विष्णु

स्तोत्र · विष्णु · श्लोक

शान्ताकारं भुजगशयनं (विष्णु ध्यान श्लोक)

भगवान विष्णु का प्रसिद्ध ध्यान-श्लोक: शेषनाग पर शांत भाव से लेटे, कमलनयन, लक्ष्मीपति विष्णु की वन्दना। मूल पाठ, अर्थ और शब्दार्थ।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. भावार्थ
  4. कब पढ़ें
  5. विधि
  6. पाठ-भेद
  7. रचयिता और स्रोत
  8. ये भी पढ़ें
  9. सवाल-जवाब
  10. सुधार सुझाएँ

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशंविश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिहृद्ध्यानगम्यंवन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

śāntākāraṃ bhujagaśayanaṃ padmanābhaṃ sureśaṃ
viśvādhāraṃ gaganasadṛśaṃ meghavarṇaṃ śubhāṅgam |
lakṣmīkāntaṃ kamalanayanaṃ yogihṛddhyānagamyaṃ
vande viṣṇuṃ bhavabhayaharaṃ sarvalokaikanātham ||

अर्थ: जिनका रूप शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर लेटे हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के स्वामी हैं; जो पूरे संसार का आधार हैं, आकाश की तरह सब जगह फैले हैं, बादल जैसे श्याम वर्ण के हैं और जिनके अंग सुंदर हैं; जो लक्ष्मी के पति हैं, कमल जैसे नेत्रों वाले हैं और योगी हृदय में ध्यान करके जिन्हें पाते हैं; संसार के भय को हरने वाले, सब लोकों के एकमात्र स्वामी उन भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।

शान्ताकारं
शांत रूप वाले
भुजगशयनं
शेषनाग की शय्या पर सोने वाले
पद्मनाभं
जिनकी नाभि में कमल है
विश्वाधारं
संसार के आधार
गगनसदृशं
आकाश के समान (सर्वव्यापी)
मेघवर्णं
बादल जैसे श्याम रंग वाले
योगिहृद्ध्यानगम्यं
योगियों के हृदय के ध्यान से प्राप्त होने वाले
भवभयहरं
संसार के भय को हरने वाले

परिचय

"शान्ताकारं भुजगशयनं" भगवान विष्णु का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला ध्यान-श्लोक है। इसमें उनके रूप का चित्र है: शांत आकार, शेषनाग की शय्या, नाभि में कमल, बादल जैसा श्याम रंग, और अंत में उन्हें प्रणाम है जो संसार का भय हरते हैं।

यह श्लोक विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र के पाठ से पहले पढ़े जाने वाले ध्यान-श्लोकों में छपता है। अलग से यह रोज़ की पूजा, गुरुवार और एकादशी के दिन विष्णु-स्मरण के लिए बोला जाता है।

भावार्थ

इस एक श्लोक में भगवान विष्णु का पूरा ध्यान है। पहले उनका रूप आता है: शांत आकार, शेषनाग की शय्या, नाभि-कमल, बादल जैसा रंग और सुंदर अंग। फिर उनकी महिमा: वे संसार का आधार हैं, आकाश की तरह सब में व्याप्त हैं, देवताओं के स्वामी हैं।

"शान्ताकारं" और "भुजगशयनं" साथ आते हैं: जिसके नीचे विषधर नाग है, वह फिर भी शांत है। भक्त इसे इस भाव से पढ़ते हैं कि जीवन की उलझनों के बीच भी मन शांत रह सके। अंत में प्रार्थना नहीं, प्रणाम है: "वन्दे विष्णुं", उन विष्णु को नमस्कार जो संसार के भय को दूर करते हैं।

यह श्लोक कब पढ़ा जाता है

  • रोज़ सुबह-शाम की पूजा में भगवान विष्णु के ध्यान के लिए
  • विष्णुसहस्रनाम का पाठ शुरू करने से पहले
  • गुरुवार और एकादशी के दिन
  • सत्यनारायण कथा या विष्णु पूजा के आरम्भ में

पढ़ने की विधि

  • भगवान विष्णु या नारायण के चित्र के सामने बैठकर, दीप जलाकर, हाथ जोड़ें।
  • श्लोक धीरे-धीरे पढ़ें और हर शब्द के साथ उनके रूप की कल्पना करें: शेषनाग पर विश्राम, नाभि से निकला कमल, साथ में माँ लक्ष्मी।
  • एक बार पढ़ना काफ़ी है; मन लगाने के लिए तीन बार भी पढ़ सकते हैं।
पूरी विधिविष्णु पूजा विधिघर में भगवान विष्णु की सरल पूजा: तुलसी के साथ पंचोपचार, गुरुवार और एकादशी की रीत, मंत्र, आरती और क्षमा प्रार्थना, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
तीसरा चरणयोगिभिर्ध्यानगम्यंsanskritdocuments.org (और sa.wikisource.org) के विष्णुसहस्रनाम का मुख्य पाठ यही है; वह "योगिहृद्ध्यानगम्यं" को कोष्ठक में देता है। अर्थ: योगियों को ध्यान से प्राप्त होने वाले।
दूसरा चरणविश्वाकारंstotranidhi.com के पाठ में "विश्वाधारं" (संसार के आधार) की जगह "विश्वाकारं" (संसार जिनका रूप है) मिलता है।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
ज्ञात नहीं
ग्रंथ / स्रोत
विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र के ध्यान-श्लोक (प्रचलित पाठ में तीसरा ध्यान-श्लोक)
भाषा
संस्कृत

sanskritdocuments.org, vignanam.org और stotranidhi.com, तीनों के विष्णुसहस्रनाम पाठ में यह श्लोक ध्यान-भाग में है। सहस्रनाम महाभारत के अनुशासन पर्व का अंश माना जाता है, पर यह ध्यान-श्लोक पाठ की परंपरा में उसके आगे जोड़ा जाता है। इसका मूल ग्रंथ और रचयिता हमारे स्रोतों में नहीं बताए गए, इसलिए रचयिता अज्ञात रखा गया है।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): श्लोक sanskritdocuments.org, vignanam.org और stotranidhi.com के विष्णुसहस्रनाम के ध्यान-भाग से मिलाया गया; sa.wikisource.org का विष्णुसहस्रनाम पाठ भी sanskritdocuments.org से मेल खाता है। पंक्तियाँ sanskritdocuments.org से हैं; तीसरे चरण में तीन में से दो स्रोतों (और sanskritdocuments.org के कोष्ठक) वाला "योगिहृद्ध्यानगम्यं" रखा गया। "योगिभिर्ध्यानगम्यं" और "विश्वाकारं" पाठ-भेद में दिए हैं। मूल ग्रंथ अज्ञात है, इसलिए रचयिता null रखा गया।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

"शान्ताकारं भुजगशयनं" किस ग्रंथ से है?

यह विष्णुसहस्रनाम के पाठ से पहले पढ़े जाने वाले ध्यान-श्लोकों में छपता है। इसका मूल ग्रंथ और रचयिता हमारे देखे स्रोतों में नहीं बताए गए हैं।

"योगिभिर्ध्यानगम्यं" सही है या "योगिहृद्ध्यानगम्यं"?

दोनों पाठ छपे मिलते हैं और अर्थ लगभग एक ही है। यहाँ "योगिहृद्ध्यानगम्यं" रखा है क्योंकि vignanam.org और stotranidhi.com में यही है और sanskritdocuments.org भी इसे दूसरे पाठ के रूप में देता है; "योगिभिर्ध्यानगम्यं" पाठ-भेद में है।

"भुजगशयनं" का क्या अर्थ है?

भुजग यानी नाग। भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर विश्राम करते हैं, इसलिए उन्हें भुजगशयन कहा गया है।

यह श्लोक कब पढ़ें?

रोज़ की पूजा में, विष्णुसहस्रनाम से पहले, या गुरुवार और एकादशी को भगवान विष्णु के स्मरण के लिए। इसे पढ़ने का कोई कठिन नियम नहीं है।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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