राधा

आरती · राधा

आरती श्री वृषभानुसुता की

श्री राधा जी की आरती, जो राधाष्टमी और राधा-कृष्ण की पूजा में गाई जाती है। गीता प्रेस के अनुसार पूरा पाठ, हर अंतरे का अर्थ और पाठभेद।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. अंतरा-वार अर्थ
  4. भावार्थ
  5. कठिन शब्द
  6. कब पढ़ें
  7. विधि
  8. पाठ-भेद
  9. रचयिता और स्रोत
  10. ये भी पढ़ें
  11. सवाल-जवाब
  12. सुधार सुझाएँ

आरति श्रीवृषभानुसुता की।मंजु मूर्ति मोहन-ममता की॥

अर्थ: आइए, वृषभानु जी की पुत्री श्री राधा जी की आरती करें, जो मोहन (श्रीकृष्ण) के स्नेह की सुंदर मूर्ति हैं।

त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि,विमल विवेकविराग विकासिनि,पावन प्रभु-पद-प्रीति प्रकाशिनि,सुन्दरतम छबि सुन्दरता की॥

॥ आरति श्रीवृषभानुसुता की ॥

अर्थ: वे तीनों तरह के कष्टों से भरे संसार-चक्र को मिटाने वाली हैं, निर्मल विवेक और वैराग्य को खिलाने वाली हैं, और प्रभु के चरणों की पवित्र प्रीति को प्रकट करने वाली हैं। उनकी छवि स्वयं सुंदरता की सबसे सुंदर छवि है।

मुनि-मन-मोहन मोहन-मोहनि,मधुर मनोहर मूरति सोहनि,अविरलप्रेम-अमिय-रस-दोहनि,प्रिय अति सदा सखी ललिता की॥

॥ आरति श्रीवृषभानुसुता की ॥

अर्थ: जो मोहन मुनियों के मन को मोह लेते हैं, राधा जी उन मोहन को भी मोहने वाली हैं। उनकी मधुर, मनोहर मूर्ति शोभा पाती है; वे निरंतर प्रेम-अमृत का रस बहाती हैं, और ललिता सखी की सदा अत्यंत प्रिय हैं।

संतत सेव्य संत-मुनि-जन की,आकर अमित दिव्यगुन-गन की,आकर्षिणी कृष्ण-तन-मन की,अति अमूल्य सम्पति समता की॥

॥ आरति श्रीवृषभानुसुता की ॥

अर्थ: संत और मुनिजन सदा उनकी सेवा करते हैं; वे अनगिनत दिव्य गुणों की खान हैं। वे श्रीकृष्ण के तन और मन को अपनी ओर खींचने वाली हैं, और समता (सबके प्रति समभाव) की अत्यंत अनमोल संपत्ति हैं।

कृष्णात्मिका, कृष्ण-सहचारिणि,चिन्मयवृन्दा-विपिन-विहारिणि,जगज्जननि जग-दुःखनिवारिणि,आदि अनादि शक्ति विभुता की॥

॥ आरति श्रीवृषभानुसुता की ॥

अर्थ: वे श्रीकृष्ण की आत्मा-रूप हैं और उनकी सहचरी हैं; दिव्य, चेतन वृंदावन में विहार करती हैं। वे जगत की जननी हैं, जगत के दुख दूर करती हैं, और आदि-अनादि शक्ति हैं, जिनकी महिमा सब ओर व्याप्त है।

हर अंतरे का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।

परिचय

“आरती श्री वृषभानुसुता की” श्री राधा जी की आरती है। वृषभानुसुता यानी वृषभानु जी की पुत्री; ब्रज की परंपरा में राधा जी बरसाना के वृषभानु जी की बेटी हैं। राधाष्टमी पर और राधा-कृष्ण की युगल पूजा में यह आरती गाई जाती है। इसकी भाषा कुछ संस्कृतनिष्ठ है: इसमें राधा जी को श्रीकृष्ण की आत्मा, उनकी सहचरी, वृंदावन में विहार करने वाली और जगत की जननी शक्ति कहा गया है।

यह आरती गीता प्रेस के आरती-संग्रह में “श्रीराधाजी” शीर्षक से छपी है, और वेबसाइटों पर मिलने वाला पाठ भी उसी से मेल खाता है। इसलिए यहाँ पाठ गीता प्रेस के अनुसार है; दूसरे स्रोतों के छोटे अंतर नीचे पाठभेद में हैं।

अंतरा-वार अर्थ

  1. मुखड़ा आरति श्रीवृषभानुसुता की…

    आइए, वृषभानु जी की पुत्री श्री राधा जी की आरती करें, जो मोहन (श्रीकृष्ण) के स्नेह की सुंदर मूर्ति हैं।

  2. अंतरा १ त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि,…

    वे तीनों तरह के कष्टों से भरे संसार-चक्र को मिटाने वाली हैं, निर्मल विवेक और वैराग्य को खिलाने वाली हैं, और प्रभु के चरणों की पवित्र प्रीति को प्रकट करने वाली हैं। उनकी छवि स्वयं सुंदरता की सबसे सुंदर छवि है।

  3. अंतरा २ मुनि-मन-मोहन मोहन-मोहनि,…

    जो मोहन मुनियों के मन को मोह लेते हैं, राधा जी उन मोहन को भी मोहने वाली हैं। उनकी मधुर, मनोहर मूर्ति शोभा पाती है; वे निरंतर प्रेम-अमृत का रस बहाती हैं, और ललिता सखी की सदा अत्यंत प्रिय हैं।

  4. अंतरा ३ संतत सेव्य संत-मुनि-जन की,…

    संत और मुनिजन सदा उनकी सेवा करते हैं; वे अनगिनत दिव्य गुणों की खान हैं। वे श्रीकृष्ण के तन और मन को अपनी ओर खींचने वाली हैं, और समता (सबके प्रति समभाव) की अत्यंत अनमोल संपत्ति हैं।

  5. अंतरा ४ कृष्णात्मिका, कृष्ण-सहचारिणि,…

    वे श्रीकृष्ण की आत्मा-रूप हैं और उनकी सहचरी हैं; दिव्य, चेतन वृंदावन में विहार करती हैं। वे जगत की जननी हैं, जगत के दुख दूर करती हैं, और आदि-अनादि शक्ति हैं, जिनकी महिमा सब ओर व्याप्त है।

भावार्थ

यह आरती राधा जी को केवल श्रीकृष्ण की प्रिया के रूप में नहीं देखती, बल्कि उस शक्ति के रूप में जिससे भक्ति स्वयं खिलती है। वे संसार के तीनों तरह के कष्ट मिटाती हैं, मन में विवेक और वैराग्य जगाती हैं, और प्रभु के चरणों में प्रेम उत्पन्न करती हैं। जो मोहन सबको मोहते हैं, वे भी राधा जी से मोहित हैं; यही इस आरती का सबसे मधुर भाव है।

अंतिम अंतरे में आरती राधा जी का तत्त्व कहती है: वे कृष्ण की आत्मा हैं, उनकी सहचरी हैं, चिन्मय वृंदावन में विहार करती हैं, और जगत की जननी, आदि-अनादि शक्ति हैं। इस तरह आरती माधुर्य (प्रेम) और ऐश्वर्य (महिमा), दोनों को एक साथ गाती है।

कठिन शब्दों के अर्थ

वृषभानुसुता
वृषभानु जी की पुत्री, राधा जी
मंजु
सुंदर
मोहन-ममता
श्रीकृष्ण का स्नेह
त्रिविध ताप
तीन तरह के कष्ट: शरीर-मन के, दैवी और दूसरे प्राणियों से मिलने वाले
संसृति
संसार, जन्म-मरण का चक्र
विवेकविराग
विवेक और वैराग्य
विकासिनि
खिलाने वाली
सुन्दरतम
सबसे सुंदर
मोहनि
मोहने वाली
अविरल
लगातार, बिना रुके
अमिय
अमृत
दोहनि
दुहने वाली, बहाने वाली
ललिता
राधा जी की प्रमुख सखी
संतत
सदा
सेव्य
सेवा के योग्य
आकर
खान
गन
समूह
आकर्षिणी
अपनी ओर खींचने वाली
समता
सबके प्रति समभाव
कृष्णात्मिका
श्रीकृष्ण की आत्मा-रूप
सहचारिणि
साथ रहने वाली, संगिनी
चिन्मय
चेतना से बना, दिव्य
विपिन
वन
विभुता
व्यापकता, ऐश्वर्य

यह आरती कब गाई जाती है

  • राधाष्टमी पर (भाद्रपद शुक्ल अष्टमी)
  • राधा-कृष्ण की युगल पूजा और रोज़ की सेवा में
  • जन्माष्टमी या एकादशी पर श्रीकृष्ण की आरती के साथ

आरती कैसे करें

  • राधा-कृष्ण के युगल चित्र या विग्रह के सामने घी का दीपक जलाएँ; फूल और तुलसी दल चढ़ाने की परंपरा है।
  • खड़े होकर, घंटी या मंजीरे के साथ आरती गाएँ और दीपक को धीरे-धीरे घुमाएँ।
  • हर अंतरे के बाद मुखड़ा “आरति श्रीवृषभानुसुता की” दोहराया जाता है।
  • भाषा कुछ कठिन है, इसलिए पहली बार गाने से पहले नीचे दिए अर्थ एक बार पढ़ लें।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
मुखड़ाआरती श्री वृषभानुसुता की, मंजुल मूर्ति मोहन ममता कीभक्ति भारत और द्रिक पंचांग में “आरती” और “मंजुल”; भारतडिस्कवरी में “मंजु”।
अंतरा 3संतत सेव्य सत मुनि जनकीभक्ति भारत, द्रिक पंचांग और भारतडिस्कवरी में “सत”; गीता प्रेस के दोनों संस्करणों में “संत-मुनि-जनकी”।
अंतरा 4जगजननि जग दुखनिवारिणि, आदि अनादिशक्ति विभुता कीभक्ति भारत की वर्तनी।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
ज्ञात नहीं
ग्रंथ / स्रोत
आरती-संग्रह (गीता प्रेस, गोरखपुर), “श्रीराधाजी” शीर्षक से
भाषा
हिन्दी

संग्रह में रचयिता का नाम नहीं दिया गया है।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): गीता प्रेस के आरती-संग्रह (कोड 153 और नया संस्करण, दोनों archive.org पर स्कैन से पढ़े गए पाठ) का पाठ भक्ति भारत, द्रिक पंचांग और भारतडिस्कवरी से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया। चारों में एक ही चार अंतरे, एक ही क्रम में हैं। यह आरती गीता प्रेस के संग्रह से ही प्रचलित हुई लगती है और वेब पाठ उसी से मेल खाते हैं, इसलिए यहाँ गीता प्रेस का पाठ रखा (वेब पाठों में “मंजुल”, “सत मुनि” जैसे छोटे अंतर हैं)। “मंजु” गीता प्रेस और भारतडिस्कवरी दोनों में है; “संत-मुनि-जन” केवल गीता प्रेस के दोनों संस्करणों में, बाक़ी में “सत मुनि जन”, जिसे पाठभेद में दिया है। मुखड़े में गीता प्रेस की वर्तनी “आरति” रखी, शीर्षक में प्रचलित “आरती”।

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राधा रानी के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

वृषभानुसुता कौन हैं?

वृषभानुसुता यानी वृषभानु की सुता (पुत्री)। ब्रज की परंपरा में राधा जी बरसाना के वृषभानु जी की पुत्री हैं।

यह आरती किसने लिखी?

आरती में रचयिता का नाम नहीं आता। यह गीता प्रेस के आरती-संग्रह में छपी है, पर वहाँ भी रचयिता का नाम नहीं दिया गया।

“त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि” का क्या अर्थ है?

त्रिविध ताप यानी तीन तरह के कष्ट: शरीर और मन के, दैवी कारणों से आए, और दूसरे प्राणियों से मिलने वाले। पंक्ति कहती है कि राधा जी इन कष्टों से भरे संसार-चक्र को मिटाने वाली हैं।

राधा जी की आरती कब गाएँ?

राधाष्टमी पर विशेष रूप से, और राधा-कृष्ण की रोज़ की पूजा में, श्रीकृष्ण की आरती के साथ।

क्या यह और “आरति श्रीवृषभानुलली की” एक ही आरती हैं?

नहीं। “आरति श्रीवृषभानुलली की, सत-चित-आनँद-कन्द-कली की” राधा जी की एक दूसरी आरती है, जो गीता प्रेस के आरती-संग्रह में इसके ठीक बाद छपी है।

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