विष्णु पूजा विधि
विष्णु · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में भगवान विष्णु की सरल पूजा: तुलसी के साथ पंचोपचार, गुरुवार और एकादशी की रीत, मंत्र, आरती और क्षमा प्रार्थना, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

आरती · विष्णु
भगवान विष्णु की वह आरती जो लगभग हर पूजा के अंत में गाई जाती है। पूरा पाठ, हर अंतरे का सरल अर्थ, भावार्थ और पाठभेद।
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
अर्थ: हे जगत के स्वामी हरि, आपकी जय हो। आप अपने भक्तों के संकट पल भर में दूर कर देते हैं।
जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का।सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
अर्थ: भक्त कहता है कि जो आपका ध्यान करता है, उसे फल मिलता है और उसके मन का दुख मिट जाता है। उसके घर सुख और संपत्ति आती है और शरीर के कष्ट दूर होते हैं।
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी।तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
अर्थ: आप ही मेरे माता-पिता हैं; आपको छोड़कर मैं किसकी शरण लूँ? आपके सिवा कोई दूसरा नहीं है, जिससे मैं आशा रखूँ।
तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतरयामी।पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
अर्थ: आप पूर्ण परमात्मा हैं और सबके मन की बात जानने वाले हैं। आप ही परब्रह्म हैं, परमेश्वर हैं और सबके स्वामी हैं।
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
अर्थ: आप करुणा के सागर हैं और सबका पालन करते हैं। मैं तो मूर्ख, बुरे स्वभाव वाला और कामनाओं से भरा हूँ; हे पालनहार, मुझ पर कृपा करो।
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
अर्थ: आप एक ही हैं, आँखों और इंद्रियों से दिखाई नहीं देते, और सबके प्राणों के स्वामी हैं। हे दयामय, मुझ जैसा कम बुद्धि वाला किस तरह आपसे मिले?
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
अर्थ: आप दीन-दुखियों के बंधु हैं, दुख हरने वाले हैं, मेरे स्वामी हैं। मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ; अपना हाथ बढ़ाकर मुझे उठा लो।
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
अर्थ: हे देव, मेरे मन से भोगों की चाह और उससे उपजे दोष मिटा दो, मेरे पाप हर लो। मेरी श्रद्धा और भक्ति बढ़ाओ और संतों की सेवा का भाव दो।
हर अंतरे का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।
“ॐ जय जगदीश हरे” भगवान विष्णु की आरती है, पर आज यह लगभग हर हिंदू घर में किसी भी पूजा, कथा या उत्सव के अंत में गाई जाती है। इसमें भक्त भगवान को जगत का स्वामी, माता-पिता, अंतर्यामी और दीनबंधु कहकर पुकारता है, अपनी कमियाँ मानता है और उनसे श्रद्धा और भक्ति माँगता है।
यह आरती पं. श्रद्धाराम शर्मा फिल्लौरी की रचना मानी जाती है, जिन्होंने इसे लगभग 1870 में लिखा। अलग-अलग संग्रहों में इसके कुछ शब्द बदल जाते हैं। यहाँ घरों में गाया जाने वाला रूप दिया है; जहाँ स्रोतों में अंतर था, वहाँ वह शब्द चुना है जो गीता प्रेस के आरती-संग्रह में भी है। बाक़ी रूप नीचे पाठभेद में हैं।
हे जगत के स्वामी हरि, आपकी जय हो। आप अपने भक्तों के संकट पल भर में दूर कर देते हैं।
भक्त कहता है कि जो आपका ध्यान करता है, उसे फल मिलता है और उसके मन का दुख मिट जाता है। उसके घर सुख और संपत्ति आती है और शरीर के कष्ट दूर होते हैं।
आप ही मेरे माता-पिता हैं; आपको छोड़कर मैं किसकी शरण लूँ? आपके सिवा कोई दूसरा नहीं है, जिससे मैं आशा रखूँ।
आप पूर्ण परमात्मा हैं और सबके मन की बात जानने वाले हैं। आप ही परब्रह्म हैं, परमेश्वर हैं और सबके स्वामी हैं।
आप करुणा के सागर हैं और सबका पालन करते हैं। मैं तो मूर्ख, बुरे स्वभाव वाला और कामनाओं से भरा हूँ; हे पालनहार, मुझ पर कृपा करो।
आप एक ही हैं, आँखों और इंद्रियों से दिखाई नहीं देते, और सबके प्राणों के स्वामी हैं। हे दयामय, मुझ जैसा कम बुद्धि वाला किस तरह आपसे मिले?
आप दीन-दुखियों के बंधु हैं, दुख हरने वाले हैं, मेरे स्वामी हैं। मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ; अपना हाथ बढ़ाकर मुझे उठा लो।
हे देव, मेरे मन से भोगों की चाह और उससे उपजे दोष मिटा दो, मेरे पाप हर लो। मेरी श्रद्धा और भक्ति बढ़ाओ और संतों की सेवा का भाव दो।
आरती का पहला भाव भरोसे का है: भगवान भक्तों के संकट पल भर में दूर करते हैं और उनका ध्यान करने वाले का मन शांत होता है। फिर भक्त कहता है कि वही उसके माता-पिता हैं, उनके सिवा कोई सहारा नहीं। वे पूर्ण परमात्मा हैं, सबके मन की बात जानते हैं, करुणा के सागर हैं और सबका पालन करते हैं।
बीच के अंतरों में भक्त अपनी सीमा स्वीकार करता है: वह मूर्ख है, कामनाओं से भरा है, और भगवान इंद्रियों की पहुँच से परे हैं; तो वह उनसे मिले कैसे? उत्तर शरण में है: वह उनके द्वार पर पड़ा है और विनती करता है कि वे हाथ बढ़ाकर उसे उठा लें। अंत में वह धन या सुख नहीं माँगता, बल्कि मन के विकार मिटें, पाप दूर हों, और श्रद्धा, भक्ति और संतों की सेवा बढ़े, यही माँगता है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| मुखड़ा | ॐ जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे। भक्तजनोंके संकट छिनमें दूर करे॥ | गीता प्रेस के आरती-संग्रह का पाठ; उसमें अंतरों के बीच भी “स्वामी” की जगह “प्रभु” आता है। |
| मुखड़ा | भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे | भक्ति भारत में; गाते समय पंक्ति इस तरह बढ़ाकर गाई जाती है। |
| अंतरा 2 | मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी। तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥ | गीता प्रेस और वेबदुनिया में “मैं” नहीं है। |
| अंतरा 4 | मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता | sanskritdocuments.org का पाठ। भक्ति भारत इसे और “मैं मूरख फलकामी” दोनों देता है। गीता प्रेस, वेबदुनिया और द्रिक पंचांग में “मैं मूरख खल कामी” है। |
| अंतरा 6 | दीनबंधु दुखहर्ता, तुम रक्षक मेरे। करुणा हस्त बढ़ाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ | sanskritdocuments.org का पाठ। भक्ति भारत में “अपने हाथ उठाओ, अपने शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे”। |
| अंतरा 7 के बाद | तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा। तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ | वेबदुनिया में यह अंतरा और है; गीता प्रेस, भक्ति भारत, sanskritdocuments और द्रिक पंचांग में नहीं। |
| अंत में | श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥ | द्रिक पंचांग में; वेबदुनिया में “जगदीश्वरजी की आरती … मनवांछित फल पावे”। यह अंतरा गीता प्रेस, भक्ति भारत और sanskritdocuments में नहीं है। |
हिन्दी और अंग्रेज़ी विकिपीडिया और द ट्रिब्यून इसे फिल्लौर (पंजाब) के पं. श्रद्धाराम शर्मा (1837–1881) की रचना बताते हैं, लगभग 1870 की; भक्ति भारत भी यही लिखता है। कुछ संग्रहों में अंत में “कहत शिवानंद स्वामी” वाला अंतरा भी जुड़ा मिलता है, पर वह गीता प्रेस, भक्ति भारत और sanskritdocuments के पाठ में नहीं है।
गीता प्रेस के पाठ में कुछ शब्द प्रचलित पाठ से अलग हैं, जैसे “प्रभु! जय जगदीश हरे” और “छिन में”; देखें पाठभेद।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति भक्ति भारत, sanskritdocuments.org (आरती संग्रह), वेबदुनिया, द्रिक पंचांग और गीता प्रेस के आरती-संग्रह (कोड 153 और नया संस्करण, archive.org पर स्कैन से पढ़ा गया पाठ) से मिलाई। हर पंक्ति कम से कम दो स्वतंत्र स्रोतों में है। प्रचलित (घरों में गाया जाने वाला) रूप रखा। जहाँ वेब स्रोत आपस में अलग थे, वहाँ गीता प्रेस से मेल खाता शब्द चुना: “मैं मूरख खल कामी”, “तुम ठाकुर मेरे”, “अपने हाथ उठाओ” (गीता प्रेस, वेबदुनिया, द्रिक पंचांग)। गीता प्रेस का “प्रभु! जय जगदीश हरे” और “छिनमें” किसी दूसरे स्रोत में नहीं मिला, इसलिए पाठभेद में रखा। अंत के दो अतिरिक्त अंतरे (वेबदुनिया, द्रिक पंचांग) गीता प्रेस और बाक़ी स्रोतों में न होने से मुख्य पाठ में नहीं लिए। गीता प्रेस का पाठ स्कैन से मशीन द्वारा पढ़ा गया है, इसलिए उसमें “मूख”, “द्वारा” जैसी पढ़ने की भूलें हैं।
विष्णु · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में भगवान विष्णु की सरल पूजा: तुलसी के साथ पंचोपचार, गुरुवार और एकादशी की रीत, मंत्र, आरती और क्षमा प्रार्थना, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
विष्णु · श्लोक · संस्कृत
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यह आरती पं. श्रद्धाराम शर्मा फिल्लौरी (1837–1881) की रचना मानी जाती है, जिन्होंने इसे लगभग 1870 में लिखा। कुछ संग्रहों के अंत में “कहत शिवानंद स्वामी” वाला अंतरा भी मिलता है, पर वह सब पाठों में नहीं है।
यह भगवान विष्णु (जगदीश, हरि) की आरती है। फिर भी इसे लगभग हर पूजा और कथा के अंत में गाया जाता है, क्योंकि इसमें भगवान को सबका स्वामी और अंतर्यामी कहकर पुकारा गया है।
दोनों पाठ प्रचलित हैं। गीता प्रेस के आरती-संग्रह में “मैं मूरख खल कामी” है, इसलिए यहाँ वही दिया है; कई घरों में “मैं सेवक तुम स्वामी” गाया जाता है। दोनों का भाव भगवान के आगे विनम्रता है।
हाँ। दीपक या कपूर हो तो उससे आरती उतारें; न हो तो हाथ जोड़कर, भगवान का ध्यान करते हुए आरती गाना भी उनकी स्तुति ही है।
यह लगभग 150 साल से गाई जा रही है। 1970 की फ़िल्म “पूरब और पश्चिम” में आने के बाद यह देश-विदेश में और भी अधिक घरों तक पहुँची।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।