शान्ताकारं भुजगशयनं (विष्णु ध्यान श्लोक)
विष्णु · श्लोक · संस्कृत
ध्यान के समय (चरण 4)

पूजा विधि · विष्णु · रोज़ की पूजा
घर में भगवान विष्णु की सरल पूजा: तुलसी के साथ पंचोपचार, गुरुवार और एकादशी की रीत, मंत्र, आरती और क्षमा प्रार्थना, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
यह घर में भगवान विष्णु (नारायण) की रोज़ की, गुरुवार की और एकादशी की सरल पूजा है: तुलसी के साथ पंचोपचार (गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य), नाम-मंत्र, आरती और क्षमा प्रार्थना। सत्यनारायण व्रत-कथा की पूरी पूजा, वैदिक पुरुषसूक्त के मंत्रों से षोडशोपचार और शालग्राम का विधिवत पूजन यहाँ नहीं हैं; शालग्राम की पूजा के अपने नियम हैं, उसके लिए अपनी परंपरा के किसी जानकार या पुरोहित से पूछें।
भगवान विष्णु जगत के पालनहार हैं। उनकी पूजा की सबसे अपनी पहचान तुलसी है: परंपरा में विष्णु के भोग में तुलसीदल रखा जाता है, और गुरुवार व एकादशी उनकी उपासना के दिन माने जाते हैं। पीला रंग उनके पीताम्बर से जुड़ा है, इसलिए गुरुवार को पीले फूल, पीला चंदन और पीली मिठाई चढ़ाने की रीत है।
गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश कहती है कि जिसे लंबे श्लोक न आते हों, वह नाम-मंत्र से पूजा करे, और यह भी संभव न हो तो बिना मंत्र के ही जल, चंदन, फूल चढ़ाकर पूजा करे। इसलिए नीचे हर चरण का एक छोटा रूप भी दिया है। मन से की गई छोटी-सी पूजा भी पूजा है; गीता में भगवान स्वयं कहते हैं कि भक्ति से दिया गया एक पत्ता, फूल, फल या जल भी वे स्वीकार करते हैं।
| सामग्री | उपयोग | स्थिति | विकल्प / टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| भगवान विष्णु का चित्र या मूर्ति | पूजा का केंद्र, जिसके सामने बैठकर ध्यान किया जाता है | वैकल्पिक | चित्र या मूर्ति न हो तो दीपक जलाकर उसके सामने बैठें और मन में भगवान का रूप ध्यान करें; मानस पूजा भी पूरी पूजा है। |
| तुलसीदल | पुष्प के साथ चढ़ाने और नैवेद्य (भोग) पर रखने के लिए | आवश्यक | परंपरा में विष्णु की पूजा तुलसी के बिना पूरी नहीं मानी जाती (गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश)। जिस दिन तुलसी तोड़ना मना माना जाता है, उस दिन पौधे से अपने-आप गिरे पत्ते या पिछले दिन के रखे पत्ते लें; पौधा न हो तो मन से तुलसी अर्पित करें। |
| शुद्ध जल का लोटा | आचमन, स्नान कराने और अर्घ्य के लिए | वैकल्पिक | गंगाजल हो तो कुछ बूँदें मिला लें; न हो तो साफ़ जल ही काफ़ी है। |
| पीले फूल और फूलमाला | पुष्प अर्पण | वैकल्पिक | पीले फूल न मिलें तो जो भी ताज़ा, सुगंधित फूल मिले; फूल न हो तो केवल तुलसीदल। |
| चंदन (पीला चंदन या केसर मिला चंदन) | तिलक और गंध अर्पण | वैकल्पिक | रोली या हल्दी; कुछ न हो तो जल से ही तिलक का भाव। |
| सफ़ेद तिल या अक्षत | पूजा में चढ़ाने के लिए | परंपरा-विशेष | गीताप्रेस की शालग्राम-पूजा में अक्षत के स्थान पर सफ़ेद तिल चढ़ाए जाते हैं; बहुत-से घरों में अक्षत भी चढ़ाए जाते हैं। अपनी पारिवारिक रीत मानें। |
| घी का दीपक | दीप दर्शन और आरती | वैकल्पिक | घी न हो तो तिल के तेल का दीपक। |
| धूप या अगरबत्ती | धूप अर्पण | वैकल्पिक | न हो तो यह उपचार मन से अर्पित करें। |
| नैवेद्य (भोग) | भगवान को भोग लगाने के लिए | वैकल्पिक | केला या कोई भी फल, मिश्री, गुड़; कुछ न हो तो तुलसीदल डला जल ही भोग है। |
| शंख और घंटी | पूजा के आरंभ और आरती में | परंपरा-विशेष | विष्णु शंख धारण करते हैं, इसलिए कई घरों में उनकी पूजा में शंख रखा जाता है; न हो तो केवल घंटी, और वह भी न हो तो कोई बात नहीं। |
| पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) | धातु की मूर्ति के स्नान और प्रसाद के लिए | वैकल्पिक | रोज़ की पूजा में शुद्ध जल ही काफ़ी है; चित्र पर केवल जल के छींटे दें। |
| पीला वस्त्र या आसन | चौकी पर बिछाने और बैठने के लिए | परंपरा-विशेष | गुरुवार की रीत है; कोई भी साफ़ कपड़ा या आसन चलेगा। |
संकल्प का अर्थ है पूजा से पहले मन में साफ़ निश्चय करना कि मैं कौन हूँ, किसकी पूजा कर रहा हूँ और किस भाव से। दाहिने हाथ में थोड़ा जल, फूल और तुलसीदल लेकर संकल्प बोलें और जल को थाली में छोड़ दें।
हे नारायण, आज (दिन का नाम) को मैं (अपना नाम) अपने परिवार के साथ आपकी प्रसन्नता के लिए यह पूजा कर रहा/रही हूँ। मुझसे जैसी बन पड़े, वैसी इस सेवा को स्वीकार करें।
विस्तृत संस्कृत संकल्प में संवत्, मास, तिथि, स्थान और गोत्र बोले जाते हैं; किसी विशेष अनुष्ठान में यह पुरोहित करवाते हैं। रोज़ की पूजा में अपनी भाषा में किया गया यह संकल्प काफ़ी है।
ॐ केशवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः। ॐ माधवाय नमः।
अर्थ: भगवान के तीन नामों, केशव, नारायण और माधव, को नमस्कार।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: आचमन की विधि
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
अर्थ: जिनका रूप शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर लेटे हैं, जिनकी नाभि में कमल है और जो देवताओं के स्वामी हैं; जो सारे जगत के आधार हैं, आकाश की तरह अनंत हैं, बादल जैसे साँवले और सुंदर अंगों वाले हैं; जो लक्ष्मी के पति हैं, कमल जैसे नेत्रों वाले हैं और योगी जिन्हें ध्यान से पाते हैं; संसार का भय हरने वाले, सब लोकों के एकमात्र स्वामी उन विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।
ॐ श्रीमन्नारायणाय नमः। स्नानीयं जलं समर्पयामि।
अर्थ: श्रीमन्नारायण को नमस्कार; मैं स्नान के लिए जल अर्पित करता हूँ।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीशालग्राम-पूजन: नाम-मंत्र के साथ स्नान का वाक्य
ॐ श्रीमन्नारायणाय नमः। चन्दनं समर्पयामि।
अर्थ: श्रीमन्नारायण को नमस्कार; मैं चंदन अर्पित करता हूँ।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीशालग्राम-पूजन
तुलसीं हेमरूपां च रत्नरूपां च मञ्जरीम्।
भवमोक्षप्रदां तुभ्यमर्पयामि हरिप्रियाम्॥
अर्थ: सोने जैसी तुलसी और रत्न जैसी उसकी मंजरी, जो हरि को प्रिय है, मैं आपको अर्पित करता हूँ।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीशालग्राम-पूजन: तुलसीपत्र अर्पण
ॐ श्रीमन्नारायणाय नमः। धूपमाघ्रापयामि।
ॐ श्रीमन्नारायणाय नमः। दीपं दर्शयामि।
अर्थ: श्रीमन्नारायण को नमस्कार; मैं धूप की सुगंध अर्पित करता हूँ। श्रीमन्नारायण को नमस्कार; मैं दीपक दिखाता हूँ।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीशालग्राम-पूजन
त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।
गृहाण सुमुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर॥
अर्थ: हे गोविंद, यह वस्तु आपकी ही है, आपको ही अर्पित करता हूँ। प्रसन्न मुख से इसे ग्रहण करें; हे परमेश्वर, प्रसन्न हों।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीशालग्राम-पूजन: नैवेद्य
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥
अर्थ: जो भक्त प्रेम से मुझे एक पत्ता, फूल, फल या जल अर्पित करता है, शुद्ध मन वाले उस भक्त का प्रेम से दिया वह उपहार मैं ग्रहण करता हूँ।
स्रोत: श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 9, श्लोक 26
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा
बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात्।
करोमि यद्यद् सकलं परस्मै
नारायणायेति समर्पयामि॥
अर्थ: शरीर से, वाणी से, मन से, इंद्रियों से, बुद्धि से या अपने स्वभाव से मैं जो कुछ भी करता हूँ, वह सब परमात्मा नारायण को अर्पित करता हूँ।
स्रोत: sanskritdocuments.org, श्लोक संग्रह 2 (प्रचलित रूप; श्रीमद्भागवत 11.2.36 का मूल पाठ थोड़ा अलग है, जो गीताप्रेस की शालग्राम-पूजा में दिया है)
विष्णु · श्लोक · संस्कृत
ध्यान के समय (चरण 4)
विष्णु, कृष्ण · अष्टकम् · संस्कृत
स्तुति और पाठ के समय (चरण 11)
विष्णु · आरती
आरती (चरण 12)
हर भोग पर तुलसीदल रखें; परंपरा में विष्णु का भोग तुलसी के साथ ही लगता है। एकादशी को भोग में चावल नहीं रखे जाते; उस दिन फल, मेवे, दूध से बनी चीज़ें या फलाहार की चीज़ें रखें। जो घर में साफ़-सफ़ाई और प्रेम से बना हो, वही अच्छा भोग है।
हे नारायण, आज की इस पूजा में जो कमी रह गई हो, उसे क्षमा करें। मेरे घर-परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें और मुझे हर दिन आपको याद करने की बुद्धि दें।
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
अर्थ: हे जनार्दन, मेरी पूजा में मंत्र की, विधि की या भक्ति की जो कमी रही हो, उसके बावजूद मैंने जो पूजा की है, उसे पूरा मान लें। मैं न आपको बुलाना जानता हूँ, न विदा करना, न ठीक से पूजा करना; हे परमेश्वर, मुझे क्षमा करें।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, गृह-मन्दिर में पञ्चदेव-पूजा: क्षमा-याचना
नरसिंह · स्तोत्र · संस्कृत
श्रीमत्पयोनिधिनिकेतनचक्रपाणे
वेंकटेश्वर · स्तोत्र · संस्कृत
कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वा सन्ध्या प्रवर्तते
समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): हर संस्कृत पंक्ति स्रोत से मिलाई गई: आचमन, स्नान, चंदन, तुलसी, धूप-दीप और नैवेद्य के वाक्य तथा क्षमा-याचना गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश (archive.org पर उपलब्ध स्कैन का OCR, दो अलग स्कैन से मिलाकर) से; शान्ताकारं श्लोकसङ्ग्रह 1 से; कायेन वाचा श्लोक संग्रह 2 से (गीताप्रेस में भागवत वाला मूल रूप है, यह अंतर नोट किया गया); गीता 9.26 sanskritdocuments की गीता से। एकादशी और गुरुवार की बातें साइट के व्रत पन्नों के अनुरूप रखी गईं। तुलसी को 'आवश्यक' गीताप्रेस में उद्धृत 'न पूजा तुलसीं विना' के आधार पर कहा गया है, साथ में विकल्प दिया है।
यह एकादशी व्रत की पुरानी परंपरा है: उस दिन चावल और अन्न नहीं खाए जाते, और भगवान के भोग में भी चावल नहीं रखे जाते। कई घर व्रत न रखने पर भी उस दिन चावल नहीं बनाते। व्रत कितना कड़ा हो, निर्जल, फलाहार या एक समय भोजन, यह अपनी सेहत, उम्र और हालात देखकर तय करें; बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती स्त्रियाँ और दवा लेने वाले लोग अपने स्वास्थ्य का ध्यान पहले रखें।
पड़ोस या मंदिर से कुछ तुलसीदल लेकर रख सकते हैं; तुलसीदल बासी नहीं माना जाता, इसलिए पिछले दिन के पत्ते भी चढ़ते हैं। बिल्कुल न मिले तो पूजा के समय मन से तुलसी अर्पित करें। भगवान भाव देखते हैं।
शालग्राम को साक्षात नारायण का रूप माना जाता है, इसलिए उसकी प्राण-प्रतिष्ठा नहीं होती, पर उसकी रोज़ पूजा और तुलसी अर्पण की परंपरा है, और कितने शालग्राम रखें, कौन उनकी पूजा करे, इसके भी परंपरा में नियम हैं। इसलिए शालग्राम लाने से पहले अपनी परंपरा के किसी जानकार से पूछें। चित्र या मूर्ति के सामने की गई पूजा अपने-आप में पूरी है।
इस पर परिवारों और परंपराओं में अलग-अलग रीत है। कई घरों में उन दिनों मूर्ति छूना और पूजा-स्थान पर बैठना टाला जाता है, जबकि बहुत-से परिवार ऐसा कोई नियम नहीं मानते। जो भी रीत आपके घर की हो, नाम-जप, मन में प्रार्थना और भगवान का स्मरण हर दिन किया जा सकता है। इसमें डरने या अपराध-बोध की कोई बात नहीं है।
हाँ। यह गृहस्थ की सरल पूजा है; इसके लिए किसी दीक्षा या पुरोहित की ज़रूरत नहीं है। बच्चे दीपक, फूल और आरती से शुरू कर सकते हैं; बस दीपक और कपूर के पास किसी बड़े का होना अच्छा है।
ऊपर दिया छोटा रूप करें: दीपक जलाएँ, तुलसीदल और जल चढ़ाएँ, 11 बार नाम लें और प्रणाम करें। पाँच मिनट की नियमित पूजा कभी-कभार की लंबी पूजा से कम नहीं है। पूरी विधि गुरुवार या एकादशी को कर सकते हैं।
भगवान विष्णु पीताम्बर, यानी पीला वस्त्र धारण करते हैं, और गुरुवार बृहस्पति देव का भी दिन है, जिनसे पीला रंग जुड़ा माना जाता है। इसलिए इस दिन पीले कपड़े, पीले फूल और पीली मिठाई की रीत है। पीली चीज़ें न हों तो भी पूजा पूरी है।
इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।