नटराज

स्तोत्र · नटराज, शिव · स्तोत्र

नटराज स्तोत्रम्

चिदम्बरम् के नटराज की स्तुति, जो परंपरा से मुनि पतञ्जलि की मानी जाती है; पूरे स्तोत्र में एक भी दीर्घ स्वर नहीं। मूल पाठ और सरल अर्थ।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. भावार्थ
  4. फलश्रुति
  5. कब पढ़ें
  6. विधि
  7. पाठ-भेद
  8. रचयिता और स्रोत
  9. ये भी पढ़ें
  10. सवाल-जवाब
  11. सुधार सुझाएँ

सदञ्चित मुदञ्चित निकुञ्चित पदं झलझलञ्चलित मञ्जु कटकम्पतञ्जलि दृगञ्जन मनञ्जन मचञ्चलपदं जनन भञ्जन करम् ।कदम्बरुचिमम्बरवसं परममम्बुद कदम्ब कविडम्बकगलम्चिदम्बुधि मणिं बुध हृदम्बुज रविं पर चिदम्बर नटं हृदि भज ॥१॥

sadañcita mudañcita nikuñcita padaṃ jhalajhalañcalita mañju kaṭakam
patañjali dṛgañjana manañjana macañcalapadaṃ janana bhañjana karam |
kadambarucimambaravasaṃ paramamambuda kadamba kaviḍambakagalam
cidambudhi maṇiṃ budha hṛdambuja raviṃ para cidambara naṭaṃ hṛdi bhaja ||

अर्थ: चिदम्बर के उस परम नर्तक को हृदय में भजो, जिनका एक चरण नृत्य में उठा और मुड़ा हुआ है, जिनके सुन्दर कंगन हिलकर झन-झन बजते हैं, जो पतञ्जलि के नेत्रों के लिए अंजन (ज्ञान की दृष्टि) हैं पर स्वयं निर्मल हैं, जिनका पद अचल है और जो जन्म के चक्र को तोड़ते हैं, जिनकी शोभा कदम्ब जैसी है, जो आकाश को वस्त्र की तरह पहनते हैं, जिनका कण्ठ वर्षा के बादलों के समूह जैसा श्याम है, जो चेतना-सागर के रत्न और ज्ञानियों के हृदय-कमल के सूर्य हैं।

निकुञ्चित पद
नृत्य में मुड़ा हुआ चरण
कटक
कंगन
अञ्जन
आँख का काजल, दृष्टि देने वाला
अनञ्जन
निर्मल, दोषरहित
जनन भञ्जन
जन्म के बंधन को तोड़ने वाले
अम्बुद
बादल
चिदम्बुधि
चेतना का सागर
हृदि भज
हृदय में भजो

हरं त्रिपुर भञ्जनं अनन्तकृतकङ्कणं अखण्डदय मन्तरहितंविरिञ्चिसुरसंहतिपुरन्दर विचिन्तितपदं तरुणचन्द्रमकुटम् ।परं पद विखण्डितयमं भसित मण्डिततनुं मदनवञ्चन परंचिरन्तनममुं प्रणवसञ्चितनिधिं पर चिदम्बर नटं हृदि भज ॥२॥

haraṃ tripura bhañjanaṃ anantakṛtakaṅkaṇaṃ akhaṇḍadaya mantarahitaṃ
viriñcisurasaṃhatipurandara vicintitapadaṃ taruṇacandramakuṭam |
paraṃ pada vikhaṇḍitayamaṃ bhasita maṇḍitatanuṃ madanavañcana paraṃ
cirantanamamuṃ praṇavasañcitanidhiṃ para cidambara naṭaṃ hṛdi bhaja ||

अर्थ: चिदम्बर के उस परम नर्तक को हृदय में भजो, जो हर हैं, जिन्होंने त्रिपुर का नाश किया, जिन्होंने अनन्त (शेषनाग) को कंगन बनाया, जिनकी दया अखण्ड है और जो अन्त से रहित हैं, ब्रह्मा, देवगण और इन्द्र जिनके चरणों का ध्यान करते हैं, जिनके मुकुट पर बालचन्द्र है, जिन्होंने अपने चरण से यम को परास्त किया, जिनका शरीर भस्म से सजा है, जो कामदेव को परास्त करने वाले हैं, जो चिरन्तन हैं और प्रणव (ॐ) में संचित निधि हैं।

त्रिपुर
असुरों के तीन नगर
कङ्कण
कंगन
अखण्डदय
अखण्ड दया वाले
विरिञ्चि
ब्रह्मा
पुरन्दर
इन्द्र
विखण्डितयम
यम को परास्त करने वाले
भसित
भस्म
प्रणव
ॐ

अवन्तमखिलं जगदभङ्ग गुणतुङ्गममतं धृतविधुं सुरसरित्-तरङ्ग निकुरम्ब धृति लम्पट जटं शमनदम्भसुहरं भवहरम् ।शिवं दशदिगन्तर विजृम्भितकरं करलसन्मृगशिशुं पशुपतिंहरं शशिधनञ्जयपतङ्गनयनं परचिदम्बर नटं हृदि भज ॥३॥

avantamakhilaṃ jagadabhaṅga guṇatuṅgamamataṃ dhṛtavidhuṃ surasarit-
taraṅga nikuramba dhṛti lampaṭa jaṭaṃ śamanadambhasuharaṃ bhavaharam |
śivaṃ daśadigantara vijṛmbhitakaraṃ karalasanmṛgaśiśuṃ paśupatiṃ
haraṃ śaśidhanañjayapataṅganayanaṃ paracidambara naṭaṃ hṛdi bhaja ||

अर्थ: चिदम्बर के उस परम नर्तक को हृदय में भजो, जो सारे जगत की रक्षा करते हैं, न टूटने वाले गुणों से ऊँचे हैं, जिन्हें पूरी तरह जानना कठिन है, जो चन्द्रमा धारण करते हैं, जिनकी जटाएँ गंगा की लहरों के समूह को थामने को उत्सुक हैं, जिन्होंने यम का घमंड तोड़ा और जो संसार के दुःख हरते हैं, जो कल्याण-स्वरूप हैं, जिनके हाथ दसों दिशाओं तक फैले हैं, जिनके हाथ में हिरन का बच्चा शोभित है, जो पशुपति हैं और जिनके नेत्र चन्द्रमा, अग्नि और सूर्य हैं।

अवन्त
रक्षा करते हुए
अभङ्ग
न टूटने वाला
अमत
जो पूरी तरह जाना न जा सके
विधु
चन्द्रमा
सुरसरित्
देवनदी, गंगा
निकुरम्ब
समूह
शमन
यम
पतङ्ग
सूर्य

अनन्तनवरत्नविलसत्कटककिङ्किणिझलं झलझलं झलरवंमुकुन्दविधि हस्तगतमद्दल लयध्वनिधिमिद्धिमित नर्तन पदम् ।शकुन्तरथ बर्हिरथ नन्दिमुख शृङ्गिरिटिभृङ्गिगणसङ्घनिकटम्सनन्दसनक प्रमुख वन्दित पदं परचिदम्बर नटं हृदि भज ॥४॥

anantanavaratnavilasatkaṭakakiṅkiṇijhalaṃ jhalajhalaṃ jhalaravaṃ
mukundavidhi hastagatamaddala layadhvanidhimiddhimita nartana padam |
śakuntaratha barhiratha nandimukha śṛṅgiriṭibhṛṅgigaṇasaṅghanikaṭam
sanandasanaka pramukha vandita padaṃ paracidambara naṭaṃ hṛdi bhaja ||

अर्थ: चिदम्बर के उस परम नर्तक को हृदय में भजो, जिनके अनगिनत नवरत्नों से चमकते कंगनों के घुँघरू झन-झन बजते हैं, जिनके नृत्य के चरण विष्णु और ब्रह्मा के हाथों के मृदंग की धिमि-धिमि लय पर चलते हैं, जिनके निकट गरुड़-वाहन विष्णु, मयूर-वाहन कार्तिकेय, नन्दी आदि और शृङ्गी, रिटि, भृङ्गी आदि गणों का समूह रहता है, और सनन्द, सनक आदि मुनि जिनके चरणों की वन्दना करते हैं।

किङ्किणी
घुँघरू
मुकुन्द
विष्णु
विधि
ब्रह्मा
मद्दल
मृदंग जैसा ढोल
शकुन्तरथ
पक्षी (गरुड़) जिनका वाहन है, विष्णु
बर्हिरथ
मोर जिनका वाहन है, कार्तिकेय
गण
शिव के सेवक
सनक, सनन्द
ब्रह्मा के मानस-पुत्र मुनि

अनन्तमहसं त्रिदशवन्द्य चरणं मुनि हृदन्तर वसन्तममलम्कबन्ध वियदिन्द्ववनि गन्धवह वह्निमख बन्धुरविमञ्जु वपुषम् ।अनन्तविभवं त्रिजगदन्तर मणिं त्रिनयनं त्रिपुर खण्डन परम्सनन्द मुनि वन्दित पदं सकरुणं पर चिदम्बर नटं हृदि भज ॥५॥

anantamahasaṃ tridaśavandya caraṇaṃ muni hṛdantara vasantamamalam
kabandha viyadindvavani gandhavaha vahnimakha bandhuravimañju vapuṣam |
anantavibhavaṃ trijagadantara maṇiṃ trinayanaṃ tripura khaṇḍana param
sananda muni vandita padaṃ sakaruṇaṃ para cidambara naṭaṃ hṛdi bhaja ||

अर्थ: चिदम्बर के उस परम नर्तक को हृदय में भजो, जिनका तेज अनन्त है, देवता जिनके चरणों की वन्दना करते हैं, जो मुनियों के हृदय में बसते हैं और निर्मल हैं, जिनका सुन्दर शरीर जल, आकाश, चन्द्रमा, पृथ्वी, वायु, अग्नि, यजमान और सूर्य, इन आठ रूपों से बना है, जिनका वैभव अनन्त है, जो तीनों लोकों के भीतर के रत्न हैं, तीन नेत्रों वाले हैं, त्रिपुर का नाश करने को तत्पर हैं, सनन्द मुनि जिनके चरणों की वन्दना करते हैं और जो करुणा से भरे हैं।

महस्
तेज
त्रिदश
देवता
कबन्ध
जल
वियत्
आकाश
अवनि
पृथ्वी
गन्धवह
वायु
मख
यज्ञ, यजमान
सकरुण
करुणा से भरे

अचिन्त्यमलिवृन्द रुचि बन्धुरगलं कुरित कुन्द निकुरम्ब धवलम्मुकुन्द सुर वृन्द बल हन्तृ कृत वन्दन लसन्तमहिकुण्डल धरम् ।अकम्पमनुकम्पित रतिं सुजन मङ्गलनिधिं गजहरं पशुपतिम्धनञ्जय नुतं प्रणत रञ्जनपरं पर चिदम्बर नटं हृदि भज ॥६॥

acintyamalivṛnda ruci bandhuragalaṃ kurita kunda nikuramba dhavalam
mukunda sura vṛnda bala hantṛ kṛta vandana lasantamahikuṇḍala dharam |
akampamanukampita ratiṃ sujana maṅgalanidhiṃ gajaharaṃ paśupatim
dhanañjaya nutaṃ praṇata rañjanaparaṃ para cidambara naṭaṃ hṛdi bhaja ||

अर्थ: चिदम्बर के उस परम नर्तक को हृदय में भजो, जो विचार से परे हैं, जिनका सुन्दर कण्ठ भौंरों के समूह जैसा श्याम है, जो खिले कुन्द-फूलों के ढेर जैसे उजले हैं, विष्णु, देवगण और बल असुर को मारने वाले इन्द्र की वन्दना से जो शोभित हैं, जो सर्प के कुण्डल पहनते हैं, जो अडिग हैं पर जिन्होंने रति पर दया की, जो सज्जनों के लिए मंगल के भंडार हैं, गजासुर को मारने वाले पशुपति हैं, अर्जुन ने जिनकी स्तुति की और जो प्रणाम करने वालों को प्रसन्न करने में तत्पर रहते हैं।

अचिन्त्य
विचार से परे
अलिवृन्द
भौंरों का समूह
कुन्द
एक सफ़ेद फूल
बलहन्तृ
बल असुर को मारने वाले, इन्द्र
अहिकुण्डल
सर्प का कुण्डल
अनुकम्पितरति
रति पर दया करने वाले
धनञ्जय
अर्जुन
प्रणत
प्रणाम करने वाले

परं सुरवरं पुरहरं पशुपतिं जनित दन्तिमुख षण्मुखममुंमृडं कनक पिङ्गल जटं सनकपङ्कज रविं सुमनसं हिमरुचिम् ।असङ्गमनसं जलधि जन्मगरलं कवलयन्त मतुलं गुणनिधिम्सनन्द वरदं शमितमिन्दु वदनं पर चिदम्बर नटं हृदि भज ॥७॥

paraṃ suravaraṃ puraharaṃ paśupatiṃ janita dantimukha ṣaṇmukhamamuṃ
mṛḍaṃ kanaka piṅgala jaṭaṃ sanakapaṅkaja raviṃ sumanasaṃ himarucim |
asaṅgamanasaṃ jaladhi janmagaralaṃ kavalayanta matulaṃ guṇanidhim
sananda varadaṃ śamitamindu vadanaṃ para cidambara naṭaṃ hṛdi bhaja ||

अर्थ: चिदम्बर के उस परम नर्तक को हृदय में भजो, जो परम हैं, देवताओं में श्रेष्ठ हैं, त्रिपुर को नष्ट करने वाले पशुपति हैं, जिन्होंने गजमुख गणेश और षण्मुख कार्तिकेय को जन्म दिया, जो मृड (सुख देने वाले) हैं, जिनकी जटाएँ सोने जैसी पीली-भूरी हैं, जो सनक मुनि रूपी कमल के सूर्य हैं, जिनका मन कोमल है, जिनकी कान्ति हिम जैसी है, जिनका मन कहीं आसक्त नहीं, जिन्होंने समुद्र से निकला विष निगल लिया, जो अतुलनीय गुणों के भंडार हैं, सनन्द मुनि को वर देने वाले हैं, शान्त हैं और जिनका मुख चन्द्रमा जैसा है।

पुरहर
त्रिपुर को नष्ट करने वाले
दन्तिमुख
हाथी के मुख वाले, गणेश
षण्मुख
छह मुखों वाले, कार्तिकेय
मृड
सुख देने वाले, शिव का नाम
पिङ्गल
पीला-भूरा
असङ्गमनस
अनासक्त मन वाले
गरल
विष
कवलयन्त
निगलते हुए

अजं क्षितिरथं भुजगपुङ्गवगुणं कनक शृङ्गि धनुषं करलसत्कुरङ्ग पृथु टङ्क परशुं रुचिर कुङ्कुम रुचिं डमरुकं च दधतम् ।मुकुन्द विशिखं नमदवन्ध्य फलदं निगम वृन्द तुरगं निरुपमंसचण्डिकममुं झटिति संहृतपुरं परचिदम्बर नटं हृदि भज ॥८॥

ajaṃ kṣitirathaṃ bhujagapuṅgavaguṇaṃ kanaka śṛṅgi dhanuṣaṃ karalasat
kuraṅga pṛthu ṭaṅka paraśuṃ rucira kuṅkuma ruciṃ ḍamarukaṃ ca dadhatam |
mukunda viśikhaṃ namadavandhya phaladaṃ nigama vṛnda turagaṃ nirupamaṃ
sacaṇḍikamamuṃ jhaṭiti saṃhṛtapuraṃ paracidambara naṭaṃ hṛdi bhaja ||

अर्थ: चिदम्बर के उस परम नर्तक को हृदय में भजो, जो अजन्मा हैं, (त्रिपुर-वध में) पृथ्वी जिनका रथ बनी, सर्पराज धनुष की डोरी और सोने की चोटी वाला मेरु धनुष बना, जिनके हाथों में हिरन, बड़ा टंक और फरसा शोभित है, जो सुन्दर कुंकुम-आभा वाला डमरू धारण करते हैं, विष्णु जिनका बाण बने, जो प्रणाम करने वालों को कभी निष्फल न होने वाला फल देते हैं, वेदों का समूह जिनके घोड़े बना, जो अनुपम हैं, चण्डिका के साथ हैं और जिन्होंने पल भर में त्रिपुर का संहार कर दिया।

क्षितिरथ
पृथ्वी ही जिनका रथ है
गुण
धनुष की डोरी
कनकशृङ्गी
सोने की चोटी वाला, मेरु पर्वत
कुरङ्ग
हिरन
विशिख
बाण
अवन्ध्य
कभी निष्फल न होने वाला
निगम
वेद
तुरग
घोड़ा

अनङ्गपरिपन्थिनमजं क्षिति धुरन्धरमलं करुणयन्तमखिलंज्वलन्तमनलं दधतमन्तकरिपुं सततमिन्द्रमुखवन्दितपदम् ।उदञ्चदरविन्दकुल बन्धुशत बिम्बरुचि संहति सुगन्धि वपुषंपतञ्जलिनुतं प्रणवपञ्जर शुकं पर चिदम्बर नटं हृदि भज ॥९॥

anaṅgaparipanthinamajaṃ kṣiti dhurandharamalaṃ karuṇayantamakhilaṃ
jvalantamanalaṃ dadhatamantakaripuṃ satatamindramukhavanditapadam |
udañcadaravindakula bandhuśata bimbaruci saṃhati sugandhi vapuṣaṃ
patañjalinutaṃ praṇavapañjara śukaṃ para cidambara naṭaṃ hṛdi bhaja ||

अर्थ: चिदम्बर के उस परम नर्तक को हृदय में भजो, जो कामदेव (अनङ्ग) के शत्रु और अजन्मा हैं, पृथ्वी का भार भली-भाँति उठाते हैं, सब पर करुणा करते हैं, जलती अग्नि धारण करते हैं, यम (अन्तक) के शत्रु हैं, इन्द्र आदि देवता जिनके चरणों की सदा वन्दना करते हैं, जिनका सुगंधित शरीर उगते हुए सैकड़ों सूर्य-मंडलों की कान्ति जैसा है, पतञ्जलि जिनकी स्तुति करते हैं और जो प्रणव (ॐ) रूपी पिंजरे के तोते हैं।

अनङ्ग
कामदेव
परिपन्थी
शत्रु
धुरन्धर
भार उठाने वाले
अनल
अग्नि
अन्तकरिपु
यम के शत्रु
अरविन्दकुलबन्धु
कमलों का मित्र, सूर्य
पञ्जर
पिंजरा
शुक
तोता

इति स्तवममुं भुजगपुङ्गव कृतं प्रतिदिनं पठति यः कृतमुखःसदः प्रभुपद द्वितयदर्शनपदं सुललितं चरण शृङ्ग रहितम् ।सरःप्रभव सम्भव हरित्पति हरिप्रमुख दिव्यनुत शङ्करपदंस गच्छति परं न तु जनुर्जलनिधिं परमदुःखजनकं दुरितदम् ॥१०॥

iti stavamamuṃ bhujagapuṅgava kṛtaṃ pratidinaṃ paṭhati yaḥ kṛtamukhaḥ
sadaḥ prabhupada dvitayadarśanapadaṃ sulalitaṃ caraṇa śṛṅga rahitam |
saraḥprabhava sambhava haritpati haripramukha divyanuta śaṅkarapadaṃ
sa gacchati paraṃ na tu janurjalanidhiṃ paramaduḥkhajanakaṃ duritadam ||

अर्थ: यह श्लोक कहता है कि सर्पों में श्रेष्ठ (पतञ्जलि) की रची इस स्तुति को, जो सभा के स्वामी (नटराज) के दोनों चरणों के दर्शन कराने वाली, सुन्दर और चरण-शृङ्ग (दीर्घ मात्राओं) से रहित है, जो प्रतिदिन मन लगाकर पढ़ता है, वह ब्रह्मा, दिशाओं के स्वामी और विष्णु आदि देवताओं से पूजित शंकर के परम पद को पाता है, और बड़े दुःख और पाप देने वाले जन्म रूपी सागर में फिर नहीं जाता।

स्तव
स्तुति
भुजगपुङ्गव
सर्पों में श्रेष्ठ, शेष (जिनके अवतार पतञ्जलि माने जाते हैं)
सदःप्रभु
सभा के स्वामी, नटराज
चरणशृङ्गरहित
दीर्घ स्वरों की मात्राओं से रहित
सरःप्रभवसम्भव
कमल से जन्मे, ब्रह्मा
हरित्पति
दिशाओं के स्वामी
जनुर्जलनिधि
जन्म रूपी सागर
दुरितद
पाप देने वाला

॥ इति श्रीपतञ्जलिमुनिप्रणीतं चरणशृङ्गरहित नटराजस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

|| iti śrīpatañjalimunipraṇītaṃ caraṇaśṛṅgarahita naṭarājastotraṃ sampūrṇam ||

अर्थ: इस प्रकार श्री पतञ्जलि मुनि द्वारा रचित माना जाने वाला चरणशृङ्गरहित नटराज स्तोत्र पूरा हुआ।

परिचय

नटराज स्तोत्र शिव के नर्तक रूप, नटराज, की स्तुति है, जिनका प्रसिद्ध मन्दिर तमिलनाडु के चिदम्बरम् में है। दस श्लोकों के इस स्तोत्र के हर श्लोक का अंत 'पर चिदम्बर नटं हृदि भज' से होता है, यानी चिदम्बर के उस परम नर्तक को हृदय में भजो।

इसे 'चरणशृङ्गरहित' स्तोत्र कहा जाता है, क्योंकि इसमें कोई दीर्घ स्वर (आ, ई, ऊ, ए, ओ आदि) नहीं है; सारे अक्षर छोटे स्वरों वाले हैं। परंपरा इसे योगसूत्र के रचयिता माने जाने वाले मुनि पतञ्जलि की रचना मानती है, जिन्हें शेषनाग का अवतार कहा जाता है।

भावार्थ

नटराज शिव का वह रूप हैं जिसमें वे आनंद में नृत्य करते हैं: एक चरण उठा हुआ, कंगनों और घुँघरुओं की झन-झन, जटाओं में गंगा, हाथ में हिरन और डमरू, और चारों ओर विष्णु, ब्रह्मा, कार्तिकेय, नन्दी और मुनियों की भीड़, जो मृदंग की धिमि-धिमि पर उनके नृत्य का साथ देती है। यह स्तोत्र चिदम्बरम् के उसी नर्तक को 'चिदम्बर नट' कहकर हृदय में भजने को कहता है।

हर श्लोक नृत्य के सौंदर्य के साथ शिव के दर्शन को जोड़ता है: वे चेतना-सागर के रत्न हैं, प्रणव में संचित निधि हैं, जल-आकाश-चन्द्र-पृथ्वी-वायु-अग्नि-यजमान-सूर्य, इन आठ रूपों में फैले हैं, और जन्म के चक्र को तोड़ने वाले हैं। त्रिपुर-वध, विषपान, यम और कामदेव पर विजय जैसी कथाएँ भी संकेत में आती हैं।

परंपरा के अनुसार पतञ्जलि ने यह स्तोत्र बिना किसी दीर्घ स्वर के रचा। अंतिम श्लोक फलश्रुति है, जो प्रतिदिन इसके पाठ से शंकर के परम पद की प्राप्ति की बात करता है।

फलश्रुति

इस स्तोत्र की फलश्रुति कहती है कि जो पतञ्जलि की रची इस स्तुति को प्रतिदिन मन लगाकर पढ़ता है, वह शंकर के परम पद को पाता है और दुःख देने वाले जन्म-सागर में फिर नहीं जाता। यह स्तोत्र के अपने शब्द हैं।

इति स्तवममुं भुजगपुङ्गव कृतं प्रतिदिनं पठति यः कृतमुखः
सदः प्रभुपद द्वितयदर्शनपदं सुललितं चरण शृङ्ग रहितम् ।
सरःप्रभव सम्भव हरित्पति हरिप्रमुख दिव्यनुत शङ्करपदं
स गच्छति परं न तु जनुर्जलनिधिं परमदुःखजनकं दुरितदम् ॥

यह श्लोक कहता है कि सर्पों में श्रेष्ठ (पतञ्जलि) की रची इस स्तुति को, जो सभा के स्वामी (नटराज) के दोनों चरणों के दर्शन कराने वाली, सुन्दर और चरण-शृङ्ग (दीर्घ मात्राओं) से रहित है, जो प्रतिदिन मन लगाकर पढ़ता है, वह ब्रह्मा, दिशाओं के स्वामी और विष्णु आदि देवताओं से पूजित शंकर के परम पद को पाता है, और बड़े दुःख और पाप देने वाले जन्म रूपी सागर में फिर नहीं जाता।

यह स्तोत्र कब पढ़ा जाता है

  • प्रदोष और सोमवार को शिव पूजा में
  • आर्द्रा दर्शन जैसे नटराज के उत्सवों पर
  • नृत्य, संगीत या किसी कला का अभ्यास आरम्भ करने से पहले, नटराज के स्मरण के रूप में

पढ़ने की विधि

  • इस स्तोत्र में सारे स्वर छोटे हैं, इसलिए इसे तेज़ और एक समान लय में पढ़ा जाता है। पहले अर्थ पढ़ें, फिर धीरे-धीरे गति बढ़ाएँ।
  • हर श्लोक का अंतिम चरण 'पर चिदम्बर नटं हृदि भज' भजन की तरह दोहराने योग्य है; इसे भाव से कहें।
  • शब्द लंबे समासों में जुड़े हैं; पढ़ते समय ऊपर दिए स्थानों पर हल्का विराम लें।
पूरी विधिशिव पूजा विधिघर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
श्लोक 1कदम्बरुचिमम्बरवसं परममम्बुद कदम्ब कविडम्बनकरम्sanskritdocuments.org पर दूसरे पाठ के रूप में।
श्लोक 2विरिञ्चिसुरसंहतिपुरन्धरvignanam.org और stotranidhi.com में 'पुरन्दर' की जगह।
श्लोक 3, 6निकुरुम्बvignanam.org और stotranidhi.com में 'निकुरम्ब' की जगह; दोनों का अर्थ समूह है।
श्लोक 4शकुन्तरथ बर्हिरथ नन्दिमुख भृङ्गिरिटिसङ्घनिकटं भयहरम्vignanam.org का पाठ; stotranidhi.com में 'नन्दिमुखदन्तिमुखभृङ्गिरिटिसङ्घनिकटं भयहरं' है।
श्लोक 7असङ्घमनसंvignanam.org और stotranidhi.com का पाठ।
श्लोक 8नमदवन्द्य फलदंsanskritdocuments.org का पाठ। उसी पेज का अर्थ 'प्रणाम करने वालों की इच्छा पूरी करने वाले' है, जो 'अवन्ध्य' (निष्फल न होने वाला) से मेल खाता है; vignanam.org और stotranidhi.com में 'अवन्ध्य' है, इसलिए वही रखा गया।
श्लोक 8प्रणतवृन्दफलदं निगमतुङ्गतरङ्गंsanskritdocuments.org पर दूसरे पाठ के रूप में।
श्लोक 9सततमिन्द्रसुरवन्दितपदम्vignanam.org और stotranidhi.com का पाठ।
हर श्लोक का अंतपर चिदम्बर नटं हृदि भजेsanskritdocuments.org के अनुसार कुछ छपी प्रतियों में 'भज' की जगह 'भजे' मिलता है।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
पतञ्जलि मुनि (परंपरा के अनुसार)
भाषा
संस्कृत

परंपरा इसे मुनि पतञ्जलि की रचना मानती है, और अंतिम श्लोक भी इसे 'भुजगपुङ्गव' (सर्पों में श्रेष्ठ, शेष के अवतार माने जाने वाले पतञ्जलि) की कृति कहता है; इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पाठ sanskritdocuments.org से लिया गया और हर पंक्ति vignanam.org और stotranidhi.com से मिलाई गई। शब्दों के बीच की जगहें sanskritdocuments.org के अनुसार हैं। श्लोक 8 में 'नमदवन्द्य' की जगह 'नमदवन्ध्य' रखा गया, जो दोनों दूसरे स्रोतों में है और मुख्य स्रोत के अपने अर्थ से मेल खाता है; बाकी पाठ sanskritdocuments.org का है और छोटे भेद 'पाठ-भेद' में दिए गए हैं।

ये भी पढ़ें

शिव

शिव पूजा विधि

शिव · पूजा विधि · रोज़ की पूजा

घर में रोज़ और सोमवार को शिव जी की सरल पूजा: जल अर्पण, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय", आरती और आधी परिक्रमा, हर सामग्री के विकल्प के साथ।

शिव

शिव चालीसा

शिव · चालीसा

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान

शिव

महाशिवरात्रि पूजा विधि

शिव · पूजा विधि · त्योहार की पूजा

महाशिवरात्रि पर घर में शिव पूजा: सुबह संकल्प, सेहत के अनुसार व्रत, रात में एक बार या चारों पहर की पूजा, जागरण, निशीथ काल और अगली सुबह पारण।

शिव

रुद्राष्टकम्

शिव · अष्टकम् · संस्कृत

नमामीशमीशाननिर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्

नटराज के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

'चरणशृङ्गरहित' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है 'चरण और सींग से रहित'। इस स्तोत्र में कोई दीर्घ स्वर (आ, ई, ऊ, ए, ओ आदि) नहीं है, और दीर्घ स्वरों की मात्राओं को लिपि में चरण और सींग जैसा माना गया है। इसलिए यह नाम पड़ा।

इसके पीछे कौन-सी कथा कही जाती है?

एक कथा के अनुसार नन्दी ने पतञ्जलि को नटराज के दर्शन से रोका, तो पतञ्जलि ने नन्दी को छेड़ते हुए बिना 'चरण और सींग' वाला यह स्तोत्र रचा, और शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए। यह परंपरा की कथा है; इसका ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।

क्या यह योगसूत्र वाले पतञ्जलि की रचना है?

परंपरा ऐसा मानती है और अंतिम श्लोक इसे 'भुजगपुङ्गव' की रचना कहता है, जो शेष के अवतार माने जाने वाले पतञ्जलि का संकेत है। इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

चिदम्बरम् का नटराज से क्या संबंध है?

तमिलनाडु के चिदम्बरम् मंदिर में शिव नटराज रूप में पूजे जाते हैं। 'चिदम्बर' का अर्थ है चेतना का आकाश, और यह स्तोत्र हर श्लोक में उन्हें 'चिदम्बर नट' कहता है।

क्या नृत्य सीखने वाले इसे पढ़ते हैं?

नटराज को नृत्य का स्वामी माना जाता है, इसलिए कई कलाकार अभ्यास या प्रस्तुति से पहले नटराज का स्मरण करते हैं। यह स्तोत्र भी उस स्मरण के लिए पढ़ा जा सकता है।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

सुधार भेजें