विष्णु पूजा विधि
विष्णु · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में भगवान विष्णु की सरल पूजा: तुलसी के साथ पंचोपचार, गुरुवार और एकादशी की रीत, मंत्र, आरती और क्षमा प्रार्थना, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशंविश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिहृद्ध्यानगम्यंवन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥
śāntākāraṃ bhujagaśayanaṃ padmanābhaṃ sureśaṃ
viśvādhāraṃ gaganasadṛśaṃ meghavarṇaṃ śubhāṅgam |
lakṣmīkāntaṃ kamalanayanaṃ yogihṛddhyānagamyaṃ
vande viṣṇuṃ bhavabhayaharaṃ sarvalokaikanātham ||
अर्थ: जिनका रूप शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर लेटे हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के स्वामी हैं; जो पूरे संसार का आधार हैं, आकाश की तरह सब जगह फैले हैं, बादल जैसे श्याम वर्ण के हैं और जिनके अंग सुंदर हैं; जो लक्ष्मी के पति हैं, कमल जैसे नेत्रों वाले हैं और योगी हृदय में ध्यान करके जिन्हें पाते हैं; संसार के भय को हरने वाले, सब लोकों के एकमात्र स्वामी उन भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।
"शान्ताकारं भुजगशयनं" भगवान विष्णु का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला ध्यान-श्लोक है। इसमें उनके रूप का चित्र है: शांत आकार, शेषनाग की शय्या, नाभि में कमल, बादल जैसा श्याम रंग, और अंत में उन्हें प्रणाम है जो संसार का भय हरते हैं।
यह श्लोक विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र के पाठ से पहले पढ़े जाने वाले ध्यान-श्लोकों में छपता है। अलग से यह रोज़ की पूजा, गुरुवार और एकादशी के दिन विष्णु-स्मरण के लिए बोला जाता है।
इस एक श्लोक में भगवान विष्णु का पूरा ध्यान है। पहले उनका रूप आता है: शांत आकार, शेषनाग की शय्या, नाभि-कमल, बादल जैसा रंग और सुंदर अंग। फिर उनकी महिमा: वे संसार का आधार हैं, आकाश की तरह सब में व्याप्त हैं, देवताओं के स्वामी हैं।
"शान्ताकारं" और "भुजगशयनं" साथ आते हैं: जिसके नीचे विषधर नाग है, वह फिर भी शांत है। भक्त इसे इस भाव से पढ़ते हैं कि जीवन की उलझनों के बीच भी मन शांत रह सके। अंत में प्रार्थना नहीं, प्रणाम है: "वन्दे विष्णुं", उन विष्णु को नमस्कार जो संसार के भय को दूर करते हैं।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| तीसरा चरण | योगिभिर्ध्यानगम्यं | sanskritdocuments.org (और sa.wikisource.org) के विष्णुसहस्रनाम का मुख्य पाठ यही है; वह "योगिहृद्ध्यानगम्यं" को कोष्ठक में देता है। अर्थ: योगियों को ध्यान से प्राप्त होने वाले। |
| दूसरा चरण | विश्वाकारं | stotranidhi.com के पाठ में "विश्वाधारं" (संसार के आधार) की जगह "विश्वाकारं" (संसार जिनका रूप है) मिलता है। |
sanskritdocuments.org, vignanam.org और stotranidhi.com, तीनों के विष्णुसहस्रनाम पाठ में यह श्लोक ध्यान-भाग में है। सहस्रनाम महाभारत के अनुशासन पर्व का अंश माना जाता है, पर यह ध्यान-श्लोक पाठ की परंपरा में उसके आगे जोड़ा जाता है। इसका मूल ग्रंथ और रचयिता हमारे स्रोतों में नहीं बताए गए, इसलिए रचयिता अज्ञात रखा गया है।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): श्लोक sanskritdocuments.org, vignanam.org और stotranidhi.com के विष्णुसहस्रनाम के ध्यान-भाग से मिलाया गया; sa.wikisource.org का विष्णुसहस्रनाम पाठ भी sanskritdocuments.org से मेल खाता है। पंक्तियाँ sanskritdocuments.org से हैं; तीसरे चरण में तीन में से दो स्रोतों (और sanskritdocuments.org के कोष्ठक) वाला "योगिहृद्ध्यानगम्यं" रखा गया। "योगिभिर्ध्यानगम्यं" और "विश्वाकारं" पाठ-भेद में दिए हैं। मूल ग्रंथ अज्ञात है, इसलिए रचयिता null रखा गया।
विष्णु · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में भगवान विष्णु की सरल पूजा: तुलसी के साथ पंचोपचार, गुरुवार और एकादशी की रीत, मंत्र, आरती और क्षमा प्रार्थना, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
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यह विष्णुसहस्रनाम के पाठ से पहले पढ़े जाने वाले ध्यान-श्लोकों में छपता है। इसका मूल ग्रंथ और रचयिता हमारे देखे स्रोतों में नहीं बताए गए हैं।
दोनों पाठ छपे मिलते हैं और अर्थ लगभग एक ही है। यहाँ "योगिहृद्ध्यानगम्यं" रखा है क्योंकि vignanam.org और stotranidhi.com में यही है और sanskritdocuments.org भी इसे दूसरे पाठ के रूप में देता है; "योगिभिर्ध्यानगम्यं" पाठ-भेद में है।
भुजग यानी नाग। भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर विश्राम करते हैं, इसलिए उन्हें भुजगशयन कहा गया है।
रोज़ की पूजा में, विष्णुसहस्रनाम से पहले, या गुरुवार और एकादशी को भगवान विष्णु के स्मरण के लिए। इसे पढ़ने का कोई कठिन नियम नहीं है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।