वेंकटेश्वर

स्तोत्र · वेंकटेश्वर · स्तोत्र

श्री वेंकटेश सुप्रभातम्

"कौसल्या सुप्रजा राम" से शुरू होने वाला, तिरुमला के भगवान वेंकटेश्वर को भोर में जगाने का स्तोत्र। सुप्रभात भाग के 29 श्लोक, अर्थ सहित।

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कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वा सन्ध्या प्रवर्तते ।उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्तव्यं दैवमाह्निकम् ॥१॥

kausalyā suprajā rāma pūrvā sandhyā pravartate |
uttiṣṭha naraśārdūla kartavyaṃ daivamāhnikam ||

अर्थ: हे कौसल्या के सुपुत्र राम! पूर्व दिशा में भोर की संध्या हो रही है। हे नरश्रेष्ठ, उठिए; दिन के देव-कार्य करने हैं।

सुप्रजा
उत्तम संतान, सुपुत्र
पूर्वा सन्ध्या
पूर्व की संध्या, भोर
प्रवर्तते
हो रही है
नरशार्दूल
मनुष्यों में सिंह, नरश्रेष्ठ
आह्निकम्
दिन का नित्य कर्म

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द उत्तिष्ठ गरुडध्वज ।उत्तिष्ठ कमलाकान्त त्रैलोक्यं मङ्गलं कुरु ॥२॥

uttiṣṭhottiṣṭha govinda uttiṣṭha garuḍadhvaja |
uttiṣṭha kamalākānta trailokyaṃ maṅgalaṃ kuru ||

अर्थ: उठिए, उठिए हे गोविन्द! उठिए हे गरुड़ध्वज! उठिए हे लक्ष्मीपति, और तीनों लोकों का मंगल कीजिए।

उत्तिष्ठ
उठिए
गरुडध्वज
जिनके ध्वज पर गरुड़ है
कमलाकान्त
लक्ष्मी (कमला) के पति
त्रैलोक्यं
तीनों लोक

मातस्समस्तजगतां मधुकैटभारेःवक्षोविहारिणि मनोहरदिव्यमूर्ते ।श्रीस्वामिनि श्रितजन प्रियदानशीलेश्रीवेङ्कटेशदयिते तव सुप्रभातम् ॥३॥

mātassamastajagatāṃ madhukaiṭabhāreḥ
vakṣovihāriṇi manoharadivyamūrte |
śrīsvāmini śritajana priyadānaśīle
śrīveṅkaṭeśadayite tava suprabhātam ||

अर्थ: हे समस्त जगत की माता, मधु-कैटभ के शत्रु (विष्णु) के वक्ष पर निवास करने वाली, मनोहर दिव्य मूर्ति वाली, हे स्वामिनी, शरण में आए लोगों को उनकी प्रिय वस्तु देने के स्वभाव वाली, हे श्री वेंकटेश की प्रिया लक्ष्मी, आपका सुप्रभात हो।

मधुकैटभारेः
मधु-कैटभ के शत्रु (विष्णु) के
वक्षोविहारिणि
वक्ष पर निवास करने वाली
श्रितजन
शरण में आए लोग
प्रियदानशीले
प्रिय वस्तु देने के स्वभाव वाली
दयिते
हे प्रिया

तव सुप्रभातमरविन्दलोचनेभवतु प्रसन्नमुखचन्द्रमण्डले ।विधिशङ्करेन्द्रवनिताभिरर्चितेवृषशैलनाथदयिते दयानिधे ॥४॥

tava suprabhātamaravindalocane
bhavatu prasannamukhacandramaṇḍale |
vidhiśaṅkarendravanitābhirarcite
vṛṣaśailanāthadayite dayānidhe ||

अर्थ: हे कमल-नयनी, हे प्रसन्न चंद्र-मुख वाली, आपका सुप्रभात हो। हे ब्रह्मा, शंकर और इन्द्र की पत्नियों से पूजित, वृषशैल (तिरुमला) के स्वामी की प्रिया, हे दया की निधि (आपका सुप्रभात हो)।

अरविन्दलोचने
हे कमल-नयनी
मुखचन्द्रमण्डले
चंद्रमा जैसे मुख वाली
विधि
ब्रह्मा
वनिताभिः
पत्नियों द्वारा
वृषशैल
वृषभाद्रि, तिरुमला
दयानिधे
हे दया की निधि

अत्र्यादि सप्तऋषयस्समुपास्य सन्ध्यांआकाशसिन्धुकमलानि मनोहराणि ।आदाय पादयुगमर्चयितुं प्रपन्नाःशेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम् ॥५॥

atryādi saptaṛṣayassamupāsya sandhyāṃ
ākāśasindhukamalāni manoharāṇi |
ādāya pādayugamarcayituṃ prapannāḥ
śeṣādriśekharavibho tava suprabhātam ||

अर्थ: अत्रि आदि सप्तर्षि संध्या-वंदन करके, आकाश-गंगा के मनोहर कमल लेकर आपके दोनों चरणों की पूजा करने आए हैं। हे शेषाद्रि के शिखर पर विराजने वाले प्रभु, आपका सुप्रभात हो।

सप्तऋषयः
सात ऋषि
समुपास्य सन्ध्यां
संध्या-वंदन करके
आकाशसिन्धु
आकाश-गंगा
आदाय
लेकर
प्रपन्नाः
आए हैं
शेषाद्रिशेखर
शेषाद्रि के शिखर पर विराजने वाले

पञ्चाननाब्जभवषण्मुखवासवाद्याःत्रैविक्रमादिचरितं विबुधाः स्तुवन्ति ।भाषापतिः पठति वासरशुद्धिमारात्शेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम् ॥६॥

pañcānanābjabhavaṣaṇmukhavāsavādyāḥ
traivikramādicaritaṃ vibudhāḥ stuvanti |
bhāṣāpatiḥ paṭhati vāsaraśuddhimārāt
śeṣādriśekharavibho tava suprabhātam ||

अर्थ: पाँच मुख वाले शिव, कमल से जन्मे ब्रह्मा, छह मुख वाले कार्तिकेय, इन्द्र आदि देवता आपके त्रिविक्रम (वामन) आदि चरित्रों की स्तुति कर रहे हैं, और वाणी के स्वामी बृहस्पति पास ही दिन की शुद्धि (आज का पंचांग) पढ़ रहे हैं। हे शेषाद्रिशेखर प्रभु, आपका सुप्रभात हो।

पञ्चानन
पाँच मुख वाले शिव
अब्जभव
कमल से जन्मे ब्रह्मा
षण्मुख
छह मुख वाले कार्तिकेय
वासव
इन्द्र
त्रैविक्रम
त्रिविक्रम (वामन) की लीला
भाषापतिः
वाणी के स्वामी, बृहस्पति
वासरशुद्धिम्
दिन की शुद्धि, पंचांग

ईषत्प्रफुल्लसरसीरुहनारिकेल-पूगद्रुमादि सुमनोहरपालिकानाम् ।आवाति मन्दमनिलस्सह दिव्यगन्धैःशेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम् ॥७॥

īṣatpraphullasarasīruhanārikela-
pūgadrumādi sumanoharapālikānām |
āvāti mandamanilassaha divyagandhaiḥ
śeṣādriśekharavibho tava suprabhātam ||

अर्थ: थोड़े-थोड़े खिले कमलों, नारियल और सुपारी के पेड़ों वाली सुंदर क्यारियों की दिव्य सुगंध लेकर मंद पवन बह रहा है। हे शेषाद्रिशेखर प्रभु, आपका सुप्रभात हो।

ईषत्प्रफुल्ल
थोड़ा खिला हुआ
सरसीरुह
कमल
नारिकेल
नारियल
पूगद्रुम
सुपारी का पेड़
पालिका
क्यारी, पंक्ति
अनिलः
पवन

उन्मील्य नेत्रयुगमुत्तमपञ्जरस्थाःपात्रावशिष्टकदलीफलपायसानि ।भुक्त्वा सलीलमथ केलिशुकाः पठन्तिशेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम् ॥८॥

unmīlya netrayugamuttamapañjarasthāḥ
pātrāvaśiṣṭakadalīphalapāyasāni |
bhuktvā salīlamatha keliśukāḥ paṭhanti
śeṣādriśekharavibho tava suprabhātam ||

अर्थ: सुंदर पिंजरों में रहने वाले पालतू तोते आँखें खोलकर, कटोरों में बचे केले और खीर को खेल-खेल में खाकर अब (आपका नाम) बोल रहे हैं। हे शेषाद्रिशेखर प्रभु, आपका सुप्रभात हो।

उन्मील्य
खोलकर
पञ्जरस्थाः
पिंजरे में रहने वाले
पात्रावशिष्ट
पात्र में बचा हुआ
कदलीफल
केला
पायस
खीर
केलिशुकाः
पालतू तोते

तन्त्रीप्रकर्षमधुरस्वनया विपञ्च्यागायत्यनन्तचरितं तव नारदोऽपि ।भाषासमग्रमसकृत्करचाररम्यंशेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम् ॥९॥

tantrīprakarṣamadhurasvanayā vipañcyā
gāyatyanantacaritaṃ tava nārado’pi |
bhāṣāsamagramasakṛtkaracāraramyaṃ
śeṣādriśekharavibho tava suprabhātam ||

अर्थ: तारों को कुशलता से छेड़ने पर मधुर स्वर देने वाली वीणा पर नारद जी भी हाथ की सुंदर गति के साथ, पूरी सुंदर भाषा में बार-बार आपके अनन्त चरित्र गा रहे हैं। हे शेषाद्रिशेखर प्रभु, आपका सुप्रभात हो।

तन्त्री
वीणा का तार
प्रकर्ष
उत्तमता, खिंचाव
विपञ्च्या
वीणा से
असकृत्
बार-बार
करचार
हाथ की गति

भृङ्गावली च मकरन्दरसानुविद्ध-झङ्कारगीतनिनदैः सह सेवनाय ।निर्यात्युपान्तसरसीकमलोदरेभ्यःशेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम् ॥१०॥

bhṛṅgāvalī ca makarandarasānuviddha-
jhaṅkāragītaninadaiḥ saha sevanāya |
niryātyupāntasarasīkamalodarebhyaḥ
śeṣādriśekharavibho tava suprabhātam ||

अर्थ: फूलों के रस में डूबे भौंरों की पंक्तियाँ गुंजन-गीत की ध्वनि के साथ आपकी सेवा के लिए पास के सरोवरों के कमलों के भीतर से निकल रही हैं। हे शेषाद्रिशेखर प्रभु, आपका सुप्रभात हो।

भृङ्गावली
भौंरों की पंक्ति
मकरन्द
फूलों का रस
झङ्कार
गुंजन
निर्याति
निकलती है
उपान्त
पास का
कमलोदर
कमल का भीतरी भाग

योषागणेन वरदध्नि विमथ्यमानेघोषालयेषु दधिमन्थनतीव्रघोषाः ।रोषात्कलिं विदधते ककुभश्च कुम्भाःशेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम् ॥११॥

yoṣāgaṇena varadadhni vimathyamāne
ghoṣālayeṣu dadhimanthanatīvraghoṣāḥ |
roṣātkaliṃ vidadhate kakubhaśca kumbhāḥ
śeṣādriśekharavibho tava suprabhātam ||

अर्थ: ग्वालों की बस्तियों में स्त्रियाँ उत्तम दही मथ रही हैं; मथने की तेज़ आवाज़ से मानो मटके और दिशाएँ (गूँज में) आपस में होड़ करके झगड़ रहे हैं। हे शेषाद्रिशेखर प्रभु, आपका सुप्रभात हो।

योषागण
स्त्रियों का समूह
वरदध्नि
उत्तम दही में
घोषालय
ग्वालों की बस्ती
दधिमन्थन
दही मथना
ककुभः
दिशाएँ
कुम्भाः
मटके

पद्मेशमित्रशतपत्रगतालिवर्गाःहर्तुं श्रियं कुवलयस्य निजाङ्गलक्ष्म्या ।भेरीनिनादमिव बिभ्रति तीव्रनादंशेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम् ॥१२॥

padmeśamitraśatapatragatālivargāḥ
hartuṃ śriyaṃ kuvalayasya nijāṅgalakṣmyā |
bherīninādamiva bibhrati tīvranādaṃ
śeṣādriśekharavibho tava suprabhātam ||

अर्थ: सूर्य के मित्र कमलों पर बैठे भौंरों के झुंड, मानो अपने (श्याम) अंगों की शोभा से नील कमल की शोभा छीनने के लिए, नगाड़े जैसी तेज़ आवाज़ कर रहे हैं। हे शेषाद्रिशेखर प्रभु, आपका सुप्रभात हो।

पद्मेशमित्र
कमलों के स्वामी (सूर्य) के मित्र
शतपत्र
कमल
अलिवर्गाः
भौंरों के झुंड
कुवलय
नील कमल
भेरी
नगाड़ा

श्रीमन्नभीष्टवरदाखिललोकबन्धोश्रीश्रीनिवास जगदेकदयैकसिन्धो ।श्रीदेवतागृहभुजान्तर दिव्यमूर्तेश्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥१३॥

śrīmannabhīṣṭavaradākhilalokabandho
śrīśrīnivāsa jagadekadayaikasindho |
śrīdevatāgṛhabhujāntara divyamūrte
śrīveṅkaṭācalapate tava suprabhātam ||

अर्थ: हे श्रीमान, मनचाहा वर देने वाले, सब लोकों के बंधु, हे श्रीनिवास, जगत में दया के अकेले सागर, जिनकी छाती लक्ष्मी देवी का घर है, ऐसी दिव्य मूर्ति वाले हे वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।

अभीष्टवरद
मनचाहा वर देने वाले
अखिललोकबन्धो
हे सब लोकों के बंधु
श्रीनिवास
लक्ष्मी के निवास
दयैकसिन्धो
हे दया के एकमात्र सागर
भुजान्तर
छाती, वक्ष
वेङ्कटाचलपते
हे वेंकट पर्वत के स्वामी

श्रीस्वामिपुष्करिणिकाऽऽप्लवनिर्मलाङ्गाःश्रेयोऽर्थिनो हरविरिञ्चिसनन्दनाद्याः ।द्वारे वसन्ति वरवेत्रहतोत्तमाङ्गाःश्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥१४॥

śrīsvāmipuṣkariṇikā’’plavanirmalāṅgāḥ
śreyo’rthino haraviriñcisanandanādyāḥ |
dvāre vasanti varavetrahatottamāṅgāḥ
śrīveṅkaṭācalapate tava suprabhātam ||

अर्थ: स्वामी पुष्करिणी में स्नान से निर्मल अंगों वाले शिव, ब्रह्मा, सनन्दन आदि कल्याण चाहने वाले आपके द्वार पर खड़े हैं, और (भीड़ में) द्वारपालों की छड़ी उनके सिरों को छू जाती है। हे वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।

स्वामिपुष्करिणी
तिरुमला का पवित्र सरोवर
आप्लव
स्नान
श्रेयोऽर्थिनः
कल्याण चाहने वाले
विरिञ्चि
ब्रह्मा
वेत्र
छड़ी
उत्तमाङ्ग
सिर

श्रीशेषशैलगरुडाचलवेङ्कटाद्रिनारायणाद्रिवृषभाद्रिवृषाद्रिमुख्याम् ।आख्यां त्वदीयवसतेरनिशं वदन्तिश्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥१५॥

śrīśeṣaśailagaruḍācalaveṅkaṭādri
nārāyaṇādrivṛṣabhādrivṛṣādrimukhyām |
ākhyāṃ tvadīyavasateraniśaṃ vadanti
śrīveṅkaṭācalapate tava suprabhātam ||

अर्थ: लोग आपके निवास-पर्वत को शेषशैल, गरुडाचल, वेंकटाद्रि, नारायणाद्रि, वृषभाद्रि, वृषाद्रि जैसे नामों से निरंतर पुकारते हैं। हे वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।

शैल, अचल, अद्रि
पर्वत
आख्यां
नाम
त्वदीयवसतेः
आपके निवास का
अनिशं
निरंतर
वदन्ति
कहते हैं

सेवापराः शिवसुरेशकृशानुधर्म-रक्षोऽम्बुनाथपवमानधनाधिनाथाः ।बद्धाञ्जलिप्रविलसन्निजशीर्षदेशाःश्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥१६॥

sevāparāḥ śivasureśakṛśānudharma-
rakṣo’mbunāthapavamānadhanādhināthāḥ |
baddhāñjalipravilasannijaśīrṣadeśāḥ
śrīveṅkaṭācalapate tava suprabhātam ||

अर्थ: शिव, इन्द्र, अग्नि, धर्मराज (यम), निर्ऋति, वरुण, वायु और कुबेर, ये सब दिक्पाल जुड़े हाथ सिर पर रखे आपकी सेवा में तत्पर हैं। हे वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।

सेवापराः
सेवा में लगे
कृशानु
अग्नि
रक्षः
निर्ऋति (राक्षसों के स्वामी दिक्पाल)
अम्बुनाथ
जल के स्वामी, वरुण
पवमान
वायु
धनाधिनाथ
धन के स्वामी, कुबेर
बद्धाञ्जलि
जुड़े हुए हाथ

धाटीषु ते विहगराजमृगाधिराज-नागाधिराजगजराजहयाधिराजाः ।स्वस्वाधिकारमहिमाधिकमर्थयन्तेश्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥१७॥

dhāṭīṣu te vihagarājamṛgādhirāja-
nāgādhirājagajarājahayādhirājāḥ |
svasvādhikāramahimādhikamarthayante
śrīveṅkaṭācalapate tava suprabhātam ||

अर्थ: आपकी (उत्सव की) सवारियों में पक्षीराज गरुड़, पशुराज सिंह, नागराज, गजराज और अश्वराज (वाहन बनकर) अपने-अपने अधिकार की महिमा और बढ़ाने की प्रार्थना करते हैं। हे वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।

धाटीषु
यात्राओं, सवारियों में
विहगराज
पक्षियों के राजा, गरुड़
मृगाधिराज
पशुओं के राजा, सिंह
हय
घोड़ा
अर्थयन्ते
प्रार्थना करते हैं

सूर्येन्दुभौमबुधवाक्पतिकाव्यसौरि-स्वर्भानुकेतुदिविषत्परिषत्प्रधानाः ।त्वद्दासदासचरमावधिदासदासाःश्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥१८॥

sūryendubhaumabudhavākpatikāvyasauri-
svarbhānuketudiviṣatpariṣatpradhānāḥ |
tvaddāsadāsacaramāvadhidāsadāsāḥ
śrīveṅkaṭācalapate tava suprabhātam ||

अर्थ: सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु, देवताओं की सभा के ये प्रमुख (नवग्रह) आपके दासों के दासों की अंतिम कड़ी तक के दास हैं। हे वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।

भौम
मंगल
वाक्पति
बृहस्पति
काव्य
शुक्र
सौरि
शनि
स्वर्भानु
राहु
दिविषत्परिषत्
देवताओं की सभा
चरमावधि
अंतिम सीमा

त्वत्पादधूलिभरितस्फुरितोत्तमाङ्गाःस्वर्गापवर्गनिरपेक्षनिजान्तरङ्गाः ।कल्पागमाकलनयाऽऽकुलतां लभन्तेश्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥१९॥

tvatpādadhūlibharitasphuritottamāṅgāḥ
svargāpavarganirapekṣanijāntaraṅgāḥ |
kalpāgamākalanayā’’kulatāṃ labhante
śrīveṅkaṭācalapate tava suprabhātam ||

अर्थ: आपके चरणों की धूल से भरे, चमकते मस्तक वाले, जिनका मन स्वर्ग और मोक्ष की भी परवाह नहीं करता, ऐसे भक्त कल्प के अंत के आने की सोचकर व्याकुल होते हैं (कि कहीं यह सेवा छूट न जाए)। हे वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।

पादधूलि
चरणों की धूल
स्वर्गापवर्ग
स्वर्ग और मोक्ष
निरपेक्ष
परवाह न करने वाले
अन्तरङ्ग
मन
कल्पागम
कल्प (युग-चक्र) के अंत का आना
आकुलताम्
व्याकुलता

त्वद्गोपुराग्रशिखराणि निरीक्षमाणाःस्वर्गापवर्गपदवीं परमां श्रयन्तः ।मर्त्या मनुष्यभुवने मतिमाश्रयन्तेश्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥२०॥

tvadgopurāgraśikharāṇi nirīkṣamāṇāḥ
svargāpavargapadavīṃ paramāṃ śrayantaḥ |
martyā manuṣyabhuvane matimāśrayante
śrīveṅkaṭācalapate tava suprabhātam ||

अर्थ: आपके गोपुर के ऊँचे शिखरों के दर्शन करते हुए लोग, स्वर्ग और मोक्ष के परम मार्ग पर होते हुए भी, (फिर) मनुष्य-लोक में ही रहने का मन बनाते हैं (ताकि दर्शन होते रहें)। हे वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।

गोपुर
मंदिर का ऊँचा द्वार-शिखर
निरीक्षमाणाः
देखते हुए
पदवीं
मार्ग, स्थान
श्रयन्तः
आश्रय लेते हुए
मर्त्याः
मनुष्य
मतिम् आश्रयन्ते
मन बनाते हैं

श्रीभूमिनायक दयादिगुणामृताब्धेदेवाधिदेव जगदेकशरण्यमूर्ते ।श्रीमन्ननन्तगरुडादिभिरर्चिताङ्घ्रेश्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥२१॥

śrībhūmināyaka dayādiguṇāmṛtābdhe
devādhideva jagadekaśaraṇyamūrte |
śrīmannanantagaruḍādibhirarcitāṅghre
śrīveṅkaṭācalapate tava suprabhātam ||

अर्थ: हे श्रीदेवी और भूदेवी के स्वामी, दया आदि गुणों के अमृत-सागर, देवों के देव, जगत की एकमात्र शरण, जिनके चरण श्रीमान अनन्त (शेष) और गरुड़ आदि पूजते हैं, हे वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।

श्रीभूमिनायक
श्रीदेवी और भूदेवी के स्वामी
गुणामृताब्धे
गुणों के अमृत-सागर
देवाधिदेव
देवताओं के भी देव
शरण्य
शरण देने वाले
अर्चिताङ्घ्रे
जिनके चरण पूजे जाते हैं

श्रीपद्मनाभ पुरुषोत्तम वासुदेववैकुण्ठ माधव जनार्दन चक्रपाणे ।श्रीवत्सचिह्न शरणागतपारिजातश्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥२२॥

śrīpadmanābha puruṣottama vāsudeva
vaikuṇṭha mādhava janārdana cakrapāṇe |
śrīvatsacihna śaraṇāgatapārijāta
śrīveṅkaṭācalapate tava suprabhātam ||

अर्थ: हे श्री पद्मनाभ, हे पुरुषोत्तम, हे वासुदेव, हे वैकुण्ठनाथ, हे माधव, हे जनार्दन, हे चक्रधारी, हे श्रीवत्स-चिह्न वाले, शरणागतों के लिए कल्पवृक्ष, हे वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।

पद्मनाभ
जिनकी नाभि में कमल है
पुरुषोत्तम
पुरुषों में उत्तम
चक्रपाणे
हे हाथ में चक्र वाले
श्रीवत्स
वक्ष पर एक पवित्र चिह्न
पारिजात
इच्छा पूरी करने वाला वृक्ष

कन्दर्पदर्पहरसुन्दरदिव्यमूर्तेकान्ताकुचाम्बुरुहकुड्मललोलदृष्टे ।कल्याणनिर्मलगुणाकरदिव्यकीर्तेश्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥२३॥

kandarpadarpaharasundaradivyamūrte
kāntākucāmburuhakuḍmalaloladṛṣṭe |
kalyāṇanirmalaguṇākaradivyakīrte
śrīveṅkaṭācalapate tava suprabhātam ||

अर्थ: हे कामदेव का घमंड तोड़ने वाली सुंदर दिव्य मूर्ति वाले, जिनकी चंचल दृष्टि प्रिया लक्ष्मी के कमल-कली जैसे सौंदर्य पर टिकी रहती है, हे कल्याणकारी निर्मल गुणों की खान, दिव्य कीर्ति वाले वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।

कन्दर्प
कामदेव
दर्पहर
घमंड हरने वाले
कान्ता
प्रिया
कुड्मल
कली
लोलदृष्टे
चंचल दृष्टि वाले
गुणाकर
गुणों की खान

मीनाकृते कमठकोलनृसिंहवर्णिन्स्वामिन् परश्वधतपोधन रामचन्द्र ।शेषांशराम यदुनन्दन कल्किरूपश्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥२४॥

mīnākṛte kamaṭhakolanṛsiṃhavarṇin
svāmin paraśvadhatapodhana rāmacandra |
śeṣāṃśarāma yadunandana kalkirūpa
śrīveṅkaṭācalapate tava suprabhātam ||

अर्थ: हे मत्स्य रूप वाले, हे कच्छप, वराह, नृसिंह और वामन (ब्रह्मचारी) रूप वाले स्वामी, हे फरसाधारी तपस्वी (परशुराम), हे रामचन्द्र, हे शेष के अंश बलराम, हे यदुनंदन कृष्ण, हे कल्कि रूप वाले वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।

मीनाकृते
हे मछली के रूप वाले
कमठ
कछुआ
कोल
वराह
वर्णिन्
हे ब्रह्मचारी (वामन)
परश्वध
फरसा
शेषांशराम
शेषनाग के अंश बलराम

एलालवङ्गघनसारसुगन्धितीर्थंदिव्यं वियत्सरिति हेमघटेषु पूर्णम् ।धृत्वाऽऽद्य वैदिकशिखामणयः प्रहृष्टाःतिष्ठन्ति वेङ्कटपते तव सुप्रभातम् ॥२५॥

elālavaṅgaghanasārasugandhitīrthaṃ
divyaṃ viyatsariti hemaghaṭeṣu pūrṇam |
dhṛtvā’’dya vaidikaśikhāmaṇayaḥ prahṛṣṭāḥ
tiṣṭhanti veṅkaṭapate tava suprabhātam ||

अर्थ: इलायची, लौंग और कपूर से सुगंधित, आकाश-गंगा का दिव्य जल सोने के घड़ों में भरकर वेद जानने वालों में श्रेष्ठ (पुजारी) आज प्रसन्न होकर (आपके अभिषेक के लिए) खड़े हैं। हे वेंकटपति, आपका सुप्रभात हो।

एला
इलायची
लवङ्ग
लौंग
घनसार
कपूर
तीर्थं
पवित्र जल
वियत्सरित्
आकाश की नदी, आकाश-गंगा
हेमघट
सोने का घड़ा
वैदिकशिखामणयः
वेदज्ञों में श्रेष्ठ

भास्वानुदेति विकचानि सरोरुहाणिसम्पूरयन्ति निनदैः ककुभो विहङ्गाः ।श्रीवैष्णवास्सततमर्थितमङ्गलास्तेधामाश्रयन्ति तव वेङ्कट सुप्रभातम् ॥२६॥

bhāsvānudeti vikacāni saroruhāṇi
sampūrayanti ninadaiḥ kakubho vihaṅgāḥ |
śrīvaiṣṇavāssatatamarthitamaṅgalāste
dhāmāśrayanti tava veṅkaṭa suprabhātam ||

अर्थ: सूर्य उदय हो रहा है, कमल खिल गए हैं, पक्षी अपनी चहचहाहट से दिशाओं को भर रहे हैं, और सदा मंगल की कामना करने वाले श्रीवैष्णव भक्त आपके धाम में आ रहे हैं। हे वेंकटेश, आपका सुप्रभात हो।

भास्वान्
सूर्य
उदेति
उदय होता है
विकचानि
खिले हुए
विहङ्गाः
पक्षी
अर्थितमङ्गलाः
मंगल की कामना करने वाले
धाम
निवास, मंदिर

ब्रह्मादयस्सुरवरास्समहर्षयस्तेसन्तस्सनन्दनमुखास्त्वथ योगिवर्याः ।धामान्तिके तव हि मङ्गलवस्तुहस्ताःश्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥२७॥

brahmādayassuravarāssamaharṣayaste
santassanandanamukhāstvatha yogivaryāḥ |
dhāmāntike tava hi maṅgalavastuhastāḥ
śrīveṅkaṭācalapate tava suprabhātam ||

अर्थ: ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता महर्षियों के साथ, सनन्दन आदि संत और श्रेष्ठ योगी हाथों में मंगल-सामग्री लिए आपके धाम के पास खड़े हैं। हे वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।

सुरवराः
श्रेष्ठ देवता
समहर्षयः
महर्षियों के साथ
सनन्दनमुखाः
सनन्दन आदि
योगिवर्याः
श्रेष्ठ योगी
धामान्तिके
धाम के पास
मङ्गलवस्तुहस्ताः
हाथों में मंगल-वस्तुएँ लिए

लक्ष्मीनिवास निरवद्यगुणैकसिन्धोसंसारसागरसमुत्तरणैकसेतो ।वेदान्तवेद्य निजवैभव भक्तभोग्यश्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥२८॥

lakṣmīnivāsa niravadyaguṇaikasindho
saṃsārasāgarasamuttaraṇaikaseto |
vedāntavedya nijavaibhava bhaktabhogya
śrīveṅkaṭācalapate tava suprabhātam ||

अर्थ: हे लक्ष्मी के निवास, निर्दोष गुणों के एकमात्र सागर, संसार-सागर से पार उतारने वाले एकमात्र सेतु, वेदांत से जाने जाने वाले, अपने ही वैभव वाले, भक्तों के आनंद के विषय, हे वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।

निरवद्य
निर्दोष
समुत्तरण
पार उतरना
सेतो
हे पुल
वेदान्तवेद्य
वेदांत से जानने योग्य
भक्तभोग्य
भक्तों के आनंद-स्वरूप

इत्थं वृषाचलपतेरिह सुप्रभातम्ये मानवाः प्रतिदिनं पठितुं प्रवृत्ताः ।तेषां प्रभातसमये स्मृतिरङ्गभाजांप्रज्ञां परार्थसुलभां परमां प्रसूते ॥२९॥

itthaṃ vṛṣācalapateriha suprabhātam
ye mānavāḥ pratidinaṃ paṭhituṃ pravṛttāḥ |
teṣāṃ prabhātasamaye smṛtiraṅgabhājāṃ
prajñāṃ parārthasulabhāṃ paramāṃ prasūte ||

अर्थ: इस प्रकार वृषाचल (तिरुमला) के स्वामी का यह सुप्रभात जो मनुष्य प्रतिदिन पढ़ने लगते हैं, सुबह के समय भगवान का स्मरण करने वाले उन लोगों को यह परम बुद्धि देता है, जिससे परम लक्ष्य सुलभ हो जाता है, ऐसा यह श्लोक कहता है।

इत्थं
इस प्रकार
वृषाचलपतेः
वृषाचल (तिरुमला) के स्वामी का
प्रवृत्ताः
लगे हुए
स्मृति
स्मरण
प्रज्ञां
बुद्धि
परार्थ
परम लक्ष्य
प्रसूते
उत्पन्न करता है, देता है

॥ इति वेङ्कटेशसुप्रभातम् ॥

|| iti veṅkaṭeśasuprabhātam ||

अर्थ: इस प्रकार वेंकटेश सुप्रभात पूरा हुआ। (तिरुमला की सेवा में इसके बाद वेंकटेश स्तोत्र, प्रपत्ति और मंगलाशासन पढ़े जाते हैं।)

परिचय

श्री वेंकटेश सुप्रभातम् भोर में भगवान वेंकटेश्वर (बालाजी) को जगाने वाला स्तोत्र है। इसका पहला श्लोक वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड 23.2) से है, जहाँ विश्वामित्र मुनि सोए हुए श्री राम को जगाते हैं। आगे के श्लोकों में भोर का दृश्य है: सप्तर्षि कमल लेकर आए हैं, नारद वीणा पर गा रहे हैं, भौंरे गुंजन कर रहे हैं, तोते नाम ले रहे हैं, देवता और नवग्रह द्वार पर खड़े हैं, और हर श्लोक के अंत में प्रार्थना है: "तव सुप्रभातम्", आपकी सुबह मंगलमय हो।

तिरुमला की प्रातःकालीन सेवा में पूरे पाठ के चार भाग होते हैं: सुप्रभातम्, वेंकटेश स्तोत्रम्, प्रपत्ति और मंगलाशासनम्। sanskritdocuments.org का पृष्ठ चारों भाग देता है; इस पृष्ठ पर केवल पहला भाग, यानी सुप्रभात के 29 श्लोक, दिए गए हैं।

भावार्थ

सुप्रभात का अर्थ है "शुभ प्रभात", यानी मंगलमय सुबह। इस स्तोत्र में भक्त भगवान को उसी प्रेम से जगाता है जैसे घर में किसी प्रिय को जगाया जाता है। शुरुआत वाल्मीकि रामायण के उस श्लोक से है जिसमें विश्वामित्र श्री राम को जगाते हैं, फिर गोविन्द को और माँ लक्ष्मी को सुप्रभात कहा गया है।

आगे भोर का पूरा दृश्य है: सप्तर्षि आकाश-गंगा के कमल लाए हैं, बृहस्पति दिन का पंचांग पढ़ रहे हैं, नारद वीणा बजा रहे हैं, भौंरे, तोते, पक्षी और दही मथती गोपियाँ सब जाग गए हैं। फिर देवता, दिक्पाल, नवग्रह, गरुड़ आदि वाहन और वेदज्ञ पुजारी अभिषेक का जल लेकर द्वार पर खड़े हैं। यह बताता है कि सारी सृष्टि भगवान की सेवा में है।

बीच के श्लोकों में भक्तों का भाव है: जो एक बार तिरुमला के गोपुर देख लेते हैं, उन्हें स्वर्ग और मोक्ष भी कम लगते हैं; वे मनुष्य बनकर बार-बार दर्शन करना चाहते हैं। अंतिम श्लोक कहता है कि रोज़ सुबह इसका पाठ करने वाले को श्रेष्ठ बुद्धि मिलती है।

फलश्रुति

इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक 29) कहती है कि जो लोग प्रतिदिन सुबह भगवान का स्मरण करते हुए यह सुप्रभात पढ़ते हैं, उन्हें यह परम बुद्धि देता है, जिससे परम लक्ष्य सुलभ होता है। यह स्तोत्र का अपना कथन है, हमारा कोई वादा नहीं।

इत्थं वृषाचलपतेरिह सुप्रभातम्
ये मानवाः प्रतिदिनं पठितुं प्रवृत्ताः ।
तेषां प्रभातसमये स्मृतिरङ्गभाजां
प्रज्ञां परार्थसुलभां परमां प्रसूते ॥

इस प्रकार वृषाचल (तिरुमला) के स्वामी का यह सुप्रभात जो मनुष्य प्रतिदिन पढ़ने लगते हैं, सुबह के समय भगवान का स्मरण करने वाले उन लोगों को यह परम बुद्धि देता है, जिससे परम लक्ष्य सुलभ हो जाता है, ऐसा यह श्लोक कहता है।

यह स्तोत्र कब पढ़ा जाता है

  • रोज़ भोर में, भगवान वेंकटेश्वर के जागरण के समय
  • तिरुमला या किसी बालाजी मंदिर की प्रातःकालीन सेवा में
  • शनिवार को (भगवान वेंकटेश्वर की पूजा के लिए यह दिन विशेष माना जाता है)

पढ़ने की विधि

  • सुबह स्नान के बाद, भगवान वेंकटेश्वर के चित्र के सामने दीप जलाकर इसे पढ़ें या सुनें।
  • हर श्लोक की टेक ("शेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम्", "श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम्") को भगवान को प्रेम से जगाने के भाव से बोलें।
  • पूरा पाठ समय ले, तो सुप्रभात के ये 29 श्लोक अकेले भी पढ़े जा सकते हैं; बाकी तीन भाग (स्तोत्र, प्रपत्ति, मंगलाशासन) चाहें तो बाद में जोड़ें।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
श्लोक 9, पहला चरणतन्त्रीप्रहर्षमधुरस्वनया विपञ्च्याsanskritdocuments.org का मुख्य पाठ; वह "प्रकर्ष" को कोष्ठक में देता है। vignanam.org और stotranidhi.com में "प्रकर्ष" है, जो यहाँ रखा गया।
श्लोक 14, दूसरा चरणश्रेयोऽर्थिनो हरविरिञ्चसनन्दनाद्याःstotranidhi.com की वर्तनी (विरिञ्च / विरिञ्चि, दोनों ब्रह्मा के नाम)।
श्लोक 17, तीसरा चरणस्वस्वाधिकारमहिमादिकमर्थयन्तेstotranidhi.com का पाठ ("अपने अधिकार की महिमा आदि माँगते हैं")।
श्लोक 24, दूसरा चरणस्वामिन् परश्वथतपोधन रामचन्द्रvignanam.org की वर्तनी (परश्वथ / परश्वध, दोनों का अर्थ फरसा)।
श्लोक 25, पहला चरणएलालवङ्गघनसारसुगन्धतीर्थंstotranidhi.com का पाठ।
श्लोक 27, दूसरा चरणसन्तस्सनन्दनमुखास्तव योगिवर्याःsanskritdocuments.org इसे कोष्ठक में दूसरे पाठ के रूप में देता है।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
प्रतिवादि भयंकरम् अण्णन् (अण्णंगराचार्य)
भाषा
संस्कृत

श्रीवैष्णव परंपरा और प्रचलित इतिहास दोनों इन्हें रचयिता मानते हैं। वे मणवाळ मामुनि के शिष्य थे, और रचना-काल लगभग 1420–1432 ई. बताया जाता है। पहला श्लोक वाल्मीकि रामायण से लिया गया है।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): सुप्रभात के 29 श्लोक sanskritdocuments.org, vignanam.org और stotranidhi.com से मिलाए गए। तीनों में श्लोक-संख्या और क्रम एक है; अंतर केवल कुछ शब्दों की वर्तनी और श्लोक 9 (प्रहर्ष/प्रकर्ष) में है। रचयिता और रचना-काल Wikipedia (Rambhadracharya 2009 के हवाले) से लिए गए। केवल सुप्रभात भाग प्रकाशित किया गया; sanskritdocuments.org के उसी पृष्ठ पर स्तोत्र, प्रपत्ति और मंगलाशासन भी हैं, जो इस पृष्ठ में नहीं जोड़े गए। श्लोक 9 का पहला चरण stotranidhi.com/vignanam.org के "प्रकर्ष" पाठ से है, बाकी पंक्तियाँ sanskritdocuments.org से।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

वेंकटेश सुप्रभातम् किसने रचा?

श्रीवैष्णव परंपरा के अनुसार इसे प्रतिवादि भयंकरम् अण्णन् (अण्णंगराचार्य) ने लगभग 1420–1432 ई. में रचा। इसका पहला श्लोक वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड 23.2) से लिया गया है।

"कौसल्या सुप्रजा राम" श्लोक कहाँ से है?

यह वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड (सर्ग 23, श्लोक 2) का श्लोक है, जिसमें विश्वामित्र मुनि भोर में श्री राम को जगाते हैं। सुप्रभात इसी श्लोक से शुरू होता है।

पूरे सुप्रभात पाठ में कितने भाग हैं?

तिरुमला की परंपरा में चार भाग पढ़े जाते हैं: सुप्रभातम्, वेंकटेश स्तोत्रम्, प्रपत्ति और मंगलाशासनम्। यहाँ पहला भाग, सुप्रभात के 29 श्लोक, दिया गया है।

इसे कब पढ़ना चाहिए?

यह भोर का स्तोत्र है, इसलिए सुबह पढ़ना या सुनना इसके भाव के अनुरूप है। तिरुमला में यह सुबह की पहली सेवा में गाया जाता है।

"शेषाद्रिशेखरविभो" का क्या अर्थ है?

शेषाद्रि यानी शेषाचल पर्वत (तिरुमला की पहाड़ियाँ) और शेखर यानी शिखर। अर्थ है: शेषाचल के शिखर पर विराजने वाले प्रभु।

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पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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