गणेश

आरती · गणेश

सुखकर्ता दुःखहर्ता

समर्थ रामदास की गणपति आरती “सुखकर्ता दुःखहर्ता”, जो गणेशोत्सव में घर-घर गाई जाती है। मूल मराठी पाठ, हर कडवे का हिंदी अर्थ और पाठभेद।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. अंतरा-वार अर्थ
  4. भावार्थ
  5. कठिन शब्द
  6. कब पढ़ें
  7. विधि
  8. पाठ-भेद
  9. रचयिता और स्रोत
  10. ये भी पढ़ें
  11. सवाल-जवाब
  12. सुधार सुझाएँ

सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची।नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची।सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची।कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥

अर्थ: गणपति सुख देने वाले और दुख हरने वाले हैं; वे विघ्नों की बात तक बाक़ी नहीं रहने देते। जिन पर उनकी कृपा होती है, उन्हें वे भरपूर प्रेम देते हैं। उनके पूरे शरीर पर सिंदूर का सुंदर लेप है और गले में मोतियों की माला चमकती है।

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।दर्शनमात्रे मन कामना पूर्ती॥

अर्थ: हे मंगलमूर्ति देव, आपकी जय हो, जय हो। भक्त कहता है कि आपके दर्शन मात्र से मन की कामना पूरी हो जाती है।

रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा।चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा।हिरेजडित मुकुट शोभतो बरा।रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरिया॥

॥ जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ॥

अर्थ: हे गौरी के पुत्र, आपके लिए रत्नों से जड़ा आभूषण है। आपको चंदन का लेप, कुंकुम और केसर लगा है। हीरों से जड़ा मुकुट सुंदर शोभा देता है, और चरणों में नूपुर और घुँघरू रुनझुन बजते हैं।

लंबोदर पीतांबर फणिवरबंधना।सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना।दास रामाचा वाट पाहे सदना।संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवरवंदना॥

॥ जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ॥

अर्थ: हे बड़े पेट वाले, पीताम्बर पहने, कमर पर नाग को बंधन की तरह बाँधे, सीधी सूँड़ वाले, वक्रतुंड और तीन नेत्रों वाले गणपति! राम का यह दास घर में आपकी राह देख रहा है। हे श्रेष्ठ देवताओं से वंदित, संकट में आकर कृपा करो और अंतिम समय में रक्षा करो।

हर अंतरे का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।

परिचय

“सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची” गणपति की मराठी आरती है। महाराष्ट्र में पूजा के अंत में गाई जाने वाली आरतियों में यह प्रायः सबसे पहले आती है, और गणेशोत्सव के दिनों में देश के दूसरे हिस्सों में भी गाई जाती है। इसके तीन कडवे (अंतरे) हैं, और धृपद “जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती” पहले कडवे के बाद और फिर हर कडवे के बाद गाया जाता है।

इसके रचयिता सत्रहवीं शताब्दी के संत समर्थ रामदास माने जाते हैं; अंतिम कडवे में उनकी छाप “दास रामाचा” आती है। परंपरा के अनुसार उन्होंने मोरगाँव के मयूरेश्वर गणपति के दर्शन से प्रेरित होकर यह आरती रची। यहाँ मूल मराठी पाठ है और हर कडवे का अर्थ हिंदी में।

अंतरा-वार अर्थ

  1. अंतरा १ सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची…

    गणपति सुख देने वाले और दुख हरने वाले हैं; वे विघ्नों की बात तक बाक़ी नहीं रहने देते। जिन पर उनकी कृपा होती है, उन्हें वे भरपूर प्रेम देते हैं। उनके पूरे शरीर पर सिंदूर का सुंदर लेप है और गले में मोतियों की माला चमकती है।

  2. मुखड़ा जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती…

    हे मंगलमूर्ति देव, आपकी जय हो, जय हो। भक्त कहता है कि आपके दर्शन मात्र से मन की कामना पूरी हो जाती है।

  3. अंतरा २ रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा…

    हे गौरी के पुत्र, आपके लिए रत्नों से जड़ा आभूषण है। आपको चंदन का लेप, कुंकुम और केसर लगा है। हीरों से जड़ा मुकुट सुंदर शोभा देता है, और चरणों में नूपुर और घुँघरू रुनझुन बजते हैं।

  4. अंतरा ३ लंबोदर पीतांबर फणिवरबंधना…

    हे बड़े पेट वाले, पीताम्बर पहने, कमर पर नाग को बंधन की तरह बाँधे, सीधी सूँड़ वाले, वक्रतुंड और तीन नेत्रों वाले गणपति! राम का यह दास घर में आपकी राह देख रहा है। हे श्रेष्ठ देवताओं से वंदित, संकट में आकर कृपा करो और अंतिम समय में रक्षा करो।

भावार्थ

पहले कडवे में गणपति का स्वभाव और रूप है: वे सुख देते हैं, दुख और विघ्न हरते हैं, कृपा करके प्रेम देते हैं; उनके शरीर पर सिंदूर का लेप है और गले में मोतियों की माला। दूसरा कडवा उनके शृंगार का चित्र है: रत्नों का आभूषण, चंदन, कुंकुम और केसर, हीरों का मुकुट, और चरणों में बजते नूपुर।

तीसरे कडवे में गणपति का पूरा रूप सामने आता है: लंबोदर, पीताम्बर, कमर में नाग, सीधी सूँड़, तीन नेत्र। फिर कवि अपनी विनती रखते हैं: “राम का दास” घर में उनकी राह देख रहा है; वे संकट के समय आएँ और अंतिम समय में रक्षा करें। हर कडवे के बाद धृपद यही भाव दोहराता है कि मंगलमूर्ति के दर्शन ही मन को पूर्ण कर देते हैं।

कठिन शब्दों के अर्थ

सुखकर्ता
सुख देने वाले
दुःखहर्ता
दुख हरने वाले
वार्ता
बात, चर्चा
विघ्नाची
विघ्नों की
नुरवी
बाक़ी नहीं रहने देते
पुरवी
पूरा करते हैं, देते हैं
सर्वांगी
पूरे शरीर पर
उटी
लेप
शेंदुराची
सिंदूर की
झळके
चमकती है
माळ
माला
मुक्ताफळ
मोती
मंगलमूर्ती
कल्याण के रूप, गणपति
दर्शनमात्रे
दर्शन मात्र से
रत्नखचित
रत्नों से जड़ा
फरा
एक आभूषण
गौरीकुमरा
गौरी (पार्वती) के पुत्र
घागरिया
घुँघरू
लंबोदर
बड़े पेट वाले
फणिवरबंधना
नागराज को कमरबंद की तरह बाँधने वाले
वक्रतुंड
टेढ़ी सूँड़ या मुख वाले, गणपति का एक नाम
त्रिनयना
तीन नेत्रों वाले
सदना
घर में
निर्वाणी
अंतिम समय में
सुरवरवंदना
श्रेष्ठ देवताओं द्वारा वंदित

यह आरती कब गाई जाती है

  • गणेश चतुर्थी और गणेशोत्सव के दिनों में, सुबह और शाम
  • संकष्टी चतुर्थी पर
  • महाराष्ट्र में रोज़ की पूजा के अंत में, आरतियों में सबसे पहले

आरती कैसे करें

  • गणपति की मूर्ति या चित्र के सामने घी का दीपक या कपूर जलाएँ; दूर्वा, लाल फूल और मोदक चढ़ाने की परंपरा है।
  • महाराष्ट्र की रीत में आरती खड़े होकर, ताली या झाँझ के साथ, सबके साथ मिलकर गाई जाती है, और दीपक गणपति के चारों ओर घुमाया जाता है।
  • पहले कडवे के बाद धृपद “जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती, दर्शनमात्रे मन कामना पूर्ती” गाया जाता है, और फिर हर कडवे के बाद।
  • मराठी न जानते हों तो अर्थ पढ़कर भाव समझ लें; शब्द धीरे और साफ़ बोलें, जैसे “झळके” और “माळ” में “ळ”।
पूरी विधिगणेश पूजा विधिघर में गणेश जी की सरल पूजा: बारह नामों से स्मरण, दूर्वा, लाल फूल, सिंदूर, मोदक या लड्डू का भोग, आरती और तीन परिक्रमा। बुधवार, चतुर्थी और हर शुभ काम से पहले।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
कडवा 1सुखकर्ता दुखहर्ता, वार्ता विघ्नांचीमराठी विकिपीडिया की वर्तनी; वेबदुनिया में भी “दुखहर्ता”।
धृपदजय देव जय देव जय मंगलमूर्ति। दर्शनमात्रे मनकामना पुरती॥द्रिक पंचांग; वेबदुनिया में “दर्शनमात्रे मन कामनापूर्ति”।
कडवा 2रत्नखचित फरा तूज गौरीकुमरा। … चंदनाची उटी कुमकुम केशरावेबदुनिया में “तूज”, मराठी विकिपीडिया में “कुमकुम केशरा”।
कडवा 3संकष्टी पावावें, निर्वाणी रक्षावे, सुरवरवंदनावेबदुनिया में “संकटी” की जगह “संकष्टी”; उसमें “फणीवर बंधना” भी है।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
समर्थ रामदास
भाषा
मराठी

अंतिम कडवे में “दास रामाचा” उनकी छाप है, और मराठी परंपरा व मराठी विकिपीडिया इसे उन्हीं की रचना मानते हैं। मोरगाँव के मयूरेश्वर गणपति से प्रेरणा की बात परंपरा की मान्यता है।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति द्रिक पंचांग (मराठी), मराठी विकिपीडिया और वेबदुनिया के मराठी पाठ से मिलाई। हर पंक्ति कम से कम दो स्रोतों में है (वर्तनी के छोटे अंतर छोड़कर)। भक्ति भारत का पाठ (सिद्धिविनायक आरती) भी देखा, पर उसमें मराठी शब्दों की वर्तनी हिंदी ढंग की और त्रुटिपूर्ण है (“नूर्वी पूर्वी”, “झलके माल”), इसलिए उसे संदर्भ नहीं बनाया। कडवों का क्रम स्रोतों जैसा रखा: पहला कडवा, फिर धृपद (मुखड़े के खंड के रूप में), फिर दूसरा और तीसरा कडवा, जिनके बाद धृपद दोहराया जाता है। वर्तनी जहाँ स्रोतों में अलग थी, वहाँ मराठी विकिपीडिया और द्रिक पंचांग की मानक वर्तनी ली (“मंगलमूर्ती”, “पूर्ती”, “संकटी”)। रचयिता: समर्थ रामदास, छाप “दास रामाचा” के आधार पर; मराठी विकिपीडिया भी यही कहता है।

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गणेश जी के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सुखकर्ता दुःखहर्ता आरती किसने लिखी?

यह सत्रहवीं शताब्दी के संत समर्थ रामदास की रचना मानी जाती है। अंतिम कडवे की पंक्ति “दास रामाचा वाट पाहे सदना” में उनकी छाप है।

“नुरवी पुरवी” का क्या अर्थ है?

“नुरवी” यानी (विघ्नों की बात) बाक़ी नहीं रहने देते, और “पुरवी” यानी पूरा करते हैं, देते हैं। मराठी विकिपीडिया के अनुसार “नुरवी” को अक्सर “नुर्वी” बोल दिया जाता है; सही रूप “नुरवी” है।

“दास रामाचा वाट पाहे सदना” का क्या अर्थ है?

“राम का दास घर में आपकी राह देख रहा है।” यह कवि की छाप भी है: “दास रामाचा” यानी रामदास।

क्या मराठी न जानने वाले यह आरती गा सकते हैं?

हाँ। इसके बहुत से शब्द हिंदी और संस्कृत से मिलते हैं, और हर कडवे का अर्थ यहाँ हिंदी में दिया है। भाव समझकर गाना पर्याप्त है।

यह आरती कब गाई जाती है?

गणेश चतुर्थी और गणेशोत्सव के दिनों में, संकष्टी चतुर्थी पर, और महाराष्ट्र में रोज़ की पूजा की आरतियों में सबसे पहले।

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पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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