अन्नपूर्णा

आरती · अन्नपूर्णा

बारम्बार प्रणाम मैया

अन्न की देवी माँ अन्नपूर्णा की आरती 'बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम': पूरा पाठ, हर अंतरे का सरल अर्थ, कठिन शब्द और पाठांतर।

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  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. अंतरा-वार अर्थ
  4. भावार्थ
  5. कठिन शब्द
  6. कब पढ़ें
  7. विधि
  8. पाठ-भेद
  9. रचयिता और स्रोत
  10. ये भी पढ़ें
  11. सवाल-जवाब
  12. सुधार सुझाएँ

बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम।जो नहीं ध्यावे तुम्हें अम्बिके, कहां उसे विश्राम।अन्नपूर्णा देवी नाम तिहारो, लेत होत सब काम॥

अर्थ: हे मैया, आपको बार-बार प्रणाम है। हे अम्बिके, जो आपका ध्यान नहीं करता, उसे कहाँ विश्राम (शांति) मिलेगा? हे अन्नपूर्णा देवी, आपका नाम लेने से सब काम बन जाते हैं।

प्रलय युगान्तर और जन्मान्तर, कालान्तर तक नाम।सुर सुरों की रचना करती, कहाँ कृष्ण कहाँ राम॥

॥ बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम ॥

अर्थ: प्रलय, युगों के बदलने, जन्मों के बदलने और समय के बदलने तक आपका नाम बना रहता है। आप ही देवताओं की रचना करती हैं; आपकी शक्ति के बिना कहाँ कृष्ण होते और कहाँ राम।

चूमहि चरण चतुर चतुरानन, चारु चक्रधर श्याम।चन्द्र चूड़ चन्द्रानन चाकर, शोभा लखहि ललाम॥

॥ बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम ॥

अर्थ: चतुर ब्रह्मा (चतुरानन) और सुन्दर चक्रधारी श्याम (विष्णु) आपके चरण चूमते हैं। सिर पर चन्द्रमा धारण करने वाले, चन्द्रमा जैसे मुख वाले शिव आपके सेवक हैं और आपकी मनोहर शोभा निहारते हैं।

देवी देव दयनीय दशा में, दया दया तव नाम।त्राहि-त्राहि शरणागत वत्सल, शरण रूप तव धाम॥

॥ बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम ॥

अर्थ: हे देवी, जब देवता भी दयनीय दशा में होते हैं, तब 'दया, दया' कहकर आपका नाम लेते हैं। हे शरण में आए पर स्नेह करने वाली, रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए; आपका धाम ही सबकी शरण है।

श्रीं, ह्रीं, श्रद्धा, श्रीं ऐं विद्या, श्रीं क्लीं कमल काम।कान्तिभ्रांतिमयी कांति शांतिमयी वर देतु निष्काम॥

॥ बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम ॥

अर्थ: यह अंतरा बीज-अक्षरों के साथ देवी के रूप गिनाता है: श्रीं-ह्रीं के साथ श्रद्धा, श्रीं-ऐं के साथ विद्या, और श्रीं-क्लीं के साथ कमला और काम। आप कान्ति और भ्रान्ति (माया) से भरी हैं, कान्ति और शांति से भरी हैं, और निष्काम भाव से वर देती हैं।

हर अंतरे का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।

परिचय

'बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम' अन्न की देवी माँ अन्नपूर्णा की आरती है। काशी में अन्नपूर्णा देवी का प्रसिद्ध मंदिर है, और परंपरा उन्हें माँ पार्वती का वह रूप मानती है जो सारे संसार को अन्न देता है।

आरती की भाषा ब्रज-मिली और अलंकारों से भरी है: दूसरे अंतरे में 'च' अक्षर की और तीसरे में 'द' अक्षर की झड़ी लगी है। अंतिम अंतरे में श्रीं, ह्रीं, ऐं, क्लीं जैसे बीज-अक्षरों के साथ देवी को श्रद्धा, विद्या और कमला (लक्ष्मी) के रूप में याद किया गया है।

अंतरा-वार अर्थ

  1. मुखड़ा बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम…

    हे मैया, आपको बार-बार प्रणाम है। हे अम्बिके, जो आपका ध्यान नहीं करता, उसे कहाँ विश्राम (शांति) मिलेगा? हे अन्नपूर्णा देवी, आपका नाम लेने से सब काम बन जाते हैं।

  2. अंतरा १ प्रलय युगान्तर और जन्मान्तर, कालान्तर तक नाम…

    प्रलय, युगों के बदलने, जन्मों के बदलने और समय के बदलने तक आपका नाम बना रहता है। आप ही देवताओं की रचना करती हैं; आपकी शक्ति के बिना कहाँ कृष्ण होते और कहाँ राम।

  3. अंतरा २ चूमहि चरण चतुर चतुरानन, चारु चक्रधर श्याम…

    चतुर ब्रह्मा (चतुरानन) और सुन्दर चक्रधारी श्याम (विष्णु) आपके चरण चूमते हैं। सिर पर चन्द्रमा धारण करने वाले, चन्द्रमा जैसे मुख वाले शिव आपके सेवक हैं और आपकी मनोहर शोभा निहारते हैं।

  4. अंतरा ३ देवी देव दयनीय दशा में, दया दया तव नाम…

    हे देवी, जब देवता भी दयनीय दशा में होते हैं, तब 'दया, दया' कहकर आपका नाम लेते हैं। हे शरण में आए पर स्नेह करने वाली, रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए; आपका धाम ही सबकी शरण है।

  5. अंतरा ४ श्रीं, ह्रीं, श्रद्धा, श्रीं ऐं विद्या, श्रीं क्लीं कमल काम…

    यह अंतरा बीज-अक्षरों के साथ देवी के रूप गिनाता है: श्रीं-ह्रीं के साथ श्रद्धा, श्रीं-ऐं के साथ विद्या, और श्रीं-क्लीं के साथ कमला और काम। आप कान्ति और भ्रान्ति (माया) से भरी हैं, कान्ति और शांति से भरी हैं, और निष्काम भाव से वर देती हैं।

भावार्थ

अन्नपूर्णा का अर्थ है अन्न से भरी हुई। यह आरती उस माँ को बार-बार प्रणाम करती है जिसके बिना न विश्राम है, न कोई काम बनता है। उसकी महिमा प्रलय और युगों के बदलने तक बनी रहती है, देवताओं की रचना वही करती है, और ब्रह्मा, विष्णु और शिव तक उसके चरणों में हैं।

फिर आरती विनती बन जाती है: जब देवता भी संकट में पड़ते हैं तो 'दया, दया' कहकर माँ का नाम लेते हैं, और भक्त भी 'त्राहि-त्राहि' कहकर उसी की शरण माँगता है। अंत में बीज-अक्षरों के साथ माँ को श्रद्धा, विद्या और लक्ष्मी के रूप में याद किया जाता है, जो बिना किसी स्वार्थ के वर देती हैं।

कठिन शब्दों के अर्थ

बारम्बार
बार-बार
ध्यावे
ध्यान करे
अम्बिके
हे माता
तिहारो
तुम्हारा
प्रलय
सृष्टि का अंत
युगान्तर
युग का बदलना
जन्मान्तर
दूसरा जन्म
कालान्तर
समय का बदलना
सुर
देवता
चतुरानन
चार मुख वाले ब्रह्मा
चक्रधर
चक्र धारण करने वाले विष्णु
चन्द्र चूड़
सिर पर चन्द्रमा धारण करने वाले शिव
चाकर
सेवक
लखहि
देखते हैं
ललाम
सुन्दर
त्राहि
रक्षा करो
शरणागत वत्सल
शरण में आए पर स्नेह करने वाली
धाम
निवास
श्रीं, ह्रीं, ऐं, क्लीं
देवी के मंत्रों के बीज-अक्षर
कान्ति
आभा, चमक
भ्रान्ति
माया, भ्रम
निष्काम
बिना किसी कामना के

यह आरती कब गाई जाती है

  • अन्नपूर्णा जयंती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) पर
  • रसोई, अन्न-भंडार या नए अनाज की पूजा में
  • घर की रोज़ की पूजा में, माँ अन्नपूर्णा के स्मरण के लिए

आरती कैसे करें

  • माँ अन्नपूर्णा के चित्र के सामने या रसोई में किसी साफ़ स्थान पर दीपक जलाएँ; थोड़ा अनाज, चावल या घर में बना भोजन भोग के रूप में रखें।
  • टेक 'बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम' गाएँ और हर अंतरे के बाद इसे दोहराएँ।
  • आरती के बाद भोग का अन्न परिवार में बाँटें; किसी भूखे को भोजन कराना माँ अन्नपूर्णा की सेवा का सबसे सीधा रूप माना जाता है।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
टेकअन्नपूर्णा देवी नाम तिहारे, लेते होत सब कामद्रिक पंचांग में; भारतकोश में 'नाम तिहारो, लेते होत सब काम'
अंतरा 3देवि देव! दयनीय दशा में, दया-दया तब नाम। त्राहि-त्राहि शरणागत वत्सल, शरण रूप तब धाम॥भक्ति भारत और आज तक में
अंतरा 4श्रीं, ह्रीं श्रद्धा श्री ऐ विद्या, श्री क्लीं कमला काम। कांति, भ्रांतिमयी, कांति शांतिमयी, वर दे तू निष्काम॥भक्ति भारत और आज तक में

रचयिता और स्रोत

रचयिता
ज्ञात नहीं
भाषा
हिन्दी

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति द्रिक पंचांग, भक्ति भारत और भारतकोश (bharatdiscovery.org) के पाठ से मिलाई गई; आज तक का पाठ भी देखा गया (भक्ति भारत जैसा)। चारों में टेक, चारों अंतरे और उनका क्रम एक है। आधार द्रिक पंचांग है, जिससे भारतकोश लगभग शब्दशः मिलता है; टेक की अंतिम पंक्ति में 'तिहारो' भक्ति भारत, भारतकोश और आज तक का पाठ है, इसलिए वह पंक्ति भक्ति भारत से ली गई ('नाम तिहारो, लेत होत सब काम')। भारतकोश में 'शारणगत', 'शातिमयी', 'देतुनिष्काम' जैसी छपाई की भूलें हैं। 'सुर सुरों' सब स्रोतों में इसी रूप में है। रचयिता अज्ञात।

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माँ अन्नपूर्णा के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

माँ अन्नपूर्णा कौन हैं?

अन्नपूर्णा अन्न की देवी हैं, जिन्हें माँ पार्वती का रूप माना जाता है। काशी में विश्वनाथ मंदिर के पास उनका प्रसिद्ध मंदिर है।

अन्नपूर्णा जयंती कब होती है?

मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को अन्नपूर्णा जयंती मनाई जाती है। उस दिन रसोई और अन्न की पूजा करके यह आरती गाई जाती है।

'चूमहि चरण चतुर चतुरानन' का क्या अर्थ है?

चतुर ब्रह्मा (चतुरानन) माँ के चरण चूमते हैं। यह पूरा अंतरा 'च' अक्षर के अनुप्रास में है और बताता है कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी माँ के सेवक हैं।

आरती में श्रीं, ह्रीं, ऐं, क्लीं क्यों आते हैं?

ये बीज-अक्षर हैं, जो देवी के मंत्रों में आते हैं। आरती इनके साथ देवी को श्रद्धा, विद्या और कमला (लक्ष्मी) के रूप में याद करती है।

इस आरती के रचयिता कौन हैं?

उपलब्ध स्रोतों में रचयिता का नाम नहीं मिलता और आरती में किसी कवि की छाप भी नहीं है।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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