लक्ष्मी

आरती · लक्ष्मी

ॐ जय लक्ष्मी माता

माँ लक्ष्मी की आरती, जो दीपावली, शुक्रवार और वैभव लक्ष्मी व्रत में गाई जाती है। पूरा पाठ, हर अंतरे का सरल अर्थ, भावार्थ और पाठभेद।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. अंतरा-वार अर्थ
  4. भावार्थ
  5. कठिन शब्द
  6. फलश्रुति
  7. कब पढ़ें
  8. विधि
  9. पाठ-भेद
  10. रचयिता और स्रोत
  11. ये भी पढ़ें
  12. सवाल-जवाब
  13. सुधार सुझाएँ

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।तुमको निस दिन सेवत, हर विष्णु धाता॥

अर्थ: हे लक्ष्मी माता, आपकी जय हो। शिव, विष्णु और ब्रह्मा भी रात-दिन आपकी सेवा करते हैं।

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥

॥ ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

अर्थ: उमा, रमा और ब्रह्माणी, आप ही ये सब हैं; आप ही जगत की माता हैं। सूर्य और चंद्रमा आपका ध्यान करते हैं और नारद ऋषि आपके गुण गाते हैं।

दुर्गा रूप निरंजनि, सुख सम्पति दाता।जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥

॥ ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

अर्थ: आप ही निर्मल दुर्गा-रूप हैं और सुख-संपत्ति देने वाली हैं। आरती कहती है कि जो आपका ध्यान करता है, उसे ऋद्धि, सिद्धि और धन मिलता है।

तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता॥

॥ ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

अर्थ: आप पाताल में भी निवास करती हैं और आप ही शुभ देने वाली हैं। आप कर्मों का फल प्रकट करती हैं और संसार रूपी सागर से रक्षा करती हैं।

जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता।सब सम्भव हो जाता, मन नहिं घबराता॥

॥ ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

अर्थ: जिस घर में आप रहती हैं, वहाँ सब अच्छे गुण आ जाते हैं। वहाँ सब काम संभव हो जाते हैं और मन नहीं घबराता।

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न हो पाता।खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥

॥ ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

अर्थ: आपके बिना न यज्ञ हो पाते हैं, न वस्त्र मिल पाता है। खाने-पीने की सारी समृद्धि आपसे ही आती है।

शुभ-गुण-मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि-जाता।रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहिं पाता॥

॥ ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

अर्थ: आप शुभ गुणों का सुंदर मंदिर हैं और क्षीर-सागर से प्रकट हुई हैं। आपके बिना समुद्र-मंथन के चौदह रत्न कोई नहीं पा सकता।

महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गाता।उर आनंद समाता, पाप उतर जाता॥

॥ ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

अर्थ: आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि महालक्ष्मी जी की यह आरती जो कोई गाता है, उसके हृदय में आनंद भर जाता है और उसके पाप उतर जाते हैं।

हर अंतरे का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।

परिचय

“ॐ जय लक्ष्मी माता” माँ लक्ष्मी की आरती है, जो दीपावली की लक्ष्मी पूजा, शुक्रवार और वैभव लक्ष्मी व्रत में सबसे अधिक गाई जाती है। इसमें लक्ष्मी जी को केवल धन की देवी नहीं, जगत की माता कहा गया है: उमा, रमा और ब्रह्माणी, सब वही हैं, और घर के सद्गुण, मन की शांति और अन्न-वस्त्र भी उन्हीं की कृपा से माने गए हैं।

इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है। गीता प्रेस के आरती-संग्रह में यह “श्रीलक्ष्मीजी” शीर्षक से छपी है। यहाँ घरों में गाया जाने वाला पाठ है; जहाँ स्रोत आपस में अलग थे, वहाँ गीता प्रेस से मेल खाता शब्द चुना है।

अंतरा-वार अर्थ

  1. मुखड़ा ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता…

    हे लक्ष्मी माता, आपकी जय हो। शिव, विष्णु और ब्रह्मा भी रात-दिन आपकी सेवा करते हैं।

  2. अंतरा १ उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता…

    उमा, रमा और ब्रह्माणी, आप ही ये सब हैं; आप ही जगत की माता हैं। सूर्य और चंद्रमा आपका ध्यान करते हैं और नारद ऋषि आपके गुण गाते हैं।

  3. अंतरा २ दुर्गा रूप निरंजनि, सुख सम्पति दाता…

    आप ही निर्मल दुर्गा-रूप हैं और सुख-संपत्ति देने वाली हैं। आरती कहती है कि जो आपका ध्यान करता है, उसे ऋद्धि, सिद्धि और धन मिलता है।

  4. अंतरा ३ तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता…

    आप पाताल में भी निवास करती हैं और आप ही शुभ देने वाली हैं। आप कर्मों का फल प्रकट करती हैं और संसार रूपी सागर से रक्षा करती हैं।

  5. अंतरा ४ जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता…

    जिस घर में आप रहती हैं, वहाँ सब अच्छे गुण आ जाते हैं। वहाँ सब काम संभव हो जाते हैं और मन नहीं घबराता।

  6. अंतरा ५ तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न हो पाता…

    आपके बिना न यज्ञ हो पाते हैं, न वस्त्र मिल पाता है। खाने-पीने की सारी समृद्धि आपसे ही आती है।

  7. अंतरा ६ शुभ-गुण-मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि-जाता…

    आप शुभ गुणों का सुंदर मंदिर हैं और क्षीर-सागर से प्रकट हुई हैं। आपके बिना समुद्र-मंथन के चौदह रत्न कोई नहीं पा सकता।

  8. अंतरा ७ महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गाता…

    आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि महालक्ष्मी जी की यह आरती जो कोई गाता है, उसके हृदय में आनंद भर जाता है और उसके पाप उतर जाते हैं।

भावार्थ

आरती लक्ष्मी जी को एक बड़े रूप में देखती है। शिव, विष्णु और ब्रह्मा उनकी सेवा करते हैं; उमा, रमा और ब्रह्माणी उन्हीं के रूप हैं; सूर्य-चंद्रमा उनका ध्यान करते हैं। वे दुर्गा का निर्मल रूप भी हैं और संसार-सागर से बचाने वाली भी। इस तरह लक्ष्मी यहाँ केवल धन नहीं, हर शुभ चीज़ की देवी हैं।

बीच के अंतरे बताते हैं कि उनकी कृपा घर में कैसे दिखती है: सद्गुण आते हैं, काम बनते हैं, मन शांत रहता है, यज्ञ होते हैं, अन्न और वस्त्र मिलते हैं। समुद्र-मंथन के चौदह रत्नों की याद दिलाकर आरती कहती है कि हर श्रेष्ठ वस्तु उन्हीं की देन है। भाव यह है कि लक्ष्मी जी को घर में शुभ गुणों के साथ बुलाया जाए।

कठिन शब्दों के अर्थ

निस दिन
रात-दिन
हर
शिव
धाता
ब्रह्मा, सृष्टि रचने वाले
उमा
पार्वती
रमा
लक्ष्मी
ब्रह्माणी
ब्रह्मा की शक्ति, सरस्वती
निरंजनि
निर्मल, दोष से रहित
ऋद्धि-सिद्धि
समृद्धि और सफलता
पाताल-निवासिनि
पाताल लोक में भी रहने वाली
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि
कर्मों का फल प्रकट करने वाली
भवनिधि
संसार रूपी सागर
त्राता
रक्षा करने वाली
तहँ
वहाँ
वैभव
समृद्धि, ऐश्वर्य
क्षीरोदधि-जाता
क्षीर-सागर से जन्मी
रत्न चतुर्दश
समुद्र-मंथन से निकले चौदह रत्न
उर
हृदय

फलश्रुति

अंतरा 7 इस आरती की फलश्रुति है। आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि इसे गाने वाले के हृदय में आनंद आता है और पाप उतर जाते हैं; यहाँ यह आरती के अपने वचन के रूप में दिया है।

महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गाता।
उर आनंद समाता, पाप उतर जाता॥

आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि महालक्ष्मी जी की यह आरती जो कोई गाता है, उसके हृदय में आनंद भर जाता है और उसके पाप उतर जाते हैं।

यह आरती कब गाई जाती है

  • दीपावली की लक्ष्मी-गणेश पूजा के अंत में, और धनतेरस पर
  • शुक्रवार को और वैभव लक्ष्मी व्रत की पूजा में
  • रोज़ की पूजा में, शाम का दीपक जलाने के समय

आरती कैसे करें

  • लक्ष्मी जी के चित्र या मूर्ति के सामने पूजा पूरी करके घी का दीपक जलाएँ; दीपावली पर कई घरों में थाली में कई दीपक सजाए जाते हैं।
  • खड़े होकर, घंटी बजाते हुए आरती गाएँ और दीपक को धीरे-धीरे माँ के चारों ओर घुमाएँ।
  • हर अंतरे के बाद “ॐ जय लक्ष्मी माता” दोहराया जाता है। गाते समय अंतरे की पहली पंक्ति का अंतिम हिस्सा “मैया” जोड़कर दोहराने की रीत है, जैसे “मैया तुम ही जग-माता”।
  • दीपावली पर कई परिवारों में पहले गणेश जी की आरती और फिर लक्ष्मी जी की आरती गाई जाती है; अपने घर की परंपरा के अनुसार करें।
पूरी विधिलक्ष्मी पूजा विधिशुक्रवार को घर में माँ लक्ष्मी की सरल पूजा: सफ़ाई, घी का दीपक, कमल या लाल फूल, कुमकुम, खीर या मिश्री का भोग, लक्ष्मी मंत्र, आरती और प्रार्थना।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
मुखड़ातुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाताभक्ति भारत और sanskritdocuments.org; द्रिक पंचांग में “हरि विष्णु विधाता”। गीता प्रेस और वेबदुनिया में “हर-विष्णु-धाता”।
अंतरा 4जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आताद्रिक पंचांग; भक्ति भारत में “जिस घर तुम रहती हो, ताँहि में हैं सद्‍गुण आता”।
अंतरा 5तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाताद्रिक पंचांग और sanskritdocuments.org; गीता प्रेस और वेबदुनिया में “वस्त्र न हो पाता”।
अंतरा 7महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाताद्रिक पंचांग और sanskritdocuments.org में “जन”; वेबदुनिया में अंत “पाप शमन हो जाता”।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
ज्ञात नहीं
ग्रंथ / स्रोत
आरती-संग्रह (गीता प्रेस, गोरखपुर), “श्रीलक्ष्मीजी” शीर्षक से
भाषा
हिन्दी

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति भक्ति भारत, द्रिक पंचांग, वेबदुनिया, गीता प्रेस के आरती-संग्रह (कोड 153, archive.org पर स्कैन से पढ़ा गया पाठ) और sanskritdocuments.org (आरती संग्रह) से मिलाई। हर पंक्ति कम से कम दो स्रोतों में है (वर्तनी के छोटे अंतर छोड़कर)। जहाँ वेब स्रोत अलग थे, वहाँ गीता प्रेस से मेल खाता पाठ चुना: “हर विष्णु धाता” (गीता प्रेस, वेबदुनिया), “दुर्गा रूप निरंजनि, सुख सम्पति दाता” (गीता प्रेस, sanskritdocuments), “वस्त्र न हो पाता” और “कोई नहिं पाता” (गीता प्रेस, वेबदुनिया), “जो कोई नर गाता” (गीता प्रेस, भक्ति भारत)। वेबदुनिया के दूसरे अंतरे की पहली पंक्ति (“तुम पाताल-निरंजनि”) स्पष्ट भूल लगती है, इसलिए वहाँ बाक़ी स्रोत माने। भक्ति भारत आरती से पहले “महालक्ष्मी नमस्तुभ्यं” श्लोक देता है; वह आरती का अंश नहीं, इसलिए यहाँ नहीं लिया।

ये भी पढ़ें

लक्ष्मी

लक्ष्मी पूजा विधि

लक्ष्मी · पूजा विधि · रोज़ की पूजा

शुक्रवार को घर में माँ लक्ष्मी की सरल पूजा: सफ़ाई, घी का दीपक, कमल या लाल फूल, कुमकुम, खीर या मिश्री का भोग, लक्ष्मी मंत्र, आरती और प्रार्थना।

लक्ष्मी

दीपावली लक्ष्मी-गणेश पूजा विधि

लक्ष्मी · पूजा विधि · त्योहार की पूजा

दीपावली की शाम घर में लक्ष्मी-गणेश पूजा: सफ़ाई, प्रदोष काल का समय, चौकी सजाना, गणेश पूजन, लक्ष्मी पूजन, दीपमालिका, बही-खाता, तिजोरी और आरती।

लक्ष्मी

श्री सूक्त

लक्ष्मी · सूक्त · संस्कृत

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्

माँ लक्ष्मी के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

लक्ष्मी जी की यह आरती किसने लिखी?

इसके रचयिता का नाम आरती में नहीं आता, और किसी विश्वसनीय स्रोत में भी प्रमाण के साथ नहीं मिलता।

दीपावली पर पहले कौन सी आरती गाएँ?

कई परिवारों में लक्ष्मी-गणेश पूजा के अंत में पहले गणेश जी की आरती और फिर लक्ष्मी जी की आरती गाई जाती है। यह परिवार की परंपरा पर निर्भर है।

“उमा, रमा, ब्रह्माणी” क्यों कहा गया है?

उमा पार्वती का, रमा लक्ष्मी का और ब्रह्माणी ब्रह्मा की शक्ति सरस्वती का नाम है। आरती कहती है कि ये सब एक ही जगन्माता के रूप हैं।

“रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहिं पाता” का क्या अर्थ है?

समुद्र-मंथन से चौदह रत्न निकले थे, और लक्ष्मी जी भी उसी क्षीर-सागर से प्रकट हुईं। पंक्ति कहती है कि उनकी कृपा के बिना कोई श्रेष्ठ वस्तु नहीं मिलती।

क्या दीपक के बिना भी आरती गा सकते हैं?

हाँ। दीपक जलाना आरती का अंग है, पर यदि वह संभव न हो तो हाथ जोड़कर, माँ का ध्यान करते हुए आरती गाना भी उनकी स्तुति है।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

सुधार भेजें