लक्ष्मी पूजा विधि
लक्ष्मी · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
शुक्रवार को घर में माँ लक्ष्मी की सरल पूजा: सफ़ाई, घी का दीपक, कमल या लाल फूल, कुमकुम, खीर या मिश्री का भोग, लक्ष्मी मंत्र, आरती और प्रार्थना।

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ।चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१॥
oṃ hiraṇyavarṇāṃ hariṇīṃ suvarṇarajatasrajām |
candrāṃ hiraṇmayīṃ lakṣmīṃ jātavedo ma āvaha ||
अर्थ: हे जातवेदा अग्निदेव, सोने जैसे रंग वाली, दुःख हरने वाली, सोने और चाँदी की मालाएँ पहनने वाली, चन्द्रमा की तरह आह्लाद देने वाली, स्वर्णमयी लक्ष्मी को मेरे लिए बुलाइए।
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥२॥
tāṃ ma āvaha jātavedo lakṣmīmanapagāminīm |
yasyāṃ hiraṇyaṃ vindeyaṃ gāmaśvaṃ puruṣānaham ||
अर्थ: हे अग्निदेव, उन कभी न छोड़कर जाने वाली लक्ष्मी को मेरे लिए बुलाइए, जिनके आने पर मैं सोना, गाय, घोड़े और अपने लोग (परिवार और सहायक) पाऊँ।
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम् ।श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवीर्जुषताम् ॥३॥
aśvapūrvāṃ rathamadhyāṃ hastinādaprabodhinīm |
śriyaṃ devīmupahvaye śrīrmā devīrjuṣatām ||
अर्थ: जिनके आगे घोड़े चलते हैं, जो रथ के बीच में हैं और जिनके आने का पता हाथियों की चिंघाड़ से चलता है, उन श्री देवी को मैं पास बुलाता हूँ; वे श्री देवी मुझे अपनाएँ।
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥४॥
kāṃ sosmitāṃ hiraṇyaprākārāmārdrāṃ jvalantīṃ tṛptāṃ tarpayantīm |
padme sthitāṃ padmavarṇāṃ tāmihopahvaye śriyam ||
अर्थ: जो आनंद-स्वरूपा हैं, मधुर मुस्कान वाली हैं, सोने के परकोटे से घिरी हैं, दया से आर्द्र हैं, तेज से दमकती हैं, स्वयं तृप्त हैं और दूसरों को तृप्त करती हैं, जो कमल पर विराजमान और कमल जैसे वर्ण वाली हैं, उन श्री को मैं यहाँ बुलाता हूँ।
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् ।तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥५॥
candrāṃ prabhāsāṃ yaśasā jvalantīṃ śriyaṃ loke devajuṣṭāmudārām |
tāṃ padminīmīṃ śaraṇamahaṃ prapadye’lakṣmīrme naśyatāṃ tvāṃ vṛṇe ||
अर्थ: जो चन्द्रमा जैसी आह्लाद देने वाली, प्रकाशमयी, यश से दमकती, लोक में देवताओं से सेवित और उदार हैं, उन कमल वाली लक्ष्मी की मैं शरण लेता हूँ। मेरी अलक्ष्मी (दरिद्रता) नष्ट हो; हे देवी, मैं तुम्हें वरता हूँ।
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥६॥
ādityavarṇe tapaso’dhijāto vanaspatistava vṛkṣo’tha bilvaḥ |
tasya phalāni tapasā nudantu māyāntarāyāśca bāhyā alakṣmīḥ ||
अर्थ: हे सूर्य जैसी कांति वाली, तुम्हारे ही तप से वनस्पतियों में श्रेष्ठ बिल्व वृक्ष उत्पन्न हुआ। उसके फल तप के बल से मेरे भीतर की माया और विघ्नों को तथा बाहर की दरिद्रता को दूर करें।
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥७॥
upaitu māṃ devasakhaḥ kīrtiśca maṇinā saha |
prādurbhūto’smi rāṣṭre’smin kīrtimṛddhiṃ dadātu me ||
अर्थ: देवताओं के सखा (कुबेर) और कीर्ति, मणि (धन) के साथ मेरे पास आएँ। मैं इस देश में जन्मा हूँ; देवी मुझे कीर्ति और समृद्धि दें।
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥८॥
kṣutpipāsāmalāṃ jyeṣṭhāmalakṣmīṃ nāśayāmyaham |
abhūtimasamṛddhiṃ ca sarvāṃ nirṇuda me gṛhāt ||
अर्थ: भूख और प्यास से मलिन, (लक्ष्मी की) बड़ी बहन अलक्ष्मी को मैं नष्ट करता हूँ। हे देवी, मेरे घर से अभाव और असमृद्धि, सबको निकाल दो।
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥९॥
gandhadvārāṃ durādharṣāṃ nityapuṣṭāṃ karīṣiṇīm |
īśvarīṃ sarvabhūtānāṃ tāmihopahvaye śriyam ||
अर्थ: सुगंध ही जिनकी पहचान है, जिन्हें कोई हरा नहीं सकता, जो सदा भरी-पूरी रहती हैं और गोधन से समृद्ध हैं, सब प्राणियों की ईश्वरी उन श्री को मैं यहाँ बुलाता हूँ।
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥१०॥
manasaḥ kāmamākūtiṃ vācaḥ satyamaśīmahi |
paśūnāṃ rūpamannasya mayi śrīḥ śrayatāṃ yaśaḥ ||
अर्थ: हम मन की कामना और संकल्प की पूर्ति, वाणी की सच्चाई, पशुओं का सौंदर्य और अन्न का रस पाएँ; श्री और यश मुझमें आकर बसें।
कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम ।श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥११॥
kardamena prajābhūtā mayi sambhava kardama |
śriyaṃ vāsaya me kule mātaraṃ padmamālinīm ||
अर्थ: कर्दम नाम के पुत्र से लक्ष्मी संतान वाली कहलाईं। हे कर्दम, आप मेरे यहाँ प्रकट हों और कमल की माला पहनने वाली माता श्री को मेरे कुल में बसाएँ।
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे ।नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥१२॥
āpaḥ sṛjantu snigdhāni ciklīta vasa me gṛhe |
ni ca devīṃ mātaraṃ śriyaṃ vāsaya me kule ||
अर्थ: जल स्नेह से भरे, चिकने पदार्थ उत्पन्न करे। हे (लक्ष्मी के पुत्र) चिक्लीत, आप मेरे घर में बसें और माता श्री देवी को भी मेरे कुल में बसाएँ।
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् ।चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१३॥
ārdrāṃ puṣkariṇīṃ puṣṭiṃ piṅgalāṃ padmamālinīm |
candrāṃ hiraṇmayīṃ lakṣmīṃ jātavedo ma āvaha ||
अर्थ: हे अग्निदेव, दया से आर्द्र, कमलों वाली, पुष्टि-रूपा, सुनहरी आभा वाली, कमल की माला पहनने वाली, चन्द्रमा जैसी आह्लादक, स्वर्णमयी लक्ष्मी को मेरे लिए बुलाइए।
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् ।सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१४॥
ārdrāṃ yaḥ kariṇīṃ yaṣṭiṃ suvarṇāṃ hemamālinīm |
sūryāṃ hiraṇmayīṃ lakṣmīṃ jātavedo ma āvaha ||
अर्थ: हे अग्निदेव, दया से आर्द्र, कर्म कराने वाली, सहारा देने वाली, सुंदर वर्ण वाली, सोने की माला पहनने वाली, सूर्य जैसी तेजस्वी, स्वर्णमयी लक्ष्मी को मेरे लिए बुलाइए।
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान्विन्देयं पुरुषानहम् ॥१५॥
tāṃ ma āvaha jātavedo lakṣmīmanapagāminīm |
yasyāṃ hiraṇyaṃ prabhūtaṃ gāvo dāsyo’śvānvindeyaṃ puruṣānaham ||
अर्थ: हे अग्निदेव, उन कभी न छोड़कर जाने वाली लक्ष्मी को मेरे लिए बुलाइए, जिनके आने पर मैं बहुत-सा सोना, गायें, सेविकाएँ, घोड़े और अपने लोग पाऊँ।
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् ।श्रियः पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥१६॥
yaḥ śuciḥ prayato bhūtvā juhuyādājyamanvaham |
śriyaḥ pañcadaśarcaṃ ca śrīkāmaḥ satataṃ japet ||
अर्थ: यह मन्त्र कहता है: जो श्री की कामना रखता है, वह पवित्र और संयमित होकर प्रतिदिन घी से हवन करे और श्री के इन पंद्रह मन्त्रों का निरंतर जप करे।
श्री सूक्त माँ लक्ष्मी की सबसे पुरानी स्तुतियों में से है। यह ऋग्वेद के मूल मण्डलों में नहीं, उसके परिशिष्ट रूप "खिल" सूक्तों में मिलता है। इसमें पंद्रह मन्त्र हैं और सोलहवाँ मन्त्र बताता है कि लक्ष्मी की कामना रखने वाला इन पंद्रह मन्त्रों का जप करे।
सूक्त की बनावट अनोखी है: ज़्यादातर मन्त्रों में भक्त अग्निदेव (जातवेदा) से कहता है कि वे लक्ष्मी को मेरे लिए बुलाएँ, और साथ ही अलक्ष्मी, यानी भूख, प्यास, अभाव और दरिद्रता को दूर करने की प्रार्थना करता है। दीपावली और लक्ष्मी पूजा में यह सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला वैदिक पाठ है।
श्री सूक्त में भक्त अग्निदेव को माध्यम बनाता है: वैदिक परंपरा में अग्नि देवताओं तक बात पहुँचाने वाले हैं, इसलिए उनसे कहा गया है कि वे लक्ष्मी को बुलाकर लाएँ। लक्ष्मी का रूप सोने जैसा, कमल पर विराजमान, कमल की माला पहने, चन्द्रमा और सूर्य जैसा दमकता हुआ बताया गया है। उनके आगमन के साथ घोड़े, रथ और हाथियों की चिंघाड़ है, यानी राजसी वैभव।
सूक्त केवल धन नहीं माँगता। वह "अनपगामिनी" लक्ष्मी माँगता है, जो आकर छोड़कर न जाएँ; मन के संकल्प की पूर्ति, वाणी की सच्चाई और यश माँगता है; और साथ में अलक्ष्मी को, यानी भूख, प्यास, अभाव और भीतर-बाहर की दरिद्रता को घर से निकालने की प्रार्थना करता है। बिल्व वृक्ष को लक्ष्मी के तप से उत्पन्न बताना भी इसी सूक्त में है।
ग्यारहवें और बारहवें मन्त्र में लक्ष्मी के पुत्र कर्दम और चिक्लीत से कहा गया है कि वे स्वयं घर में बसें और माँ को भी कुल में बसाएँ, जैसे बच्चे के रहने से माँ वहीं रहती है। सोलहवाँ मन्त्र बताता है कि इन पंद्रह मन्त्रों का जप पवित्र और संयमित होकर किया जाए।
सूक्त का सोलहवाँ मन्त्र स्वयं कहता है कि श्री की कामना रखने वाला पवित्र और संयमित होकर प्रतिदिन घी से हवन करे और इन पंद्रह मन्त्रों का जप करे। बहुत-सी पुस्तकों में सूक्त के बाद और भी फलश्रुति-श्लोक जोड़े गए हैं (जैसे "पद्मानने पद्म ऊरू"), जो सूक्त के इन सोलह मन्त्रों में नहीं गिने जाते।
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् ।
श्रियः पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥यह मन्त्र कहता है: जो श्री की कामना रखता है, वह पवित्र और संयमित होकर प्रतिदिन घी से हवन करे और श्री के इन पंद्रह मन्त्रों का निरंतर जप करे।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| मन्त्र 3 | श्रीर्मा देवी जुषताम् | drikpanchang.com और बहुत-सी हिंदी पुस्तकों का पाठ; sanskritdocuments.org और stotranidhi.com के स्वर-सहित पाठ में "श्रीर्मा देवीर्जुषताम्" है। |
| मन्त्र 16 | सूक्तं पञ्चदशर्चं च | drikpanchang.com का पाठ। |
| मन्त्र 16 के बाद | "पद्मानने पद्म ऊरू" आदि श्लोक और लक्ष्मी गायत्री | sanskritdocuments.org, stotranidhi.com और drikpanchang.com तीनों पर सूक्त के बाद ये श्लोक दिए हैं, पर उनकी संख्या और क्रम अलग-अलग है; वे यहाँ सूक्त में नहीं जोड़े गए। |
वैदिक सूक्त का कोई रचयिता नहीं माना जाता; उसके द्रष्टा ऋषि बताए जाते हैं। सूक्त के बाद पढ़े जाने वाले एक श्लोक के अनुसार इसके ऋषि श्री के पुत्र आनन्द, कर्दम, श्रीद और चिक्लीत हैं; ग्यारहवें और बारहवें मन्त्र में कर्दम और चिक्लीत का नाम भी आता है।
श्री सूक्त ऋग्वेद के पाँचवें मण्डल के साथ जुड़े खिल (परिशिष्ट) भाग में है। अलग-अलग परंपराओं में इसके बाद कई फलश्रुति-श्लोक और लक्ष्मी गायत्री भी जोड़ी जाती है; यहाँ केवल सूक्त के सोलह मन्त्र दिए गए हैं।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): सोलहों मन्त्र sanskritdocuments.org के बिना स्वर वाले श्रीसूक्त और drikpanchang.com के पाठ से पंक्ति-पंक्ति मिलाए गए, और sanskritdocuments.org तथा stotranidhi.com के स्वर सहित पाठ से शब्द देखे गए। मन्त्रों का क्रम और संख्या सब स्रोतों में एक है। मन्त्र 9 में sanskritdocuments.org "ईश्वरीꣳ" (वैदिक अनुस्वार का चिह्न) लिखता है; यहाँ सामान्य अनुस्वार "ईश्वरीं" लिखा है, जैसा drikpanchang.com पर है। अर्थ और उच्चारण वही है।
लक्ष्मी · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
शुक्रवार को घर में माँ लक्ष्मी की सरल पूजा: सफ़ाई, घी का दीपक, कमल या लाल फूल, कुमकुम, खीर या मिश्री का भोग, लक्ष्मी मंत्र, आरती और प्रार्थना।
लक्ष्मी · आरती
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता
लक्ष्मी · चालीसा
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास
लक्ष्मी · स्तोत्र · संस्कृत
अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती
लक्ष्मी · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
दीपावली की शाम घर में लक्ष्मी-गणेश पूजा: सफ़ाई, प्रदोष काल का समय, चौकी सजाना, गणेश पूजन, लक्ष्मी पूजन, दीपमालिका, बही-खाता, तिजोरी और आरती।
लक्ष्मी · अष्टकम् · संस्कृत
नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते
यह ऋग्वेद का है, पर उसके मूल मण्डलों में नहीं, बल्कि परिशिष्ट रूप "खिल" सूक्तों में मिलता है। इसलिए इसे ऋग्वेदीय खिल सूक्त कहा जाता है।
मूल सूक्त में पंद्रह मन्त्र हैं, और सोलहवाँ मन्त्र इन पंद्रह के जप की विधि बताता है। कई पुस्तकों में इसके बाद और श्लोक जोड़े जाते हैं, इसलिए कुछ जगह संख्या अधिक दिखती है।
वैदिक परंपरा में अग्नि देवताओं तक आहुति और प्रार्थना पहुँचाने वाले माने जाते हैं। इसलिए भक्त अग्निदेव से कहता है कि वे लक्ष्मी को मेरे लिए बुलाएँ।
अलक्ष्मी अभाव, दरिद्रता, भूख-प्यास और अशुभता का रूप है। श्री सूक्त के आठवें मन्त्र में उसे लक्ष्मी की बड़ी बहन कहा गया है और घर से उसे निकालने की प्रार्थना है।
स्वर सहित पाठ वैदिक परंपरा में गुरु से सीखा जाता है। घर की पूजा में बहुत-से लोग इसे बिना स्वर के, साफ़ उच्चारण और श्रद्धा से पढ़ते हैं।
कई पूजा-पद्धतियों में सोलह उपचारों (आवाहन, आसन, स्नान आदि) के साथ श्री सूक्त का एक-एक मन्त्र पढ़ा जाता है। कुछ घरों में पूजा के अंत में पूरा सूक्त एक साथ भी पढ़ा जाता है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।