गणेश पूजा विधि
गणेश · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में गणेश जी की सरल पूजा: बारह नामों से स्मरण, दूर्वा, लाल फूल, सिंदूर, मोदक या लड्डू का भोग, आरती और तीन परिक्रमा। बुधवार, चतुर्थी और हर शुभ काम से पहले।

चालीसा · गणेश
“जय गणपति सदगुण सदन” वाली गणेश चालीसा का मूल पाठ, हर चौपाई का सरल अर्थ, गणेश जन्म की कथा, कठिन शब्द और पाठभेद।
॥ दोहा ॥
जय गणपति सद्गुणसदन, कविवर बदन कृपाल।विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
अर्थ: हे सद्गुणों के धाम, ज्ञानियों में श्रेष्ठ और कृपालु गणपति, आपकी जय हो। विघ्न हरने वाले और मंगल करने वाले गिरिजा के लाल, आपकी जय हो, जय हो।
॥ चौपाई ॥
जय जय जय गणपति गणराजू।मंगल भरण करण शुभ काजू ॥१॥
अर्थ: हे गणपति, गणों के राजा, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मंगल से भर देने वाले और शुभ काम करने वाले हैं।
जय गजबदन सदन सुखदाता।विश्व विनायक बुद्धि विधाता ॥२॥
अर्थ: हे हाथी के मुख वाले, सुख के धाम और सुख देने वाले, आपकी जय हो। आप विश्व के विनायक और बुद्धि के विधाता हैं।
वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन।तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन ॥३॥
अर्थ: आपकी टेढ़ी, पवित्र और सुंदर सूँड है, और माथे पर त्रिपुंड का तिलक मन को भाता है।
राजत मणि मुक्तन उर माला।स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला ॥४॥
अर्थ: आपके हृदय पर मणियों और मोतियों की माला शोभित है; सिर पर सोने का मुकुट है और आँखें बड़ी-बड़ी हैं।
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।मोदक भोग सुगन्धित फूलं ॥५॥
अर्थ: आपके हाथों में पुस्तक, फरसा और त्रिशूल हैं; आपको मोदक का भोग और सुगंधित फूल चढ़ते हैं।
सुन्दर पीताम्बर तन साजित।चरण पादुका मुनि मन राजित ॥६॥
अर्थ: आपके शरीर पर सुंदर पीतांबर सजा है, और चरणों की पादुकाएँ मुनियों के मन में बसती हैं।
धनि शिवसुवन षडानन भ्राता।गौरी ललन विश्व विख्याता ॥७॥
अर्थ: हे शिव के पुत्र, षडानन (कार्तिकेय) के भाई, आप धन्य हैं। गौरी के लाल, आप सारे विश्व में प्रसिद्ध हैं।
ऋद्धि सिद्धि तव चँवर सुधारे।मूषक वाहन सोहत द्वारे ॥८॥
अर्थ: ऋद्धि और सिद्धि आप पर चँवर डुलाती हैं, और आपका वाहन मूषक द्वार पर शोभा देता है।
कहौं जन्म शुभ कथा तुम्हारी।अति शुचि पावन मंगल कारी ॥९॥
अर्थ: अब मैं आपके जन्म की शुभ कथा कहता हूँ, जो अत्यंत पवित्र और मंगल करने वाली है।
एक समय गिरिराज कुमारी।पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी ॥१०॥
अर्थ: एक समय गिरिराज हिमालय की पुत्री पार्वती जी ने पुत्र पाने के लिए भारी तप किया।
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।तब पहुँच्यो तुम धरि द्विज रूपा ॥११॥
अर्थ: जब उनका अनुपम यज्ञ पूरा हुआ, तब आप ब्राह्मण का रूप धरकर वहाँ पहुँचे।
अतिथि जानि कै गौरी सुखारी।बहु विधि सेवा करी तुम्हारी ॥१२॥
अर्थ: आपको अतिथि जानकर गौरी जी प्रसन्न हुईं और अनेक प्रकार से आपकी सेवा की।
अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा।मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा ॥१३॥
अर्थ: आपने अत्यंत प्रसन्न होकर वर दिया: हे माता, आपने पुत्र के लिए जो तप किया है, उसका फल मिलेगा।
मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला।बिना गर्भ धारण यहि काला ॥१४॥
अर्थ: आपको बड़ी बुद्धि वाला पुत्र मिलेगा, और वह भी इसी समय, बिना गर्भ धारण किए।
गणनायक गुण ज्ञान निधाना।पूजित प्रथम रूप भगवाना ॥१५॥
अर्थ: वह गणों का नायक, गुण और ज्ञान का भंडार होगा, और भगवान के रूप में सबसे पहले पूजा जाएगा।
अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै।पलना पर बालक स्वरूप ह्वै ॥१६॥
अर्थ: ऐसा कहकर आप अंतर्धान हो गए, और पालने में बालक के रूप में प्रकट हो गए।
बनि शिशु रुदन जबहि तुम ठाना।लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना ॥१७॥
अर्थ: शिशु बनकर जब आप रोने लगे, तब आपका मुख देखकर गौरी जी के सुख की सीमा न रही।
सकल मगन सुख मंगल गावहिं।नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं ॥१८॥
अर्थ: सब आनंद में मग्न होकर मंगल गीत गाने लगे, और आकाश से देवता फूल बरसाने लगे।
शम्भु उमा बहुदान लुटावहिं।सुर मुनि जन सुत देखन आवहिं ॥१९॥
अर्थ: शिव और उमा ने खूब दान बाँटा, और देवता, मुनि और लोग पुत्र को देखने आने लगे।
लखि अति आनन्द मंगल साजा।देखन भी आये शनि राजा ॥२०॥
अर्थ: यह आनंद और मंगल का उत्सव देखकर शनिदेव भी बालक को देखने आए।
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।बालक देखन चाहत नाहीं ॥२१॥
अर्थ: पर अपनी दृष्टि के दोष को याद करके शनिदेव मन में बालक को देखना नहीं चाहते थे।
गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो।उत्सव मोर न शनि तुहि भायो ॥२२॥
अर्थ: इससे गिरिजा जी के मन में कुछ खटका हुआ, और उन्होंने कहा: शनि, क्या तुम्हें मेरा उत्सव अच्छा नहीं लगा?
कहन लगे शनि मन सकुचाई।का करिहौ शिशु मोहि दिखाई ॥२३॥
अर्थ: शनिदेव मन में सकुचाते हुए बोले: शिशु को मुझे दिखाकर क्या करोगी?
नहिं विश्वास उमा कर भयऊ।शनि सों बालक देखन कह्यऊ ॥२४॥
अर्थ: पर उमा को उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ, और उन्होंने शनिदेव से बालक को देखने को कहा।
पड़तहिं शनि दृग कोण प्रकाशा।बालक सिर उड़ि गयो अकाशा ॥२५॥
अर्थ: शनि की दृष्टि का कोना पड़ते ही बालक का सिर उड़कर आकाश में चला गया।
गिरिजा गिरी विकल ह्वै धरणी।सो दुख दशा गयो नहिं वरणी ॥२६॥
अर्थ: गिरिजा जी व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ीं; उस दुःख का वर्णन नहीं हो सकता।
हाहाकार मच्यो कैलाशा।शनि कीन्ह्यों लखि सुत को नाशा ॥२७॥
अर्थ: कैलाश पर हाहाकार मच गया कि शनि ने देखकर पुत्र का नाश कर दिया।
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाये।काटि चक्र सो गज शिर लाये ॥२८॥
अर्थ: तुरंत भगवान विष्णु गरुड़ पर चढ़कर गए और चक्र से एक हाथी का सिर काटकर ले आए।
बालक के धड़ ऊपर धारयो।प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो ॥२९॥
अर्थ: उन्होंने वह सिर बालक के धड़ पर रखा, और भगवान शंकर ने प्राण-मंत्र पढ़कर उसमें प्राण डाल दिए।
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे ॥३०॥
अर्थ: तब शिव जी ने आपका नाम गणेश रखा, और आपको सबसे पहले पूजे जाने और बुद्धि का भंडार होने का वर दिया।
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा ॥३१॥
अर्थ: एक बार शिव जी ने पुत्रों की बुद्धि की परीक्षा ली और कहा कि जो पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आए, वही श्रेष्ठ।
चले षडानन भरमि भुलाई।रची बैठ तुम बुद्धि उपाई ॥३२॥
अर्थ: कार्तिकेय (षडानन) पृथ्वी की परिक्रमा करने चल पड़े, और आपने वहीं बैठे-बैठे बुद्धि से एक उपाय सोचा।
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें ॥३३॥
अर्थ: आपने माता-पिता के चरण पकड़ लिए और उन्हीं की सात परिक्रमाएँ कर लीं, क्योंकि माता-पिता ही आपके लिए संसार थे।
धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे।नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे ॥३४॥
अर्थ: शिव जी ने हृदय में हर्षित होकर कहा: गणेश, तुम धन्य हो! और आकाश से देवताओं ने बहुत फूल बरसाए।
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।शेष सहस मुख सकै न गाई ॥३५॥
अर्थ: आपकी महिमा और बुद्धि की बड़ाई हज़ार मुखों वाले शेषनाग भी पूरी नहीं गा सकते।
मैं मति हीन मलीन दुखारी।करहुँ कौन बिधि विनय तुम्हारी ॥३६॥
अर्थ: मैं बुद्धिहीन, मलिन और दुखी हूँ; किस विधि से आपसे विनती करूँ?
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।जग प्रयाग ककरा दुर्वासा ॥३७॥
अर्थ: प्रभु के दास रामसुंदर आपका भजन करते हैं। दूसरी पंक्ति में प्रयाग, ककरा और दुर्वासा (ऋषि के आश्रम) का नाम है, जिसे कवि के स्थान का परिचय माना जाता है।
अब प्रभु दया दीन पर कीजै।अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै ॥३८॥
अर्थ: हे प्रभु, अब इस दीन पर दया कीजिए, और अपनी शक्ति और भक्ति में से कुछ मुझे भी दीजिए।
॥ दोहा ॥
श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै धर ध्यान।नित नव मंगल गृह बसै, लहै जगत सनमान॥
अर्थ: चालीसा का यह दोहा कहता है कि जो ध्यान लगाकर श्री गणेश की यह चालीसा पढ़ता है, उसके घर में नित नए मंगल बसते हैं और वह संसार में सम्मान पाता है।
संवत् अपन सहस्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥
अर्थ: यह दोहा रचना का समय बताता है: संवत् के किसी वर्ष में ऋषि पंचमी के दिन, रविवार को मंगलमूर्ति गणेश की यह चालीसा पूरी हुई। संवत् का अंक इस पंक्ति से साफ़ नहीं होता।
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गणेश चालीसा भगवान गणेश की प्रचलित हिन्दी स्तुति है। इसमें आरंभ में एक दोहा, अड़तीस चौपाइयाँ और अंत में दो दोहे हैं; नाम चालीसा है, पर चौपाइयों की गिनती सभी स्रोतों में अड़तीस ही है।
पहली आठ चौपाइयाँ गणेश जी के रूप का वर्णन करती हैं। फिर चालीसा उनके जन्म की पूरी कथा कहती है: पार्वती जी का तप, ब्राह्मण रूप में गणेश जी का वरदान, शनिदेव की दृष्टि से बालक का सिर कटना, विष्णु जी का हाथी का सिर लाना, और शिव जी का उन्हें प्रथम पूज्य बनाना। अंत में माता-पिता की परिक्रमा वाली कथा और भक्त की विनती है।
हे सद्गुणों के धाम, ज्ञानियों में श्रेष्ठ और कृपालु गणपति, आपकी जय हो। विघ्न हरने वाले और मंगल करने वाले गिरिजा के लाल, आपकी जय हो, जय हो।
हे गणपति, गणों के राजा, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मंगल से भर देने वाले और शुभ काम करने वाले हैं।
हे हाथी के मुख वाले, सुख के धाम और सुख देने वाले, आपकी जय हो। आप विश्व के विनायक और बुद्धि के विधाता हैं।
आपकी टेढ़ी, पवित्र और सुंदर सूँड है, और माथे पर त्रिपुंड का तिलक मन को भाता है।
आपके हृदय पर मणियों और मोतियों की माला शोभित है; सिर पर सोने का मुकुट है और आँखें बड़ी-बड़ी हैं।
आपके हाथों में पुस्तक, फरसा और त्रिशूल हैं; आपको मोदक का भोग और सुगंधित फूल चढ़ते हैं।
आपके शरीर पर सुंदर पीतांबर सजा है, और चरणों की पादुकाएँ मुनियों के मन में बसती हैं।
हे शिव के पुत्र, षडानन (कार्तिकेय) के भाई, आप धन्य हैं। गौरी के लाल, आप सारे विश्व में प्रसिद्ध हैं।
ऋद्धि और सिद्धि आप पर चँवर डुलाती हैं, और आपका वाहन मूषक द्वार पर शोभा देता है।
अब मैं आपके जन्म की शुभ कथा कहता हूँ, जो अत्यंत पवित्र और मंगल करने वाली है।
एक समय गिरिराज हिमालय की पुत्री पार्वती जी ने पुत्र पाने के लिए भारी तप किया।
जब उनका अनुपम यज्ञ पूरा हुआ, तब आप ब्राह्मण का रूप धरकर वहाँ पहुँचे।
आपको अतिथि जानकर गौरी जी प्रसन्न हुईं और अनेक प्रकार से आपकी सेवा की।
आपने अत्यंत प्रसन्न होकर वर दिया: हे माता, आपने पुत्र के लिए जो तप किया है, उसका फल मिलेगा।
आपको बड़ी बुद्धि वाला पुत्र मिलेगा, और वह भी इसी समय, बिना गर्भ धारण किए।
वह गणों का नायक, गुण और ज्ञान का भंडार होगा, और भगवान के रूप में सबसे पहले पूजा जाएगा।
ऐसा कहकर आप अंतर्धान हो गए, और पालने में बालक के रूप में प्रकट हो गए।
शिशु बनकर जब आप रोने लगे, तब आपका मुख देखकर गौरी जी के सुख की सीमा न रही।
सब आनंद में मग्न होकर मंगल गीत गाने लगे, और आकाश से देवता फूल बरसाने लगे।
शिव और उमा ने खूब दान बाँटा, और देवता, मुनि और लोग पुत्र को देखने आने लगे।
यह आनंद और मंगल का उत्सव देखकर शनिदेव भी बालक को देखने आए।
पर अपनी दृष्टि के दोष को याद करके शनिदेव मन में बालक को देखना नहीं चाहते थे।
इससे गिरिजा जी के मन में कुछ खटका हुआ, और उन्होंने कहा: शनि, क्या तुम्हें मेरा उत्सव अच्छा नहीं लगा?
शनिदेव मन में सकुचाते हुए बोले: शिशु को मुझे दिखाकर क्या करोगी?
पर उमा को उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ, और उन्होंने शनिदेव से बालक को देखने को कहा।
शनि की दृष्टि का कोना पड़ते ही बालक का सिर उड़कर आकाश में चला गया।
गिरिजा जी व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ीं; उस दुःख का वर्णन नहीं हो सकता।
कैलाश पर हाहाकार मच गया कि शनि ने देखकर पुत्र का नाश कर दिया।
तुरंत भगवान विष्णु गरुड़ पर चढ़कर गए और चक्र से एक हाथी का सिर काटकर ले आए।
उन्होंने वह सिर बालक के धड़ पर रखा, और भगवान शंकर ने प्राण-मंत्र पढ़कर उसमें प्राण डाल दिए।
तब शिव जी ने आपका नाम गणेश रखा, और आपको सबसे पहले पूजे जाने और बुद्धि का भंडार होने का वर दिया।
एक बार शिव जी ने पुत्रों की बुद्धि की परीक्षा ली और कहा कि जो पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आए, वही श्रेष्ठ।
कार्तिकेय (षडानन) पृथ्वी की परिक्रमा करने चल पड़े, और आपने वहीं बैठे-बैठे बुद्धि से एक उपाय सोचा।
आपने माता-पिता के चरण पकड़ लिए और उन्हीं की सात परिक्रमाएँ कर लीं, क्योंकि माता-पिता ही आपके लिए संसार थे।
शिव जी ने हृदय में हर्षित होकर कहा: गणेश, तुम धन्य हो! और आकाश से देवताओं ने बहुत फूल बरसाए।
आपकी महिमा और बुद्धि की बड़ाई हज़ार मुखों वाले शेषनाग भी पूरी नहीं गा सकते।
मैं बुद्धिहीन, मलिन और दुखी हूँ; किस विधि से आपसे विनती करूँ?
प्रभु के दास रामसुंदर आपका भजन करते हैं। दूसरी पंक्ति में प्रयाग, ककरा और दुर्वासा (ऋषि के आश्रम) का नाम है, जिसे कवि के स्थान का परिचय माना जाता है।
हे प्रभु, अब इस दीन पर दया कीजिए, और अपनी शक्ति और भक्ति में से कुछ मुझे भी दीजिए।
चालीसा का यह दोहा कहता है कि जो ध्यान लगाकर श्री गणेश की यह चालीसा पढ़ता है, उसके घर में नित नए मंगल बसते हैं और वह संसार में सम्मान पाता है।
यह दोहा रचना का समय बताता है: संवत् के किसी वर्ष में ऋषि पंचमी के दिन, रविवार को मंगलमूर्ति गणेश की यह चालीसा पूरी हुई। संवत् का अंक इस पंक्ति से साफ़ नहीं होता।
गणेश चालीसा का बड़ा भाग एक कथा है। पार्वती जी पुत्र के लिए तप करती हैं; गणेश जी स्वयं ब्राह्मण बनकर आते हैं, वर देते हैं और बालक बनकर पालने में प्रकट होते हैं। उत्सव में शनिदेव आते हैं, अपनी दृष्टि के कारण बालक को देखने से बचते हैं, पर माता के कहने पर देखते हैं और बालक का सिर उड़ जाता है। विष्णु जी हाथी का सिर लाते हैं, शिव जी प्राण डालते हैं और बालक का नाम गणेश रखकर उन्हें प्रथम पूज्य बनाते हैं। यह कथा ब्रह्मवैवर्त पुराण की परंपरा से जुड़ी है; गणेश जी के गजमुख होने की दूसरी प्रसिद्ध कथा में शिव जी द्वार पर रोके जाने पर सिर काटते हैं।
इसके बाद परिक्रमा की कथा आती है: कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा को निकलते हैं और गणेश जी माता-पिता की सात परिक्रमा करके जीत जाते हैं। यह गणेश जी की बुद्धि और माता-पिता के प्रति आदर का प्रतीक है। अंत में भक्त अपनी मति की कमी मानकर विनती करता है कि प्रभु उसे अपनी शक्ति और भक्ति में से कुछ दें। पूरी चालीसा का सार यह है कि गणेश जी बुद्धि के दाता और हर शुभ काम में सबसे पहले स्मरण किए जाने वाले देव हैं।
गणेश जी को प्रथम पूज्य माना जाता है, इसलिए किसी भी पूजा या शुभ काम के आरंभ में उनका स्मरण होता है। गणेश चालीसा का पाठ गणेश चतुर्थी और गणेशोत्सव के दिनों में घर-घर होता है, और बहुत से लोग बुधवार या चतुर्थी तिथि पर भी इसे पढ़ते हैं।
इस चालीसा की विशेषता यह है कि इसमें गणेश जी के जन्म और प्रथम पूज्य बनने की पूरी कथा सरल चौपाइयों में आ जाती है। इसलिए परिवारों में यह बच्चों को गणेश जी की कथा सुनाने का माध्यम भी बनती है। इसकी फलश्रुति अंतिम दोहे में है, जो कहता है कि ध्यान से पाठ करने वाले के घर मंगल बसता है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| दोहा 1 | जय गणपति सदगुण सदन, करि वर बदन कृपाल | रणधीर प्रकाशन की पुस्तक में “कविवर” की जगह “करि वर”: हाथी (करि) जैसे श्रेष्ठ मुख वाले। sanskritdocuments.org और भक्ति भारत में “कविवर”। |
| चौपाई 1 | जय जय जय गणपति राजू | sanskritdocuments.org और भारतकोश में “गणराजू” की जगह “राजू”; रणधीर प्रकाशन और भक्ति भारत में “गणपति गणराजू”, जिससे चौपाई की मात्राएँ भी पूरी होती हैं। |
| चौपाई 4 | राजित मणि मुक्तन उर माला | sanskritdocuments.org में “राजत” की जगह “राजित”। |
| चौपाई 7 | गौरी ललन विश्व-विधाता | sanskritdocuments.org में; रणधीर प्रकाशन और भक्ति भारत में “विश्व विख्याता”, जो “भ्राता” से तुक भी मिलाता है। |
| चौपाई 24 | नहिं विश्वास उमा उर भयऊ | रणधीर प्रकाशन और भक्ति भारत में “कर” की जगह “उर”: उमा के मन में विश्वास नहीं हुआ। |
| चौपाई 34 | धनि गणेश कहि शिव हिय हर्ष्यो। नभ ते सुरन सुमन बहु वर्ष्यो॥ | रणधीर प्रकाशन की पुस्तक में यही पंक्ति इस रूप में है। |
| चौपाई 37 | लख प्रयाग ककरा दुर्वासा | sanskritdocuments.org और भारतकोश में “जग” की जगह “लख”। |
| अंतिम दोहा 2 | सम्बन्ध अपना सहस्र दश | रणधीर प्रकाशन में “संवत्” की जगह “सम्बन्ध” छपा है; sanskritdocuments.org में “संवत्” और भारतकोश में “सम्वत्”। |
चौपाई 37 “भजत रामसुन्दर प्रभुदासा” में यह नाम आता है, साथ में प्रयाग, ककरा और दुर्वासा का उल्लेख है; इसे कवि का परिचय माना जाता है। इसके अलावा कवि के बारे में प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): sanskritdocuments.org (gaNesha40) को रणधीर प्रकाशन की छपी पुस्तक “51 चालीसा संग्रह” (archive.org के पृष्ठ-चित्र और OCR), भारतकोश और भक्ति भारत के पाठ से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया। हर पंक्ति इनमें से किसी एक संदर्भ फ़ाइल में ज्यों की त्यों मिलती है। sanskritdocuments.org के पाठ की छपाई की भूलें (“इड़ि”, “परीक्शा”, “प्रदक्शिणा”, “गणपति राजू”) छपी पुस्तक या भारतकोश के शुद्ध रूप से ठीक कीं। पहला दोहा और चौपाई 24 sanskritdocuments.org के अनुसार रखे; दूसरे पाठ पाठभेद में हैं। फलश्रुति केवल अंतिम दोहे में है, जिसका क्रमांक नहीं होता, इसलिए फलश्रुति का अलग खंड नहीं बनाया; उस दोहे को फलश्रुति के रूप में चिह्नित किया है।
गणेश · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में गणेश जी की सरल पूजा: बारह नामों से स्मरण, दूर्वा, लाल फूल, सिंदूर, मोदक या लड्डू का भोग, आरती और तीन परिक्रमा। बुधवार, चतुर्थी और हर शुभ काम से पहले।
गणेश · आरती
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा
गणेश · स्तोत्र · संस्कृत
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्
गणेश · आरती · मराठी
सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची
गणेश · श्लोक · संस्कृत
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ
गणेश · स्तोत्र · संस्कृत
मुदाकरात्तमोदकं सदाविमुक्तिसाधकं
चौपाई 37 में “रामसुन्दर प्रभुदासा” नाम आता है, इसलिए इन्हें रचयिता माना जाता है। इनके बारे में और प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।
जिन स्रोतों से यह पाठ मिलाया गया, उन सब में चौपाइयाँ अड़तीस ही हैं। चालीसा नाम इस तरह की स्तुतियों का प्रचलित नाम है।
शनिदेव की दृष्टि पड़ने से बालक का सिर उड़ने और विष्णु जी के हाथी का सिर लाने वाली कथा, जो ब्रह्मवैवर्त पुराण की परंपरा से जुड़ी है।
गणेश चतुर्थी और गणेशोत्सव में, बुधवार को, चतुर्थी तिथि पर, और किसी शुभ काम के आरंभ में।
अंतिम दोहा कहता है कि जो ध्यान लगाकर यह चालीसा पढ़ता है, उसके घर में नित नए मंगल बसते हैं और उसे संसार में सम्मान मिलता है। यह चालीसा का अपना वचन है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।