लक्ष्मी पूजा विधि
लक्ष्मी · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
शुक्रवार को घर में माँ लक्ष्मी की सरल पूजा: सफ़ाई, घी का दीपक, कमल या लाल फूल, कुमकुम, खीर या मिश्री का भोग, लक्ष्मी मंत्र, आरती और प्रार्थना।

चालीसा · लक्ष्मी
“मातु लक्ष्मी करि कृपा” वाली लक्ष्मी चालीसा का मूल पाठ, हर चौपाई का सरल अर्थ, कठिन शब्द, भावार्थ और अलग-अलग पुस्तकों के पाठभेद।
॥ दोहा ॥
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास।मनोकामना सिद्ध करि, पुरवहु मेरी आस॥
अर्थ: हे माँ लक्ष्मी, कृपा करके मेरे हृदय में वास कीजिए। मेरी मनोकामना सिद्ध करके मेरी आशा पूरी कीजिए।
॥ सोरठा ॥
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करुं।सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥
अर्थ: हाथ जोड़कर मेरी यही प्रार्थना है: हे जगत की जननी जगदम्बिका, आपकी जय हो; हर प्रकार से मेरे घर में बसिए और उसे सुख से भर दीजिए।
॥ चौपाई ॥
सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही।ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि ॥१॥
अर्थ: हे सागर की पुत्री लक्ष्मी, मैं आपका स्मरण करता हूँ। मुझे ज्ञान, बुद्धि और विद्या दीजिए।
तुम समान नहीं कोई उपकारी।सब विधि पुरवहु आस हमारी ॥२॥
अर्थ: आपके समान कोई उपकार करने वाला नहीं है; हर प्रकार से मेरी आशा पूरी कीजिए।
जय जय जय जननी जगदम्बा।सबकी तुम ही हो अवलम्बा ॥३॥
अर्थ: हे जननी जगदम्बा, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप ही सबका सहारा हैं।
तुम ही हो घट घट के वासी।विनती यही हमारी खासी ॥४॥
अर्थ: आप ही हर प्राणी के भीतर बसती हैं; मेरी यही विशेष विनती है।
जग जननी जय सिन्धु कुमारी।दीनन की तुम हो हितकारी ॥५॥
अर्थ: हे जगत की माता, सागर की पुत्री, आपकी जय हो; आप दीनों का भला करने वाली हैं।
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी।कृपा करौ जग जननि भवानी ॥६॥
अर्थ: हे महारानी, मैं रोज़ आपसे विनती करता हूँ; हे जगत-जननी भवानी, कृपा कीजिए।
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी।सुधि लीजै अपराध बिसारी ॥७॥
अर्थ: मैं किस विधि से आपकी स्तुति करूँ? मेरे अपराध भुलाकर मेरी सुधि लीजिए।
कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी।जगत जननि विनती सुन मोरी ॥८॥
अर्थ: मेरी ओर कृपा की दृष्टि से देखिए; हे जगत-जननी, मेरी विनती सुनिए।
ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता।संकट हरो हमारी माता ॥९॥
अर्थ: आप ज्ञान, बुद्धि, विजय और सुख देने वाली हैं; हे माता, मेरे संकट हर लीजिए।
क्षीर सिंधु जब विष्णु मथायो।चौदह रत्न सिंधु में पायो ॥१०॥
अर्थ: जब भगवान विष्णु की प्रेरणा से क्षीरसागर का मंथन हुआ, तब सागर से चौदह रत्न निकले।
चौदह रत्न में तुम सुखरासी।सेवा कियो प्रभुहिं बनि दासी ॥११॥
अर्थ: उन चौदह रत्नों में आप सुख की राशि थीं; आपने प्रभु विष्णु को वरण किया और सेविका बनकर उनकी सेवा की।
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा।रूप बदल तहं सेवा कीन्हा ॥१२॥
अर्थ: प्रभु ने जब-जब, जहाँ भी अवतार लिया, आपने रूप बदलकर वहाँ उनका साथ दिया और सेवा की।
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा।लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा ॥१३॥
अर्थ: जब स्वयं विष्णु ने मनुष्य का शरीर धारण किया और अयोध्या में श्री राम के रूप में अवतार लिया,
तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं।सेवा कियो हृदय पुलकाहीं ॥१४॥
अर्थ: तब आप जनकपुर में सीता जी के रूप में प्रकट हुईं और पुलकित हृदय से उनकी सेवा की।
अपनायो तोहि अन्तर्यामी।विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी ॥१५॥
अर्थ: अंतर्यामी प्रभु ने आपको अपनाया। आप विश्व में प्रसिद्ध हैं और तीनों लोकों की स्वामिनी हैं।
तुम सम प्रबल शक्ति नहिं आनि।कहँ तक महिमा कहौं बखानी ॥१६॥
अर्थ: आपके समान प्रबल शक्ति कोई दूसरी नहीं है; मैं आपकी महिमा का कहाँ तक बखान करूँ?
मन क्रम वचन करै सेवकाई।मन इच्छित वांछित फल पाई ॥१७॥
अर्थ: जो मन, कर्म और वचन से आपकी सेवा करता है, वह मनचाहा फल पाता है।
तजि छल कपट और चतुराई।पूजहिं विविध भाँति मन लाई ॥१८॥
अर्थ: छल, कपट और चतुराई छोड़कर, मन लगाकर अनेक प्रकार से आपकी पूजा करनी चाहिए।
और हाल मैं कहौं बुझाई।जो यह पाठ करे मन लाई ॥१९॥
अर्थ: अब मैं एक और बात समझाकर कहता हूँ: जो मन लगाकर इसका पाठ करता है,
ताको कोई कष्ट न होई।मन इच्छित पावै फल सोई ॥२०॥
अर्थ: उसे कोई कष्ट नहीं होता और वह मनचाहा फल पाता है; चालीसा यही कहती है।
त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणी।त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि ॥२१॥
अर्थ: हे दुःख दूर करने वाली माँ, रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए, आपकी जय हो! आप तीनों प्रकार के ताप और संसार के बंधन हरने वाली हैं।
जो यह पढ़े और पढ़ावे।ध्यान लगाकर सुने सुनावै ॥२२॥
अर्थ: जो इसे पढ़ता और पढ़ाता है, और ध्यान लगाकर सुनता और सुनाता है,
ताको कोई न रोग सतावै।पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै ॥२३॥
अर्थ: चालीसा के अनुसार उसे कोई रोग नहीं सताता, और वह संतान, धन और संपत्ति पाता है।
पुत्र हीन और सम्पत्ति हीना।अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना ॥२४॥
अर्थ: जो संतानहीन हो या संपत्तिहीन हो, जो देख या सुन न सके, कुष्ठ रोग से पीड़ित हो या बहुत दुखी हो,
विप्र बोलाय कै पाठ करावै।शंका दिल में कभी न लावै ॥२५॥
अर्थ: वह ब्राह्मण को बुलाकर इसका पाठ करवाए, और मन में कभी शंका न लाए।
पाठ करावै दिन चालीसा।ता पर कृपा करैं गौरीसा ॥२६॥
अर्थ: चालीसा कहती है कि जो चालीस दिन तक पाठ करवाए, उस पर गौरीपति भगवान शिव भी कृपा करते हैं।
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै।कमी नहीं काहू की आवै ॥२७॥
अर्थ: वह बहुत सुख और संपत्ति पाता है, और उसे किसी चीज़ की कमी नहीं रहती।
बारह मास करै जो पूजा।तेहि सम धन्य और नहिं दूजा ॥२८॥
अर्थ: जो बारहों महीने आपकी पूजा करता है, उसके समान धन्य कोई दूसरा नहीं।
प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं।उन सम कोई जग में कहुँ नाहीं ॥२९॥
अर्थ: जो प्रतिदिन मन लगाकर पाठ करता है, उसके समान संसार में कहीं कोई नहीं।
बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई।लेय परीक्षा ध्यान लगाई ॥३०॥
अर्थ: मैं बहुत तरह से क्या बड़ाई करूँ; कोई भी ध्यान लगाकर इसे स्वयं परख ले, ऐसा चालीसा कहती है।
करि विश्वास करैं व्रत नेमा।होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा ॥३१॥
अर्थ: जो विश्वास के साथ व्रत और नियम का पालन करते हैं, उनका काम सिद्ध होता है और हृदय में प्रेम उपजता है।
जय जय जय लक्ष्मी महारानी।सब में व्यापित जो गुण खानी ॥३२॥
अर्थ: हे महारानी लक्ष्मी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप सब में व्याप्त हैं और गुणों की खान हैं।
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं।तुम सम कोउ दयाल कहूँ नाहीं ॥३३॥
अर्थ: संसार में आपका तेज प्रबल है; आपके समान दयालु कहीं कोई नहीं।
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै।संकट काटि भक्ति मोहि दीजे ॥३४॥
अर्थ: मुझ अनाथ की अब सुधि लीजिए; मेरे संकट काटकर मुझे भक्ति दीजिए।
भूल चूक करी क्षमा हमारी।दर्शन दीजै दशा निहारी ॥३५॥
अर्थ: मेरी भूल-चूक क्षमा कीजिए, और मेरी दशा देखकर मुझे दर्शन दीजिए।
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी।तुमहि अछत दुख सहते भारी ॥३६॥
अर्थ: आपके दर्शन के बिना यह भक्त व्याकुल है; आपके रहते हुए भी मैं भारी दुःख सह रहा हूँ।
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में।सब जानत हो अपने मन में ॥३७॥
अर्थ: मुझमें ज्ञान और बुद्धि नहीं है; आप अपने मन में सब जानती हैं।
रूप चतुर्भुज करके धारण।कष्ट मोर अब करहु निवारण ॥३८॥
अर्थ: अपना चार भुजाओं वाला रूप धारण करके अब मेरा कष्ट दूर कीजिए।
केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई।ज्ञान बुद्धि मोहि नहिं अधिकाई ॥३९॥
अर्थ: मैं किस प्रकार आपकी बड़ाई करूँ? मुझमें ज्ञान और बुद्धि अधिक नहीं है।
रामदास अब कहै पुकारी।करो दूर तुम विपति हमारी ॥४०॥
अर्थ: रामदास अब पुकारकर कहते हैं: माँ, आप मेरी विपत्ति दूर कीजिए।
॥ दोहा ॥
त्राहि त्राहि दुःख हारिणी, हरो बेगि सब त्रास।जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रुन का नाश॥
अर्थ: हे दुःख हरने वाली, रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए; जल्दी सब भय और कष्ट हर लीजिए। हे लक्ष्मी, आपकी जय हो; शत्रुओं का नाश कीजिए।
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर।मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥
अर्थ: रामदास रोज़ ध्यान लगाकर हाथ जोड़कर विनती करते हैं: हे माँ लक्ष्मी, इस दास पर दया की दृष्टि कीजिए।
हर चौपाई का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।
लक्ष्मी चालीसा माँ लक्ष्मी की प्रचलित हिन्दी स्तुति है। इसमें आरंभ में एक दोहा और एक सोरठा, चालीस चौपाइयाँ और अंत में दो दोहे हैं; अंतिम चौपाई और दोहे में “रामदास” नाम आता है।
चालीसा पहले माँ से ज्ञान, बुद्धि और विद्या माँगती है, फिर उनकी कथा कहती है: समुद्र-मंथन के चौदह रत्नों में उनका प्रकट होना, और विष्णु जी के हर अवतार में रूप बदलकर उनका साथ देना, जैसे श्री राम के समय जनकपुर में सीता जी के रूप में। बीच की चौपाइयाँ पाठ का फल बताती हैं, और अंत में भक्त अपनी भूलों की क्षमा माँगकर दर्शन की विनती करता है।
हे माँ लक्ष्मी, कृपा करके मेरे हृदय में वास कीजिए। मेरी मनोकामना सिद्ध करके मेरी आशा पूरी कीजिए।
हाथ जोड़कर मेरी यही प्रार्थना है: हे जगत की जननी जगदम्बिका, आपकी जय हो; हर प्रकार से मेरे घर में बसिए और उसे सुख से भर दीजिए।
हे सागर की पुत्री लक्ष्मी, मैं आपका स्मरण करता हूँ। मुझे ज्ञान, बुद्धि और विद्या दीजिए।
आपके समान कोई उपकार करने वाला नहीं है; हर प्रकार से मेरी आशा पूरी कीजिए।
हे जननी जगदम्बा, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप ही सबका सहारा हैं।
आप ही हर प्राणी के भीतर बसती हैं; मेरी यही विशेष विनती है।
हे जगत की माता, सागर की पुत्री, आपकी जय हो; आप दीनों का भला करने वाली हैं।
हे महारानी, मैं रोज़ आपसे विनती करता हूँ; हे जगत-जननी भवानी, कृपा कीजिए।
मैं किस विधि से आपकी स्तुति करूँ? मेरे अपराध भुलाकर मेरी सुधि लीजिए।
मेरी ओर कृपा की दृष्टि से देखिए; हे जगत-जननी, मेरी विनती सुनिए।
आप ज्ञान, बुद्धि, विजय और सुख देने वाली हैं; हे माता, मेरे संकट हर लीजिए।
जब भगवान विष्णु की प्रेरणा से क्षीरसागर का मंथन हुआ, तब सागर से चौदह रत्न निकले।
उन चौदह रत्नों में आप सुख की राशि थीं; आपने प्रभु विष्णु को वरण किया और सेविका बनकर उनकी सेवा की।
प्रभु ने जब-जब, जहाँ भी अवतार लिया, आपने रूप बदलकर वहाँ उनका साथ दिया और सेवा की।
जब स्वयं विष्णु ने मनुष्य का शरीर धारण किया और अयोध्या में श्री राम के रूप में अवतार लिया,
तब आप जनकपुर में सीता जी के रूप में प्रकट हुईं और पुलकित हृदय से उनकी सेवा की।
अंतर्यामी प्रभु ने आपको अपनाया। आप विश्व में प्रसिद्ध हैं और तीनों लोकों की स्वामिनी हैं।
आपके समान प्रबल शक्ति कोई दूसरी नहीं है; मैं आपकी महिमा का कहाँ तक बखान करूँ?
जो मन, कर्म और वचन से आपकी सेवा करता है, वह मनचाहा फल पाता है।
छल, कपट और चतुराई छोड़कर, मन लगाकर अनेक प्रकार से आपकी पूजा करनी चाहिए।
अब मैं एक और बात समझाकर कहता हूँ: जो मन लगाकर इसका पाठ करता है,
उसे कोई कष्ट नहीं होता और वह मनचाहा फल पाता है; चालीसा यही कहती है।
हे दुःख दूर करने वाली माँ, रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए, आपकी जय हो! आप तीनों प्रकार के ताप और संसार के बंधन हरने वाली हैं।
जो इसे पढ़ता और पढ़ाता है, और ध्यान लगाकर सुनता और सुनाता है,
चालीसा के अनुसार उसे कोई रोग नहीं सताता, और वह संतान, धन और संपत्ति पाता है।
जो संतानहीन हो या संपत्तिहीन हो, जो देख या सुन न सके, कुष्ठ रोग से पीड़ित हो या बहुत दुखी हो,
वह ब्राह्मण को बुलाकर इसका पाठ करवाए, और मन में कभी शंका न लाए।
चालीसा कहती है कि जो चालीस दिन तक पाठ करवाए, उस पर गौरीपति भगवान शिव भी कृपा करते हैं।
वह बहुत सुख और संपत्ति पाता है, और उसे किसी चीज़ की कमी नहीं रहती।
जो बारहों महीने आपकी पूजा करता है, उसके समान धन्य कोई दूसरा नहीं।
जो प्रतिदिन मन लगाकर पाठ करता है, उसके समान संसार में कहीं कोई नहीं।
मैं बहुत तरह से क्या बड़ाई करूँ; कोई भी ध्यान लगाकर इसे स्वयं परख ले, ऐसा चालीसा कहती है।
जो विश्वास के साथ व्रत और नियम का पालन करते हैं, उनका काम सिद्ध होता है और हृदय में प्रेम उपजता है।
हे महारानी लक्ष्मी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप सब में व्याप्त हैं और गुणों की खान हैं।
संसार में आपका तेज प्रबल है; आपके समान दयालु कहीं कोई नहीं।
मुझ अनाथ की अब सुधि लीजिए; मेरे संकट काटकर मुझे भक्ति दीजिए।
मेरी भूल-चूक क्षमा कीजिए, और मेरी दशा देखकर मुझे दर्शन दीजिए।
आपके दर्शन के बिना यह भक्त व्याकुल है; आपके रहते हुए भी मैं भारी दुःख सह रहा हूँ।
मुझमें ज्ञान और बुद्धि नहीं है; आप अपने मन में सब जानती हैं।
अपना चार भुजाओं वाला रूप धारण करके अब मेरा कष्ट दूर कीजिए।
मैं किस प्रकार आपकी बड़ाई करूँ? मुझमें ज्ञान और बुद्धि अधिक नहीं है।
रामदास अब पुकारकर कहते हैं: माँ, आप मेरी विपत्ति दूर कीजिए।
हे दुःख हरने वाली, रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए; जल्दी सब भय और कष्ट हर लीजिए। हे लक्ष्मी, आपकी जय हो; शत्रुओं का नाश कीजिए।
रामदास रोज़ ध्यान लगाकर हाथ जोड़कर विनती करते हैं: हे माँ लक्ष्मी, इस दास पर दया की दृष्टि कीजिए।
लक्ष्मी चालीसा में माँ लक्ष्मी केवल धन की देवी नहीं, ज्ञान, बुद्धि और विद्या देने वाली जगत-जननी के रूप में आती हैं; पहली ही चौपाई में भक्त इन्हीं को माँगता है। चालीसा बताती है कि वे सागर से प्रकट हुईं, विष्णु जी को वरा, और उनके हर अवतार में रूप बदलकर साथ रहीं, जैसे श्री राम के साथ सीता जी के रूप में। वे हर प्राणी के भीतर बसती हैं और सबका सहारा हैं।
बीच की चौपाइयाँ पाठ और पूजा का फल बताती हैं, पर साथ में शर्त भी रखती हैं: छल, कपट और चतुराई छोड़कर मन, वचन और कर्म से सेवा, और विश्वास के साथ नियम। अंत में भक्त विनम्र होकर मानता है कि उसमें ज्ञान और बुद्धि की कमी है, वह अपनी भूलों की क्षमा माँगता है और बस माँ के दर्शन और दया चाहता है।
चौपाई 19 से 31 (21 को छोड़कर, जो विनती है) लक्ष्मी चालीसा की फलश्रुति हैं। चालीसा अपने वचनों में कहती है कि मन लगाकर पाठ करने, पढ़ने-सुनने, चालीस दिन पाठ करवाने और विश्वास से व्रत-नियम करने वाले को कष्ट नहीं होता और सुख-संपत्ति मिलती है। यहाँ ये चालीसा के अपने वचन के रूप में दिए गए हैं, किसी परिणाम के वादे के रूप में नहीं; चालीसा स्वयं इनके साथ छल-कपट छोड़कर सच्चे मन से पूजा की बात जोड़ती है।
और हाल मैं कहौं बुझाई।
जो यह पाठ करे मन लाई॥अब मैं एक और बात समझाकर कहता हूँ: जो मन लगाकर इसका पाठ करता है,
ताको कोई कष्ट न होई।
मन इच्छित पावै फल सोई॥उसे कोई कष्ट नहीं होता और वह मनचाहा फल पाता है; चालीसा यही कहती है।
जो यह पढ़े और पढ़ावे।
ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥जो इसे पढ़ता और पढ़ाता है, और ध्यान लगाकर सुनता और सुनाता है,
ताको कोई न रोग सतावै।
पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥चालीसा के अनुसार उसे कोई रोग नहीं सताता, और वह संतान, धन और संपत्ति पाता है।
पुत्र हीन और सम्पत्ति हीना।
अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥जो संतानहीन हो या संपत्तिहीन हो, जो देख या सुन न सके, कुष्ठ रोग से पीड़ित हो या बहुत दुखी हो,
विप्र बोलाय कै पाठ करावै।
शंका दिल में कभी न लावै॥वह ब्राह्मण को बुलाकर इसका पाठ करवाए, और मन में कभी शंका न लाए।
पाठ करावै दिन चालीसा।
ता पर कृपा करैं गौरीसा॥चालीसा कहती है कि जो चालीस दिन तक पाठ करवाए, उस पर गौरीपति भगवान शिव भी कृपा करते हैं।
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै।
कमी नहीं काहू की आवै॥वह बहुत सुख और संपत्ति पाता है, और उसे किसी चीज़ की कमी नहीं रहती।
बारह मास करै जो पूजा।
तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥जो बारहों महीने आपकी पूजा करता है, उसके समान धन्य कोई दूसरा नहीं।
प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं।
उन सम कोई जग में कहुँ नाहीं॥जो प्रतिदिन मन लगाकर पाठ करता है, उसके समान संसार में कहीं कोई नहीं।
बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई।
लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥मैं बहुत तरह से क्या बड़ाई करूँ; कोई भी ध्यान लगाकर इसे स्वयं परख ले, ऐसा चालीसा कहती है।
करि विश्वास करैं व्रत नेमा।
होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥जो विश्वास के साथ व्रत और नियम का पालन करते हैं, उनका काम सिद्ध होता है और हृदय में प्रेम उपजता है।
लक्ष्मी चालीसा का पाठ प्रायः शुक्रवार को, दीपावली पर लक्ष्मी-गणेश पूजा के साथ और शरद पूर्णिमा जैसे अवसरों पर होता है। बहुत से घरों में शाम को दीपक जलाते समय भी इसे पढ़ा जाता है।
परंपरा में लक्ष्मी जी को श्री, यानी समृद्धि, शोभा और शुभता की देवी माना जाता है। यह चालीसा इसी भाव को आगे बढ़ाती है: वह पहले ज्ञान, बुद्धि और विद्या माँगती है, और पूजा के साथ छल-कपट छोड़ने की बात कहती है। इसलिए भक्त इसे केवल धन की कामना नहीं, बल्कि घर में सुख, सद्भाव और शुभता की प्रार्थना के रूप में पढ़ते हैं।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| आरंभ | सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार। ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे नत शिर बारंबार॥ | sanskritdocuments.org में पहले दोहे के बाद यह दोहा “टेक” (बार-बार गाई जाने वाली पंक्ति) के रूप में है, और वहाँ सोरठा नहीं है। रणधीर प्रकाशन की पुस्तक और भारतकोश में सोरठा है; यहाँ उन्हीं के अनुसार सोरठा दिया है। |
| चौपाई 1 | ज्ञान बुद्धि विद्या दे मोही | रणधीर प्रकाशन की पुस्तक में। |
| चौपाई 3 | जै जै जगत जननि जगदम्बा। सबके तुमही हो स्वलम्बा॥ | sanskritdocuments.org में; रणधीर प्रकाशन में “सबकी तुम ही हो अवलम्बा”, जो अर्थ में साफ़ है। |
| चौपाई 16 | तुम सब प्रबल शक्ति नहिं आनी | sanskritdocuments.org में “सम” की जगह “सब”; रणधीर प्रकाशन में दूसरी पंक्ति “कहँ लौं महिमा कहौं बखानी” है। |
| चौपाई 20 | मन इच्छित फल पावै फल सोई | sanskritdocuments.org में “फल” दो बार छपा है। |
| चौपाई 22 | जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे। इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥ | sanskritdocuments.org का पाठ। |
| चौपाई 32 | जय जय जय लक्ष्मी भवानी। सब में व्यापित हो गुणखानी॥ | रणधीर प्रकाशन की पुस्तक में। |
| चौपाई 36 | तुमहिं अक्षत दुःख सहते भारी | sanskritdocuments.org में “अछत” की जगह “अक्षत”। |
| चौपाई 39 और 40 | (क्रम और अंतिम चौपाई अलग) | रणधीर प्रकाशन की पुस्तक में “केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई…” चौपाई 35 के बाद आती है और “रामदास अब कहै पुकारी…” वाली चौपाई नहीं है। sanskritdocuments.org में चौपाई 39 का आरंभ “कहि प्रकार” छपा है। |
| अंतिम दोहा 1 | जयति जयति जय लक्ष्मी, करो दुश्मन का नाश | रणधीर प्रकाशन की पुस्तक में। |
चौपाई 40 (“रामदास अब कहै पुकारी”) और अंतिम दोहे (“रामदास धरि ध्यान नित”) में यह नाम आता है, इसलिए इन्हें रचयिता माना जाता है। इनके बारे में और प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): sanskritdocuments.org (laxmi40) को रणधीर प्रकाशन की छपी पुस्तक “51 चालीसा संग्रह” (archive.org के पृष्ठ-चित्र और OCR) और भारतकोश के पाठ से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया। हर पंक्ति इनमें से किसी एक संदर्भ फ़ाइल में ज्यों की त्यों मिलती है। चौपाइयों का क्रम और संख्या sanskritdocuments.org के अनुसार है। sanskritdocuments.org की स्पष्ट भूलों वाली पंक्तियाँ (चौपाई 2, 3, 16, 20, 22, 36, 39) छपी पुस्तक के पाठ से लीं, जिसे पृष्ठ-चित्र से जाँचा। सोरठा भारतकोश से लिया (छपी पुस्तक में भी है, पर OCR में अक्षर बिगड़े हैं)। पुस्तक की OCR प्रति में चौपाई 10–15 छूट गई हैं, जबकि पृष्ठ-चित्र में वे हैं।
लक्ष्मी · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
शुक्रवार को घर में माँ लक्ष्मी की सरल पूजा: सफ़ाई, घी का दीपक, कमल या लाल फूल, कुमकुम, खीर या मिश्री का भोग, लक्ष्मी मंत्र, आरती और प्रार्थना।
लक्ष्मी · आरती
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता
लक्ष्मी · स्तोत्र · संस्कृत
अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती
लक्ष्मी · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
दीपावली की शाम घर में लक्ष्मी-गणेश पूजा: सफ़ाई, प्रदोष काल का समय, चौकी सजाना, गणेश पूजन, लक्ष्मी पूजन, दीपमालिका, बही-खाता, तिजोरी और आरती।
लक्ष्मी · सूक्त · संस्कृत
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्
लक्ष्मी · अष्टकम् · संस्कृत
नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते
चौपाई 40 और अंतिम दोहे में “रामदास” नाम आता है, इसलिए उन्हें रचयिता माना जाता है। उनके बारे में और प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।
प्रायः शुक्रवार को, दीपावली पर, शरद पूर्णिमा पर और रोज़ शाम दीपक जलाते समय। चालीसा में कोई तय दिन अनिवार्य नहीं बताया गया है।
नहीं। इसकी पहली ही चौपाई में ज्ञान, बुद्धि और विद्या की प्रार्थना है, और यह छल-कपट छोड़कर सच्चे मन से पूजा की बात करती है।
चालीस दिन तक पाठ करवाना। यह चालीसा की फलश्रुति का वचन है; पाठ की संख्या या दिनों को लेकर चिंता करने के बजाय श्रद्धा से पढ़ना ही मुख्य माना जाता है।
परंपरा मानती है कि विष्णु जी के हर अवतार में लक्ष्मी जी भी अवतार लेती हैं; श्री राम के अवतार में वे जनकपुर में सीता जी के रूप में प्रकट हुईं। चौपाई 13 और 14 यही कहती हैं।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।