वक्रतुण्ड महाकाय
गणेश · श्लोक · संस्कृत
गणेश पूजन के आरंभ में

यह पन्ना दीपावली (कार्तिक अमावस्या) की शाम घर में होने वाली लक्ष्मी-गणेश पूजा बताता है: प्रदोष काल में गणेश पूजन, लक्ष्मी पूजन, सिक्कों की पूजा, दीपमालिका पूजन, बही-खाते और तिजोरी की पूजा, और परिवार के साथ आरती। नई मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा, कलश-स्थापना के साथ नवग्रह और षोडश मातृका पूजन वाला पूरा विधान, श्री सूक्त से हवन, और आधी रात के महानिशीथ काल की तांत्रिक साधनाएँ पुरोहित या जानकार आचार्य के साथ की जाने वाली अलग विधियाँ हैं। धनतेरस, नरक चतुर्दशी, गोवर्धन पूजा और भाई दूज इस पन्ने में नहीं हैं।
दीपावली कार्तिक अमावस्या की वह रात है जब साल की सबसे अँधेरी रात दीयों से जगमगा उठती है। इस शाम घर-घर में माँ लक्ष्मी और गणेश जी की एक साथ पूजा होती है: लक्ष्मी जी सुख-समृद्धि की देवी हैं, और गणेश जी शुभ-लाभ और सद्बुद्धि के देवता। परंपरा दोनों की साथ पूजा को इसलिए महत्व देती है कि समृद्धि के साथ उसे सही ढंग से बरतने की समझ भी चाहिए।
पूजा का समय सूर्यास्त के बाद का प्रदोष काल है। उससे पहले घर की सफ़ाई, द्वार पर रंगोली और तोरण, और पूजा की चौकी तैयार कर ली जाती है। यहाँ गीता प्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश की "श्रीमहालक्ष्मी-पूजन" विधि का घर के लिए सरल रूप है; जितना हो सके उतना करें। एक दीपक, लक्ष्मी-गणेश का नाम और परिवार के साथ गाई आरती भी पूरी दीपावली पूजा है।
| सामग्री | उपयोग | स्थिति | विकल्प / टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| मिट्टी के दीये, घी या तेल और बत्तियाँ | दीपमालिका पूजन और पूरे घर में दीये; दीपावली दीपों का ही पर्व है | आवश्यक | गीता प्रेस ग्यारह, इक्कीस या उससे अधिक दीये बताती है; जितने हों उतने। मिट्टी के दीये न हों तो धातु के दीपक। |
| लक्ष्मी जी और गणेश जी की मूर्तियाँ या तस्वीर | पूजा का केंद्र | वैकल्पिक | नई मूर्ति लाना ज़रूरी नहीं; पुरानी मूर्ति या तस्वीर भी ठीक है। कुछ न हो तो गणेश जी के लिए मौली लपेटी सुपारी और लक्ष्मी जी के लिए सिक्के। |
| चौकी और लाल कपड़ा | मूर्तियाँ रखने के लिए | वैकल्पिक | कोई साफ़ ऊँचा स्थान और साफ़ कपड़ा। |
| सिक्के या रुपये (द्रव्य-लक्ष्मी) | गीता प्रेस इन्हें आठ पंखुड़ियों के कमल पर रखकर मूर्ति के साथ पूजने को कहती है | परंपरा-विशेष | एक सिक्का भी काफ़ी है। |
| खील (धान का लावा) और बताशे | दीपमालिका पूजन के बाद गणेश जी, लक्ष्मी जी और सभी देवताओं को | परंपरा-विशेष | न हों तो कोई भी मिठाई। |
| कमल या लाल-गुलाबी फूल, गेंदे की माला | पूजा और सजावट | वैकल्पिक | जो ताज़े फूल मिलें। |
| कुमकुम, हल्दी, केसर या चंदन, अक्षत | तिलक, अष्टदल कमल और अर्पण | वैकल्पिक | रोली से भी कमल और स्वस्तिक बनता है। |
| दूर्वा | गणेश पूजन में | वैकल्पिक | न हो तो लाल फूल। |
| बही-खाता, कलम, तिजोरी या गल्ला | व्यापारी परिवारों में सरस्वती, लेखनी और कुबेर की पूजा | परंपरा-विशेष | जो व्यापार नहीं करते, वे पढ़ाई की किताबें, कलम या घर के हिसाब की बही रख सकते हैं, या यह हिस्सा छोड़ दें। |
| हल्दी की पाँच गाँठें, साबुत धनिया, कमलगट्टे | बही-खाते की थैली में रखने के लिए, जो बाद में तिजोरी में रखी जाती है | परंपरा-विशेष | न हों तो केवल सिक्का और अक्षत। |
| नैवेद्य | मिठाई, मौसमी फल, ईख (गन्ना), सिंघाड़ा, संतरा | वैकल्पिक | गीता प्रेस लिखती है कि ये चीज़ें अपने घर के आचार के अनुसार चढ़ाई जाती हैं; जो हो वही। |
| कपूर, घंटी और शंख | प्रधान आरती | वैकल्पिक | घी के दीपक से आरती और ताली भी काफ़ी है। |
| कलश, आम के पत्ते और नारियल | कई घरों में मुख्य द्वार या पूजा-स्थान पर मंगल-कलश | परंपरा-विशेष | ज़रूरी नहीं। |
दीपावली की पूजा का संकल्प हाथ में जल, अक्षत, फूल और एक सिक्का लेकर किया जाता है। गीता प्रेस के संकल्प में महालक्ष्मी-पूजन, कुबेर आदि के पूजन, और उसके अंग के रूप में गणेश-पूजन का निश्चय किया जाता है; संकल्प के बाद जल-अक्षत गणेश जी के पास छोड़ दिए जाते हैं।
हे माँ लक्ष्मी, हे गणेश जी, आज दीपावली की शुभ संध्या पर मैं [अपना नाम] अपने पूरे परिवार की ओर से आपकी पूजा कर रहा/रही हूँ। हमारे घर में सुख, शांति, ईमानदार कमाई और सद्बुद्धि बनी रहे, और जो कुछ है उसमें से ज़रूरतमंदों के साथ बाँटने का मन रहे।
पुरोहित संस्कृत संकल्प में संवत, मास, तिथि, गोत्र और नाम बोलते हैं; घर की पूजा में अपनी भाषा का यह संकल्प काफ़ी है।
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
अर्थ: कोई अपवित्र हो या पवित्र, किसी भी अवस्था में हो, जो कमल-नयन भगवान का स्मरण करता है, वह भीतर और बाहर से शुद्ध हो जाता है।
स्रोत: गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीमहालक्ष्मी-पूजन का आरंभ (प्रोक्षण का श्लोक)।
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
अर्थ: हे टेढ़ी सूँड वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों जैसी आभा वाले देव, मेरे सब कामों को सदा बिना विघ्न पूरा करें।
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
अर्थ: हे अग्निदेव (जातवेद), सोने जैसी आभा वाली, सोने और चाँदी की मालाएँ पहने, चंद्रमा जैसी उजली, स्वर्णमयी लक्ष्मी को मेरे पास ले आइए।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। गन्धं समर्पयामि॥
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। कुङ्कुमं समर्पयामि॥
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। पुष्पं पुष्पमालां च समर्पयामि॥
अर्थ: माँ महालक्ष्मी को नमन; मैं चंदन (गंध) अर्पित करता/करती हूँ। माँ महालक्ष्मी को नमन; मैं कुमकुम अर्पित करता/करती हूँ। माँ महालक्ष्मी को नमन; मैं फूल और फूलों की माला अर्पित करता/करती हूँ।
स्रोत: हर उपचार को देवता के नाम-मंत्र के साथ "समर्पयामि" कहकर अर्पित करने का प्रचलित ढंग; ये वाक्य गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश के श्रीमहालक्ष्मी-पूजन में इसी रूप में हैं।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। धूपमाघ्रापयामि॥
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। दीपं दर्शयामि॥
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। नैवेद्यं निवेदयामि॥
अर्थ: माँ महालक्ष्मी को नमन; मैं धूप की सुगंध अर्पित करता/करती हूँ, दीपक की ज्योति दिखाता/दिखाती हूँ, और यह भोग निवेदन करता/करती हूँ।
स्रोत: गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीमहालक्ष्मी-पूजन के उपचार-वाक्य।
त्वं ज्योतिस्त्वं रविश्चन्द्रो विद्युदग्निश्च तारकाः।
सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिर्दीपावल्यै नमो नमः॥
अर्थ: तुम ही ज्योति हो; तुम ही सूर्य, चंद्रमा, बिजली, अग्नि और तारे हो। सब ज्योतियों की ज्योति, दीपों की इस पंक्ति को बार-बार नमस्कार।
स्रोत: गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीमहालक्ष्मी-पूजन के अंतर्गत दीपमालिका-पूजन।
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः।
ॐ कुबेराय नमः।
अर्थ: वीणा और पुस्तक धारण करने वाली श्री सरस्वती जी को नमस्कार। धन के रक्षक कुबेर जी को नमस्कार।
स्रोत: गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीमहालक्ष्मी-पूजन के अंग के रूप में दिए सरस्वती (बही-खाता) और कुबेर पूजन के नाम-मंत्र।
ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम महालक्ष्मी को जानते हैं, विष्णु-पत्नी का ध्यान करते हैं; वे लक्ष्मी हमें प्रेरणा दें।
गणेश · श्लोक · संस्कृत
गणेश पूजन के आरंभ में
गणेश · आरती
प्रधान आरती से पहले गणेश जी की आरती
लक्ष्मी · सूक्त · संस्कृत
लक्ष्मी जी का ध्यान; पूजा के बाद पूरा पाठ
लक्ष्मी · अष्टकम् · संस्कृत
पूजा के बाद जागरण या स्तुति में
लक्ष्मी · स्तोत्र · संस्कृत
पूजा के बाद स्तुति में
लक्ष्मी · चालीसा
परिवार के साथ हिंदी में पाठ
गीता प्रेस के अनुसार दीपमालिका पूजन के बाद अपने घर के आचार के अनुसार संतरा, ईख, पानीफल (सिंघाड़ा) और धान का लावा (खील) चढ़ाया जाता है, और खील गणेश जी, महालक्ष्मी और सभी देवी-देवताओं को अर्पित की जाती है। पूजा के बाद यही प्रसाद परिवार, पड़ोसियों और घर में काम करने वालों में बाँटा जाता है।
हे माँ लक्ष्मी, हे गणेश जी, इस साल जो कुछ मिला, उसके लिए आभार। आने वाले साल में हमारे घर में ईमानदार कमाई, अच्छा स्वास्थ्य, आपसी प्रेम और सही निर्णय लेने की बुद्धि रहे। जिनके घर में आज दीया नहीं जला, उनके जीवन में भी उजाला हो। पूजा में जो कमी रही, उसे क्षमा करें।
नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरिप्रिये।
या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्त्वदर्चनात्॥
अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि॥
अर्थ: हे हरिप्रिया, आपको नमस्कार; आप सब देवताओं को वर देने वाली हैं। आपकी शरण में आए लोगों को जो गति मिलती है, आपकी इस पूजा से वही मुझे मिले। हे परमेश्वरी, मुझसे दिन-रात हज़ारों भूलें होती हैं; मुझे अपना सेवक मानकर क्षमा करें।
स्रोत: गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीमहालक्ष्मी-पूजन (दीपावली) की क्षमा-प्रार्थना के दो श्लोक।
लक्ष्मी · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
शुक्रवार को घर में माँ लक्ष्मी की सरल पूजा: सफ़ाई, घी का दीपक, कमल या लाल फूल, कुमकुम, खीर या मिश्री का भोग, लक्ष्मी मंत्र, आरती और प्रार्थना।
लक्ष्मी · आरती
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता
समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): Sequence and all quoted Sanskrit come from the Gita Press Nityakarma-Pujaprakash Shri Mahalakshmi-pujan (checked in two archive.org OCR copies): placement (Lakshmi to Ganesha's right), evening worship in a cleaned house, dravya-lakshmi on an ashtadal lotus, east/north facing, the apavitrah prokshan verse, Shri Sukta verse 1 at dhyana, upachara sentences with "ॐ महालक्ष्म्यै नमः", the Saraswati (bahi) and Kuber name-mantras, the dipmalika prayer "त्वं ज्योतिस्त्वं...", kheel and seasonal fruit, the family pradhan aarti, Lakshmi Gayatri in mantra-pushpanjali, the kshama verses (first and an inner pair of its list), and no visarjan for the new images. Pradosh kaal length, sthir/vrishabha lagna, the mahanishita view and the navagraha chauki from Drik Panchang's Lakshmi Puja muhurat page; starting before the muhurat, all-night lamp and fasting by capacity from Drik's Diwali puja vidhi. Lamps are the only item marked essential, since dipmalika is the festival itself. Safety notes added for lamps and fireworks.
सूर्यास्त के बाद का प्रदोष काल, जो लगभग 2 घंटे 24 मिनट रहता है; उसमें भी स्थिर लग्न (अक्सर वृषभ लग्न) का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। यह हर शहर में अलग होता है, इसलिए स्थानीय पंचांग देखें। पूरी विधि लंबी हो तो कुछ पहले शुरू कर दें, ताकि लक्ष्मी पूजन मुहूर्त में पड़े।
नहीं। बहुत-से घरों में नई मूर्ति लाने का चलन है, पर पुरानी धातु की मूर्ति, तस्वीर, या सुपारी (गणेश) और सिक्के (लक्ष्मी) से भी पूजा पूरी है। नई मूर्ति की विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा कराना चाहें तो पुरोहित से कराएँ; घर की सरल पूजा में श्रद्धा से आवाहन काफ़ी है।
गीता प्रेस की विधि में माँ लक्ष्मी को गणेश जी के दाहिने भाग में स्थापित करने को कहा गया है। कई परिवारों की अपनी पुरानी रीति अलग है, और वह भी ठीक है। सबसे ज़रूरी है कि दोनों की पूजा आदर और साफ़-सफ़ाई से हो।
पूजा का दीपक रात भर जलता रहे, यह परंपरा है। पर सुरक्षा पहले है: दीपक परदों और कपड़ों से दूर, हवा से बचा, पर्याप्त घी या तेल के साथ हो। सुरक्षित न लगे तो उसे अपने-आप शांत होने दें; इससे पूजा अधूरी नहीं होती और डरने की कोई बात नहीं।
घर का कोई भी सदस्य पूजा करा सकता है: पति, पत्नी, बेटा, बेटी या बुज़ुर्ग। सबसे अच्छा यह है कि पूरा परिवार साथ बैठे; एक व्यक्ति विधि करे और बाकी सब फूल, अक्षत और आरती में साथ दें।
परिवारों की रीतियाँ अलग हैं। कई घरों में ऐसे में विधि कोई और सदस्य करता है और वे पास बैठकर प्रार्थना, आरती और दीये जलाने में साथ देती हैं; कई घर ऐसा भेद नहीं मानते। अपने घर की रीति और अपनी सुविधा के अनुसार चलें; इसमें अपराध-बोध की कोई बात नहीं।
गीता प्रेस के अनुसार दीपावली पर पूजी गई नई प्रतिमाओं का विसर्जन नहीं होता; वे पूजा-स्थान में रहती हैं। पुरानी मिट्टी की मूर्तियाँ आदर से घर में पानी में घोलकर वह मिट्टी गमलों में डाली जा सकती है। नदी-तालाब में डालने से पानी गंदा होता है, इसलिए यह तरीका बेहतर है।
इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।