लक्ष्मी पूजा विधि
लक्ष्मी · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
शुक्रवार को घर में माँ लक्ष्मी की सरल पूजा: सफ़ाई, घी का दीपक, कमल या लाल फूल, कुमकुम, खीर या मिश्री का भोग, लक्ष्मी मंत्र, आरती और प्रार्थना।

इन्द्र उवाच ।
नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते ।शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥१॥
namaste’stu mahāmāye śrīpīṭhe surapūjite |
śaṅkhacakragadāhaste mahālakṣmi namo’stu te ||
अर्थ: इन्द्र कहते हैं: हे महामाया, श्रीपीठ पर विराजने वाली, देवताओं से पूजित, हाथों में शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है।
नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयङ्करि ।सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥२॥
namaste garuḍārūḍhe kolāsurabhayaṅkari |
sarvapāpahare devi mahālakṣmi namo’stu te ||
अर्थ: गरुड पर सवार, कोलासुर को भय देने वाली, सारे पाप हरने वाली देवी महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है।
सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि ।सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥३॥
sarvajñe sarvavarade sarvaduṣṭabhayaṅkari |
sarvaduḥkhahare devi mahālakṣmi namo’stu te ||
अर्थ: सब कुछ जानने वाली, सबको वर देने वाली, सब दुष्टों को भय देने वाली और सब दुःख हरने वाली देवी महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है।
सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि ।मन्त्रमूर्ते सदा देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥४॥
siddhibuddhiprade devi bhuktimuktipradāyini |
mantramūrte sadā devi mahālakṣmi namo’stu te ||
अर्थ: सफलता और बुद्धि देने वाली, सांसारिक सुख और मोक्ष दोनों देने वाली, सदा मन्त्र-स्वरूप देवी महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है।
आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि ।योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥५॥
ādyantarahite devi ādyaśaktimaheśvari |
yogaje yogasambhūte mahālakṣmi namo’stu te ||
अर्थ: जिनका न आदि है न अंत, ऐसी देवी, आदिशक्ति, महेश्वरी, योग से प्रकट होने वाली और योग से उत्पन्न महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है।
स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे ।महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥६॥
sthūlasūkṣmamahāraudre mahāśaktimahodare |
mahāpāpahare devi mahālakṣmi namo’stu te ||
अर्थ: स्थूल और सूक्ष्म दोनों रूपों वाली, अत्यंत उग्र रूप भी धारण करने वाली, महाशक्ति, जिनके विशाल उदर में सारा जगत समाया है, बड़े-बड़े पाप हरने वाली देवी महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है।
पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि ।परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥७॥
padmāsanasthite devi parabrahmasvarūpiṇi |
parameśi jaganmātarmahālakṣmi namo’stu te ||
अर्थ: कमल के आसन पर विराजमान, परब्रह्म-स्वरूपिणी, परमेश्वरी, जगत की माता महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है।
श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूषिते ।जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥८॥
śvetāmbaradhare devi nānālaṅkārabhūṣite |
jagatsthite jaganmātarmahālakṣmi namo’stu te ||
अर्थ: श्वेत वस्त्र धारण करने वाली, अनेक आभूषणों से सजी, सारे जगत में व्याप्त, जगत की माता देवी महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है।
महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं यः पठेद्भक्तिमान्नरः ।सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा ॥९॥
mahālakṣmyaṣṭakaṃ stotraṃ yaḥ paṭhedbhaktimānnaraḥ |
sarvasiddhimavāpnoti rājyaṃ prāpnoti sarvadā ||
अर्थ: यह श्लोक कहता है: जो भक्त मनुष्य इस महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र का पाठ करता है, वह सब सिद्धियाँ पाता है और सदा राज्य-वैभव पाता है।
एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम् ।द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वितः ॥१०॥
ekakāle paṭhennityaṃ mahāpāpavināśanam |
dvikālaṃ yaḥ paṭhennityaṃ dhanadhānyasamanvitaḥ ||
अर्थ: यह श्लोक कहता है: रोज़ एक समय पढ़ने से बड़े पापों का नाश होता है, और जो रोज़ दो समय पढ़ता है, वह धन-धान्य से युक्त होता है।
त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम् ।महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा ॥११॥
trikālaṃ yaḥ paṭhennityaṃ mahāśatruvināśanam |
mahālakṣmīrbhavennityaṃ prasannā varadā śubhā ||
अर्थ: यह श्लोक कहता है: जो रोज़ तीनों समय पढ़ता है, उसके बड़े शत्रुओं का नाश होता है, और कल्याण करने वाली, वर देने वाली महालक्ष्मी उस पर सदा प्रसन्न रहती हैं।
॥ इतीन्द्रकृतं महालक्ष्म्यष्टकं सम्पूर्णम् ॥
|| itīndrakṛtaṃ mahālakṣmyaṣṭakaṃ sampūrṇam ||
अर्थ: इस प्रकार इन्द्र द्वारा की गई महालक्ष्मी अष्टक की स्तुति पूरी हुई।
महालक्ष्म्यष्टकम् माँ महालक्ष्मी की आठ श्लोकों की स्तुति है। हर श्लोक "महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते" (हे महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है) पर समाप्त होता है, इसलिए इसे याद करना और रोज़ पढ़ना सरल है। आठ श्लोकों के बाद तीन श्लोकों की फलश्रुति है।
पाठ "इन्द्र उवाच" से शुरू होता है और अंत में इसे इन्द्र की की हुई स्तुति कहा गया है। इसमें देवी को महामाया, आदिशक्ति, परब्रह्म-स्वरूपिणी और जगत की माता कहकर नमन किया गया है, यानी केवल धन की देवी के रूप में नहीं, सारी सृष्टि की मूल शक्ति के रूप में।
इस अष्टक में देवराज इन्द्र माँ महालक्ष्मी को बार-बार नमस्कार करते हैं और हर श्लोक में उनके किसी नए रूप या गुण का स्मरण करते हैं। पहले श्लोकों में उनका दिखने वाला रूप है: श्रीपीठ पर विराजमान, हाथों में शंख-चक्र-गदा, गरुड पर सवार। फिर उनके गुण आते हैं: सब कुछ जानने वाली, सबको वर देने वाली, सब दुःख और पाप हरने वाली।
बीच के श्लोक बताते हैं कि महालक्ष्मी केवल धन-संपत्ति की देवी नहीं हैं। वे आदि और अंत से रहित आदिशक्ति हैं, स्थूल और सूक्ष्म दोनों रूपों में हैं, आवश्यकता पड़ने पर उग्र रूप भी धारण करती हैं, और परब्रह्म ही उनका स्वरूप है। वे भोग भी देती हैं और मोक्ष भी।
अंत के तीन श्लोक फलश्रुति हैं, जो पाठ के फल बताते हैं। स्तोत्र का मूल भाव फिर भी नमन ही है: हर श्लोक का अंत "महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते" पर होता है, यानी माँ के सामने सिर झुकाना।
इस स्तोत्र की फलश्रुति कहती है कि भक्ति से इसका पाठ करने वाला सिद्धि और वैभव पाता है, और दिन में एक, दो या तीन समय पढ़ने के अलग-अलग फल बताती है: पापों का नाश, धन-धान्य, और शत्रुओं का नाश। ये स्तोत्र के अपने शब्द हैं, जिन्हें श्रद्धा से पढ़ा जाता है।
महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं यः पठेद्भक्तिमान्नरः ।
सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा ॥यह श्लोक कहता है: जो भक्त मनुष्य इस महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र का पाठ करता है, वह सब सिद्धियाँ पाता है और सदा राज्य-वैभव पाता है।
एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम् ।
द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वितः ॥यह श्लोक कहता है: रोज़ एक समय पढ़ने से बड़े पापों का नाश होता है, और जो रोज़ दो समय पढ़ता है, वह धन-धान्य से युक्त होता है।
त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम् ।
महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा ॥यह श्लोक कहता है: जो रोज़ तीनों समय पढ़ता है, उसके बड़े शत्रुओं का नाश होता है, और कल्याण करने वाली, वर देने वाली महालक्ष्मी उस पर सदा प्रसन्न रहती हैं।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| श्लोक 4 | मन्त्रपूते सदा देवि | sanskritdocuments.org पर "मन्त्रमूर्ते" के साथ दूसरे पाठ के रूप में दिया है (मन्त्र से पवित्र)। |
| श्लोक 5 | योगज्ञे योगसम्भूते | stotranidhi.com पर "योगजे" के साथ कोष्ठक में दिया दूसरा पाठ (योग को जानने वाली)। |
| श्लोक 6 | महाशक्ते महोदरे | stotranidhi.com का पाठ; sanskritdocuments.org पर एक जगह "महाशक्ति महोदरे" भी छपा है। |
| श्लोक 10 | एककालं पठेन्नित्यं | stotranidhi.com का पाठ; अर्थ वही है। |
| समापन | इतीन्द्रकृतं श्रीमहालक्ष्मीस्तवम् | sanskritdocuments.org पर दूसरी प्रति का समापन। |
पाठ "इन्द्र उवाच" से शुरू होता है और अंतिम पंक्ति इसे इन्द्र की की हुई स्तुति कहती है। यह स्तोत्र के भीतर की परंपरागत मान्यता है; किसी ऐतिहासिक रचयिता का नाम ज्ञात नहीं।
लोक-परंपरा इस अष्टक को पद्म पुराण से जोड़ती है, पर जिन स्रोतों से यहाँ पाठ मिलाया गया, उनमें ग्रंथ का नाम नहीं है, और पद्म पुराण में इसका अध्याय-स्थान हमें नहीं मिला। इसलिए यह जुड़ाव परंपरा की मान्यता के रूप में ही दिया गया है।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पूरा पाठ sanskritdocuments.org के महालक्ष्म्यष्टकम् (दूसरी प्रति, श्लोक-संख्या सहित) और stotranidhi.com के पाठ से मिलाया गया। जहाँ दोनों अलग हैं (श्लोक 6), वहाँ drikpanchang.com से भी देखा गया, जिसका पाठ sanskritdocuments.org से मेल खाता है। दूसरे पाठ पाठ-भेद में दिए हैं। पद्म पुराण से जुड़ाव केवल परंपरा की मान्यता के रूप में बताया गया है।
लक्ष्मी · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
शुक्रवार को घर में माँ लक्ष्मी की सरल पूजा: सफ़ाई, घी का दीपक, कमल या लाल फूल, कुमकुम, खीर या मिश्री का भोग, लक्ष्मी मंत्र, आरती और प्रार्थना।
लक्ष्मी · आरती
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मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास
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दीपावली की शाम घर में लक्ष्मी-गणेश पूजा: सफ़ाई, प्रदोष काल का समय, चौकी सजाना, गणेश पूजन, लक्ष्मी पूजन, दीपमालिका, बही-खाता, तिजोरी और आरती।
लक्ष्मी · सूक्त · संस्कृत
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पाठ "इन्द्र उवाच" से शुरू होता है और अंतिम पंक्ति इसे इन्द्र की की हुई स्तुति कहती है। परंपरा इसे पद्म पुराण से भी जोड़ती है, पर उस ग्रंथ में इसका स्थान हमें नहीं मिला।
पहले आठ श्लोक स्तुति हैं, इसलिए इसे अष्टक कहा जाता है। बाद के तीन श्लोक फलश्रुति हैं, जो पाठ का फल बताते हैं।
कोल्हापुर (करवीर) की महालक्ष्मी से जुड़ी परंपरागत कथा में कोलासुर एक असुर है जिसका देवी ने अंत किया। इसलिए यहाँ देवी को कोलासुर को भय देने वाली कहा गया है।
नहीं। फलश्रुति एक, दो और तीन समय के पाठ की बात करती है, पर यह कोई अनिवार्य नियम नहीं है। रोज़ एक बार श्रद्धा से पढ़ना भी अच्छा अभ्यास है।
शुक्रवार, दीपावली, धनतेरस और शरद पूर्णिमा पर इसे विशेष रूप से पढ़ा जाता है। बहुत-से लोग इसे रोज़ की पूजा में भी पढ़ते हैं।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।