आरती श्री वृषभानुसुता की
राधा · आरती
आरति श्रीवृषभानुसुता की

स्तोत्र · राधा, राधा-कृष्ण · स्तोत्र
"कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्": श्री राधा की कृपा-दृष्टि माँगने वाला स्तोत्र, परंपरा में ऊर्ध्वाम्नाय तन्त्र का और शिव का कहा माना जाता है।
मुनीन्द्रवृन्दवन्दिते त्रिलोकशोकहारिणिप्रसन्नवक्त्रपङ्कजे निकुञ्जभूविलासिनि ।व्रजेन्द्रभानुनन्दिनि व्रजेन्द्रसूनुसङ्गतेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥१॥
munīndravṛndavandite trilokaśokahāriṇi
prasannavaktrapaṅkaje nikuñjabhūvilāsini |
vrajendrabhānunandini vrajendrasūnusaṅgate
kadā kariṣyasīha māṃ kṛpākaṭākṣabhājanam ||
अर्थ: हे श्रेष्ठ मुनियों के समूह से वंदित, तीनों लोकों का शोक हरने वाली, प्रसन्न कमल-मुख वाली, निकुंज-भूमि में विहार करने वाली, व्रज के राजा वृषभानु की नंदिनी, व्रजराज के पुत्र (श्री कृष्ण) की संगिनी राधे! आप मुझे कब अपनी कृपा-दृष्टि का पात्र बनाएँगी?
अशोकवृक्षवल्लरीवितानमण्डपस्थितेप्रवालबालपल्लवप्रभारुणाङ्घ्रिकोमले ।वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालयेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥२॥
aśokavṛkṣavallarīvitānamaṇḍapasthite
pravālabālapallavaprabhāruṇāṅghrikomale |
varābhayasphuratkare prabhūtasampadālaye
kadā kariṣyasīha māṃ kṛpākaṭākṣabhājanam ||
अर्थ: हे अशोक वृक्ष की लताओं से बने छायादार मंडप में विराजने वाली, मूँगे और नए कोमल पत्तों की आभा जैसे लाल, कोमल चरणों वाली, वर और अभय देने वाले चमकते हाथों वाली, अपार संपदा की धाम राधे! आप मुझे कब अपनी कृपा-दृष्टि का पात्र बनाएँगी?
अनङ्गरङ्गमङ्गलप्रसङ्गभङ्गुरभ्रुवांसविभ्रमं ससम्भ्रमं दृगन्तबाणपातनैः ।निरन्तरं वशीकृतप्रतीतनन्दनन्दनेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥३॥
anaṅgaraṅgamaṅgalaprasaṅgabhaṅgurabhruvāṃ
savibhramaṃ sasambhramaṃ dṛgantabāṇapātanaiḥ |
nirantaraṃ vaśīkṛtapratītanandanandane
kadā kariṣyasīha māṃ kṛpākaṭākṣabhājanam ||
अर्थ: हे राधे, प्रेम-लीला के मंगल प्रसंगों में तिरछी होती भौंहों के साथ, विलास और चकित भाव से नयनों के कोर से बाण चलाकर जिन्होंने प्रसिद्ध नंदनंदन को सदा के लिए वश में कर लिया है! आप मुझे कब अपनी कृपा-दृष्टि का पात्र बनाएँगी?
तडित्सुवर्णचम्पकप्रदीप्तगौरविग्रहेमुखप्रभापरास्तकोटिशारदेन्दुमण्डले ।विचित्रचित्रसञ्चरच्चकोरशावलोचनेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष भाजनम् ॥४॥
taḍitsuvarṇacampakapradīptagauravigrahe
mukhaprabhāparāstakoṭiśāradendumaṇḍale |
vicitracitrasañcaraccakoraśāvalocane
kadā kariṣyasīha māṃ kṛpākaṭākṣa bhājanam ||
अर्थ: हे बिजली, सोने और चंपा के फूल जैसी दमकती गोरी देह वाली, जिनके मुख की कांति करोड़ों शरद-पूर्णिमा के चंद्रमाओं को मात देती है, जिनकी आँखें चकोर के बच्चे की तरह विचित्र ढंग से चंचल घूमती हैं! आप मुझे कब अपनी कृपा-दृष्टि का पात्र बनाएँगी?
मदोन्मदातियौवने प्रमोदमानमण्डितेप्रियानुरागरञ्जिते कलाविलासपण्डिते ।अनन्यधन्यकुञ्जराज्यकामकेलिकोविदेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥५॥
madonmadātiyauvane pramodamānamaṇḍite
priyānurāgarañjite kalāvilāsapaṇḍite |
ananyadhanyakuñjarājyakāmakelikovide
kadā kariṣyasīha māṃ kṛpākaṭākṣabhājanam ||
अर्थ: हे यौवन के उल्लास से भरी, आनंद और मान से सजी, प्रियतम के अनुराग में रँगी, कलाओं के विलास में निपुण, अनुपम और धन्य कुंज-राज्य में प्रेम-क्रीड़ा में कुशल राधे! आप मुझे कब अपनी कृपा-दृष्टि का पात्र बनाएँगी?
अशेषहावभावधीरहीरहारभूषितेप्रभूतशातकुम्भकुम्भकुम्भिकुम्भसुस्तनि ।प्रशस्तमन्दहास्यचूर्णपूर्णसौख्यसागरेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥६॥
aśeṣahāvabhāvadhīrahīrahārabhūṣite
prabhūtaśātakumbhakumbhakumbhikumbhasustani |
praśastamandahāsyacūrṇapūrṇasaukhyasāgare
kadā kariṣyasīha māṃ kṛpākaṭākṣabhājanam ||
अर्थ: हे सब तरह के हाव-भाव, धैर्य और हीरों के हारों से सजी, सोने के कलशों और गजराज के कुंभ जैसे सुडौल वक्ष वाली, अपनी सुंदर मंद मुस्कान रूपी चूर्ण से भरे सुख का सागर राधे! आप मुझे कब अपनी कृपा-दृष्टि का पात्र बनाएँगी?
मृणालवालवल्लरी तरङ्गरङ्गदोर्लतेलताग्रलास्यलोलनीललोचनावलोकने ।ललल्लुलन्मलन्मनोज्ञमुग्धमोहनाश्रितेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥७॥
mṛṇālavālavallarī taraṅgaraṅgadorlate
latāgralāsyalolanīlalocanāvalokane |
lalallulanmalanmanojñamugdhamohanāśrite
kadā kariṣyasīha māṃ kṛpākaṭākṣabhājanam ||
अर्थ: हे कमल-नाल की कोमल बेल की तरह लहरों में लहराती भुजाओं वाली, लता के सिरे की तरह थिरकती चंचल नीली आँखों से देखने वाली, चंचल, मनोहर और मुग्ध करने वाले मोहन (श्री कृष्ण) जिनका आश्रय लेते हैं! आप मुझे कब अपनी कृपा-दृष्टि का पात्र बनाएँगी?
सुवर्णमालिकाञ्चितत्रिरेखकम्बुकण्ठगेत्रिसूत्रमङ्गलीगुणत्रिरत्नदीप्तिदीधिते ।सलोलनीलकुन्तलप्रसूनगुच्छगुम्फितेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥८॥
suvarṇamālikāñcitatrirekhakambukaṇṭhage
trisūtramaṅgalīguṇatriratnadīptidīdhite |
salolanīlakuntalaprasūnagucchagumphite
kadā kariṣyasīha māṃ kṛpākaṭākṣabhājanam ||
अर्थ: हे सोने की माला से सजे, तीन रेखाओं वाले शंख जैसे कंठ वाली, जिनके गले में तीन लड़ियों का मंगल-सूत्र और तीन रत्नों की चमक है, जिनके लहराते नीले-काले केश फूलों के गुच्छों से गुँथे हैं! आप मुझे कब अपनी कृपा-दृष्टि का पात्र बनाएँगी?
नितम्बबिम्बलम्बमानपुष्पमेखलागुणेप्रशस्तरत्नकिङ्किणीकलापमध्यमञ्जुले ।करीन्द्रशुण्डदण्डिकावरोहसौभगोरुकेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥९॥
nitambabimbalambamānapuṣpamekhalāguṇe
praśastaratnakiṅkiṇīkalāpamadhyamañjule |
karīndraśuṇḍadaṇḍikāvarohasaubhagoruke
kadā kariṣyasīha māṃ kṛpākaṭākṣabhājanam ||
अर्थ: हे जिनकी कमर पर फूलों की करधनी लटक रही है, रत्नजड़ित घुँघरुओं के समूह से जिनका कटि-भाग मनोहर है, जिनकी जंघाएँ गजराज की सूँड़ जैसी सुडौल और सुंदर हैं! आप मुझे कब अपनी कृपा-दृष्टि का पात्र बनाएँगी?
अनेकमन्त्रनादमञ्जुनूपुरारवस्खल-त्समाजराजहंसवंशनिक्वणातिगौरवे ।विलोलहेमवल्लरीविडम्बिचारुचङ्क्रमेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥१०॥
anekamantranādamañjunūpurāravaskhala-
tsamājarājahaṃsavaṃśanikvaṇātigaurave |
vilolahemavallarīviḍambicārucaṅkrame
kadā kariṣyasīha māṃ kṛpākaṭākṣabhājanam ||
अर्थ: हे जिनके पायलों की मधुर रुनझुन अनेक मंत्रों के नाद जैसी है और राजहंसों के झुंड की कूजन से भी अधिक गरिमा वाली है, जिनकी चाल हिलती सुनहरी लता जैसी सुंदर है! आप मुझे कब अपनी कृपा-दृष्टि का पात्र बनाएँगी?
अनन्तकोटिविष्णुलोकनम्रपद्मजार्चितेहिमाद्रिजापुलोमजाविरिञ्चजावरप्रदे ।अपारसिद्धिऋद्धिदिग्धसत्पदाङ्गुलीनखेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥११॥
anantakoṭiviṣṇulokanamrapadmajārcite
himādrijāpulomajāviriñcajāvaraprade |
apārasiddhiṛddhidigdhasatpadāṅgulīnakhe
kadā kariṣyasīha māṃ kṛpākaṭākṣabhājanam ||
अर्थ: हे जिन्हें अनन्त करोड़ विष्णुलोकों में वंदित लक्ष्मी जी भी पूजती हैं, जो पार्वती, इन्द्राणी और सरस्वती को वर देती हैं, जिनके सुंदर चरणों की उँगलियों के नखों में अपार सिद्धियाँ और समृद्धियाँ भरी हैं! आप मुझे कब अपनी कृपा-दृष्टि का पात्र बनाएँगी?
मखेश्वरि क्रियेश्वरि स्वधेश्वरि सुरेश्वरित्रिवेदभारतीश्वरि प्रमाणशासनेश्वरि ।रमेश्वरि क्षमेश्वरि प्रमोदकाननेश्वरिव्रजेश्वरि व्रजाधिपे श्रीराधिके नमोऽस्तु ते ॥१२॥
makheśvari kriyeśvari svadheśvari sureśvari
trivedabhāratīśvari pramāṇaśāsaneśvari |
rameśvari kṣameśvari pramodakānaneśvari
vrajeśvari vrajādhipe śrīrādhike namo’stu te ||
अर्थ: हे यज्ञों की स्वामिनी, कर्मों की स्वामिनी, स्वधा (पितृ-अर्पण) की स्वामिनी, देवताओं की स्वामिनी, तीनों वेदों और वाणी की स्वामिनी, प्रमाण और अनुशासन की स्वामिनी, लक्ष्मी की, क्षमा की और आनंद-वन (वृन्दावन) की स्वामिनी, व्रज की स्वामिनी, व्रज की अधिपति श्री राधिके! आपको नमस्कार है।
अमुं ममाद्भुतं स्तवं निशम्य भानुनन्दनीकरोतु सन्ततं जनं कृपाकटाक्षभाजनम् ।भवेत्तदैव सञ्चितत्रिरूपकर्मनाशनंलभेत्तदा व्रजेन्द्रसूनुमण्डलप्रवेशनम् ॥१३॥
amuṃ mamādbhutaṃ stavaṃ niśamya bhānunandanī
karotu santataṃ janaṃ kṛpākaṭākṣabhājanam |
bhavettadaiva sañcitatrirūpakarmanāśanaṃ
labhettadā vrajendrasūnumaṇḍalapraveśanam ||
अर्थ: मेरे इस अद्भुत स्तव को सुनकर वृषभानु-नंदिनी (राधा जी) इसे पढ़ने वाले को सदा अपनी कृपा-दृष्टि का पात्र बनाएँ। तब उसी समय उसके संचित तीनों प्रकार के कर्म नष्ट हों, और तब वह व्रजराज-नंदन (श्री कृष्ण) के मंडल में प्रवेश पाए।
फलश्रुतिः
राकायां च सिताष्टम्यां दशम्यां च विशुद्धधीः ।एकादश्यां त्रयोदश्यां यः पठेत्साधकः सुधीः ॥१४॥
rākāyāṃ ca sitāṣṭamyāṃ daśamyāṃ ca viśuddhadhīḥ |
ekādaśyāṃ trayodaśyāṃ yaḥ paṭhetsādhakaḥ sudhīḥ ||
अर्थ: जो शुद्ध बुद्धि वाला, समझदार साधक पूर्णिमा को, शुक्ल पक्ष की अष्टमी, दशमी, एकादशी और त्रयोदशी को इसका पाठ करता है (उसका फल अगले श्लोक में है)।
यं यं कामयते कामं तं तमाप्नोति साधकः ।राधाकृपाकटाक्षेण भक्तिःस्यात् प्रेमलक्षणा ॥१५॥
yaṃ yaṃ kāmayate kāmaṃ taṃ tamāpnoti sādhakaḥ |
rādhākṛpākaṭākṣeṇa bhaktiḥsyāt premalakṣaṇā ||
अर्थ: वह साधक जिस-जिस इच्छा की कामना करता है, उसे पाता है, और राधा जी की कृपा-दृष्टि से उसे प्रेम-लक्षणा भक्ति (प्रेम-रूपी भक्ति) मिलती है, ऐसा फलश्रुति कहती है।
ऊरुदघ्ने नाभिदघ्ने हृद्दघ्ने कण्ठदघ्नके ।राधाकुण्डजले स्थित्वा यः पठेत्साधकस्तु सः ॥१६॥
ūrudaghne nābhidaghne hṛddaghne kaṇṭhadaghnake |
rādhākuṇḍajale sthitvā yaḥ paṭhetsādhakastu saḥ ||
अर्थ: जो साधक राधाकुंड के जल में जाँघ तक, नाभि तक, छाती तक या गले तक खड़े होकर इसका पाठ करता है (उसका फल अगले श्लोकों में है)।
तस्य सर्वार्थसिद्धिः स्याद्वाक्सामर्थ्यं तथा लभेत् ।ऐश्वर्यं च लभेत्साक्षाद्दृशा पश्यति राधिकाम् ॥१७॥
tasya sarvārthasiddhiḥ syādvāksāmarthyaṃ tathā labhet |
aiśvaryaṃ ca labhetsākṣāddṛśā paśyati rādhikām ||
अर्थ: उसके सब प्रयोजन सिद्ध होते हैं, उसे वाणी का सामर्थ्य मिलता है, ऐश्वर्य मिलता है और वह अपनी आँखों से साक्षात् राधा जी के दर्शन करता है, ऐसा फलश्रुति कहती है।
तेन सा तत्क्षणादेव तुष्टा दत्ते महावरम् ।येन पश्यति नेत्राभ्यां तत्प्रियं श्यामसुन्दरम् ॥१८॥
tena sā tatkṣaṇādeva tuṣṭā datte mahāvaram |
yena paśyati netrābhyāṃ tatpriyaṃ śyāmasundaram ||
अर्थ: उस (पाठ) से राधा जी उसी क्षण प्रसन्न होकर ऐसा महान वर देती हैं, जिससे वह अपनी आँखों से उनके प्रिय श्यामसुंदर को देखता है, ऐसा फलश्रुति कहती है।
नित्यलीलाप्रवेशं च ददाति श्रीव्रजाधिपः ।अतः परतरं प्रार्थ्यं वैष्णवस्य न विद्यते ॥१९॥
nityalīlāpraveśaṃ ca dadāti śrīvrajādhipaḥ |
ataḥ parataraṃ prārthyaṃ vaiṣṇavasya na vidyate ||
अर्थ: और व्रज के स्वामी श्री कृष्ण उसे अपनी नित्य लीला में प्रवेश देते हैं। एक वैष्णव के लिए इससे बढ़कर माँगने योग्य कुछ नहीं है, ऐसा यह स्तोत्र कहता है।
राधा कृपाकटाक्ष स्तोत्र (स्तवराज) में भक्त हर श्लोक के अंत में एक ही प्रश्न पूछता है: "कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्", हे राधे, आप मुझे कब अपनी कृपा-भरी दृष्टि का पात्र बनाएँगी? पहले ग्यारह श्लोकों में राधा जी के रूप, शृंगार, चाल और महिमा का वर्णन है, बारहवें में उन्हें अनेक नामों से नमस्कार है, और तेरहवें में स्तोत्र का सार। इसके बाद छह श्लोकों की फलश्रुति है।
परंपरा इसे ऊर्ध्वाम्नाय तन्त्र का अंश और भगवान शिव का कहा हुआ मानती है; sanskritdocuments.org और bhaktibharat.com दोनों इसे ऊर्ध्वाम्नाय से जोड़ते हैं। यह परंपरा का कथन है; उस तन्त्र का कोई छपा संस्करण हमने नहीं देखा। ब्रज और वृन्दावन में यह स्तोत्र बहुत गाया जाता है।
इस स्तोत्र का भाव एक ही है: भक्त को और कुछ नहीं, बस राधा जी की कृपा-भरी एक दृष्टि चाहिए। इसके लिए वह राधा जी का ध्यान करता है: निकुंज में विहार करती, वृषभानु की नंदिनी, बिजली और सोने जैसी गोरी, चकोर जैसी चंचल आँखों वाली, फूलों से गुँथे केशों वाली, पायलों की रुनझुन के साथ सुनहरी लता जैसी चलती राधा। हर वर्णन के बाद वही प्रश्न लौटता है: "कब?"
बीच-बीच में उनकी महिमा भी है: वे अपने प्रेम से नंदनंदन को वश में रखती हैं, लक्ष्मी जी उनकी पूजा करती हैं, पार्वती, इन्द्राणी और सरस्वती को वे वर देती हैं। बारहवें श्लोक में उन्हें यज्ञ, कर्म, वेद, वाणी, क्षमा और वृन्दावन की स्वामिनी कहकर प्रणाम है।
तेरहवें श्लोक में स्तोत्र का सार है: राधा जी की कृपा-दृष्टि मिलते ही कर्मों का बंधन कटता है और भक्त श्री कृष्ण के लीला-मंडल में प्रवेश पाता है। गौड़ीय और ब्रज की भक्ति-परंपरा में राधा जी की कृपा को ही कृष्ण-प्रेम का द्वार माना जाता है; यह स्तोत्र उसी भाव की प्रार्थना है।
इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक 14–19) कहती है कि पूर्णिमा और शुक्ल पक्ष की अष्टमी, दशमी, एकादशी व त्रयोदशी को इसे पढ़ने वाले साधक की कामनाएँ पूरी होती हैं और उसे प्रेम-भक्ति मिलती है; और राधाकुंड के जल में खड़े होकर पढ़ने वाले को राधा जी और श्यामसुंदर के दर्शन तथा नित्य लीला में प्रवेश मिलता है। ये स्तोत्र के अपने कथन हैं; हम इन्हें किसी फल के वादे के रूप में नहीं देते।
राकायां च सिताष्टम्यां दशम्यां च विशुद्धधीः ।
एकादश्यां त्रयोदश्यां यः पठेत्साधकः सुधीः ॥जो शुद्ध बुद्धि वाला, समझदार साधक पूर्णिमा को, शुक्ल पक्ष की अष्टमी, दशमी, एकादशी और त्रयोदशी को इसका पाठ करता है (उसका फल अगले श्लोक में है)।
यं यं कामयते कामं तं तमाप्नोति साधकः ।
राधाकृपाकटाक्षेण भक्तिःस्यात् प्रेमलक्षणा ॥वह साधक जिस-जिस इच्छा की कामना करता है, उसे पाता है, और राधा जी की कृपा-दृष्टि से उसे प्रेम-लक्षणा भक्ति (प्रेम-रूपी भक्ति) मिलती है, ऐसा फलश्रुति कहती है।
ऊरुदघ्ने नाभिदघ्ने हृद्दघ्ने कण्ठदघ्नके ।
राधाकुण्डजले स्थित्वा यः पठेत्साधकस्तु सः ॥जो साधक राधाकुंड के जल में जाँघ तक, नाभि तक, छाती तक या गले तक खड़े होकर इसका पाठ करता है (उसका फल अगले श्लोकों में है)।
तस्य सर्वार्थसिद्धिः स्याद्वाक्सामर्थ्यं तथा लभेत् ।
ऐश्वर्यं च लभेत्साक्षाद्दृशा पश्यति राधिकाम् ॥उसके सब प्रयोजन सिद्ध होते हैं, उसे वाणी का सामर्थ्य मिलता है, ऐश्वर्य मिलता है और वह अपनी आँखों से साक्षात् राधा जी के दर्शन करता है, ऐसा फलश्रुति कहती है।
तेन सा तत्क्षणादेव तुष्टा दत्ते महावरम् ।
येन पश्यति नेत्राभ्यां तत्प्रियं श्यामसुन्दरम् ॥उस (पाठ) से राधा जी उसी क्षण प्रसन्न होकर ऐसा महान वर देती हैं, जिससे वह अपनी आँखों से उनके प्रिय श्यामसुंदर को देखता है, ऐसा फलश्रुति कहती है।
नित्यलीलाप्रवेशं च ददाति श्रीव्रजाधिपः ।
अतः परतरं प्रार्थ्यं वैष्णवस्य न विद्यते ॥और व्रज के स्वामी श्री कृष्ण उसे अपनी नित्य लीला में प्रवेश देते हैं। एक वैष्णव के लिए इससे बढ़कर माँगने योग्य कुछ नहीं है, ऐसा यह स्तोत्र कहता है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| श्लोक 1, तीसरा चरण | व्रजेन्द्रभानुनन्दनि | sanskritdocuments.org की वर्तनी; यहाँ bhaktibharat.com का "नन्दिनि" रखा गया। |
| श्लोक 3, तीसरा चरण | वशीकृतप्रतीतिनन्दनन्दने | sanskritdocuments.org का पाठ; bhaktibharat.com में "प्रतीत" (प्रसिद्ध) है, जो यहाँ रखा गया। |
| श्लोक 6, दूसरा चरण | प्रभूतशातकुम्भकुम्भकुम्भकुम्भसुस्तनि | sanskritdocuments.org का पाठ; bhaktibharat.com का "कुम्भिकुम्भ" (हाथी का कुंभ) रखा गया, जो उसी पृष्ठ के अंग्रेज़ी अनुवाद से भी मेल खाता है। |
| श्लोक 7, तीसरा चरण | ललल्लुलन्मिलन्मनोज्ञमुग्धमोहिनाश्रिते | bhaktibharat.com का पाठ; यहाँ sanskritdocuments.org की पंक्ति रखी गई है। |
| श्लोक 9, 10, 11 के तीसरे चरण | करीन्द्रशुण्डदण्डकावराहसौभगोरुके / विलोलहेमवल्लरीविडम्बचारुचङ्क्रमे / अपारसिद्धिऋद्धिदिग्धसम्पदङ्गुलीनखे | sanskritdocuments.org के पाठ; यहाँ bhaktibharat.com के "दण्डिकावरोह", "विडम्बि" और "सत्पदाङ्गुली" रखे गए। |
| श्लोक 13, चौथा चरण | भवेत्तदा व्रजेन्द्रसूनुमण्डलप्रवेशनम् | sanskritdocuments.org का पाठ; bhaktibharat.com में "लभेत्तदा" है, जो यहाँ रखा गया। |
| श्लोक 14–19 (फलश्रुति) | यः पठेत्सशिवः स्वयम् (14); भुक्त्वान्ते मोक्षमाप्नुयात् (15); वाक्सिद्धिञ्च (17); पश्यन्ति (17, 18); नित्यलीलाप्रवेश्यञ्च, प्राप्त्यै (19) | sanskritdocuments.org के पाठ में फलश्रुति के ये शब्द अलग हैं, जबकि उसी पृष्ठ का अंग्रेज़ी अनुवाद bhaktibharat.com वाले पाठ ("भक्तिःस्यात् प्रेमलक्षणा") के अनुसार है। यहाँ फलश्रुति bhaktibharat.com के पाठ से है; श्लोक 16 का दूसरा चरण और श्लोक 18 का पहला चरण sanskritdocuments.org से लिए गए। |
| श्लोक 16, दूसरा चरण | राधाकुण्डजले स्थिता यः पठेत् साधकः शतम् | bhaktibharat.com का पाठ ("सौ बार पढ़ता है")। |
परंपरा के अनुसार यह स्तोत्र ऊर्ध्वाम्नाय तन्त्र में भगवान शिव का कहा हुआ है। यह परंपरा का दावा है; इसकी ऐतिहासिक पुष्टि नहीं होती।
sanskritdocuments.org के पाठ का समापन इसे "ऊर्ध्वाम्नायतन्त्रान्तर्गत" और bhaktibharat.com का पाठ "श्रीमदूर्ध्वाम्नाये" बताता है।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): उन्नीस श्लोक sanskritdocuments.org और bhaktibharat.com के पाठ से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाए गए। श्लोक 1–13 में ज़्यादातर पंक्तियाँ दोनों में एक जैसी हैं; जहाँ sanskritdocuments.org में साफ़ टाइप-भूल दिखी (जैसे "कुम्भकुम्भकुम्भकुम्भ", "दश्म्याञ्च"), वहाँ bhaktibharat.com की पंक्ति ली गई और दूसरा पाठ पाठ-भेद में दिया गया। इस स्तोत्र के लिए कोई तीसरा देवनागरी स्रोत (vignanam.org, stotranidhi.com, wikisource) नहीं मिला, इसलिए दोनों स्रोतों में से हर पंक्ति के लिए व्याकरण और अर्थ से ठीक बैठने वाला पाठ चुना गया। फलश्रुति का पाठ सबसे अस्थिर है; इसे स्तोत्र के अपने कथन के रूप में दिया गया है।
राधा · आरती
आरति श्रीवृषभानुसुता की
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आरती कुंजबिहारी की,
कृष्ण · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
घर में जन्माष्टमी की पूजा: दिन का व्रत, आधी रात को श्री कृष्ण के जन्म पर पंचामृत अभिषेक, पालना, भोग, आरती और पारण, हर सामग्री के विकल्प के साथ।
बाल गोपाल · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में लड्डू गोपाल की रोज़ की सेवा, बालक की तरह: जगाना, स्नान, शृंगार, दिन भर के भोग, आरती और शयन, सरल विकल्पों और परंपराओं के अंतर के साथ।
खाटू श्याम · आरती
ॐ जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे
कृष्ण · चालीसा
बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम
परंपरा इसे ऊर्ध्वाम्नाय तन्त्र का अंश और भगवान शिव का कहा हुआ मानती है। यह परंपरा का कथन है; इसके रचयिता के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता।
कटाक्ष यानी आँख के कोने से डाली गई दृष्टि, और कृपाकटाक्ष यानी कृपा से भरी ऐसी दृष्टि। भक्त राधा जी से इसी दृष्टि का पात्र बनाने की प्रार्थना करता है।
इसकी फलश्रुति पूर्णिमा और शुक्ल पक्ष की अष्टमी, दशमी, एकादशी और त्रयोदशी का नाम लेती है। राधा अष्टमी पर भी यह विशेष रूप से पढ़ा जाता है, और रोज़ भी पढ़ा जा सकता है।
नहीं। फलश्रुति राधाकुंड में पाठ की महिमा बताती है, पर इसे घर पर या कहीं भी श्रद्धा से पढ़ा जा सकता है; कोई अनिवार्य नियम नहीं है।
यह स्तोत्र मौखिक परंपरा और अलग-अलग प्रतियों से छपा है, इसलिए कई जगह वर्तनी और शब्द बदल गए हैं, ख़ासकर फलश्रुति में। मुख्य अंतर पाठ-भेद में दिए गए हैं।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।