गणेश

आरती · गणेश

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा

भगवान गणेश की सबसे प्रसिद्ध हिंदी आरती, जो हर पूजा और गणेशोत्सव में गाई जाती है। पूरा पाठ, हर अंतरे का सरल अर्थ और पाठभेद।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. अंतरा-वार अर्थ
  4. भावार्थ
  5. कठिन शब्द
  6. कब पढ़ें
  7. विधि
  8. पाठ-भेद
  9. रचयिता और स्रोत
  10. ये भी पढ़ें
  11. सवाल-जवाब
  12. सुधार सुझाएँ

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

अर्थ: हे गणेश देव, आपकी जय हो। आपकी माता पार्वती हैं और पिता महादेव शिव।

एकदन्त दयावन्त, चार भुजा धारी।माथे पर सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥

॥ जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ॥

अर्थ: आपका एक दाँत है, आप दया से भरे हैं और चार भुजाएँ धारण करते हैं। आपके माथे पर सिंदूर शोभा पाता है और आप चूहे की सवारी करते हैं।

पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा।लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥

॥ जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ॥

अर्थ: आपको पान, फूल और मेवा चढ़ाए जाते हैं। लड्डुओं का भोग लगता है और संत आपकी सेवा करते हैं।

अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया।बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥

॥ जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ॥

अर्थ: आरती गणेश जी की दया का वर्णन करती है: वे अंधे को आँखें, कोढ़ के रोगी को स्वस्थ शरीर, निःसंतान को संतान और निर्धन को धन देते हैं।

'सूर' श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

॥ जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ॥

अर्थ: कवि “सूर” कहते हैं कि वे आपकी शरण में आए हैं; उनकी सेवा सफल कीजिए। हे गणेश, जिनकी माता पार्वती और पिता महादेव हैं।

हर अंतरे का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।

परिचय

“जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा” भगवान गणेश की सबसे प्रसिद्ध हिंदी आरती है। गणेश जी को प्रथम पूज्य माना जाता है, इसलिए यह आरती गणेश चतुर्थी, बुधवार, दीपावली की लक्ष्मी-गणेश पूजा और रोज़ की पूजा में गाई जाती है। इसकी भाषा बहुत सरल है: गणेश जी का रूप, उन्हें चढ़ने वाला भोग, और दुखियों पर उनकी कृपा।

अंतिम अंतरे में “सूर श्याम” आता है, इसलिए कई जगह इसे सूरदास की रचना कहा जाता है, पर इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। यहाँ वह पाठ है जो भक्ति भारत, द्रिक पंचांग, वेबदुनिया और sanskritdocuments में, छोटे शब्द-अंतरों के साथ, एक जैसा मिलता है। गीता प्रेस के पुराने आरती-संग्रह में इसका एक अलग रूप छपा है, जिसमें “सूर श्याम” वाला अंतरा नहीं है; वह नीचे पाठभेद में है।

अंतरा-वार अर्थ

  1. मुखड़ा जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा…

    हे गणेश देव, आपकी जय हो। आपकी माता पार्वती हैं और पिता महादेव शिव।

  2. अंतरा १ एकदन्त दयावन्त, चार भुजा धारी…

    आपका एक दाँत है, आप दया से भरे हैं और चार भुजाएँ धारण करते हैं। आपके माथे पर सिंदूर शोभा पाता है और आप चूहे की सवारी करते हैं।

  3. अंतरा २ पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा…

    आपको पान, फूल और मेवा चढ़ाए जाते हैं। लड्डुओं का भोग लगता है और संत आपकी सेवा करते हैं।

  4. अंतरा ३ अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया…

    आरती गणेश जी की दया का वर्णन करती है: वे अंधे को आँखें, कोढ़ के रोगी को स्वस्थ शरीर, निःसंतान को संतान और निर्धन को धन देते हैं।

  5. अंतरा ४ 'सूर' श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा…

    कवि “सूर” कहते हैं कि वे आपकी शरण में आए हैं; उनकी सेवा सफल कीजिए। हे गणेश, जिनकी माता पार्वती और पिता महादेव हैं।

भावार्थ

यह आरती बहुत सीधे शब्दों में गणेश जी का परिचय देती है: वे पार्वती और शिव के पुत्र हैं, एक दाँत वाले, चार भुजाओं वाले, माथे पर सिंदूर लगाए और चूहे की सवारी करने वाले। फिर वह पूजा की तस्वीर बनाती है: पान, फूल, मेवा और लड्डुओं का भोग, और सेवा करते संत।

तीसरा अंतरा गणेश जी की करुणा का है: जिसे जिस चीज़ की कमी है, अंधे को आँख, रोगी को स्वस्थ शरीर, निःसंतान को संतान, निर्धन को धन, वे उसी पर कृपा करते हैं। यह भक्ति का भाव है, किसी वादे का नहीं। अंत में कवि शरण में आकर बस इतना माँगता है कि उसकी सेवा सफल हो।

कठिन शब्दों के अर्थ

महादेवा
महादेव, शिव
जाकी
जिनकी
एकदन्त
एक दाँत वाले
दयावन्त
दया से भरे
भुजा
बाँह
सिंदूर
लाल रंग का चूर्ण, जो गणेश जी को चढ़ाया जाता है
मूसे
चूहे (मूषक) की
मेवा
सूखे फल
लड्डुअन
लड्डुओं का
भोग
भगवान को अर्पित भोजन
कोढ़िन
कोढ़ के रोगी
काया
शरीर
बाँझन
जिन स्त्रियों के संतान न हो
माया
यहाँ: धन-संपत्ति
सफल कीजे
सफल कीजिए

यह आरती कब गाई जाती है

  • गणेश चतुर्थी और गणेशोत्सव के दिनों में, सुबह और शाम
  • बुधवार और संकष्टी चतुर्थी पर
  • दीपावली की लक्ष्मी-गणेश पूजा में, और किसी भी पूजा या शुभ काम के आरंभ और अंत में

आरती कैसे करें

  • गणेश जी की मूर्ति या चित्र के सामने घी का दीपक या कपूर जलाएँ। दूर्वा और लड्डू या मोदक का भोग लगाने की परंपरा है।
  • खड़े होकर, ताली या घंटी के साथ आरती गाएँ और दीपक को धीरे-धीरे गणेश जी के चारों ओर घुमाएँ।
  • हर अंतरे के बाद पूरा मुखड़ा दोहराया जाता है: “जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा”।
  • कई घरों में जब कई आरतियाँ गाई जाती हैं, तो पहले गणेश जी की आरती होती है।
पूरी विधिगणेश पूजा विधिघर में गणेश जी की सरल पूजा: बारह नामों से स्मरण, दूर्वा, लाल फूल, सिंदूर, मोदक या लड्डू का भोग, आरती और तीन परिक्रमा। बुधवार, चतुर्थी और हर शुभ काम से पहले।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
अंतरा 1माथे पर तिलक सोहे, मूसे की सवारीद्रिक पंचांग और sanskritdocuments.org; भक्ति भारत में “माथे सिंदूर सोहे”, वेबदुनिया में “मूषक की सवारी”। गीता प्रेस में “मस्तक सिन्दूर सोहे मूसे की सवारी”।
अंतरा 2पान चढ़े फल चढ़े और चढ़े मेवाभक्ति भारत और sanskritdocuments.org में “फल”; द्रिक पंचांग “हार चढ़े, फूल चढ़े” भी देता है। गीता प्रेस, द्रिक पंचांग और वेबदुनिया में “फूल”।
अंतरा 3अंधे को आँख देत, कोढ़िन को कायाsanskritdocuments.org और द्रिक पंचांग में “अंधे/अँधे को”।
अंतरा 4 के स्थान पर या उसके बाददीनन की लाज राखो शम्भु-सुतवारी। कामना को पूरा करो जग बलिहारी॥गीता प्रेस के पुराने आरती-संग्रह में यह अंतिम अंतरा है और “सूर श्याम” वाला अंतरा नहीं है। भक्ति भारत इसे अतिरिक्त अंतरे के रूप में देता है (“शंभु सुतकारी … जाऊं बलिहारी”), द्रिक पंचांग दूसरे पाठ के रूप में।
क्रमलडुअन कौ भोग लगे सन्त करें सेवा। पान चढ़ें फूल चढ़ें और चढ़ें मेवा॥गीता प्रेस में “अंधन को आँख देत” वाला अंतरा पहले आता है, और इस अंतरे की दोनों पंक्तियाँ उलटे क्रम में हैं।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
सूरदास (परंपरा के अनुसार)
ग्रंथ / स्रोत
आरती-संग्रह (गीता प्रेस, गोरखपुर; कोड 153), “भगवान् श्रीगणेशजी” शीर्षक से
भाषा
हिन्दी

अंतिम अंतरे की पंक्ति “'सूर' श्याम शरण आए” को सूरदास की छाप माना जाता है, और इसी आधार पर इसे उनकी रचना कहा जाता है। इसकी पुष्टि करने वाला कोई प्रामाणिक स्रोत हमें नहीं मिला, और गीता प्रेस के पाठ में यह अंतरा नहीं है। रचयिता निश्चित नहीं है।

गीता प्रेस का रूप प्रचलित पाठ से अलग है: अंतरों का क्रम बदला है, “सूर श्याम” वाला अंतरा नहीं है और अंत में “दीनन की लाज राखो” वाला अंतरा है। गीता प्रेस के नए संस्करण में यह आरती नहीं है।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति भक्ति भारत, द्रिक पंचांग, वेबदुनिया, sanskritdocuments.org (आरती संग्रह) और गीता प्रेस के आरती-संग्रह (कोड 153, archive.org पर स्कैन से पढ़ा गया पाठ) से मिलाई। हर पंक्ति कम से कम दो स्रोतों में है (वर्तनी के छोटे अंतर छोड़कर)। चारों वेब स्रोत अंतरों और क्रम पर एकमत हैं, इसलिए वही ढाँचा रखा; गीता प्रेस का रूप (अलग क्रम, “दीनन की लाज” वाला अंतिम अंतरा, “सूर श्याम” नहीं) पाठभेद में है। जहाँ वेब स्रोत अलग थे, वहाँ गीता प्रेस से मेल खाता शब्द चुना: “पान चढ़े फूल चढ़े” (गीता प्रेस, द्रिक पंचांग, वेबदुनिया), “अंधन को आँख देत” (गीता प्रेस, भक्ति भारत, वेबदुनिया), और “सिंदूर” (गीता प्रेस, भक्ति भारत, वेबदुनिया)। अंतरा 4 की दूसरी पंक्ति स्रोतों में ऐसे ही छपी है (मुखड़े की दूसरी पंक्ति), इसलिए उसे अंतरे में रखा।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या यह आरती सूरदास ने लिखी?

अंतिम अंतरे में “सूर श्याम” आता है, इसलिए इसे सूरदास की रचना कहा जाता है। पर इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता, और गीता प्रेस के पाठ में यह अंतरा है ही नहीं; रचयिता निश्चित नहीं है।

गणेश जी की आरती पहले क्यों की जाती है?

गणेश जी को प्रथम पूज्य माना जाता है, यानी हर पूजा और शुभ काम की शुरुआत उन्हीं से होती है। इसी भाव से कई घरों में कई आरतियों में पहले गणेश जी की आरती गाई जाती है।

“बाँझन को पुत्र देत” जैसी पंक्तियों को कैसे समझें?

ये पंक्तियाँ गणेश जी की दया का वर्णन करती हैं: जिसे जिस चीज़ की कमी है, वे उस पर कृपा करते हैं। इन्हें भक्ति के भाव के रूप में पढ़ें, किसी वादे की तरह नहीं।

क्या “जय गणेश देवा” और “सुखकर्ता दुःखहर्ता” एक ही आरती हैं?

नहीं। “सुखकर्ता दुःखहर्ता” समर्थ रामदास की मराठी आरती है, और “जय गणेश देवा” हिंदी की आरती। गणेशोत्सव में दोनों गाई जाती हैं।

गणेश जी की आरती कब करें?

रोज़ की पूजा में, बुधवार को, संकष्टी चतुर्थी पर और गणेशोत्सव के दिनों में सुबह और शाम।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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