पार्वती

आरती · पार्वती

जय पार्वती माता

माँ पार्वती की आरती 'जय पार्वती माता, जय पार्वती माता': पूरा पाठ, हर अंतरे का सरल अर्थ और पाठांतर। तीज और गौरी व्रतों में गाई जाती है।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. अंतरा-वार अर्थ
  4. भावार्थ
  5. कठिन शब्द
  6. फलश्रुति
  7. कब पढ़ें
  8. विधि
  9. पाठ-भेद
  10. रचयिता और स्रोत
  11. ये भी पढ़ें
  12. सवाल-जवाब
  13. सुधार सुझाएँ

जय पार्वती माता जय पार्वती माता।ब्रह्म सनातन देवी शुभ फल की दाता॥

अर्थ: हे पार्वती माता, आपकी जय हो। आप सनातन ब्रह्म-स्वरूपा देवी हैं और शुभ फल देने वाली हैं।

अरिकुल पद्म विनाशिनि जय सेवक त्राता।जग जीवन जगदम्बा, हरिहर गुण गाता॥

॥ जय पार्वती माता जय पार्वती माता ॥

अर्थ: आप शत्रुओं के कुल का नाश करने वाली हैं; हे सेवकों की रक्षक, आपकी जय हो। आप जगत का जीवन और जगत की माता हैं; विष्णु और शिव (हरि-हर) भी आपके गुण गाते हैं।

सिंह को वाहन साजे, कुण्डल हैं साथा।देव वधू जस गावत, नृत्य करत ताथा॥

॥ जय पार्वती माता जय पार्वती माता ॥

अर्थ: सिंह आपका वाहन है और कानों में कुण्डल सुशोभित हैं। देवताओं की पत्नियाँ आपका यश गाती हैं और 'ता-था' की ताल पर नृत्य करती हैं।

सतयुग रूपशील अतिसुन्दर, नाम सती कहलाता।हेमांचल घर जन्मी, सखियन संग राता॥

॥ जय पार्वती माता जय पार्वती माता ॥

अर्थ: सतयुग में आप अत्यन्त सुन्दर रूप और शील वाली सती के नाम से जानी गईं। फिर आपने हिमालय (हेमांचल) के घर जन्म लिया और सखियों के संग रमीं।

शुम्भ निशुम्भ विदारे, हेमांचल स्थाता।सहस्र भुजा तनु धरि के, चक्र लियो हाथा॥

॥ जय पार्वती माता जय पार्वती माता ॥

अर्थ: हिमालय पर निवास करने वाली आपने शुम्भ और निशुम्भ का संहार किया। हज़ार भुजाओं वाला शरीर धारण करके आपने हाथ में चक्र लिया।

सृष्टि रूप तुही है जननी शिवसंग रंगराता।नन्दी भृंगी बीन लही सारा जग मदमाता॥

॥ जय पार्वती माता जय पार्वती माता ॥

अर्थ: हे जननी, सृष्टि आपका ही रूप है, और आप शिव के संग प्रेम के रंग में रँगी रहती हैं। नन्दी और भृंगी वीणा लेकर बजाते हैं और सारा संसार आनंद में मग्न हो जाता है।

देवन अरज करत हम चित को लाता।गावत दे दे ताली, मन में रंगराता॥

॥ जय पार्वती माता जय पार्वती माता ॥

अर्थ: देवता आपसे विनती करते हैं, और हम भी मन लगाकर विनती करते हैं। हम ताली दे-देकर आपका गुण गाते हैं और मन आपके रंग में रँग जाता है।

श्री प्रताप आरती मैया की, जो कोई गाता।सदासुखी नित रहता सुख सम्पत्ति पाता॥

॥ जय पार्वती माता जय पार्वती माता ॥

अर्थ: आरती की अंतिम पंक्तियाँ, कवि श्री प्रताप के शब्दों में, कहती हैं कि जो कोई मैया की यह आरती गाता है, वह सदा सुखी रहता है और सुख-सम्पत्ति पाता है।

हर अंतरे का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।

परिचय

'जय पार्वती माता' भगवान शिव की अर्धांगिनी माँ पार्वती की आरती है। इसमें उन्हें सनातन ब्रह्म-स्वरूपा देवी, शत्रुओं का नाश करने वाली और सेवकों की रक्षा करने वाली जगदम्बा कहा गया है।

आरती पार्वती के कई रूपों को एक साथ याद करती है: सतयुग की सती, हिमालय (हेमांचल) के घर जन्मी पार्वती, शुम्भ-निशुम्भ का संहार करने वाली देवी, और सृष्टि-रूपा जननी जो शिव के संग प्रेम के रंग में रँगी रहती हैं।

अंतरा-वार अर्थ

  1. मुखड़ा जय पार्वती माता जय पार्वती माता…

    हे पार्वती माता, आपकी जय हो। आप सनातन ब्रह्म-स्वरूपा देवी हैं और शुभ फल देने वाली हैं।

  2. अंतरा १ अरिकुल पद्म विनाशिनि जय सेवक त्राता…

    आप शत्रुओं के कुल का नाश करने वाली हैं; हे सेवकों की रक्षक, आपकी जय हो। आप जगत का जीवन और जगत की माता हैं; विष्णु और शिव (हरि-हर) भी आपके गुण गाते हैं।

  3. अंतरा २ सिंह को वाहन साजे, कुण्डल हैं साथा…

    सिंह आपका वाहन है और कानों में कुण्डल सुशोभित हैं। देवताओं की पत्नियाँ आपका यश गाती हैं और 'ता-था' की ताल पर नृत्य करती हैं।

  4. अंतरा ३ सतयुग रूपशील अतिसुन्दर, नाम सती कहलाता…

    सतयुग में आप अत्यन्त सुन्दर रूप और शील वाली सती के नाम से जानी गईं। फिर आपने हिमालय (हेमांचल) के घर जन्म लिया और सखियों के संग रमीं।

  5. अंतरा ४ शुम्भ निशुम्भ विदारे, हेमांचल स्थाता…

    हिमालय पर निवास करने वाली आपने शुम्भ और निशुम्भ का संहार किया। हज़ार भुजाओं वाला शरीर धारण करके आपने हाथ में चक्र लिया।

  6. अंतरा ५ सृष्टि रूप तुही है जननी शिवसंग रंगराता…

    हे जननी, सृष्टि आपका ही रूप है, और आप शिव के संग प्रेम के रंग में रँगी रहती हैं। नन्दी और भृंगी वीणा लेकर बजाते हैं और सारा संसार आनंद में मग्न हो जाता है।

  7. अंतरा ६ देवन अरज करत हम चित को लाता…

    देवता आपसे विनती करते हैं, और हम भी मन लगाकर विनती करते हैं। हम ताली दे-देकर आपका गुण गाते हैं और मन आपके रंग में रँग जाता है।

  8. अंतरा ७ श्री प्रताप आरती मैया की, जो कोई गाता…

    आरती की अंतिम पंक्तियाँ, कवि श्री प्रताप के शब्दों में, कहती हैं कि जो कोई मैया की यह आरती गाता है, वह सदा सुखी रहता है और सुख-सम्पत्ति पाता है।

भावार्थ

यह आरती माँ पार्वती को एक साथ कई रूपों में देखती है: सनातन ब्रह्म-स्वरूपा देवी, सिंह पर सवार शत्रुओं का नाश करने वाली शक्ति, सतयुग की सती और हिमालय के घर जन्मी गौरी। विष्णु और शिव तक उनके गुण गाते हैं, और देवताओं की पत्नियाँ उनके यश पर नृत्य करती हैं।

अंत की ओर आरती का स्वर उत्सव का हो जाता है: सृष्टि-रूपा जननी शिव के संग प्रेम के रंग में रँगी हैं, नन्दी और भृंगी वीणा बजाते हैं, सारा जग आनंद में है, और भक्त ताली दे-देकर गाते हैं। इसीलिए यह आरती तीज और गणगौर जैसे उत्सवों के भाव से मेल खाती है।

कठिन शब्दों के अर्थ

ब्रह्म सनातन
सदा रहने वाला परम तत्त्व
अरिकुल
शत्रुओं का कुल
विनाशिनि
नाश करने वाली
त्राता
रक्षा करने वाली
जगदम्बा
जगत की माता
हरिहर
विष्णु और शिव
साजे
सजता है
देव वधू
देवताओं की पत्नियाँ
जस
यश
ताथा
नृत्य की ताल के बोल
शील
अच्छा स्वभाव
हेमांचल
हिमालय
राता
रमी, रची-बसी
विदारे
चीर डाले, संहार किया
स्थाता
निवास करने वाली
सहस्र
हज़ार
रंगराता
रंग में रँगी, प्रेम में मग्न
भृंगी
शिव के एक गण
मदमाता
आनंद में मस्त
अरज
विनती

फलश्रुति

अंतिम अंतरा कहता है कि मैया की यह आरती गाने वाला सदा सुखी रहता है और सुख-सम्पत्ति पाता है। ये आरती के अपने शब्द हैं, जिनमें भक्त का भरोसा बोलता है; इन्हें किसी निश्चित फल का वादा न समझें।

श्री प्रताप आरती मैया की, जो कोई गाता।
सदासुखी नित रहता सुख सम्पत्ति पाता॥

आरती की अंतिम पंक्तियाँ, कवि श्री प्रताप के शब्दों में, कहती हैं कि जो कोई मैया की यह आरती गाता है, वह सदा सुखी रहता है और सुख-सम्पत्ति पाता है।

यह आरती कब गाई जाती है

  • हरतालिका तीज और हरियाली तीज पर
  • गणगौर की पूजा में
  • सोमवार या शिव-पार्वती की संयुक्त पूजा में, शिव जी की आरती के साथ
  • महाशिवरात्रि पर

आरती कैसे करें

  • शिव-पार्वती के चित्र के सामने दीपक जलाएँ; तीज और गणगौर में माँ को सुहाग की सामग्री (चूड़ी, बिंदी, सिंदूर) चढ़ाने की परंपरा है।
  • टेक 'जय पार्वती माता, जय पार्वती माता' गाकर हर अंतरे के बाद इसे दोहराएँ।
  • शिव-पार्वती की पूजा में पहले शिव जी की आरती और फिर यह आरती, या अपनी परंपरा के क्रम में गा सकते हैं।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
टेकजय पार्वती माता, मैया जय गौरा माताभारतकोश के पाठ में
अंतरा 1अरिकुल कंटक नाशिनि ... जग जननी जगदम्बाभारतकोश और भक्ति भारत में ('पद्म विनाशिनि' की जगह 'कंटक नाशिनि', 'जग जीवन' की जगह 'जग जननी')
अंतरा 6देवन अरज करत हम, चरण ध्यान लाता। तेरी कृपा रहे तो, मन नहीं भरमाता॥भक्ति भारत और भारतकोश में
अंतरा 7मैया जी की आरती, भक्ति भाव से जो नर गाता। नित्य सुखी रह करके, सुख संपत्ति पाता॥भक्ति भारत में; भारतकोश में 'धन सम्पति पाता'। इस पाठ में कवि का नाम नहीं है।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
प्रताप (परंपरा के अनुसार)
भाषा
हिन्दी

द्रिक पंचांग और अमर उजाला के पाठ के अंतिम अंतरे में 'श्री प्रताप आरती मैया की' आता है, जो कवि की छाप लगती है। भक्ति भारत और भारतकोश के पाठ में यह अंतरा दूसरे शब्दों में है और कोई नाम नहीं है। रचयिता के बारे में और कोई जानकारी नहीं मिली।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति द्रिक पंचांग और अमर उजाला के पाठ से मिलाई गई; भक्ति भारत और भारतकोश (bharatdiscovery.org) का पाठ भी देखा गया। टेक और अंतरे 2 से 5 चारों में लगभग एक जैसे हैं; टेक की दूसरी पंक्ति, पहले अंतरे के कुछ शब्दों और अंतिम दो अंतरों में स्रोत दो रूपों में बँटते हैं (द्रिक पंचांग और अमर उजाला एक ओर, भक्ति भारत और भारतकोश दूसरी ओर)। यहाँ द्रिक पंचांग का पाठ आधार है, क्योंकि अमर उजाला से वह लगभग शब्दशः मिलता है, उसमें कवि की छाप वाला अंतिम अंतरा है और छपाई की भूलें नहीं हैं; दूसरे रूप के अंतर पाठांतर में दिए गए। भक्ति भारत में 'ब्रह्मा सनातन देवी', 'नासनि', 'वहान' जैसी भूलें हैं; भारतकोश का पाठ दो स्तंभों में छपा है और उसमें 'श्राता', 'भकितभव' जैसी भूलें हैं। अमर उजाला में कुछ शब्द अलग हैं ('पद्मा विनासनी', 'देव वधु जहं गावत', 'सतयुग शील सुसुन्दर')।

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माँ पार्वती के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

पार्वती माता की आरती कब गाई जाती है?

हरतालिका तीज, हरियाली तीज और गणगौर जैसे पर्वों पर, और शिव-पार्वती की संयुक्त पूजा में शिव जी की आरती के साथ। महाशिवरात्रि पर भी इसे गाया जाता है।

आरती में पार्वती को सती क्यों कहा गया है?

कथा के अनुसार पार्वती पूर्व जन्म में दक्ष की पुत्री सती थीं, जिन्होंने दक्ष के यज्ञ में देह त्याग दी। अगले जन्म में वे हिमालय के घर पार्वती बनकर जन्मीं; आरती इन्हीं दोनों जन्मों को याद करती है।

हेमांचल का क्या अर्थ है?

हेमांचल यानी हिमालय पर्वत। पार्वती हिमालय (हिमवान) और मैना की पुत्री हैं, इसलिए उन्हें शैलपुत्री और गिरिजा भी कहते हैं।

'शुम्भ निशुम्भ विदारे' का प्रसंग क्या है?

दुर्गा सप्तशती में देवी ने शुम्भ और निशुम्भ नाम के असुरों का संहार किया था। सप्तशती के अनुसार ये देवी पार्वती के शरीर से प्रकट हुई थीं, इसीलिए आरती यह पराक्रम पार्वती का बताती है।

इस आरती के पाठ अलग-अलग क्यों मिलते हैं?

यह आरती दो रूपों में छपती है। द्रिक पंचांग और अमर उजाला वाले रूप के अंतिम अंतरे में 'श्री प्रताप' नाम आता है; भक्ति भारत और भारतकोश वाले रूप में अंतिम दो अंतरे दूसरे शब्दों में हैं। यहाँ पहला रूप दिया गया है और दूसरा पाठांतर में।

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पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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