लक्ष्मी पूजा विधि
लक्ष्मी · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
शुक्रवार को घर में माँ लक्ष्मी की सरल पूजा: सफ़ाई, घी का दीपक, कमल या लाल फूल, कुमकुम, खीर या मिश्री का भोग, लक्ष्मी मंत्र, आरती और प्रार्थना।

अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्तीभृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् ।अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीलामाङ्गल्यदाऽस्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥१॥
aṅgaṃ hareḥ pulakabhūṣaṇamāśrayantī
bhṛṅgāṅganeva mukulābharaṇaṃ tamālam |
aṅgīkṛtākhilavibhūtirapāṅgalīlā
māṅgalyadā’stu mama maṅgaladevatāyāḥ ||
अर्थ: जैसे भौंरी कलियों से सजे तमाल वृक्ष का आश्रय लेती है, वैसे ही जो कृपा-दृष्टि रोमांच से सजे भगवान हरि के अंग का आश्रय लेती है और जिसमें सारी विभूतियाँ समाई हैं, मंगल की देवी लक्ष्मी की वह चितवन मुझे मंगल देने वाली हो।
मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेःप्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले यासा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥२॥
mugdhā muhurvidadhatī vadane murāreḥ
prematrapāpraṇihitāni gatāgatāni |
mālā dṛśormadhukarīva mahotpale yā
sā me śriyaṃ diśatu sāgarasambhavāyāḥ ||
अर्थ: जैसे भौंरी बड़े नील कमल पर बार-बार आती-जाती है, वैसे ही जो दृष्टि-माला मुरारि के मुख पर प्रेम और लाज से बार-बार आती-जाती है, समुद्र से प्रकट हुई लक्ष्मी की वह मोहक दृष्टि मुझे श्री (संपत्ति और शोभा) दे।
विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षंआनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि ।ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम्इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥३॥
viśvāmarendrapadavibhramadānadakṣaṃ
ānandaheturadhikaṃ muravidviṣo’pi |
īṣanniṣīdatu mayi kṣaṇamīkṣaṇārdham
indīvarodarasahodaramindirāyāḥ ||
अर्थ: जो दृष्टि सब देवताओं को इन्द्र-पद का वैभव देने में समर्थ है और मुर के शत्रु विष्णु को भी बहुत आनंद देती है, नील कमल के भीतरी भाग जैसी सुंदर, लक्ष्मी की वह आधी दृष्टि क्षण भर के लिए थोड़ी-सी मुझ पर भी ठहरे।
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दंआनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् ।आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रंभूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥४॥
āmīlitākṣamadhigamya mudā mukundaṃ
ānandakandamanimeṣamanaṅgatantram |
ākekarasthitakanīnikapakṣmanetraṃ
bhūtyai bhavenmama bhujaṅgaśayāṅganāyāḥ ||
अर्थ: आनंद के मूल मुकुन्द को आनंद से आँखें मूँदे पाकर जो नेत्र प्रेम के वश अपलक हो जाते हैं, जिनकी पुतलियाँ और पलकें तिरछी होकर ठहर गई हैं, शेषनाग पर सोने वाले विष्णु की पत्नी लक्ष्मी के वे नेत्र मेरे ऐश्वर्य के लिए हों।
बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे याहारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमालाकल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥५॥
bāhvantare madhujitaḥ śritakaustubhe yā
hārāvalīva harinīlamayī vibhāti |
kāmapradā bhagavato’pi kaṭākṣamālā
kalyāṇamāvahatu me kamalālayāyāḥ ||
अर्थ: मधु को जीतने वाले भगवान के कौस्तुभ मणि से सजे वक्ष पर जो इन्द्रनील मणियों के हार जैसी शोभित होती है और भगवान की भी कामना पूरी करती है, कमल में रहने वाली लक्ष्मी की वह कटाक्ष-माला मेरा कल्याण करे।
कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेःधाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव ।मातुस्समस्तजगतां महनीयमूर्तिःभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः ॥६॥
kālāmbudālilalitorasi kaiṭabhāreḥ
dhārādhare sphurati yā taḍidaṅganeva |
mātussamastajagatāṃ mahanīyamūrtiḥ
bhadrāṇi me diśatu bhārgavanandanāyāḥ ||
अर्थ: जैसे काले बादल में बिजली चमकती है, वैसे ही जो कैटभ के शत्रु विष्णु के काले मेघ-जैसे सुंदर वक्ष पर चमकती हैं, समस्त जगत की माता, भृगु की पुत्री लक्ष्मी का वह पूजनीय रूप मुझे कल्याण दे।
प्राप्तं पदं प्रथमतः खलु यत्प्रभावात्माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन ।मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धंमन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः ॥७॥
prāptaṃ padaṃ prathamataḥ khalu yatprabhāvāt
māṅgalyabhāji madhumāthini manmathena |
mayyāpatettadiha mantharamīkṣaṇārdhaṃ
mandālasaṃ ca makarālayakanyakāyāḥ ||
अर्थ: जिस दृष्टि के प्रभाव से कामदेव ने मंगलमय मधुसूदन भगवान पर पहली बार अपना स्थान पाया, समुद्र की पुत्री लक्ष्मी की वह धीमी, अलसाई आधी दृष्टि यहाँ मुझ पर भी पड़े।
दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारांअस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे ।दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरंनारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः ॥८॥
dadyāddayānupavano draviṇāmbudhārāṃ
asminnakiñcanavihaṅgaśiśau viṣaṇṇe |
duṣkarmagharmamapanīya cirāya dūraṃ
nārāyaṇapraṇayinīnayanāmbuvāhaḥ ||
अर्थ: नारायण की प्रिया लक्ष्मी के नेत्र रूपी बादल, जिन्हें दया रूपी अनुकूल हवा चलाती है, मेरे बुरे कर्मों की तपन को सदा के लिए दूर हटाकर, इस दुखी और निर्धन पक्षी-शिशु (चातक) पर धन रूपी जल की धारा बरसाएँ।
इष्टाविशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र-दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते ।दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टांपुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥९॥
iṣṭāviśiṣṭamatayo’pi yayā dayārdra-
dṛṣṭyā triviṣṭapapadaṃ sulabhaṃ labhante |
dṛṣṭiḥ prahṛṣṭakamalodaradīptiriṣṭāṃ
puṣṭiṃ kṛṣīṣṭa mama puṣkaraviṣṭarāyāḥ ||
अर्थ: जिसकी दया से भीगी दृष्टि से लोग स्वर्ग का पद भी सहज पा लेते हैं, खिले कमल के भीतरी भाग जैसी चमक वाली, कमल के आसन पर बैठने वाली लक्ष्मी की वह दृष्टि मुझे मनचाही पुष्टि (समृद्धि) दे।
गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीतिशाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति ।सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायैतस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥१०॥
gīrdevateti garuḍadhvajasundarīti
śākambharīti śaśiśekharavallabheti |
sṛṣṭisthitipralayakeliṣu saṃsthitāyai
tasyai namastribhuvanaikagurostaruṇyai ||
अर्थ: जो सृष्टि, पालन और प्रलय की लीलाओं में वाणी की देवी, गरुडध्वज विष्णु की सुंदरी, शाकम्भरी और चन्द्रशेखर शिव की प्रिया के रूप में स्थित हैं, तीनों लोकों के एकमात्र गुरु भगवान की उस तरुणी पत्नी को नमस्कार है।
श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यैरत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै ।शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायैपुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥११॥
śrutyai namo’stu śubhakarmaphalaprasūtyai
ratyai namo’stu ramaṇīyaguṇārṇavāyai |
śaktyai namo’stu śatapatraniketanāyai
puṣṭyai namo’stu puruṣottamavallabhāyai ||
अर्थ: शुभ कर्मों का फल देने वाली श्रुति-रूपा को नमस्कार, सुंदर गुणों की सागर रति-रूपा को नमस्कार, कमल में निवास करने वाली शक्ति-रूपा को नमस्कार, और पुरुषोत्तम की प्रिया पुष्टि-रूपा को नमस्कार।
नमोऽस्तु नालीकनिभाननायैनमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूम्यै ।नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायैनमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥१२॥
namo’stu nālīkanibhānanāyai
namo’stu dugdhodadhijanmabhūmyai |
namo’stu somāmṛtasodarāyai
namo’stu nārāyaṇavallabhāyai ||
अर्थ: कमल जैसे मुख वाली को नमस्कार, क्षीरसागर जिनकी जन्मभूमि है उनको नमस्कार, चन्द्रमा और अमृत की बहन को नमस्कार, नारायण की प्रिया को नमस्कार।
सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानिसाम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि ।त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानिमामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ॥१३॥
sampatkarāṇi sakalendriyanandanāni
sāmrājyadānavibhavāni saroruhākṣi |
tvadvandanāni duritāharaṇodyatāni
māmeva mātaraniśaṃ kalayantu mānye ||
अर्थ: हे कमलनयनी, तुम्हें किए गए प्रणाम संपत्ति देने वाले, सब इन्द्रियों को आनंद देने वाले, साम्राज्य तक दे सकने वाले और पाप हरने को तत्पर हैं। हे माननीय माँ, वे प्रणाम सदा मेरे साथ रहें।
यत्कटाक्षसमुपासनाविधिःसेवकस्य सकलार्थसम्पदः ।सन्तनोति वचनाङ्गमानसैःत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥१४॥
yatkaṭākṣasamupāsanāvidhiḥ
sevakasya sakalārthasampadaḥ |
santanoti vacanāṅgamānasaiḥ
tvāṃ murārihṛdayeśvarīṃ bhaje ||
अर्थ: जिनकी कृपा-दृष्टि की उपासना सेवक को सारे अर्थ और संपत्तियाँ देती है, मुरारि के हृदय की स्वामिनी उन तुमको मैं वाणी, शरीर और मन से भजता हूँ।
सरसिजनिलये सरोजहस्तेधवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे ।भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञेत्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥१५॥
sarasijanilaye sarojahaste
dhavalatamāṃśukagandhamālyaśobhe |
bhagavati harivallabhe manojñe
tribhuvanabhūtikari prasīda mahyam ||
अर्थ: हे कमल में रहने वाली, हाथ में कमल लिए, अत्यंत उजले वस्त्र, चंदन और माला से शोभित, मन को हरने वाली हरिप्रिया भगवती, तीनों लोकों को ऐश्वर्य देने वाली माँ, मुझ पर प्रसन्न हो।
दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट-स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम् ।प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष-लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ॥१६॥
digghastibhiḥ kanakakumbhamukhāvasṛṣṭa-
svarvāhinīvimalacārujalaplutāṅgīm |
prātarnamāmi jagatāṃ jananīmaśeṣa-
lokādhināthagṛhiṇīmamṛtābdhiputrīm ||
अर्थ: दिशाओं के हाथी सोने के कलशों के मुख से आकाशगंगा का निर्मल, सुंदर जल जिन पर उँड़ेलते हैं, उस जल से नहाई हुई, जगत की माता, सारे लोकों के स्वामी विष्णु की गृहिणी, अमृत-सागर की पुत्री लक्ष्मी को मैं प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ।
कमले कमलाक्षवल्लभे त्वंकरुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गैः ।अवलोकय मामकिञ्चनानांप्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥१७॥
kamale kamalākṣavallabhe tvaṃ
karuṇāpūrataraṅgitairapāṅgaiḥ |
avalokaya māmakiñcanānāṃ
prathamaṃ pātramakṛtrimaṃ dayāyāḥ ||
अर्थ: हे कमला, कमलनयन विष्णु की प्रिया, करुणा की बाढ़ से उमड़ती अपनी चितवन से मुझे देखो; निर्धनों में मैं तुम्हारी दया का सबसे पहला और सच्चा पात्र हूँ।
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमीभिरन्वहंत्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् ।गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनोभवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः ॥१८॥
stuvanti ye stutibhiramībhiranvahaṃ
trayīmayīṃ tribhuvanamātaraṃ ramām |
guṇādhikā gurutarabhāgyabhāgino
bhavanti te bhuvi budhabhāvitāśayāḥ ||
अर्थ: यह श्लोक कहता है: जो लोग इन स्तुतियों से तीनों वेदों की स्वरूप, तीनों लोकों की माता रमा की प्रतिदिन स्तुति करते हैं, वे इस धरती पर गुणों में बढ़े हुए, बड़े भाग्य वाले और विद्वानों द्वारा सराहे गए मन वाले होते हैं।
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृत श्री कनकधारास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
|| iti śrīmacchaṅkarācāryakṛta śrī kanakadhārāstotraṃ sampūrṇam ||
अर्थ: इस प्रकार श्री शंकराचार्य द्वारा रचा श्री कनकधारा स्तोत्र पूरा हुआ।
कनकधारा स्तोत्र माँ लक्ष्मी की स्तुति है जिसे परंपरा आदि शंकराचार्य की रचना मानती है। इसका केंद्र लक्ष्मी जी की कृपा-दृष्टि है: शुरू के श्लोकों में वह दृष्टि भगवान विष्णु पर पड़ती दिखाई गई है, और भक्त माँगता है कि उसकी एक झलक मुझ पर भी पड़े।
परंपरा की कथा है कि बालक शंकर भिक्षा माँगते हुए एक निर्धन ब्राह्मणी के घर पहुँचे, जिसके पास देने को कुछ नहीं था। उसकी दशा देखकर उन्होंने यह स्तोत्र कहा और माँ लक्ष्मी ने उस घर पर सोने की वर्षा की; इसी से इसका नाम "कनकधारा" (सोने की धारा) पड़ा। यह कथा शंकराचार्य के जीवन पर लिखे शंकर-विजय ग्रंथों की परंपरा से जुड़ी है।
पहले नौ श्लोक माँ लक्ष्मी की दृष्टि के बारे में हैं। वह दृष्टि भगवान विष्णु के साँवले शरीर पर भौंरी की तरह मँडराती है, उनके वक्ष पर इन्द्रनील के हार जैसी चमकती है, काले बादल में बिजली की तरह कौंधती है। भक्त कहता है: जो दृष्टि देवताओं को इन्द्र-पद तक दे सकती है, उसकी आधी झलक क्षण भर के लिए मुझ पर भी पड़े। आठवें श्लोक में वह स्वयं को प्यासा चातक-शिशु कहता है, जिस पर माँ के नेत्र रूपी बादल धन की वर्षा करें।
दसवें से सोलहवें श्लोक तक नमस्कार है। लक्ष्मी जी को सरस्वती, शाकम्भरी और शिव-प्रिया पार्वती के रूप में भी पहचाना गया है, यानी एक ही देवी सृष्टि, पालन और प्रलय की लीलाओं में अलग-अलग रूपों में है। फिर उन्हें श्रुति, रति, शक्ति और पुष्टि कहकर, क्षीरसागर की पुत्री और चन्द्रमा-अमृत की बहन कहकर नमन किया गया है।
सत्रहवें श्लोक में भक्त अपनी पूरी विनती रखता है: मैं निर्धनों में तुम्हारी दया का सबसे सच्चा पात्र हूँ, करुणा भरी दृष्टि से मुझे देखो। अठारहवाँ श्लोक फलश्रुति है, जो प्रतिदिन इन स्तुतियों से माँ की स्तुति करने वालों के गुण और भाग्य बढ़ने की बात कहता है।
इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक 18) कहती है कि जो लोग प्रतिदिन इन स्तुतियों से माँ लक्ष्मी की स्तुति करते हैं, वे गुणों और भाग्य में बढ़ते हैं और विद्वानों में सम्मान पाते हैं। कुछ संस्करणों में अंत में जोड़ा गया एक और श्लोक भी फल बताता है; वह यहाँ दिए अठारह श्लोकों में नहीं है (पाठ-भेद देखें)।
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमीभिरन्वहं
त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् ।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो
भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः ॥यह श्लोक कहता है: जो लोग इन स्तुतियों से तीनों वेदों की स्वरूप, तीनों लोकों की माता रमा की प्रतिदिन स्तुति करते हैं, वे इस धरती पर गुणों में बढ़े हुए, बड़े भाग्य वाले और विद्वानों द्वारा सराहे गए मन वाले होते हैं।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| आरम्भ | वन्दे वन्दारुमन्दारमिन्दिरानन्दकन्दलम् … | sanskritdocuments.org और stotranidhi.com दोनों पर स्तोत्र से पहले गणेश-वन्दना का यह श्लोक दिया है; यह कनकधारा के अठारह श्लोकों में नहीं गिना जाता। |
| श्लोक 12 के बाद | "नमोऽस्तु हेमाम्बुजपीठिकायै" आदि तीन श्लोक | कुछ संस्करण तीन और "नमोऽस्तु" श्लोक जोड़ते हैं (stotranidhi.com पर "अधिक श्लोक" के रूप में, drikpanchang.com पर श्लोक 13 से 15)। |
| श्लोक 17 के बाद | "बिल्वाटवीमध्यलसत्सरोजे" आदि तीन श्लोक और "सुवर्णधारास्तोत्रं यच्छङ्कराचार्यनिर्मितम्" वाला फल-श्लोक | sanskritdocuments.org के अनुसार ये श्लोक दूसरे छपे संस्करणों में मिलते हैं, शंकराचार्य के ग्रंथ-संग्रह वाले अठारह श्लोकों में नहीं। |
| श्लोक 3 | क्षणमीक्षणार्थम् | stotranidhi.com का पाठ। |
| श्लोक 10 | गरुडध्वजभामिनीति | sanskritdocuments.org पर दिया दूसरा पाठ; drikpanchang.com में भी यही है। |
| श्लोक 18 | स्तुतिभिरमूभिरन्वहं … गुरुतरभाग्यभाजिनो | stotranidhi.com का पाठ। |
पाठ की समापन-पंक्ति इसे शंकराचार्य की रचना कहती है, और यह श्री वाणी विलास से छपे शंकराचार्य के ग्रंथ-संग्रह में भी है। रचयिता को परंपरा के अनुसार ही बताया गया है।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): अठारहों श्लोक sanskritdocuments.org (शंकराचार्य के ग्रंथ-संग्रह वाले क्रम के अनुसार) और stotranidhi.com के अठारह श्लोकों वाले पाठ से मिलाए गए; दोनों में श्लोकों का क्रम एक ही है। drikpanchang.com का इक्कीस श्लोकों वाला पाठ भी देखा गया। श्लोक 16 में "दिग्घस्तिभिः" का संधि वाला रूप stotranidhi.com से लिया गया है; sanskritdocuments.org पर यह "दिग् हस्तिभिः" अलग लिखा है।
लक्ष्मी · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
शुक्रवार को घर में माँ लक्ष्मी की सरल पूजा: सफ़ाई, घी का दीपक, कमल या लाल फूल, कुमकुम, खीर या मिश्री का भोग, लक्ष्मी मंत्र, आरती और प्रार्थना।
लक्ष्मी · आरती
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता
लक्ष्मी · चालीसा
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास
लक्ष्मी · सूक्त · संस्कृत
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्
लक्ष्मी · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
दीपावली की शाम घर में लक्ष्मी-गणेश पूजा: सफ़ाई, प्रदोष काल का समय, चौकी सजाना, गणेश पूजन, लक्ष्मी पूजन, दीपमालिका, बही-खाता, तिजोरी और आरती।
लक्ष्मी · अष्टकम् · संस्कृत
नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते
"कनक" यानी सोना और "धारा" यानी वर्षा की धार। परंपरा की कथा के अनुसार शंकराचार्य के इस स्तोत्र से प्रसन्न होकर माँ लक्ष्मी ने एक निर्धन ब्राह्मणी के घर सोने की वर्षा की थी।
शंकराचार्य के ग्रंथ-संग्रह में और यहाँ अठारह श्लोक हैं। कुछ संस्करणों में 21 या 25 श्लोक मिलते हैं, क्योंकि उनमें कुछ "नमोऽस्तु" श्लोक और एक फल-श्लोक जोड़ा गया है।
इसका केंद्र माँ लक्ष्मी की कृपा-दृष्टि है, और उसमें धन के साथ मंगल, कल्याण, गुण और भाग्य सब की प्रार्थना है। भक्त इसे माँ के प्रति श्रद्धा और नमन के रूप में भी पढ़ते हैं।
शुक्रवार, दीपावली और धनतेरस पर इसे विशेष रूप से पढ़ा जाता है। सोलहवें श्लोक में प्रातःकाल नमस्कार की बात है, इसलिए बहुत-से लोग इसे सुबह पढ़ते हैं।
दसवाँ श्लोक कहता है कि वही एक देवी सृष्टि, पालन और प्रलय की लीलाओं में वाणी की देवी, विष्णु-प्रिया, शाकम्भरी और शिव-प्रिया के रूप में स्थित हैं। यह शक्ति की एकता का भाव है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।