाहिने हाथ से

अन्धस्य मे हृतविवेकमहाधनस्यचोरैर्महाबलिभिरिन्द्रियनामधेयैः ।मोहान्धकारकुहरे विनिपातितस्यलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥१५॥

andhasya me hṛtavivekamahādhanasya
corairmahābalibhirindriyanāmadheyaiḥ |
mohāndhakārakuhare vinipātitasya
lakṣmīnṛsiṃha mama dehi karāvalambam ||

अर्थ: इन्द्रिय नाम के बहुत बलवान चोरों ने जिसका विवेक रूपी बड़ा धन लूट लिया है, जो (इसलिए) अंधा हो गया है और मोह के अँधेरे गड्ढे में गिरा दिया गया है, उस मुझे, हे लक्ष्मीनृसिंह, हाथ का सहारा दीजिए।

हृत
छीना हुआ
विवेक
सही-गलत की समझ
महाबलिभिः
बहुत बलवानों द्वारा
इन्द्रियनामधेयैः
इन्द्रिय नाम वाले
कुहरे
गड्ढे में
विनिपातितस्य
गिराए गए का

प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक-व्यासादिभागवतपुङ्गवहृन्निवास ।भक्तानुरक्तपरिपालनपारिजातलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥१६॥

prahlādanāradaparāśarapuṇḍarīka-
vyāsādibhāgavatapuṅgavahṛnnivāsa |
bhaktānuraktaparipālanapārijāta
lakṣmīnṛsiṃha mama dehi karāvalambam ||

अर्थ: हे प्रह्लाद, नारद, पराशर, पुंडरीक, व्यास आदि श्रेष्ठ भक्तों के हृदय में निवास करने वाले, भक्तों से प्रेम करने और उनका पालन करने में पारिजात (कल्पवृक्ष) जैसे, हे लक्ष्मीनृसिंह, मुझे हाथ का सहारा दीजिए।

भागवतपुङ्गव
भक्तों में श्रेष्ठ
हृन्निवास
हृदय में निवास करने वाले
भक्तानुरक्त
भक्तों से प्रेम करने वाले
परिपालन
रक्षा, पालन
पारिजात
इच्छा पूरी करने वाला स्वर्ग का वृक्ष

लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतेनस्तोत्रं कृतं शुभकरं भुवि शङ्करेण ।ये तत्पठन्ति मनुजा हरिभक्तियुक्ता-स्ते यान्ति तत्पदसरोजमखण्डरूपम् ॥१७॥

lakṣmīnṛsiṃhacaraṇābjamadhuvratena
stotraṃ kṛtaṃ śubhakaraṃ bhuvi śaṅkareṇa |
ye tatpaṭhanti manujā haribhaktiyuktā-
ste yānti tatpadasarojamakhaṇḍarūpam ||

अर्थ: लक्ष्मीनृसिंह के चरण-कमलों के भौंरे शंकर ने इस धरती पर यह कल्याणकारी स्तोत्र रचा। जो मनुष्य हरि-भक्ति के साथ इसे पढ़ते हैं, वे उनके अखंड स्वरूप वाले चरण-कमलों को पाते हैं, ऐसा यह श्लोक कहता है।

चरणाब्ज
चरण-कमल
मधुव्रत
भौंरा
शुभकरं
कल्याण करने वाला
भुवि
पृथ्वी पर
तत्पदसरोजम्
उनके चरण-कमल को
अखण्डरूपम्
अखंड स्वरूप वाले

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचितं श्रीलक्ष्मीनृसिंह करावलम्ब स्तोत्रम् ।

iti śrīmatparamahaṃsaparivrājakācārya śrīmacchaṅkarācārya viracitaṃ śrīlakṣmīnṛsiṃha karāvalamba stotram |

अर्थ: इस प्रकार परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री शंकराचार्य का रचा श्री लक्ष्मीनृसिंह करावलम्ब स्तोत्र पूरा हुआ।

परिचय

करावलम्ब स्तोत्र में हर श्लोक एक ही पुकार पर खत्म होता है: "लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्", हे लक्ष्मीनृसिंह, मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिए। भक्त संसार को कभी जलता जंगल, कभी अथाह कुआँ, कभी मगरमच्छों से भरा सागर, कभी साँप और कभी काँटों वाला वृक्ष बताता है, और हर बार डूबते-गिरते मनुष्य की तरह हाथ बढ़ाने की प्रार्थना करता है।

इसके श्लोकों की संख्या और क्रम अलग-अलग पुस्तकों में अलग मिलते हैं: sanskritdocuments.org तेरह श्लोकों का पाठ देकर बाकी श्लोक अलग से जोड़ता है, और stotranidhi.com पच्चीस तक देता है। यहाँ सत्रह श्लोकों का वह प्रचलित पाठ है जो vignanam.org और stotranidhi.com में एक ही क्रम में है, और जिसके सभी श्लोक sanskritdocuments.org पर भी मिलते हैं। अंतिम श्लोक कहता है कि इसे शंकर ने रचा।

भावार्थ

इस स्तोत्र में भक्त अपनी हालत को कई चित्रों से बताता है: जंगल की आग में झुलसता, जाल में फँसी मछली, अँधे कुएँ में साँपों से घिरा, हाथी की सूँड़ से कुचला जाता, साँप का डँसा हुआ, पेड़ से गिरता, मगरमच्छ का पकड़ा हुआ, जंगली पशुओं से घिरा और यमदूतों से घसीटा जाता। ये सब संसार के दुःख, इन्द्रियों के खिंचाव, काम, ईर्ष्या और मृत्यु के डर के रूपक हैं।

हर चित्र के बाद एक ही पुकार है: "मम देहि करावलम्बम्", मुझे अपना हाथ दीजिए। भगवान नरसिंह को इसलिए पुकारा गया है क्योंकि उन्होंने भक्त प्रह्लाद को ऐसे ही हर संकट से बचाया था। साथ में लक्ष्मी जी का नाम आता है, यानी उग्र नरसिंह यहाँ करुणा से भरे, लक्ष्मी सहित शांत रूप में ध्यान किए जाते हैं।

अंतिम श्लोक कहता है कि नृसिंह के चरणों के भक्त शंकर ने यह स्तोत्र रचा और हरि-भक्ति के साथ इसे पढ़ने वाले उनके चरणों को पाते हैं। स्तोत्र का सार शरणागति है: अपनी शक्ति से न निकल पाने वाला मनुष्य भगवान का हाथ थामे।

फलश्रुति

इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक 17) कहती है कि जो मनुष्य हरि-भक्ति के साथ इसका पाठ करते हैं, वे भगवान के चरण-कमलों को प्राप्त करते हैं। यह स्तोत्र का अपना कथन है, हमारा कोई वादा नहीं।

लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतेन
स्तोत्रं कृतं शुभकरं भुवि शङ्करेण ।
ये तत्पठन्ति मनुजा हरिभक्तियुक्ता-
स्ते यान्ति तत्पदसरोजमखण्डरूपम् ॥

लक्ष्मीनृसिंह के चरण-कमलों के भौंरे शंकर ने इस धरती पर यह कल्याणकारी स्तोत्र रचा। जो मनुष्य हरि-भक्ति के साथ इसे पढ़ते हैं, वे उनके अखंड स्वरूप वाले चरण-कमलों को पाते हैं, ऐसा यह श्लोक कहता है।

यह स्तोत्र कब पढ़ा जाता है

  • नरसिंह जयंती पर
  • रोज़ सुबह या संध्या की पूजा में
  • कठिन समय, डर या उलझन में मन को सहारा देने के लिए
  • भक्त प्रह्लाद की कथा सुनने-सुनाने के समय

पढ़ने की विधि

  • भगवान लक्ष्मीनृसिंह (या नरसिंह) के चित्र के सामने दीप जलाकर बैठें।
  • हर श्लोक की टेक "लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्" को सच्ची पुकार की तरह बोलें; यह वसंततिलका छंद में है और लय में पढ़ना आसान है।
  • पूरा स्तोत्र एक बार पढ़ना काफ़ी है। समय कम हो तो पहले कुछ श्लोक और अंतिम श्लोक भी पढ़े जा सकते हैं।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
श्लोकों की संख्या और क्रम13 श्लोक (sanskritdocuments.org) / 25 श्लोक (stotranidhi.com)sanskritdocuments.org का मुख्य पाठ तेरह श्लोकों का है और उसका क्रम अलग है; बाकी श्लोक वह "अतिरिक्त श्लोक" कहकर अलग देता है। stotranidhi.com सत्रहवें श्लोक के बाद आठ "अधिक श्लोक" और देता है। यहाँ vignanam.org और stotranidhi.com का साझा सत्रह श्लोकों वाला पाठ है।
sanskritdocuments.org का श्लोक 13यन्माययार्जितवपुःप्रचुरप्रवाह- / मग्नार्थमत्र निवहोरुकरावलम्बम् । / लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतेन / स्तोत्रं कृतं सुखकरं भुवि शङ्करेण ॥यह श्लोक sanskritdocuments.org के मुख्य पाठ का अंतिम श्लोक है; vignanam.org के पाठ में नहीं है, और stotranidhi.com इसे "अधिक श्लोकों" में देता है।
श्लोक 13 (यहाँ), दूसरा और चौथा चरणवैकुण्ठ कृष्ण मधुसूदन पुष्कराक्ष / देवेश देहि कृपणस्य करावलम्बम्sanskritdocuments.org का मुख्य पाठ; वह "यज्ञेश यज्ञ मधुसूदन विश्वरूप" को पाठ-भेद के रूप में देता है।
श्लोक 3, पहला चरणसंसारदावदहनाकरभीकरोग्र-sanskritdocuments.org का मुख्य पाठ; vignanam.org और stotranidhi.com में "भीकरोरु" है।
श्लोक 8, तीसरा चरणआरुह्य दुःखफलितं चकितं दयालोsanskritdocuments.org का मुख्य पाठ; stotranidhi.com का मुख्य पाठ "पततो" है और vignanam.org भी इसे देता है।
श्लोक 7, पहला चरणसंसारसर्पविषदग्धमहोग्रतीव्र-stotranidhi.com का पाठ ("विष से जला हुआ"); sanskritdocuments.org और vignanam.org में "विषदिग्ध" है।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
आदि शंकराचार्य (परंपरा के अनुसार)
भाषा
संस्कृत

स्तोत्र का अपना अंतिम श्लोक कहता है कि इसे "शङ्कर" ने रचा, और परंपरा इसे आदि शंकराचार्य की रचना मानती है। इसकी अलग ऐतिहासिक पुष्टि नहीं है।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): सत्रह श्लोकों का पाठ vignanam.org और stotranidhi.com से मिलाया गया (दोनों का क्रम और शब्द लगभग एक जैसे हैं), और हर श्लोक sanskritdocuments.org के पाठ में (मुख्य या अतिरिक्त श्लोकों में) खोजकर देखा गया। श्लोक-संख्या और क्रम vignanam.org/stotranidhi.com के अनुसार हैं। जहाँ तीनों में शब्द अलग थे (श्लोक 3, 7, 8, 13), वहाँ दो स्रोतों वाला पाठ रखा गया और दूसरा पाठ-भेद में है। stotranidhi.com के आठ "अधिक श्लोक" यहाँ नहीं जोड़े गए।

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भगवान नरसिंह के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

"करावलम्ब" का क्या अर्थ है?

कर यानी हाथ और अवलम्ब यानी सहारा। "मम देहि करावलम्बम्" का अर्थ है: मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिए, जैसे डूबते हुए को कोई हाथ पकड़कर निकालता है।

इसके कितने श्लोक हैं?

अलग-अलग पुस्तकों में तेरह से पच्चीस तक श्लोक मिलते हैं। यहाँ सत्रह श्लोकों का वह पाठ है जो vignanam.org और stotranidhi.com में एक ही क्रम में है।

यह स्तोत्र किसने रचा?

स्तोत्र का अंतिम श्लोक कहता है कि इसे शंकर ने रचा, और परंपरा इसे आदि शंकराचार्य की रचना मानती है। इसकी अलग ऐतिहासिक पुष्टि नहीं है।

नरसिंह भगवान के साथ लक्ष्मी जी का नाम क्यों है?

लक्ष्मीनृसिंह भगवान नरसिंह का वह शांत रूप है जिसमें लक्ष्मी जी उनकी गोद में विराजती हैं। करुणा माँगने वाले इस स्तोत्र में इसी करुणामय रूप को पुकारा गया है।

इसे कब पढ़ें?

नरसिंह जयंती पर, रोज़ की पूजा में, या जब मन डरा या उलझा हो। इसे पढ़ने का कोई कठिन नियम नहीं है।

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