विष्णु

पूजा विधि · विष्णु · रोज़ की पूजा

विष्णु पूजा विधि

घर में भगवान विष्णु की सरल पूजा: तुलसी के साथ पंचोपचार, गुरुवार और एकादशी की रीत, मंत्र, आरती और क्षमा प्रार्थना, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

इस पेज पर
  1. परिचय
  2. एक नज़र में
  3. कब करें
  4. सामग्री
  5. तैयारी
  6. चित्र या मूर्ति
  7. संकल्प
  8. चरण-दर-चरण विधि
  9. पाठ
  10. भोग
  11. समापन
  12. छोटी विधि
  13. परंपराओं में अंतर
  14. ये भी पढ़ें
  15. स्रोत
  16. सवाल-जवाब
  17. सुधार सुझाएँ
रोज़ की पूजा

यह घर में भगवान विष्णु (नारायण) की रोज़ की, गुरुवार की और एकादशी की सरल पूजा है: तुलसी के साथ पंचोपचार (गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य), नाम-मंत्र, आरती और क्षमा प्रार्थना। सत्यनारायण व्रत-कथा की पूरी पूजा, वैदिक पुरुषसूक्त के मंत्रों से षोडशोपचार और शालग्राम का विधिवत पूजन यहाँ नहीं हैं; शालग्राम की पूजा के अपने नियम हैं, उसके लिए अपनी परंपरा के किसी जानकार या पुरोहित से पूछें।

परिचय

भगवान विष्णु जगत के पालनहार हैं। उनकी पूजा की सबसे अपनी पहचान तुलसी है: परंपरा में विष्णु के भोग में तुलसीदल रखा जाता है, और गुरुवार व एकादशी उनकी उपासना के दिन माने जाते हैं। पीला रंग उनके पीताम्बर से जुड़ा है, इसलिए गुरुवार को पीले फूल, पीला चंदन और पीली मिठाई चढ़ाने की रीत है।

गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश कहती है कि जिसे लंबे श्लोक न आते हों, वह नाम-मंत्र से पूजा करे, और यह भी संभव न हो तो बिना मंत्र के ही जल, चंदन, फूल चढ़ाकर पूजा करे। इसलिए नीचे हर चरण का एक छोटा रूप भी दिया है। मन से की गई छोटी-सी पूजा भी पूजा है; गीता में भगवान स्वयं कहते हैं कि भक्ति से दिया गया एक पत्ता, फूल, फल या जल भी वे स्वीकार करते हैं।

एक नज़र में

समय
सुबह स्नान के बाद; गुरुवार और एकादशी को विशेष रूप से
अवधि
लगभग 20–30 मिनट; छोटा रूप 5–10 मिनट
कौन कर सकता है
कोई भी श्रद्धा रखने वाला: स्त्री, पुरुष, बच्चे, बुज़ुर्ग
मुख्य सामग्री
तुलसीदल, पीले फूल, चंदन, घी का दीपक, धूप, नैवेद्य
आरती
ॐ जय जगदीश हरे

पूजा कब करें

  • रोज़ सुबह स्नान के बाद पूजा की जा सकती है। जो रोज़ न कर सकें, वे गुरुवार (बृहस्पतिवार) को करें: परंपरा में यह दिन भगवान विष्णु और बृहस्पति देव का है और इस दिन पीले रंग का महत्व माना जाता है। गुरुवार व्रत के बारे में साइट के गुरुवार व्रत पन्ने पर पढ़ें।
  • हर महीने की दोनों एकादशियाँ भगवान विष्णु की उपासना के दिन हैं। एकादशी की तारीख़, तिथि का समय और पारण का समय साइट के एकादशी पन्ने पर दिया है।
  • शाम को सूर्यास्त के समय दीपक जलाकर आरती की जा सकती है। कार्तिक मास, देवउठनी एकादशी और पूर्णिमा को भी कई घरों में विष्णु पूजा विशेष रूप से होती है।

पूजा सामग्री

  • आवश्यक इसके बिना यह विधि नहीं होती
  • वैकल्पिक हो तो अच्छा; न हो तो विकल्प दिया है
  • परंपरा-विशेष कुछ परंपराओं में ही
सामग्रीउपयोगस्थितिविकल्प / टिप्पणी
भगवान विष्णु का चित्र या मूर्तिपूजा का केंद्र, जिसके सामने बैठकर ध्यान किया जाता हैवैकल्पिकचित्र या मूर्ति न हो तो दीपक जलाकर उसके सामने बैठें और मन में भगवान का रूप ध्यान करें; मानस पूजा भी पूरी पूजा है।
तुलसीदलपुष्प के साथ चढ़ाने और नैवेद्य (भोग) पर रखने के लिएआवश्यकपरंपरा में विष्णु की पूजा तुलसी के बिना पूरी नहीं मानी जाती (गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश)। जिस दिन तुलसी तोड़ना मना माना जाता है, उस दिन पौधे से अपने-आप गिरे पत्ते या पिछले दिन के रखे पत्ते लें; पौधा न हो तो मन से तुलसी अर्पित करें।
शुद्ध जल का लोटाआचमन, स्नान कराने और अर्घ्य के लिएवैकल्पिकगंगाजल हो तो कुछ बूँदें मिला लें; न हो तो साफ़ जल ही काफ़ी है।
पीले फूल और फूलमालापुष्प अर्पणवैकल्पिकपीले फूल न मिलें तो जो भी ताज़ा, सुगंधित फूल मिले; फूल न हो तो केवल तुलसीदल।
चंदन (पीला चंदन या केसर मिला चंदन)तिलक और गंध अर्पणवैकल्पिकरोली या हल्दी; कुछ न हो तो जल से ही तिलक का भाव।
सफ़ेद तिल या अक्षतपूजा में चढ़ाने के लिएपरंपरा-विशेषगीताप्रेस की शालग्राम-पूजा में अक्षत के स्थान पर सफ़ेद तिल चढ़ाए जाते हैं; बहुत-से घरों में अक्षत भी चढ़ाए जाते हैं। अपनी पारिवारिक रीत मानें।
घी का दीपकदीप दर्शन और आरतीवैकल्पिकघी न हो तो तिल के तेल का दीपक।
धूप या अगरबत्तीधूप अर्पणवैकल्पिकन हो तो यह उपचार मन से अर्पित करें।
नैवेद्य (भोग)भगवान को भोग लगाने के लिएवैकल्पिककेला या कोई भी फल, मिश्री, गुड़; कुछ न हो तो तुलसीदल डला जल ही भोग है।
शंख और घंटीपूजा के आरंभ और आरती मेंपरंपरा-विशेषविष्णु शंख धारण करते हैं, इसलिए कई घरों में उनकी पूजा में शंख रखा जाता है; न हो तो केवल घंटी, और वह भी न हो तो कोई बात नहीं।
पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)धातु की मूर्ति के स्नान और प्रसाद के लिएवैकल्पिकरोज़ की पूजा में शुद्ध जल ही काफ़ी है; चित्र पर केवल जल के छींटे दें।
पीला वस्त्र या आसनचौकी पर बिछाने और बैठने के लिएपरंपरा-विशेषगुरुवार की रीत है; कोई भी साफ़ कपड़ा या आसन चलेगा।

स्थान और अपनी तैयारी

  • घर का पूजा-स्थान या कोई साफ़, शांत कोना चुनें। स्थान को झाड़-पोंछकर साफ़ कर लें।
  • स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें; गुरुवार को कई लोग पीले कपड़े पहनते हैं। ज़मीन पर सीधे न बैठकर आसन पर बैठें।
  • पूजा से पहले मन को कुछ पल शांत करें। जल्दबाज़ी न हो, इसलिए उतना ही करें जितना आराम से कर सकें।

चित्र या मूर्ति कैसे रखें

  • एक चौकी पर पीला या साफ़ कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु का चित्र या मूर्ति रखें। लक्ष्मी-नारायण का चित्र भी रखा जा सकता है।
  • गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश के अनुसार पूजा करने वाले की दाहिनी ओर घी का दीपक और जल भरा शंख, बाईं ओर जल का कलश, घंटी और धूप रहें; चंदन, फूल, तुलसी सामने। नैवेद्य भगवान के ठीक सामने रखें।
  • पूजा करने वाले का मुख आमतौर पर पूर्व या उत्तर की ओर रखा जाता है; घर की बनावट से यह संभव न हो तो जैसा सुविधाजनक हो। दिशा के बारे में परंपराओं में अंतर है।
  • दीपक को सीधे ज़मीन पर न रखकर किसी छोटी थाली, दीवट या अक्षत पर रखने की रीत है।

संकल्प

संकल्प का अर्थ है पूजा से पहले मन में साफ़ निश्चय करना कि मैं कौन हूँ, किसकी पूजा कर रहा हूँ और किस भाव से। दाहिने हाथ में थोड़ा जल, फूल और तुलसीदल लेकर संकल्प बोलें और जल को थाली में छोड़ दें।

हे नारायण, आज (दिन का नाम) को मैं (अपना नाम) अपने परिवार के साथ आपकी प्रसन्नता के लिए यह पूजा कर रहा/रही हूँ। मुझसे जैसी बन पड़े, वैसी इस सेवा को स्वीकार करें।

विस्तृत संस्कृत संकल्प में संवत्, मास, तिथि, स्थान और गोत्र बोले जाते हैं; किसी विशेष अनुष्ठान में यह पुरोहित करवाते हैं। रोज़ की पूजा में अपनी भाषा में किया गया यह संकल्प काफ़ी है।

पूजा की विधि, चरण-दर-चरण

  1. १शुद्धि और आचमन

    क्या करें
    आसन पर बैठकर हाथ-मुँह शुद्ध करें और अपने ऊपर व सामग्री पर जल छिड़कें।
    कैसे करें
    दाहिनी हथेली में थोड़ा-सा जल लेकर नीचे के तीन नाम बोलते हुए तीन बार ज़रा-सा जल पिएँ, फिर 'ॐ हृषीकेशाय नमः' कहकर हाथ धो लें। इसके बाद थोड़ा जल अपने ऊपर और पूजा-सामग्री पर छिड़कें।
    भाव
    भगवान के सामने बैठने से पहले तन के साथ मन को भी साफ़ करने का भाव।
    पाठ

    ॐ केशवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः। ॐ माधवाय नमः।

    अर्थ: भगवान के तीन नामों, केशव, नारायण और माधव, को नमस्कार।

    स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: आचमन की विधि

    विकल्प
    आचमन न कर सकें तो केवल हाथ धोकर, भगवान का नाम लेकर बैठ जाएँ।
  2. २दीपक जलाएँ

    क्या करें
    घी का दीपक जलाकर भगवान की दाहिनी ओर (आपकी दाहिनी ओर) रखें।
    कैसे करें
    दीपक को थाली या दीवट पर रखें। शंख हो तो एक बार बजाएँ या घंटी बजाएँ, फिर हाथ जोड़कर दीपक को प्रणाम करें।
    भाव
    दीपक की लौ भगवान के प्रकाश का प्रतीक है; उसी प्रकाश में पूजा शुरू हो रही है।
    विकल्प
    घी न हो तो तिल के तेल का दीपक जलाएँ।
  3. ३संकल्प

    क्या करें
    हाथ में जल, फूल और तुलसीदल लेकर ऊपर दिया सरल संकल्प बोलें।
    कैसे करें
    संकल्प बोलकर हाथ का जल और फूल थाली में या भगवान के चरणों के पास छोड़ दें।
    भाव
    यह पूजा भगवान की प्रसन्नता के लिए है; जो बन पड़े, प्रेम से करूँगा।
    विकल्प
    शब्द याद न रहें तो मन में इतना कहें: हे नारायण, यह पूजा आपके लिए है।
  4. ४ध्यान

    क्या करें
    आँखें बंद करके भगवान विष्णु के रूप का ध्यान करें।
    कैसे करें
    हाथ में फूल लेकर नीचे का श्लोक पढ़ें और फूल भगवान के चरणों में रख दें।
    भाव
    शेषनाग पर शांत भाव से लेटे, कमल-नयन, साँवले भगवान का मन में दर्शन।
    पाठ

    शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्।
    विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
    लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्।
    वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

    अर्थ: जिनका रूप शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर लेटे हैं, जिनकी नाभि में कमल है और जो देवताओं के स्वामी हैं; जो सारे जगत के आधार हैं, आकाश की तरह अनंत हैं, बादल जैसे साँवले और सुंदर अंगों वाले हैं; जो लक्ष्मी के पति हैं, कमल जैसे नेत्रों वाले हैं और योगी जिन्हें ध्यान से पाते हैं; संसार का भय हरने वाले, सब लोकों के एकमात्र स्वामी उन विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।

    शान्ताकारं भुजगशयनं (विष्णु ध्यान श्लोक): पूरा पाठ और अर्थ

    विकल्प
    श्लोक न पढ़ सकें तो 'ॐ नमो नारायणाय' कहकर फूल चढ़ा दें।
  5. ५स्नान

    क्या करें
    भगवान को जल से स्नान कराएँ।
    कैसे करें
    धातु की मूर्ति हो तो उसे किसी पात्र में रखकर पहले शुद्ध जल से, चाहें तो फिर पंचामृत से और अंत में फिर शुद्ध जल से स्नान कराएँ और साफ़ कपड़े से पोंछ दें। चित्र हो तो फूल से जल के कुछ छींटे दें।
    भाव
    जैसे किसी प्रिय अतिथि की सेवा करते हैं, वैसे ही भगवान को स्नान कराने का भाव।
    पाठ

    ॐ श्रीमन्नारायणाय नमः। स्नानीयं जलं समर्पयामि।

    अर्थ: श्रीमन्नारायण को नमस्कार; मैं स्नान के लिए जल अर्पित करता हूँ।

    स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीशालग्राम-पूजन: नाम-मंत्र के साथ स्नान का वाक्य

    विकल्प
    रोज़ की छोटी पूजा में स्नान की जगह केवल जल के छींटे देना काफ़ी है।
  6. ६वस्त्र, चंदन और तिल

    क्या करें
    वस्त्र या मौली अर्पित करें, चंदन लगाएँ और सफ़ेद तिल या अक्षत चढ़ाएँ।
    कैसे करें
    मूर्ति हो तो छोटा पीला वस्त्र पहनाएँ; न हो तो मौली (कलावा) का टुकड़ा चढ़ाएँ। अनामिका उँगली से पीला चंदन लगाएँ, फिर तिल या अक्षत चढ़ाएँ।
    भाव
    पीताम्बरधारी भगवान को पीले वस्त्र और सुगंध से सजाने का आनंद।
    पाठ

    ॐ श्रीमन्नारायणाय नमः। चन्दनं समर्पयामि।

    अर्थ: श्रीमन्नारायण को नमस्कार; मैं चंदन अर्पित करता हूँ।

    स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीशालग्राम-पूजन

    विकल्प
    वस्त्र न हो तो मन से अर्पित करें; चंदन न हो तो रोली या हल्दी।
  7. ७पुष्प और तुलसी

    क्या करें
    फूल, फूलमाला और तुलसीदल अर्पित करें।
    कैसे करें
    फूल को अंगूठे, मध्यमा और अनामिका से पकड़कर चढ़ाएँ। तुलसीदल भगवान के चरणों में रखें; तुलसी-मंजरी हो तो वह भी।
    भाव
    तुलसी भगवान को सबसे प्रिय है; उसे चढ़ाते हुए अपना प्रेम अर्पित करने का भाव।
    पाठ

    तुलसीं हेमरूपां च रत्नरूपां च मञ्जरीम्।
    भवमोक्षप्रदां तुभ्यमर्पयामि हरिप्रियाम्॥

    अर्थ: सोने जैसी तुलसी और रत्न जैसी उसकी मंजरी, जो हरि को प्रिय है, मैं आपको अर्पित करता हूँ।

    स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीशालग्राम-पूजन: तुलसीपत्र अर्पण

    विकल्प
    फूल न हो तो केवल तुलसीदल; तुलसी भी न हो तो मन से अर्पित करें।
  8. ८धूप और दीप

    क्या करें
    धूप दिखाएँ, फिर दीपक दिखाएँ।
    कैसे करें
    धूप या अगरबत्ती जलाकर भगवान के सामने धीरे से घुमाएँ और बाईं ओर रख दें। फिर दीपक उठाकर भगवान को दिखाएँ और वापस रखकर हाथ धो लें।
    भाव
    सुगंध और प्रकाश, दोनों भगवान की सेवा में।
    पाठ

    ॐ श्रीमन्नारायणाय नमः। धूपमाघ्रापयामि।
    ॐ श्रीमन्नारायणाय नमः। दीपं दर्शयामि।

    अर्थ: श्रीमन्नारायण को नमस्कार; मैं धूप की सुगंध अर्पित करता हूँ। श्रीमन्नारायण को नमस्कार; मैं दीपक दिखाता हूँ।

    स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीशालग्राम-पूजन

    विकल्प
    धूप न हो तो केवल दीपक दिखाएँ।
  9. ९नैवेद्य (भोग)

    क्या करें
    भोग पर तुलसीदल रखकर भगवान को अर्पित करें, फिर पीने का जल दें।
    कैसे करें
    भोग को किसी साफ़ बर्तन में भगवान के सामने रखें और उस पर एक-दो तुलसीदल रखें। श्लोक पढ़कर कुछ पल आँखें बंद रखें, मानो भगवान भोग ग्रहण कर रहे हैं। फिर थोड़ा जल अर्पित करें।
    भाव
    जो कुछ मेरे पास है, वह आपका ही दिया है; आपकी चीज़ आपको ही अर्पित है।
    पाठ

    त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।
    गृहाण सुमुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर॥

    अर्थ: हे गोविंद, यह वस्तु आपकी ही है, आपको ही अर्पित करता हूँ। प्रसन्न मुख से इसे ग्रहण करें; हे परमेश्वर, प्रसन्न हों।

    स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीशालग्राम-पूजन: नैवेद्य

    विकल्प
    भोग में कुछ न हो तो तुलसीदल डला जल या एक फल भी पूरा भोग है।
  10. १०नाम-जप

    क्या करें
    भगवान के मंत्र का जप करें।
    कैसे करें
    माला हो तो 108 बार, नहीं तो 11 या 21 बार, धीमी आवाज़ में या मन में जपें। कई वैष्णव घरों में तुलसी की माला से जप होता है।
    भाव
    हर नाम के साथ भगवान को याद करना और उनकी शरण लेना।
    पाठ

    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

    अर्थ: भगवान वासुदेव को नमस्कार।

    मंत्र का अर्थ और उच्चारण

    विकल्प
    इसकी जगह 'ॐ नमो नारायणाय' भी जप सकते हैं; जो नाम मन को अच्छा लगे, वही।
  11. ११स्तुति और पाठ

    क्या करें
    अपनी रुचि से कोई स्तुति या पाठ करें।
    कैसे करें
    समय हो तो अच्युताष्टकम् या गीता का कोई अध्याय पढ़ें। कम समय हो तो नीचे का एक श्लोक अर्थ के साथ पढ़ लें।
    भाव
    भगवान को सुनाना कि मेरी छोटी-सी भेंट भी प्रेम से है।
    पाठ

    पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
    तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥

    अर्थ: जो भक्त प्रेम से मुझे एक पत्ता, फूल, फल या जल अर्पित करता है, शुद्ध मन वाले उस भक्त का प्रेम से दिया वह उपहार मैं ग्रहण करता हूँ।

    स्रोत: श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 9, श्लोक 26

    विकल्प
    पाठ न हो सके तो यह चरण छोड़ दें; जप ही काफ़ी है।
  12. १२आरती

    क्या करें
    घी के दीपक या कपूर से 'ॐ जय जगदीश हरे' गाते हुए आरती करें।
    कैसे करें
    गीताप्रेस की रीत के अनुसार दीपक को पहले चरणों के सामने चार बार, नाभि के सामने दो बार, मुख के सामने एक बार और फिर पूरे रूप के सामने सात बार घुमाएँ। आरती के बाद उसके चारों ओर थोड़ा जल घुमाकर गिरा दें, फिर दोनों हथेलियों से आरती लें।
    भाव
    पूरे परिवार के साथ मिलकर भगवान का गुणगान।
    विकल्प
    आरती के बोल याद न हों तो दीपक घुमाते हुए भगवान का नाम लें।
    आरतीॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरेपूरी भगवान विष्णु की आरती पढ़ें
  13. १३पुष्पांजलि, परिक्रमा और समर्पण

    क्या करें
    दोनों हाथों में फूल लेकर अर्पित करें, अपनी जगह पर घूमकर परिक्रमा करें और पूजा भगवान को समर्पित करें।
    कैसे करें
    फूल चढ़ाकर दाहिनी ओर से घूमते हुए अपनी जगह पर ही एक परिक्रमा करें। फिर हाथ जोड़कर नीचे का श्लोक पढ़ें और नीचे दी गई क्षमा प्रार्थना करें।
    भाव
    आज मैंने जो कुछ किया, वह सब नारायण को अर्पित है।
    पाठ

    कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा
    बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात्।
    करोमि यद्यद् सकलं परस्मै
    नारायणायेति समर्पयामि॥

    अर्थ: शरीर से, वाणी से, मन से, इंद्रियों से, बुद्धि से या अपने स्वभाव से मैं जो कुछ भी करता हूँ, वह सब परमात्मा नारायण को अर्पित करता हूँ।

    स्रोत: sanskritdocuments.org, श्लोक संग्रह 2 (प्रचलित रूप; श्रीमद्भागवत 11.2.36 का मूल पाठ थोड़ा अलग है, जो गीताप्रेस की शालग्राम-पूजा में दिया है)

    विकल्प
    परिक्रमा की जगह न हो तो अपनी जगह पर खड़े होकर घूम जाएँ, या केवल प्रणाम करें।

पूजा में पढ़े जाने वाले पाठ

भोग

  • केला और मौसम के फल
  • पीली मिठाई: बेसन के लड्डू, केसर की खीर या बूंदी
  • चने की दाल और गुड़ (गुरुवार की रीत)
  • पंचामृत
  • मिश्री, माखन-मिश्री या सूखे मेवे

हर भोग पर तुलसीदल रखें; परंपरा में विष्णु का भोग तुलसी के साथ ही लगता है। एकादशी को भोग में चावल नहीं रखे जाते; उस दिन फल, मेवे, दूध से बनी चीज़ें या फलाहार की चीज़ें रखें। जो घर में साफ़-सफ़ाई और प्रेम से बना हो, वही अच्छा भोग है।

प्रार्थना और समापन

हे नारायण, आज की इस पूजा में जो कमी रह गई हो, उसे क्षमा करें। मेरे घर-परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें और मुझे हर दिन आपको याद करने की बुद्धि दें।

क्षमा प्रार्थना

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥

अर्थ: हे जनार्दन, मेरी पूजा में मंत्र की, विधि की या भक्ति की जो कमी रही हो, उसके बावजूद मैंने जो पूजा की है, उसे पूरा मान लें। मैं न आपको बुलाना जानता हूँ, न विदा करना, न ठीक से पूजा करना; हे परमेश्वर, मुझे क्षमा करें।

स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, गृह-मन्दिर में पञ्चदेव-पूजा: क्षमा-याचना

पूजा के बाद

  • भोग को प्रसाद के रूप में घर के सब लोगों में बाँटें और ख़ुद भी लें। भगवान पर चढ़ा तुलसीदल प्रसाद के साथ ग्रहण करने की रीत है।
  • चढ़े हुए फूल अगले दिन सुबह हटाएँ और उन्हें किसी गमले या बगीचे की मिट्टी में डाल दें, या खाद बना दें; कूड़े में न डालें।
  • शाम को भगवान पर लगा चंदन हल्के गीले कपड़े से पोंछ दें, भोग लगाकर आरती करें; गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश में शाम की यही रीत बताई गई है।

समय कम हो तो: छोटी विधि

  1. स्नान के बाद आसन पर बैठकर 'ॐ केशवाय नमः' आदि से आचमन करें।
  2. घी का दीपक जलाएँ और मन में संकल्प करें।
  3. 'शान्ताकारं भुजगशयनं' पढ़कर या 'ॐ नमो नारायणाय' कहकर फूल चढ़ाएँ।
  4. जल के छींटे, चंदन, फूल और तुलसीदल अर्पित करें।
  5. तुलसीदल रखकर भोग लगाएँ।
  6. 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का 11 या 108 बार जप करें।
  7. 'ॐ जय जगदीश हरे' से आरती करें।
  8. क्षमा प्रार्थना करके प्रसाद बाँटें।

परंपराओं में अंतर

  • उत्तर भारत में गुरुवार को पीले वस्त्र, पीले फूल, चने की दाल-गुड़ और केले के पेड़ की पूजा की रीत है; पूर्णिमा को सत्यनारायण कथा भी कई घरों में होती है।
  • दक्षिण भारत में विष्णु की पूजा वेंकटेश्वर, रंगनाथ और दूसरे रूपों में होती है; मार्गशीर्ष मास और वैकुंठ एकादशी वहाँ विशेष हैं, और पूजा के मंत्र-स्तोत्र भी अलग हो सकते हैं।
  • अक्षत: कुछ परंपराएँ विष्णु पूजा में अक्षत की जगह सफ़ेद तिल चढ़ाती हैं (गीताप्रेस की शालग्राम-पूजा), कई घरों में अक्षत ही चढ़ते हैं।
  • श्रीवैष्णव जैसी कुछ संप्रदाय-परंपराओं में अष्टाक्षर मंत्र दीक्षा में गुरु से मिलता है और उसके नियम होते हैं; आम घरों में 'ॐ नमो नारायणाय' नाम-स्मरण की तरह भी जपा जाता है। अपनी परंपरा के अनुसार चलें।
  • एकादशी की तारीख़: गृहस्थ (स्मार्त) और वैष्णव परंपरा में कभी-कभी एक दिन का अंतर होता है। साइट के एकादशी पन्ने पर स्मार्त तारीख़ दी गई है; अपने मंदिर या परंपरा से मिलान कर लें।

ये भी पढ़ें

भगवान विष्णु के लिए और

स्रोत और समीक्षा

  • गीताप्रेस, गोरखपुर: नित्यकर्म-पूजाप्रकाश (archive.org पर स्कैन): पाँच, दस और सोलह उपचार; आचमन के नाम; पूजा-सामग्री रखने का प्रकार; तुलसीदल के नियम; श्रीशालग्राम-पूजन के नाम-मंत्र वाक्य, तुलसी और नैवेद्य के श्लोक, आरती की रीत; पञ्चदेव-पूजा की क्षमा-याचना; 'नाम-मंत्र से या बिना मंत्र के भी पूजा' वाली बात।
  • sanskritdocuments.org: श्लोकसङ्ग्रह 1: शान्ताकारं भुजगशयनं का पाठ
  • sanskritdocuments.org: श्लोक संग्रह 2: कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा का प्रचलित रूप
  • sanskritdocuments.org: श्रीमद्भगवद्गीता: अध्याय 9, श्लोक 26 (पत्रं पुष्पं फलं तोयं)
  • dailybhakti.app: एकादशी और गुरुवार व्रत के पन्ने: एकादशी की तारीख़, पारण और गुरुवार की रीत साइट के व्रत पन्नों से मिलाई गई

समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): हर संस्कृत पंक्ति स्रोत से मिलाई गई: आचमन, स्नान, चंदन, तुलसी, धूप-दीप और नैवेद्य के वाक्य तथा क्षमा-याचना गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश (archive.org पर उपलब्ध स्कैन का OCR, दो अलग स्कैन से मिलाकर) से; शान्ताकारं श्लोकसङ्ग्रह 1 से; कायेन वाचा श्लोक संग्रह 2 से (गीताप्रेस में भागवत वाला मूल रूप है, यह अंतर नोट किया गया); गीता 9.26 sanskritdocuments की गीता से। एकादशी और गुरुवार की बातें साइट के व्रत पन्नों के अनुरूप रखी गईं। तुलसी को 'आवश्यक' गीताप्रेस में उद्धृत 'न पूजा तुलसीं विना' के आधार पर कहा गया है, साथ में विकल्प दिया है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

एकादशी को चावल क्यों नहीं खाते?

यह एकादशी व्रत की पुरानी परंपरा है: उस दिन चावल और अन्न नहीं खाए जाते, और भगवान के भोग में भी चावल नहीं रखे जाते। कई घर व्रत न रखने पर भी उस दिन चावल नहीं बनाते। व्रत कितना कड़ा हो, निर्जल, फलाहार या एक समय भोजन, यह अपनी सेहत, उम्र और हालात देखकर तय करें; बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती स्त्रियाँ और दवा लेने वाले लोग अपने स्वास्थ्य का ध्यान पहले रखें।

तुलसी का पौधा नहीं है, तो पूजा कैसे करें?

पड़ोस या मंदिर से कुछ तुलसीदल लेकर रख सकते हैं; तुलसीदल बासी नहीं माना जाता, इसलिए पिछले दिन के पत्ते भी चढ़ते हैं। बिल्कुल न मिले तो पूजा के समय मन से तुलसी अर्पित करें। भगवान भाव देखते हैं।

क्या घर में शालग्राम रखना चाहिए?

शालग्राम को साक्षात नारायण का रूप माना जाता है, इसलिए उसकी प्राण-प्रतिष्ठा नहीं होती, पर उसकी रोज़ पूजा और तुलसी अर्पण की परंपरा है, और कितने शालग्राम रखें, कौन उनकी पूजा करे, इसके भी परंपरा में नियम हैं। इसलिए शालग्राम लाने से पहले अपनी परंपरा के किसी जानकार से पूछें। चित्र या मूर्ति के सामने की गई पूजा अपने-आप में पूरी है।

क्या मासिक धर्म के दिनों में पूजा कर सकते हैं?

इस पर परिवारों और परंपराओं में अलग-अलग रीत है। कई घरों में उन दिनों मूर्ति छूना और पूजा-स्थान पर बैठना टाला जाता है, जबकि बहुत-से परिवार ऐसा कोई नियम नहीं मानते। जो भी रीत आपके घर की हो, नाम-जप, मन में प्रार्थना और भगवान का स्मरण हर दिन किया जा सकता है। इसमें डरने या अपराध-बोध की कोई बात नहीं है।

क्या बच्चे और अकेले रहने वाले लोग यह पूजा कर सकते हैं?

हाँ। यह गृहस्थ की सरल पूजा है; इसके लिए किसी दीक्षा या पुरोहित की ज़रूरत नहीं है। बच्चे दीपक, फूल और आरती से शुरू कर सकते हैं; बस दीपक और कपूर के पास किसी बड़े का होना अच्छा है।

रोज़ इतना समय नहीं मिलता, तो क्या करें?

ऊपर दिया छोटा रूप करें: दीपक जलाएँ, तुलसीदल और जल चढ़ाएँ, 11 बार नाम लें और प्रणाम करें। पाँच मिनट की नियमित पूजा कभी-कभार की लंबी पूजा से कम नहीं है। पूरी विधि गुरुवार या एकादशी को कर सकते हैं।

गुरुवार को पीला रंग क्यों?

भगवान विष्णु पीताम्बर, यानी पीला वस्त्र धारण करते हैं, और गुरुवार बृहस्पति देव का भी दिन है, जिनसे पीला रंग जुड़ा माना जाता है। इसलिए इस दिन पीले कपड़े, पीले फूल और पीली मिठाई की रीत है। पीली चीज़ें न हों तो भी पूजा पूरी है।

सुधार सुझाएँ

इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।

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