बारम्बार प्रणाम मैया
अन्नपूर्णा · आरती
बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम

नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरीनिर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी ।प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥१॥
nityānandakarī varābhayakarī saundaryaratnākarī
nirdhūtākhilaghorapāvanakarī pratyakṣamāheśvarī |
prāleyācalavaṃśapāvanakarī kāśīpurādhīśvarī
bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātā’nnapūrṇeśvarī ||
अर्थ: जो सदा आनंद देने वाली हैं, वर और अभय देती हैं, सौंदर्य का सागर हैं, सारे घोर पापों को धोकर पवित्र करने वाली हैं, साक्षात् माहेश्वरी हैं, जिन्होंने हिमालय के वंश को पवित्र किया और जो काशी नगरी की स्वामिनी हैं, ऐसी कृपा का सहारा देने वाली माँ अन्नपूर्णेश्वरी, मुझे भिक्षा दो।
नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरीमुक्ताहारविलम्बमान-विलसद्वक्षोजकुम्भान्तरी ।काश्मीरागरुवासिताङ्गरुचिरा काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥२॥
nānāratnavicitrabhūṣaṇakarī hemāmbarāḍambarī
muktāhāravilambamāna-vilasadvakṣojakumbhāntarī |
kāśmīrāgaruvāsitāṅgarucirā kāśīpurādhīśvarī
bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātā’nnapūrṇeśvarī ||
अर्थ: जो अनेक रत्नों के विचित्र आभूषण पहने हैं, सुनहरे वस्त्रों से शोभित हैं, जिनके वक्ष पर मोतियों का हार लटकता हुआ चमक रहा है, जिनका सुंदर शरीर केसर और अगरु से सुगंधित है, ऐसी काशी की स्वामिनी, कृपा का सहारा देने वाली माँ अन्नपूर्णेश्वरी, मुझे भिक्षा दो।
योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मार्थनिष्ठाकरीचन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी ।सर्वैश्वर्यसमस्तवाञ्छितकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥३॥
yogānandakarī ripukṣayakarī dharmārthaniṣṭhākarī
candrārkānalabhāsamānalaharī trailokyarakṣākarī |
sarvaiśvaryasamastavāñchitakarī kāśīpurādhīśvarī
bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātā’nnapūrṇeśvarī ||
अर्थ: जो योग का आनंद देने वाली, शत्रुओं का नाश करने वाली और धर्म तथा अर्थ में निष्ठा जगाने वाली हैं, जिनकी आभा की लहरें चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि जैसी चमकती हैं, जो तीनों लोकों की रक्षा करती हैं और सारा ऐश्वर्य तथा सब मनचाही वस्तुएँ देती हैं, ऐसी काशी की स्वामिनी माँ अन्नपूर्णेश्वरी, मुझे भिक्षा दो।
कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी उमा शङ्करीकौमारी निगमार्थगोचरकरी ओङ्कारबीजाक्षरी ।मोक्षद्वारकपाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥४॥
kailāsācalakandarālayakarī gaurī umā śaṅkarī
kaumārī nigamārthagocarakarī oṅkārabījākṣarī |
mokṣadvārakapāṭapāṭanakarī kāśīpurādhīśvarī
bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātā’nnapūrṇeśvarī ||
अर्थ: जो कैलास पर्वत की गुफा को अपना घर बनाती हैं, जो गौरी, उमा और शंकरी हैं, कौमारी हैं, वेदों का अर्थ प्रकट करने वाली हैं, ओंकार ही जिनका बीज-अक्षर है और जो मोक्ष के द्वार के किवाड़ खोल देती हैं, ऐसी काशी की स्वामिनी माँ अन्नपूर्णेश्वरी, मुझे भिक्षा दो।
दृश्यादृश्य विभूतिवाहनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरीलीलानाटकसूत्रभेदनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी ।श्रीविश्वेशमनः प्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥५॥
dṛśyādṛśya vibhūtivāhanakarī brahmāṇḍabhāṇḍodarī
līlānāṭakasūtrabhedanakarī vijñānadīpāṅkurī |
śrīviśveśamanaḥ prasādanakarī kāśīpurādhīśvarī
bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātā’nnapūrṇeśvarī ||
अर्थ: जो दिखने वाली और न दिखने वाली सारी विभूतियों को धारण करती हैं, जिनके उदर में ब्रह्माण्ड रूपी पात्र समाया है, जो संसार रूपी लीला-नाटक का सूत्र (बन्धन) काट देती हैं, जो ज्ञान के दीपक की लौ हैं और भगवान विश्वनाथ के मन को प्रसन्न करती हैं, ऐसी काशी की स्वामिनी माँ अन्नपूर्णेश्वरी, मुझे भिक्षा दो।
उर्वी सर्वजनेश्वरी भगवती माताऽन्नपूर्णेश्वरीवेणीनीलसमानकुन्तलधरी नित्यान्नदानेश्वरी ।सर्वानन्दकरी सदाशुभकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥६॥
urvī sarvajaneśvarī bhagavatī mātā’nnapūrṇeśvarī
veṇīnīlasamānakuntaladharī nityānnadāneśvarī |
sarvānandakarī sadāśubhakarī kāśīpurādhīśvarī
bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātā’nnapūrṇeśvarī ||
अर्थ: जो पृथ्वी के सब लोगों की स्वामिनी हैं, भगवती माता अन्नपूर्णेश्वरी हैं, जिनके केश गुँथी वेणी जैसे घने और काले हैं, जो सदा अन्नदान करने वाली ईश्वरी हैं, सबको आनंद देने वाली और सदा कल्याण करने वाली हैं, ऐसी काशी की स्वामिनी माँ अन्नपूर्णेश्वरी, मुझे भिक्षा दो।
आदिक्षान्तसमस्तवर्णनकरी शम्भोस्त्रिभावाकरीकाश्मीरा त्रिजलेश्वरी त्रिलहरी नित्याङ्कुरा शर्वरी ।कामाकाङ्क्षकरी जनोदयकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥७॥
ādikṣāntasamastavarṇanakarī śambhostribhāvākarī
kāśmīrā trijaleśvarī trilaharī nityāṅkurā śarvarī |
kāmākāṅkṣakarī janodayakarī kāśīpurādhīśvarī
bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātā’nnapūrṇeśvarī ||
अर्थ: जो 'अ' से 'क्ष' तक सारी वर्णमाला को प्रकट करती हैं, जो शम्भु के तीनों भावों की रचना करती हैं, जो केसर-सी आभा वाली, तीन जलधाराओं की ईश्वरी, तीन लहरों वाली, सदा नई अंकुरित होने वाली और शर्वरी हैं, जो मनचाही कामनाएँ पूरी करती हैं और लोगों का उदय करती हैं, ऐसी काशी की स्वामिनी माँ अन्नपूर्णेश्वरी, मुझे भिक्षा दो।
देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरीवामे स्वादुपयोधरा प्रियकरी सौभाग्य माहेश्वरी ।भक्ताभीष्टकरी सदाशुभकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥८॥
devī sarvavicitraratnaracitā dākṣāyaṇī sundarī
vāme svādupayodharā priyakarī saubhāgya māheśvarī |
bhaktābhīṣṭakarī sadāśubhakarī kāśīpurādhīśvarī
bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātā’nnapūrṇeśvarī ||
अर्थ: जो देवी तरह-तरह के विचित्र रत्नों से सजी हैं, दक्ष की पुत्री और सुंदरी हैं, जो शिव के बाएँ भाग में विराजती हैं, माँ की तरह मधुर पोषण देती हैं, सबका प्रिय करती हैं, सौभाग्य देने वाली माहेश्वरी हैं, भक्तों की इच्छा पूरी करने वाली और सदा शुभ करने वाली हैं, ऐसी काशी की स्वामिनी माँ अन्नपूर्णेश्वरी, मुझे भिक्षा दो।
चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशुबिम्बाधरीचन्द्रार्काग्निसमानकुण्डलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी ।मालापुस्तकपाशसाङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥९॥
candrārkānalakoṭikoṭisadṛśā candrāṃśubimbādharī
candrārkāgnisamānakuṇḍaladharī candrārkavarṇeśvarī |
mālāpustakapāśasāṅkuśadharī kāśīpurādhīśvarī
bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātā’nnapūrṇeśvarī ||
अर्थ: जो करोड़ों-करोड़ों चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के समान तेज वाली हैं, जिनके होठ बिम्बफल जैसे और चन्द्रमा की किरणों-से उजले हैं, जो चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि जैसे कुण्डल पहनती हैं, जिनकी कांति चन्द्रमा और सूर्य जैसी है और जो माला, पुस्तक, पाश और अंकुश धारण करती हैं, ऐसी काशी की स्वामिनी माँ अन्नपूर्णेश्वरी, मुझे भिक्षा दो।
क्षत्रत्राणकरी महाऽभयकरी माता कृपासागरीसाक्षान्मोक्षकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरी श्रीधरी ।दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥१०॥
kṣatratrāṇakarī mahā’bhayakarī mātā kṛpāsāgarī
sākṣānmokṣakarī sadā śivakarī viśveśvarī śrīdharī |
dakṣākrandakarī nirāmayakarī kāśīpurādhīśvarī
bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātā’nnapūrṇeśvarī ||
अर्थ: जो रक्षा करने वालों की भी रक्षा करती हैं, महान अभय देती हैं, जो माता और कृपा की सागर हैं, साक्षात् मोक्ष देने वाली, सदा कल्याण करने वाली, विश्व की ईश्वरी और श्री को धारण करने वाली हैं, जिन्होंने दक्ष को रुलाया और जो रोगों से मुक्त करती हैं, ऐसी काशी की स्वामिनी माँ अन्नपूर्णेश्वरी, मुझे भिक्षा दो।
अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे ।ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥११॥
annapūrṇe sadāpūrṇe śaṅkaraprāṇavallabhe |
jñānavairāgyasiddhyarthaṃ bhikṣāṃ dehi ca pārvati ||
अर्थ: हे अन्नपूर्णा, सदा परिपूर्ण रहने वाली, शंकर की प्राणप्रिया माँ पार्वती, ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए मुझे भिक्षा दो।
माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः ।बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥१२॥
mātā ca pārvatī devī pitā devo maheśvaraḥ |
bāndhavāḥ śivabhaktāśca svadeśo bhuvanatrayam ||
अर्थ: मेरी माता देवी पार्वती हैं और पिता भगवान महेश्वर; शिव के भक्त मेरे बन्धु हैं और तीनों लोक मेरा अपना देश है।
॥ इति श्रीशङ्करभगवतः कृतौ अन्नपूर्णास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
|| iti śrīśaṅkarabhagavataḥ kṛtau annapūrṇāstotraṃ sampūrṇam ||
अर्थ: इस प्रकार श्री शंकर भगवत्पाद की रचना अन्नपूर्णा स्तोत्र पूरा हुआ।
अन्नपूर्णा स्तोत्र काशी की अधीश्वरी माँ अन्नपूर्णा की स्तुति है, जिसे परंपरा आदि शंकराचार्य की रचना मानती है। इसके पहले दस श्लोकों का अंत एक ही विनती पर होता है: "भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी", यानी कृपा का सहारा देने वाली माँ अन्नपूर्णेश्वरी, मुझे भिक्षा दो।
अंत के दो छोटे श्लोक बहुत प्रसिद्ध हैं। "अन्नपूर्णे सदापूर्णे" में भक्त भोजन नहीं, ज्ञान और वैराग्य की भिक्षा माँगता है, और "माता च पार्वती देवी" में कहता है कि पार्वती मेरी माता हैं, महेश्वर पिता, शिव-भक्त बन्धु और तीनों लोक मेरा देश।
पहले दस श्लोकों में माँ अन्नपूर्णा के रूप और गुणों का वर्णन है: वे काशी की अधीश्वरी हैं, गौरी, उमा और शंकरी हैं, हिमालय की पुत्री और दक्ष की पुत्री (सती) हैं, आभूषणों और सुगंध से शोभित हैं, तीनों लोकों की रक्षा करती हैं और मोक्ष का द्वार खोलती हैं। हर श्लोक के अंत में भक्त एक भिक्षुक की तरह हाथ फैलाता है: "भिक्षां देहि", माँ, भिक्षा दो।
ग्यारहवें श्लोक में बात खुलती है कि यह भिक्षा केवल अन्न की नहीं है। भक्त ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए भिक्षा माँगता है। जो माँ सबको अन्न देती हैं, उनसे वह मन का भोजन भी माँगता है।
बारहवाँ श्लोक पूरे स्तोत्र का सबसे आत्मीय भाव है: पार्वती मेरी माँ हैं, महेश्वर मेरे पिता, शिव के भक्त मेरे बन्धु और तीनों लोक मेरा घर। ऐसे परिवार में कोई अनाथ या परदेसी नहीं रहता।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| श्लोक 2, तीसरी पंक्ति | काश्मीरागरुवासिता रुचिकरी | sanskritdocuments.org का पाठ; ऊपर stotranidhi.com का पाठ है, जिससे drikpanchang.com का पाठ भी मिलता-जुलता है। |
| श्लोक 3 | धर्मैकनिष्ठाकरी … सर्वैश्वर्यकरी तपः फलकरी | stotranidhi.com का पाठ। |
| श्लोक 5 | लीलानाटकसूत्रखेलनकरी | stotranidhi.com का पाठ (लीला-नाटक की डोर से खेलने वाली)। |
| श्लोक 6 और 7 | क्रम और पंक्तियाँ अलग | stotranidhi.com पर "आदिक्षान्त" वाला श्लोक छठा है और उसकी दूसरी-तीसरी पंक्तियाँ अलग हैं; "उर्वी सर्वजनेश्वरी" वाला श्लोक सातवाँ है। |
| श्लोक 10 | क्षेत्रत्राणकरी | drikpanchang.com का पाठ (क्षेत्र की रक्षा करने वाली)। |
| श्लोक 12 | माता मे पार्वती देवी | sanskritdocuments.org का पाठ; ऊपर stotranidhi.com और drikpanchang.com वाला "माता च" रखा गया है। |
| श्लोक 10 के बाद | तीन अतिरिक्त श्लोक | sanskritdocuments.org के अनुसार कुछ छपे संस्करण दसवें श्लोक के बाद अन्नदाकल्प तन्त्र से लिए तीन श्लोक जोड़ते हैं; वे इस स्तोत्र के मूल पाठ में नहीं गिने गए। |
पाठ की समापन-पंक्ति इसे "श्रीशङ्करभगवतः कृतौ" यानी श्री शंकर भगवत्पाद की रचना कहती है। यह परंपरा की मान्यता है।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): बारहों श्लोक sanskritdocuments.org, stotranidhi.com और drikpanchang.com के पाठ से मिलाए गए। आधार sanskritdocuments.org का पाठ है; जहाँ बाकी दोनों स्रोत एक साथ दूसरा पाठ देते हैं (श्लोक 2 की तीसरी पंक्ति, श्लोक 12), वहाँ वही रखा गया। इस स्तोत्र के पाठ में स्रोतों के बीच बहुत भेद हैं; मुख्य भेद पाठ-भेद में दिए हैं।
अन्नपूर्णा · आरती
बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम
अर्धनारीश्वर, शिव, पार्वती · स्तोत्र · संस्कृत
चाम्पेयगौरार्धशरीरकायै कर्पूरगौरार्धशरीरकाय
पार्वती · आरती
जय पार्वती माता जय पार्वती माता
लक्ष्मी · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
शुक्रवार को घर में माँ लक्ष्मी की सरल पूजा: सफ़ाई, घी का दीपक, कमल या लाल फूल, कुमकुम, खीर या मिश्री का भोग, लक्ष्मी मंत्र, आरती और प्रार्थना।
दुर्गा · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
नवरात्रि में घर पर रोज़ माँ दुर्गा की पूजा: दीपक या अखंड ज्योति, कलश, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, दिन की देवी का स्मरण, पाठ, आरती और कन्या पूजन।
लक्ष्मी · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
दीपावली की शाम घर में लक्ष्मी-गणेश पूजा: सफ़ाई, प्रदोष काल का समय, चौकी सजाना, गणेश पूजन, लक्ष्मी पूजन, दीपमालिका, बही-खाता, तिजोरी और आरती।
हाँ, "नित्यानन्दकरी वराभयकरी" से शुरू होने वाले इसी स्तोत्र को अन्नपूर्णाष्टकम् भी कहा जाता है, यद्यपि इसमें बारह श्लोक हैं। माँ अन्नपूर्णा के दूसरे स्तोत्र भी हैं, पर यह सबसे प्रसिद्ध है।
इसका अर्थ है: मुझे भिक्षा दो। काशी की परंपरा में स्वयं भगवान शिव को माँ अन्नपूर्णा से भिक्षा लेते दिखाया जाता है, और भक्त भी उसी भाव से माँ के सामने हाथ फैलाता है।
यह श्लोक अन्न देने वाली माँ को याद करता है, इसलिए कई घरों में भोजन से पहले इसे पढ़ने की परंपरा है। इसमें भक्त ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए भिक्षा माँगता है।
पाठ की समापन-पंक्ति इसे शंकर भगवत्पाद यानी आदि शंकराचार्य की रचना कहती है। यह परंपरा की मान्यता है।
प्रचलित परंपरा में अन्नपूर्णा जयंती मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। उस दिन यह स्तोत्र विशेष रूप से पढ़ा जाता है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।